Great Thinking Part 6 Mans Time Speaks in Hindi Motivational Stories by r k lal books and stories PDF | महान सोच - भाग 6 (आदमी का समय बोलता है)

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महान सोच - भाग 6 (आदमी का समय बोलता है)

महान सोच भाग 6 (आदमी का समय बोलता है)

आर ० के ० लाल


अनंत शहर के एक बड़े अस्पताल में आर्थोपेडिक सर्जन थे । अनंत के पिता प्रकाश के खास दोस्त संपत के घुटनों में काफी दिनों से दर्द था इसलिए उन्होंने प्रकाश से कहा कि आपके बेटे की क्लीनिक है। शहर में उनका नाम है, इसलिए मैं चाहता हूं कि आप उनसे मुझे कुछ दवा दिला दें । अभी यह शुरुआती दर्द है जो ठीक हो जाएगा वरना बाद में नी रिप्लेसमेंट के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा। प्रकाश ने बताया कि उनके बेटे सिविल लाइंस स्थिति क्लीनिक में शाम को 6.00 से 8:00 बजे तक मिलते हैं। मैं फोन कर दूंगा।

डॉ अनंत अपने पेरेंट्स से अलग रहते थे तथा ज्यादा बिजी रहते थे इसलिए प्रकाश केवल उनसे फोन पर ही बात कर सकते थे, परंतु पिछले दो दिनों से उनका फोन ही नहीं लग रहा था। उनके असिस्टेंट ने बताया कि डॉक्टर

ओ ० टी० में हैं। उनका कोई फोन न आने पर प्रकाश ने संपत को एक पर्ची लिखकर दे दी और कहा कि आप चले जाइए, काम हो जाएगा"।

संपत ने संकोच में फीस के बारे में नहीं पूछा और शाम को क्लीनिक पहुंच गए। वहां पर कई पेसेंट डॉक्टर साहब की प्रतीक्षा कर रहे थे। संपत ने डॉक्टर के क्लर्क को प्रकाश द्वारा लिखी हुई परची दी ।

वहां अर्जेंट कैटेगरी के मरीज भी थे जो पंद्रह सौ रुपए फीस दे रहे थे इसलिए उन्हें पहले दिखाया जाएगा। लगभग डेढ़ घंटे प्रतीक्षा करने के बाद डॉक्टर साहब आये। क्लर्क अर्जेंट मरीजों को भेजने लगा। डॉक्टर साहब बहुत समय दे रहे थे और संपत बैठे-बैठे ऊंघ रहा था, 9.00 बज गए थे। संपत के पुनःअनुरोध करने पर  क्लर्क ने पर्ची डॉक्टर साहब को दी तो उन्होंने उसकी उनकी फाइल तैयार करने को कहा और उसे बताया कि पिताजी ने इनको भेजा है इसलिए कायदे से सारी जांच करा लेना। क्लर्क ने उनका बायोडाटा नोट किया तथा ब्लड प्रेशर, टेंपरेचर, आर बी एस, थायराइड जानने के टेस्ट किए। पैरों और घुटनों के एक्सरे के साथ ई सी जी भी करवाया। यह सब करने में दस बज गए थे।  अब संपत को डॉक्टर साहब ने भीतर बुलाया और उन्हें एक गिलास ठंडा पानी पिलाया तथा उनका हालचाल पूछा।  वह एक्स-रे आदि देख रहे थे और उनसे बात भी कर रहे थे। कहने लगे,  "आप तो पापा के दोस्त हैं । आप पापा को क्यों नहीं समझाते ? लगता है पापा सठिया गए हैं, मेरी कोई बात नहीं मानते, आए दिन बीमार रहते हैं। यह भी नहीं होता कि कहीं घूमने चले जाएं । हमेशा पैसे और जायजाद के चक्कर में ही पड़े रहते हैं । जरा उनको समझाइए कि सब हम दो भाइयों के नाम करके छुट्टी पा लें।" उनका मन रखने के लिए संपत ने हां में हां मिलाई। बीमारी के विषय में डॉक्टर साहब ने कहा, "वैसे तो आपका यूरिक एसिड,आरबीएस और इ सी जी आदि सब सही है लेकिन आपको अर्थराइटिस है।  मुझे लगता है कि आपको जल्दी से जल्दी नी ऑपरेशन करा लेना चाहिए।  आपके पास मेडीक्लेम पालिसी तो होगी ही, सब कुछ कैशलेस हो जाएगा ।इतना कह कर के उन्होंने दस बारह दवाइयां लिख दीं और तीन दिन बाद पुनः दिखाने को कहा।

संपत ने औपचारिकताबस फीस के विषय में पूछ लिया। वे बोले आप पापा के दोस्त हैं तो आपसे फीस कैसे ले सकता हूं। आप केवल टेस्ट के चार्जेज ही दीजिएगा । डॉक्टर साहब चले गए और संपत को दवा और टेस्ट के बत्तीस सौ रुपए देने पड़े।

संपत को लगा कि डॉक्टर साहब को दिखाने से कोई फायदा नहीं हुआ। उन्हें तो बहुत हल्का सा दर्द था और आपरेशन की कोई नौबत नहीं थी। कुछ थेरेपी और हल्की दवाइयों से भी काम चल सकता था । डॉक्टर अपने पिता की शिकायत ज्यादा कर रहे थे और  मर्ज के बारे में कम इंटरेस्ट ले रहे थे।

 दूसरे दिन उन्होंने प्रकाश को सारा किस्सा बताया और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की तो प्रकाश कटे पेड़ की तरह धम्म से बैठ गए । प्रकाश बोले एक साधारण दर्द के लिए के लिए इतने जांच की जरूरत नहीं थी। पता नहीं क्यों मेरी शिकायत आपसे की?  फोन भी करने का उसके पास समय नहीं है लेकिन मेरे जायजाद की बड़ी चिंता है उसे। मैं तो मरते दम तक कोई फूटी कौड़ी भी किसी को नहीं देने वाला, सब मतलबी हैं यहां। आज मैं अकेले रहता हूं तो कोई मदद के लिए नहीं आता। 

प्रकाश इस प्रकरण को अपनी बेइज्जती समझ रही थे। उन्हें कई दिनों तक ठीक से नींद नहीं आई । वे सोच रहे थे कि जीवन भर हमने कड़ी मेहनत करके सब कुछ बच्चों के लिए जमा किया, दान दक्षिणा भी नहीं दिया। पता नहीं मेरे जीवन का उद्धार कैसे होगा ? मरने के बाद तो यह सब यहीं रह जाएगा । अकेलेपन से ग्रसित उनका व्याकुल मन जीवन से भी निराश हो चुका था। सोचा कि अब तो थोड़ी उम्र रह गई है, अपनी भूल सुधार लेनी चाहिए और कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे लोग उन्हें याद करें।

 सोशल वर्क के रूप में वे लोगों के हेल्थ प्रॉब्लम के विषय में सही जानकारी और आसान इलाज दिलाने का काम करने की सोचने लगे क्योंकि अज्ञानता और सोशल मीडिया पर उत्तपन्न कन्फ्यूजन के कारण लोग यह भी निर्णय नहीं कर पाते कि एलोपैथी, होम्योपैथी,  आयुर्वेद या नेचुरोपैथी आदि में से किस पद्धति को अपनाया जाए। कई तो घरेलू इलाज भी गलत ढंग से करते हैं। इसलिए  बीमारियां और उसकी भयानकता बढ़ रही है। 

प्रकाश ने सोचा कि अपनी कमाई का एक हिस्सा इन कार्यों में और लोगों को जागरूक करने में खर्च करेंगे। 

उन्होंने हेल्थ कैंपों का आयोजन करने की सोची जिसमें  शहर के नामी डॉक्टर और मेडिकल क्षेत्र में देश के विशेषज्ञों को बुलाने की योजना बनाई। इस कार्य में संपत जैसे दो  चार दोस्तों ने भी उनका साथ दिया । इसमें होने वाले खर्च को स्वयं प्रकाश जी सहने को तैयार थे।

पहला कैंप मोहल्ले के ही पार्क में आयोजित करने की तैयारी चल ही रही थी कि जिले के एक पैथोलॉजी सेंटर से फोन आया कि वह कैंप में नि:शुल्क ब्लड टेस्ट करना चाहते हैं। इस फोन को पाकर प्रकाश जी तो खुशी से झूम उठे। उनका सभी सपोर्ट कर रहे थे।  मोहल्ले के एक डेंटल डॉक्टर ने भी फ्री डेंटल चेकअप करने की पेशकश की। इस प्रकार उनका पहला कैंप बहुत ही सफल रहा।  कोई खास खर्च भी नहीं आया । उन्होंने इस कैंप के फोटोग्राफ्स और विवरण मीडिया पर भी मैसेज किए जिसे सभी ने खूब सराहा। फेसबुक पर एवं व्हाट्सएप पर उन्हें धन्यवाद पर धन्यवाद और लाइक मिल रहे थे। यह देखकर शहर के तीन अस्पताल, ब्लड सेंटर, और आंख के एक डॉक्टर ने अगले कैंपों में सहयोग देने का प्रस्ताव दे दिया। प्रकाश जी कभी आई कैंप, कभी घुटनों की दर्द से छुटकारा पाने का कैंप, कभी गायनाकोलॉजिस्ट , कार्डियोलॉजिस्ट और कभी विकलांगों के लिए विशेष कैंप का आयोजन करने में लग गए हैं। इस कार्य में उन्हें बहुत मजा आ रहा था । उन्होंने तो स्थानीय एक सामाजिक संस्था को एक लाख रुपए का चेक भी दिया ताकि उनके माध्यम से कैंप आयोजित हो सके।

प्रकाश जी का मानना था कि आज लोगों की सोच बदल रही है। अनेक  अन्य भारतीय तरीकों जैसे योग, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंचर, नेचुरोपैथी, आयुर्वेद , घरेलू उपचार आदि से अब स्वस्थ रहा जा सकता है और गंभीर से गंभीर बीमारियों का इलाज किया जा सकता है।   बस लोगों को सही जानकारी देने की जरूरत है ।

अब प्रकाश जी के चेहरे पर एक नई चमक आ गई थी, उनका अकेलापन और बीमारी खत्म हो गई थी। शायद वे पंद्रह से बीस साल और जीवित रहेंगे । अब वे अपने डॉक्टर बेटे से भी बात नहीं करते क्योंकि उन्हें समाज सेवा से फुरसत ही नहीं है। अब उनका समय बोल रहा था।


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