Musafir Jayega kaha? - 29 books and stories free download online pdf in Hindi

मुसाफ़िर जाएगा कहाँ?--भाग(२९)

यहाँ तेजस्वी ने किशोर को अपने कमरें में कैद करके रखा था और उधर ऋषिकेश में ओजस्वी अपनी छोटी बहन और पति का इन्तजार करती रही,लेकिन दोनों ऋषिकेश ना पहुँचे फिर ओजस्वी ने दोनों को वहाँ से तार भेजा और उसका जवाब भी ना पहुँचा तो ओजस्वी को दोनों की बहुत चिन्ता हुई और अब ये खबर लक्खा सिंह तक पहुँची तो वो एक रात आगबबूला होकर हाथ में कुल्हाड़ी लेकर हवेली पहुँचा,वो किशोर को मारने वहाँ आया था और जैसे ही वो हवेली में कुल्हाड़ी लेकर दाखिल हुआ और तेजस्वी के कमरें वो किशोर को मारने पहुँचा तो तेजस्वी ने उससे पूछा.....
"लक्खा! तुम इतनी रात को यहाँ क्या करने आए हो"?
तभी लक्खा बोला....
"मुझे माँफ कर दीजिए छोटी मालकिन लेकिन मैं वो खबर सुनकर रह ना सका और यहाँ उस कमीने किशोर को मारने चला आया,मैंने ठाकुर साहब का नमक खाया है तो मैं ये अनर्थ होते नहीं देख सकता था"
"ये सब मैंने जानबूझकर किया है लक्खा! आखिरकार मैंने बाबूजी की मौत का बदला ले लिया और किशोर को दीदी से अलग कर दिया,जैसे बाबूजी तड़प तड़पकर मरे थे तो वैसे ही ये दोनों भी मरेगें",तेजस्वी बोली...
"सही कह रही हो छोटी मालकिन",लक्खा ने पूछा...
"हाँ! बिलकुल सच! अब तुम यहाँ से चले जाओ और बाद के तमाशे को देखने के लिए तैयार रहना", तेजस्वी बोली...
"लेकिन छोटी मालकिन इस खेल को करने में आपकी इज्जत को भी तो दाग लग रहा है,बाद में आपकी जिन्दगी का क्या होगा",लक्खा ने पूछा...
तब तेजस्वी बोली....
"मुझे उसकी परवाह नहीं लक्खा! अब आग में हाथ डाले हैं तो हाथ तो झुलसेगें ही,ये जिन्दगी भी तो बाबूजी जी की ही दी हुई है और उनके बदले को पूरा करने में अगर ये जिन्दगी तबाह भी हो जाए तो क्या फर्क पड़ेगा,लेकिन मेरा मकसद तो पूरा हो जाएगा ना,मैने उस किशोर को इस पिंजरे में कैद करके रखा है और जब दीदी ऋषिकेश से लौटकर आ जाएगी तो मैं किशोर से साइन करवाकर तलाक के कागजात भेंज दूँगीं और दोनों को अलग करके ही मानूँगी",
"ठीक है छोटी मालकिन तो अब मैं चलता हूँ और इस आग को मैं और भी भड़का दूँगा,पूरे गाँव भर को पता चल जाएगा कि हवेली में क्या हो रहा है",लक्खा बोला...
"हाँ! अब तुम जाओ,कहीं कोई तुम्हें यहाँ देख ना ले",तेजस्वी बोली...
और फिर लक्खा हवेली से मुस्कुराता हुआ चला गया,ठकुराइन की तबियत भी ठीक हो गई थी तो ओजस्वी ने रामस्वरूप जी और नारायन के साथ वापस आने का सोचा और वो सभी ऋषिकेश से लौट आएँ,इधर शान्तिनिकेतन आते ही ओजस्वी ने नौकरों से पूछा....
"साहब कहाँ हैं,वें ठीक तो हैं ना! ऋषिकेश आने को कहा था उन्होंने लेकिन वहाँ पहुँचे ही नहीं",
तब नौकरानी बोली.....
"साहब तो उसी दिन हवेली चले गए थे जब आप ऋषिकेश के लिए निकली थीं और तब से वें शान्तिनिकेतन लौटे ही नहीं",
"ये क्या कह रही हो तुम "?,ओजस्वी ने पूछा...
"जी!सच कह रही हूँ छोटी मालकिन",नौकरानी बोली...
और फिर उस समय लक्खा शान्तिनिकेतन पहुँचा,वो तो इसी ताक में था कि कब ओजस्वी ऋषिकेश से वापस लौटे और वो वहाँ आग लगाने पहुँच जाए फिर जब वो वहाँ पहुँचा तो वहाँ पर रामस्वरूप जी और नरायन भी मौजूद थे और वो ओजस्वी से बोला....
"मालकिन! मुझे माँफ कर दीजिए,मैं ठाकुर साहब की इज्ज़त नीलाम होने से नहीं बचा सका",
"ये क्या कह रहे हो लक्खा"?,ओजस्वी ने पूछा....
"सही कह रहा हूँ मालकिन!आजकल जो हवेली में चल रहा है ना आप उसे सुनेगी तो शर्म से आपकी आँखें झुक जाऐगीं",लक्खा बोला....
"ऐसा क्या चल रहा है हवेली में",ओजस्वी ने पूछा....
तब लक्खा बोला....
"जी!आपके पति और आपकी छोटी बहन ने मिलकर जो अन्धेर मचा रखा है हवेली में,उससे कोई अन्जान नहीं है,जिसके मुँह से देखो बस वहीं बातें सुनने को मिल रहीं हैं,दोनों ने मिलकर उस हवेली को अय्याशी का अड्डा बना रखा है,मैंने कभी नहीं सोचा था कि ठाकुर साहब के जाने के बाद ये दिन भी देखना पड़ेगा",
"जो कहना है साफ साफ कहो,तुम्हारी बातें मेरे पल्ले नहीं पड़ रहीं हैं",ओजस्वी गुस्से से बोली...
"मालकिन यही कि दमाद बाबू और छोटी मालकिन के बीच जो सम्बन्ध हैं उन सम्बन्धों को लेकर हर जगह चर्चा हो रही है,दमाद बाबू और वें एक ही कमरें में रहते हैं और दिन दिन भर दोनों उसी कमरें में पड़े रहते हैं,हवेली के नौकरों ने खुद ये तमाशा देखा है,अब इससे ज्यादा बोलूँ तो मेरी जुबान कटकर गिर जाएं", लक्खा बोला...
"ये क्या कह रहे हो लक्खा! मुझे तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं होता",रामस्वरूप जी बोलें....
"मेरी बातों पर यकीन नहीं होता तो खुद ही हवेली जाकर क्यों नहीं देख आते",लक्खा बोला...
"ठीक है मैं अभी वहाँ जाकर देखता हूँ,तेरी बातों पर मुझे भरोसा नहीं है",रामस्वरूप जी बोलें...
और फिर रामस्वरूप जी हवेली पहुँचे और वें तेजस्वी से मिले क्योंकि तेजस्वी ने किशोर से रामस्वरूप जी को मिलने नहीं दिया और वो रामस्वरूप जी से बोली....
"आप सभी आ गए ऋषिकेश से,माँ कैसीं है"?
"तुम्हें ठाकुराइन से क्या लेना देना छोटी बिटिया! उनकी इतनी चिन्ता होती तुम्हें तो उन्हें देखने तुम ऋषिकेश ना आ जाती,पहले ये बताओ कि जो मुझे लक्खा ने बताया है क्या वो सच है", रामस्वरूप जी बोलें...
"हाँ! बिलकुल सच है,किशोर बाबू दीदी को नहीं मुझे चाहते हैं और वें दीदी को तलाक देने के लिए भी तैयार हैं,उन्हें तलाक देकर वें मुझसे शादी करेगें",तेजस्वी बोली...
"ये बात मैं किशोर बाबू के मुँह से सुनना चाहता हूँ",रामस्वरूप जी बोलें....
"अब वें और मैं अलग अलग थोड़े ही हैं,हम दोनों अब एक जिस्म दो जान हो चुके हैं,जो मैं कह रही हूँ उनका जवाब भी वही है,दीदी से कहिएगा कि कुछ ही दिनों में उन्हें तलाक के पेपर मिल जाऐगें और वो उनमें साइन कर देगीं",तेजस्वी बोली...
"ये क्या किया तुमने छोटी बिटिया?अपनी ही बड़ी बहन के साथ इतना बड़ा धोखा किया तुमने",रामस्वरूप जी बोलें...
"यही तो जमाने का नियम है,कोई बेटी अपने बाप को धोखा देती है तो कोई पति अपनी पत्नी को,मैने कोई नया काम तो कर नहीं दिया",तेजस्वी बोली....
"मुझे यकीन नहीं होता कि तुम ऐसा कुछ कर सकती हो छोटी बिटिया!",रामस्वरूप जी बोले....
"अब हो गया ना यकीन और अगर यकीन हो गया हो तो ये बात जाकर दीदी से भी बता दीजिएगा" , तेजस्वी बोली....
"ये सही नहीं है छोटी बिटिया!",रामस्वरूप जी बोले...
"जब ये बात दीदी ने नहीं सोची तो मैं क्यों सोचूँ",तेजस्वी बोली....
और फिर रामस्वरूप जी अपना सा मुँह लेकर हवेली से शान्तिनिकेतन लौट आएं और उन्होंने तेजस्वी से सब कह दिया ये सुनकर तेजस्वी के तो जैसे होश ही उड गए और वो भगवान के सामने जाकर फूट फूटकर रोते हुए बोली.......
"हे! भगवान! ये मुझे मेरे किन गुनाहों की सजा मिल रही है,इतना बड़ा धोखा दिया मुझे मेरे पति ने,अब ये दुख मुझसे बरदाश्त नहीं हो रहा भगवान ! अब मैं ये सब छोड़ना चाहती हूँ,अब मैं ये सब छोड़कर अपनी माँ के पास चली जाऊँगी,मेरा जी भर गया है मेरा इस दुनियादारी से",
और फिर उस दिन ओजस्वी ने साध्वी बनने का फैसला ले लिया और सारे विधि विधान से उसने सन्यास लेने का सोच लिया और फिर गुरु जी को बुलवाकर उसने उनसे दीक्षा लेने की तैयारियाँ शुरु कर दीं....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....


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