Ek Yogi ki Aatmkatha - 19 books and stories free download online pdf in Hindi

एक योगी की आत्मकथा - 19

{ मेरे गुरु कोलकाता में, प्रकट होते हैं श्रीरामपुर में }

“ईश्वर के अस्तित्व के विषय में शंकाओं से मैं प्रायः उद्विग्न हो जाता हूँ। फिर भी एक कष्टप्रद विचार बार-बार मुझे सताता रहता है: क्या आत्मा में ऐसी सम्भावनाएँ नहीं हो सकतीं जिन्हें मानवजाति ने कभी प्रयुक्त ही न किया हो ? यदि इन सम्भावनाओं का पता मनुष्य नहीं लगा पाता, तो क्या वह अपने वास्तविक लक्ष्य से चूक नहीं जाता ?”

यह मन्तव्य पंथी छात्रावास के कमरे में मेरे साथ रहने वाले दिजेन बाबू ने तब प्रकट किया जब मैंने उन्हें आकर अपने गुरु से मिलने के लिये कहा।

“श्रीयुक्तेश्वरजी तुम्हें क्रियायोग की दीक्षा देंगे,” मैंने उत्तर दिया। “उससे एक दिव्य आंतरिक विश्वास के द्वारा ऐसी द्वन्द्वात्मक वैचारिक खलबली शान्त हो जाती है।”

उस दिन शाम को दिजेन बाबू मेरे साथ आश्रम आये। गुरुदेव के सान्निध्य में उन्हें ऐसी आध्यात्मिक शान्ति का लाभ हुआ कि शीघ्र ही वे नियमित रूप से आश्रम में आने लगे।

दैनिक जीवन की छोटी-मोटी आवश्यकताओं की पूर्ति में व्यस्त रहने से ही हमारी गहनतम आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो जाती; क्योंकि मनुष्य में ज्ञान की भी स्वाभाविक तृष्णा होती है। मेरे गुरु की बातों से दिजेन बाबू अपने अन्तर में एक क्षणभंगुर जन्म के उथले अहंकार से अधिक गहरे सच्चे आत्मस्वरूप को खोजने का प्रयास करने में प्रेरित हुए।

दिजेन और मैं, दोनों ही श्रीरामपुर कॉलेज में बी.ए. की पढ़ाई कर रहे थे, इसलिये हमारी यह आदत ही बन गयी कि कॉलेज से छुट्टी मिलते ही दोनों साथ-साथ चलकर आश्रम पहुँच जाते थे। हम प्रायः श्रीयुक्तेश्वरजी को दूसरे तल्ले की बाल्कनी में खड़े देखते और जैसे-जैसे हम आश्रम के करीब पहुँचते, वे हमारी ओर देखकर मुस्कराते रहते।

एक दिन दोपहर को जब हम आश्रम के द्वार पर पहुँचे तो आश्रम में रहने वाले कन्हाई नामक एक लड़के ने हमें निराश करने वाला समाचार सुना दिया।

“गुरुदेव यहाँ नहीं हैं; एक अत्यावश्यक सूचना मिलने से उन्हें कोलकाता जाना पड़ा।”

दूसरे दिन मुझे गुरुदेव का एक पोस्टकार्ड मिला। उन्होंने लिखा थाः “मैं बुधवार की सुबह यहाँ से चल पडूगा। तुम और दिजेन सुबह नौ बजे श्रीरामपुर स्टेशन पर मिलो।”

बुधवार को सुबह लगभग साढ़े आठ बजे श्रीयुक्तेश्वरजी का मनः संचार पद्धति ( Telepathy) से भेजा गया सन्देश मेरे मन में बार-बार दृढ़तापूर्वक उभरने लगा: “मुझे रुकना पड़ रहा है; नौ बजे स्टेशन पर मत आना।”

दिजेन बाबू पहले ही कपड़े पहने स्टेशन जाने के लिये तैयार हो गये थे; तभी मैंने उन्हें यह नवीनतम सन्देश सुनाया।

“तुम और तुम्हारी अन्तप्रेरणा !” उनकी आवाज़ में तिरस्कार की धार थी। “मैं तो गुरुदेव के लिखित सन्देश पर ही विश्वास करना श्रेष्ठ समझता हूं।”

मैंने अपने कंधे उचकाये और शान्त निश्चय के साथ बैठ गया। दिजेन बाबू गुस्से में बड़बड़ाते हुए दरवाज़े से बाहर गये और उसे ज़ोर की आवाज़ के साथ अपने पीछे बन्द कर चले गये।

कमरे में कुछ अन्धेरा-सा होने के कारण मैं बाहर सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। सूर्य का मन्द प्रकाश हठात् एक ऐसी तीव्र ज्योति में बदल गया कि उसमें लोहे की छड़ें लगी खिड़की पूर्णतः अदृश्य हो गयी। इस दीप्तिमान पृष्ठभूमि पर श्रीयुक्तेश्वरजी स्पष्टतया प्रकट हुए!

विस्मयविमूढ़-सा होकर मैं तुरन्त कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और उन्हें प्रणाम करने के लिये झुका। अपने गुरु के चरणों में आदर व्यक्त करने की अपनी आदत के अनुसार मैंने उनके जूतों का स्पर्श किया। टाट के तलेवाले नारंगी कैनवस के ये जूते मेरे चिर परिचित थे। उनका गेरुआ वस्त्र उड़ उड़ कर मेरे शरीर का स्पर्श कर रहा था। न केवल उनके वस्त्र की बुनाई को ही, बल्कि उनके जूतों के खुरदरेपन को और उनके भीतर हाथों को लगते उनके पाँवों की उँगलियों के दबाव को भी मैं स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था। आश्चर्य से अवाक् खड़ा होकर मैं प्रश्नार्थक दृष्टि से उनकी ओर देखता रहा।

“मैं खुश हूँ कि तुम्हें मेरा मनःसंचारित सन्देश मिल गया।” गुरुदेव का स्वर शान्त और सदा की तरह ही सहज था । “अब कोलकाता में मेरा काम समाप्त हो गया है और दस बजे की गाड़ी से मैं श्रीरामपुर पहुँच रहा हूं।”

मैं अब भी अवाक् ही रहकर उनकी ओर देख रहा था। श्रीयुक्तेश्वरजी कहते गये: “यह कोई आभास नहीं, बल्कि मेरा हाड़-मांस का शरीर है। पृथ्वी पर अत्यंत दुर्लभ यह अनुभव तुम्हें प्रदान करने की आज्ञा मुझे ईश्वर ने दी है। मुझे स्टेशन पर मिलो; अभी मैं जिस परिधान में हूँ, उसी परिधान में तुम और दिजेन मुझे अपनी ओर आते देखोगे। मेरे आगे-आगे, उसी ट्रेन से उतरा एक छोटा बच्चा हाथ में चाँदी का लोटा लिये चल रहा होगा।"

मेरे गुरु ने अपने दोनों हाथ मेरे मस्तक पर रखकर आशीर्वाद दिया। जैसे ही उन्होंने विदा लेने के लिये, “तबे आशी”* कहा, मुझे एक अजीब प्रकार की गड़गड़ाहट** सुनायी देने लगी। उस तीव्र प्रकाश में धीरे-धीरे उनका शरीर विलीन होने लगा। पहले उनके चरण और टाँगें विलीन होकर अदृश्य हो गये, बाद में धड़ और फिर सिर, जैसे किसी लेखपट को कोई नीचे से ऊपर की ओर लपेट रहा हो। अंतिम क्षण तक, मेरे बालों पर हलके से टिकी उनकी उँगलियों का स्पर्श मैं अनुभव कर रहा था। धीरे धीरे वह दीप्तिमान प्रकाश लुप्त हो गया; अब मेरी दृष्टि के सामने छड़ें लगी खिड़की और मंद सूर्यप्रकाश के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा।

* (बंगाली भाषा में “तो मैं आता हूँ।”)

** (शरीर के अणुओं के विघटन से होने वाली ध्वनि।)


मैं यह सोचता हुआ अर्द्धग्लानि की अवस्था में खड़ा रहा कि कहीं मैं चित्त भ्रम का शिकार तो नहीं हो गया था। शीघ्र ही दिजेन बाबू मुँह लटकाये कमरे में दाखिल हुए।

“गुरुदेव न तो नौ बजे पहुँचने वाली गाड़ी में थे और न ही साढ़े नौ बजे पहुँचने वाली गाड़ी में।” उनके स्वर में अपनी भूल के अहसास की किंचित् सी झलक थी।

“चलो, मैं जानता हूँ वे दस बजे की गाड़ी से आ रहे हैं।” मैंने दिजेन बाबू का हाथ पकड़ा और उनके विरोध की ओर कोई ध्यान न देकर उन्हें अपने साथ खींचता ले गया। लगभग दस मिनट में हम लोग स्टेशन पहुँच गये जहाँ गाड़ी अभी-अभी आकर रुक ही रही थी।

“पूरी गाड़ी गुरुदेव के तेज के आलोक से भरी हुई है। वे इसमें हैं!” आनन्द से मेरे उद्गार निकले।

“तुम ऐसे ही सपना देख रहे हो?” दिजेन बाबू उपहास के साथ हँस रहे थे।

“हम यहाँ खड़े रहते हैं।” मैंने अपने मित्र को गुरुदेव हमारी ओर किस प्रकार आयेंगे, वह सब बताया। जैसे ही मेरा वर्णन समाप्त हुआ, श्रीयुक्तेश्वरजी हमें दिखायी पड़े। उन्होंने वही कपड़े पहन रखे थे जो थोड़ी देर पहले मुझे दिखायी दिये थे। वे धीरे-धीरे एक चाँदी का लोटा पकड़े चल रहे बच्चे के पीछे आ रहे थे।

अपने विचित्र एवं अपूर्व अनुभव पर मैं एक क्षण के लिये भय से सिहर उठा। मुझे ऐसा लग रहा था मानों बीसवीं शताब्दी का भौतिकतावादी संसार मेरी पकड़ से फिसल रहा है; क्या मैं उस प्राचीन काल में पहुँच गया था जब ईसा मसीह पीटर के सामने सागर जल पर प्रकट हो गये थे?

“ मैंने तुम्हें भी सन्देश भेजा था, पर तुम उसे ग्रहण नहीं कर सके।” दिजेन बाबू चुप थे, पर सन्देह के मारे मेरी ओर क्रोधभरी दृष्टि से देख रहे थे। अपने गुरुदेव को आश्रम में पहुँचा देने के बाद दिजेन बाबू और मैं श्रीरामपुर कॉलेज की ओर जाने लगे। रास्ते में अचानक दिजेन बाबू रुक गये, उनके प्रत्येक रंध्र से जैसे रोष बह रहा था।

“तो! गुरुदेव ने मेरे लिये सन्देश भेजा था! फिर भी तुमने उसे छुपाकर रखा! इसका कोई कारण बता सकते हो ?”

“यदि तुम्हारे मन का दर्पण अशान्ति से इतना चंचल है कि गुरुदेव के निर्देशों को तुम उसमें पढ़ नहीं पाते, तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?” मैंने पलटकर जवाब दिया।

दिजेन बाबू के चेहरे से क्रोध लुप्त हो गया। “अब मेरी समझ में आ रहा है तुम क्या कहना चाहते हो,” उन्होंने खेदभरे स्वर में कहा। “परन्तु फिर भी कृपा करके मुझे यह बताओ कि लोटा पकड़े बच्चे के बारे में तुम्हें पूर्व जानकारी कैसे मिली ?”

उस दिन प्रातःकाल छात्रावास में गुरुदेव के प्रकट होने की अलौकिक कहानी जब तक मैंने पूरी की, तब तक हम श्रीरामपुर कॉलेज पहुँच चुके थे।

दिजेन बाबू ने कहा: “तुम्हारे गुरु की शक्तियों का जो वर्णन मैंने अभी-अभी तुमसे सुना है, उसके आगे तो लगता है कि संसार के सारे विश्वविद्यालय शिशु विद्यालय मात्र हैं।”*


* “मुझे ऐसे-ऐसे सत्यों का दर्शन हुआ है कि मैंने जो कुछ लिखा है वह सब अब मुझे तिनके से अधिक मूल्यवान प्रतीत नहीं होता।”
ये उद्गार “धर्म पंडितों के राजा” माने जाने वाले सेंट टामस ऐक्वीनास ने उनके सचिव द्वारा 'सम्मा थियोलोजिए' (Summa Theologiae) नामक पुस्तक को पूरा करने के लिये बारबार आग्रह करने पर निकाले थे। सन् १२७३ में एक दिन नेपल्स के एक गिरजाघर में सामूहिक प्रार्थना के दौरान सेंट टामस को एक अति गहन अन्तर्ज्ञान की अनुभूति हुई। दिव्य ज्ञान की महिमा से वे इतने अभिभूत हो गये कि उसके बाद बौद्धिक तर्कवितर्क में उन्हें कोई रस नहीं रहा।
इसी प्रकार सुकरात के शब्द (प्लेटो के 'फीड्स' में) भी मननीय हैं: “अपने बारे में मैं इतना ही जानता हूँ कि मैं कुछ भी नहीं जानता।”