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दलदल से बाहर

दलदल से बाहर...   (डॉ.भावना शुक्ल )

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 आज मन बहुत प्रफुल्लित हो रहा था गर्मी की छुट्टी बिताने के बाद अपने घर जा रहे थे अब  प्रतीक्षा समाप्त हो रही थी जल्दी ही परिवार से मिलेंगे .

और अभी हम लोग जबलपुर स्टेशन पर हम ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। आज ट्रेन बहुत लेट होती जा रही थी। तभी मेरी नजर एक महिला पर पड़ी कुछ लोग उसे पुष्पगुच्छ दे रहे, माला पहना रहे हैं। उन्हें देख लग रहा जैसे बहुत ही सम्मानित व्यक्तित्व है।

एक सज्जन ने कहा... "मैंम दिल्ली पहुंच कर अगले प्रोग्राम के विषय में बताइएगा।"

उन्होंने कहा... "जी अच्छा।"

ट्रेन प्लेटफार्म पर लग रही है मन सोच रहा है। कौन है यह प्रभावशाली महिला? भैया ने ट्रेन में सामान चढ़ाया और मैं पापा, मम्मी, भाई बहन से विदा लेकर ट्रेन में चढ़ गई, ट्रेन में चढ़ते ही मैंने देखा सम्मानित डिब्बे में है और बाजू के कंपार्टमेंट में बर्थ है। उत्सुकता बढ़ गई साथ ही है पता भी  चल जाएगा कि कौन है? उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कोई फतेह हासिल कर ली है मुझे भी उन्हें देख कर अच्छा लग रहा था क्योंकि मैं भी एक महिला हूँ।

गाड़ी ने अपनी रफ्तार पकड़ ली थी। मन सवालों के घेरे में था कि यह... इतने में मेरे मन में सवाल किया क्यों न स्वयं ही उनसे बात करके पूछ लूं और सारे सवालों का जवाब मिल जाएगा। यह बात कुछ जंची।

मैं उनके पास जाने की हिम्मत जुटाने लगी। मेरी नजर उन पर ही थी वह सामान ठीक से रख रही थी। तभी उनका मोबाइल बज उठा... बात करने लगी मराठी में, थोड़ा-थोड़ा मेरी भी समझ में आया क्योंकि मैं भी महाराष्ट्र रह चुकी थी इनकी बोली भाषा से पता चल गया यह महिला महाराष्ट्रीयन है। थोड़ी हिम्मत बंध गई. फोन बंद हुआ मैं हिम्मत जुटाकर पहुंच गई उनके पास।

मैम नमस्ते... "आप कहाँ जा रही हैं।"

उन्होंने कहा..."नमस्ते मैं दिल्ली जा रही हूँ आइए बैठिए यहाँ।"

मैंने कहा... "जी धन्यवाद। दिल्ली में कौन है?"

उन्होंने कहा... "बड़ी बेटी है वह हॉस्टल में रहकर एमबीए कर रही है।"

मैं जान सकती हूँ आप कौन हैं? आपका नाम क्या है? लोग आपको इतना मान दे रहे थे देख कर बहुत अच्छा लग रहा था।

उन्होंने कहा... "जी मैं कुछ भी नहीं हूँ मुझे यहाँ पर लायंस ग्रुप में फाउंडेशन वूमेन अवार्ड से सम्मानित किया है। मेरा नाम शुभी मानेकर है।"

आप क्या करती हैं?

उन्होंने कहा... "मैं बेबस लड़कियों को दलदल से निकालने का कार्य करती हूँ और स्वच्छता अभियान चलाती हूँ।"

अरे वाह! आप तो बहुत अच्छा कार्य करती हैं। आप वास्तव में सम्मान के पात्र हैं। आज देखा जाए तो बेबस लड़कियों की संख्या ज़्यादा होती जा रही है।

उन्होंने कहा..."आप सही कह रही हैं और उन बेबस लड़कियों को बरगलाकर उनका लाभ उठाने वालों की संख्या भी कुछ ज़्यादा है। मैं उन्हें सही रास्ता दिखाने का कार्य करती हूँ।"

जी बहुत बढ़िया... ' मैम आप रहती कहाँ है। "

जी मैं... "मुंबई में रहती हूँ।"

यह सुनकर मन खुशी से झूम उठा क्योंकि मैं भी कई वर्ष में गुजार चुकी हूँ।

आपके कितने बच्चे हैं। आपके साहब क्या करते हैं? और कौन-कौन है घर में...

मेरी दृष्टि मैम की तरफ गई मैंने देखा... मेरे-मेरे प्रश्नों की झड़ी जैसे उनके मन में भूचाल ला दिया।

चेहरा तमतमा गया। आंखों से आंसू निकलने लगे। मुझे एक क्षण को लगा मैंने ऐसा कौन-सा सवाल पूछ लिया जिससे उन पर असर हुआ। मैंने उन्हें जल्दी से पास में रखी पानी की बोतल दी। उन्होंने पानी पिया...

मैंने कहा... "मैम मैंने अगर कुछ ग़लत प्रश्न किया हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ..."

उनके आंसू ऐसे जैसे बरसात की झड़ी, थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मैंने उनका हाथ पकड़ कर ढांढस बंधाया और कहा चुप हो जाइए. कंपार्टमेंट में कोई नहीं था। केवल मैम ही थी और बाजू से किसी को यह दृश्य दिखाई नहीं दे रहा था...

मैंने कहा... "मैंम आप थोड़ा आराम कर लीजिए मैं अब चलती हूँ। आपके दिल को ठेस पहुंचाने के लिए माफी चाहती हूँ।"

जैसे ही मैं उठी... "उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहने लगी... अब सवाल किया है तो उसका उत्तर भी सुनती जाओ. आज बरसों बाद किसी ने मुझसे यह सवाल किया है। जख्म जैसे हरे हो गये..." ।

बात उस समय की है जब मैं बहुत छोटी थी घर पर सबकी लाडली थी माँ बापू मुझे बहुत प्यार करते थे लेकिन का सपना था मैं अपनी लाडो की शादी बहुत अच्छी जगह धूमधाम से करूंगा पहले मुझे उसे बहुत पढ़ाना है लिखाना है लेकिन गांव का माहौल तथा बड़े बुजुर्गों की सोच के कारण मेरी शादी (14 वर्ष) छोटी उम्र में हो गई और शादी के 1 वर्ष बाद मैंने एक लड़के को जन्म दिया। घर का माहौल अच्छा नहीं था पति जो मिला और शराबी था मारता पीटता था उनके जुल्मों को सहती रही थी।

एक दिन पति ने बड़े प्यार से कहा अब तुम्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है अब हम लोग मुंबई चलकर रहेंगे वहाँ जाकर में नौकरी कर तुम सबको पालूंगा हमने सोचा आप शायद सुधर रहे हो हमारे अच्छे दिन आ रहे हैं उन पर विश्वास कर हम लोग मुंबई आ गए.

कुछ समय बाद पति काम पर गया था रात हो गई पति वापस नहीं आया तो मैं हैरान परेशान हो गई. रात के करीब 2: 00 बजे दरवाज़ा खटखटाने की आवाज आई मैं खुशी से झूम उठी चलो इसका बापू आ गया जैसे ही दरवाजा खोला दरवाजे पर 4 लोग खड़े थे उन्हें देखकर मैं घबरा गई... कुछ बोलते ही न बना और देखते ही देखते वे लोग बड़े हक से घर के अंदर घुस आए और बोले चल मेरे साथ मैंने कहा कौन हो और कहाँ जाने की बात कर रहे हो तभी उनमें से एक ने कहा तेरे आदमी ने हमसे तेरा सौदा किया है और वह शहर छोड़ कर चला गया यह सुनकर काटो तो खून नहीं... सोच नहीं पा रही थी कि आदमी इस हद तक गिर जाएगा।

मैं कहती रही मुझे छोड़ दो मैं नहीं चलूंगी लेकिन मैं अकेली बच्चे के साथ चार का मुकाबला नहीं कर पा रही थी जबरदस्ती ले गए और एक कमरे में बंद कर दिया बच्चा लगातार रोता रहा और मैं उन चारों की हवस का शिकार बनती है।

एक दिन मौका पाकर में बच्चे को लेकर भाग निकली कहीं झुग्गी में जाकर आसरा लिया मन में सौ बार विचार किया अपने और बच्चे की इहलीला समाप्त कर लूँ लेकिन फिर सोचा हिम्मत नहीं हारना है डटकर मुकाबला करना है अब बच्चे को पालना है खर्चा कहाँ से आता काम की तलाश करती थी लेकिन काम न मिला। बस केवल व्यापार करते रहे बच्चे को पालना है यह भी मंजूर कर लिया और मैंने अपने शरीर का बलिदान कर यह ज़िन्दगी भी स्वीकार कर ली.बस यही सोचते रहे कुछ पैसे आ जाये तो नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करूँ ।

कुछ यूं ही दिन बीतते गए मैं सिर्फ़ यह देख रही थी कि इस दुनिया में शरीर के भूखे कितने हैं दरिंदगी किस कदर भरी पड़ी है लोग अपने परिवार पत्नी बच्चों को कितना धोखा देते हैं बेचारी पत्नी को क्या मालूम कि पति पैसों की चमक दिखाकर पत्नी को खुश कर देता है परिवार में अपनी अच्छी खासी साख बनाता है और हवस का शिकार किसी और को बनाता है उसकी बुराइयाँ दिखाई नहीं देती मेरी तो मजबूरी है बच्चा न होता तो शायद मर भी जाती।

कुछ समय बाद अब समय आ गया जैसे मैंने सोचा था मेरे पास बहुत सारा पैसा यानी 50, 000 हो गये सोचा कोई धंधा चालू करूंगी और यह मजबूरी का काम छोड़कर अच्छे से जीवन जिऊंगी। लेकिन जिसकी ज़िन्दगी में उजाला न हो सिर्फ़ अँधेरा ही अँधेरा हो तो रोशनी की किरण कहाँ से आ सकती है। एक दिन न जाने कहाँ से मेरा पति का प्रकट हो गया मैंने सोचा अब शायद जीवन बदल जाएगा शायद इसे पछतावा हुआ है इसी कारण यह आ गया है मन ही मन मैंने उसे माफ़ कर दिया सोचा जीवन तो जीना है साथी  तो चाहिए. लेकिन मेरा पति उसी रात मुझे सोता छोड़कर जमा किया हुआ 50, 000 और बच्चा लेकर चला गया और वापस कभी न आया सर पीटने के सिवाय कोई चारा न बचा सोचा पटरी के नीचे आकर अपनी जान दे दूँ लेकिन मैंने सोचा इस संसार का मुकाबला कर तूने बहुत संघर्ष किए कोई मुकाम हासिल नहीं किया कुछ ऐसा करना है मुझ जैसी लाचार कोई और न हो।

फिर नये सिरे से जीना शुरु किया। जहाँ मैं रहती थी उसी जगह पर एक युवक काम करता था उसे मेरी वस्तुस्थिति पता थी। वह मेरा ध्यान रखने लगा मुझे बहुत समझाता कहता शुभी तुम्हें जीना है रोने से काम नहीं चलेगा धीरे-धीरे उससे लगाव होने लगा। मैं बेबस करती भी क्या? मुझे एक दिन उसने विवाह का प्रस्ताव मेरे सामने रख दिया और मैं मना न कर पाई क्योंकि मुझे भी सहारे की ज़रूरत थी लगा जैसे मेरी जीवन को किनारा मिल गया युवक का कहना था मैं थोड़े पैसे जमा कर लूं फिर तुम्हें इस दलदल में से निकाल कर ले चलूंगा। मैंने भी सोचा जब सहारा दिया है अपना माना हैं तो दलदल से ज़रूर निकलेगा।

कुछ दिन बाद मैंने एक बेटी को जन्म दिया लगा धीरे-धीरे गाड़ी पटरी पर आने लगी बेटी 2 वर्ष की हो गई मन उसे देख खुश होने लगा कुछ समय बाद फिर मैं माँ बनने वाली थी पति ने कहा अब चिंता न करना सब ठीक हो जाएगा मैं भी निश्चिंत हो गई क्योंकि आप घर को संभालने वाला है. लेकिन यह मेरा भ्रम था मेरी ज़िन्दगी में ग्रहण का असर अभी तक कम नहीं हुआ है मेरा दूसरा पति भी एक दिन मुझे बेसहारा छोड़ कर चला गया उसके जाने के कुछ दिन बाद दूसरी बेटी ने जन्म लिया एक बार फिर भाग्य ने मुझे उसी दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। सोचा क्या किस्मत पाई है अब इस दुनिया में दो बेटियों के साथ जीना कितना दुष्कर है. जिसकी माँ कभी देह व्यापार के दलदल में रही हो उसकी बेटियों को सही नजर से कैसे देखा जा सकता है लेकिन इस जीवन को जीना है बच्चों को अच्छी तरह परवरिश देनी है फिर मैं अपने ग्राहकों की सोच खोज में जुट गई बढ़ती उम्र और मुसीबतों की मारी मुझे कोई पसंद नहीं करता भूख से बेहाल बच्चों को देखकर ऐसा लगता था कि आत्महत्या कर लूँ पर सोचा मासूम बच्चों ने दुनिया देखी नहीं ऐसे में अपने शरीर का त्याग और उनकी हत्या ...नहीं नहीं...एक नया जीवन दूंगी। एक मिसाल बनूँगी।

ढलती उम्र में देह का खरीददार न मिलने पर भीख मांग कर गुजारा करना प्रारंभ कर दिया दिन बीतने लगे भीख मांग-मांग कर बच्चों का पेट भरने लगी।

एक दिन अचानक भीख मांगते-मांगते मेरी मुलाकात प्रज्ञा नामक संस्था के संस्थापक से हुई. उन्होंने कहा भीख मांगने की बजाय कुछ ऐसा काम आप करो जिससे आप लोगों का सहारा बनो देखने में तो आप अच्छे घर की लगती हो फिर यह काम क्यों? ... मैंने अपनी आपबीती कह सुनाई सुनकर वे दंग रह गए और अपनी संस्था ले गए वहाँ हमारी रहने की व्यवस्था की उनकी प्रेरणा हमारे लिए लाभदायक साबित हुई और मैंने अपने आप को इस दलदल से बाहर निकाला और एक नई राह की ओर चल पड़ी।

अब तक मैं कई बेबस लड़कियों को इस दलदल से बाहर निकाल चुकी हूँ जागरूकता का कार्य कर रही हूँ, स्वच्छता अभियान चला रहीं हूँ तथा अपनी जैसी लाचार का जीवन संवारने में जुटी हुई हूँ मुझे अपने बच्चों को सही दिशा देना है लायक बनाना है।

मुझे इस संस्था से जुड़े कई वर्ष हो गए इस प्रज्ञा संस्था ने मुझे राष्ट्रीय स्तर के महिला पुरस्कार से पुरस्कृत किया आज मुझे जबलपुर की 'मधुरम' संस्था ने मेरे कार्य से प्रभावित होकर यहाँ आमंत्रित किया था तथा लाइन्स फाउंडेशन सम्मान से सम्मानित किया गया उसी संस्था के लोग छोड़ने आए थे।

आपने सवाल किया तो मैं सोच में पड़ गई कौन-कौन से बच्चों के बारे और कौन से पति के बारे में बताएँ ...आज फिर से सारे जख्म हरे हो गए.

शुभी मैम की आपबीती सुनकर आंखें छलक आई, मन भर आया मन सोचने को विवश हो गया कितनी बहादुरी और जिंदादिली से उन्होंने जीवन को जिया है।

मैंम आप धन्य हैं आपको शत-शत नमन जिस प्रकार कमल दलदल में उगता है और बाहर खूबसूरत रूप लेता है आप भी उसी कमल की तरह है आपकी तपस्या सफल और सार्थक हो गई.

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