Wo Maya he - 29 in Hindi Adventure Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | वो माया है.... - 29

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वो माया है.... - 29



(29)

दीनदयाल और रविप्रकाश दाह संस्कार के दिन शाम को चले गए थे। मनोहर भी अगले दिन सुबह अपने परिवार के साथ चले गए थे। घर में अब केदारनाथ और उनका परिवार ही था।
दसवें के बाद जब शुद्धि हो गई तो माहौल कुछ सामान्य हुआ था। उमा की हालत में भी बहुत सुधार आया था। वह दुखी थीं पर इस बात को स्वीकार कर लिया था कि अब जीवन इसी दुख के सहारे काटना है। किशोरी भी दुख को भुलाने की कोशिश कर रही थीं। तांत्रिक ने कहा था कि अब घर में रक्षा कवच की आवश्यकता नहीं है। पुष्कर की तेरहवीं के बाद वह अपना काम शुरू करेंगे और माया के श्राप से इस घर को मुक्ति दिला देंगे।
बद्रीनाथ जबसे घर लौटकर आए थे दिशा दिन में एकबार नीचे जाकर उनका हालचाल पूछ लेती थी। इस बात से बद्रीनाथ को अपने किए पर और पछतावा हो रहा था। उन्होंने दिशा के बारे में जो कहा था उसका उन्हें पछतावा था। वह इस बात को लेकर चिंतित थे कि अब दिशा का क्या होगा।
शाम का समय था। अगले दिन पुष्कर की तेरहवीं थी। बद्रीनाथ और उमा इसी विषय में बातें कर रहे थे। विशाल और केदारनाथ भी उनके पास बैठे थे। तैयारी के बारे में बताते हुए विशाल ने कहा,
"हमने पूजा का सारा सामान लाकर रख दिया है। कल नौ बजे पंडित जी आ जाएंगे।"
बद्रीनाथ ने कहा,
"खाने का क्या किया ?"
केदारनाथ ने कहा,
"मंगतराम को सारा जिम्मा दे दिया है। सुबह जल्दी आ जाएगा और अपना काम शुरू कर देगा। उसका इंतज़ाम छत पर कर देंगे। बहू को कह दिया है कि आज से नीचे के कमरे में ही रहे।"
बद्रीनाथ अचानक उदास हो गए। उनकी आँखों में आंसू आ गए। केदारनाथ ने समझाया कि अब धीरे धीरे पुष्कर का दुख भुलाने की कोशिश करें। उनकी बात सुनकर बद्रीनाथ ने कहा,
"केदार....इस दुख को भुलाना तो संभव नहीं है। पुष्कर चला गया है इस बात को मन ने स्वीकार कर लिया है। चिंता तो अब हमें दूसरी है।"
केदारनाथ उनकी चिंता का कारण जानते थे। उन्होंने कहा,
"बहू के बारे में सोचकर तो हमें भी तकलीफ होती है। पर किया क्या जा सकता है ?"
विशाल भी दिशा के बारे में फिक्रमंद था। उसने कहा,
"दिशा की मम्मी ने कहा था कि तेरहवीं के बाद आकर उसे ले जाएंगी। हमारे हिसाब से तो यही सही रहेगा।"
विशाल की बात सुनकर उमा ने कहा,
"ऐसा कैसे हो सकता है ? अब वह हमारे घर की बहू है।"
"मम्मी.... पुष्कर होता तो भी दिशा यहाँ ना रहती। अब क्या फर्क पड़ता है ?"
उमा ने तर्क दिया,
"फर्क कैसे नहीं है ? पुष्कर उसका पति था। उसके साथ कहीं भी रहती। पर अपनी माँ के साथ रहे यह तो अलग बात हो गई।"
विशाल ने उमा की तरफ देखकर कहा,
"हम तो यही कहेंगे कि जो दिशा के लिए सही हो वही फैसला कीजिए। ज़िद में किए गए फैसले का परिणाम यह घर भुगत रहा है।"
विशाल की बात पर बद्रीनाथ और उमा ने एक दूसरे की तरफ देखा। केदारनाथ ने बात संभालते हुए कहा,
"सही तो रहेगा कि दिशा से बात करके उसकी सलाह ली जाए।"
उसके बाद विशाल से बोले,
"टेंट वाले को बोल दो कि छत पर टेंट लगा जाए। हलवाई सुबह आ जाएगा तो दिक्कत होगी।"
विशाल उठकर चला गया। केदारनाथ भी किसी काम से चले गए। बद्रीनाथ और उमा विशाल की बात पर विचार कर रहे थे।
पुष्कर की तेरहवीं हो गई थी। दीनदयाल अपने दामाद रविप्रकाश के साथ दोपहर में ही वापस चले गए थे। मनोहर भी शाम को अपने परिवार को लेकर निकल गए थे। सुनंदा ने उमा से कहा कि बहुत दिनों से घर बंद है। सोनम और मीनू की पढ़ाई का भी हर्ज़ हो रहा है। उमा ने कहा कि अब सब काम हो गया है। वह और केदारनाथ घर चले जाएं।
दोपहर तक तो मौसम सामान्य था। लेकिन शाम से ही अचानक कोहरा छाने लगा था और ठंड बढ़ गई थी। आज लिहाफ ओढ़ने की ज़रूरत महसूस हो रही थी। दिशा सीढ़ियों के पास वाले छोटे कमरे में थी। जहाँ विदा होकर आने पर ठहरी थी। उसे ठंड लग रही थी। पर उसके पास रज़ाई नहीं थी। कुछ देर तो वह संकोच में सिकुड़ी बैठी रही। उसे लगा कि शायद कोई आकर रज़ाई दे जाए। पर कोई नहीं आया तो वह उठकर उस कमरे में आई जहाँ उमा और बद्रीनाथ थे। दरवाज़े पर खड़े होकर उसने आवाज़ लगाई,
"मम्मी...."
बद्रीनाथ और उमा उसके बारे में ही बात कर रहे थे। आवाज़ सुनकर उमा दरवाज़े पर आईं। उन्होंने कहा,
"क्या बात है बेटा ?"
"मम्मी.... ठंड लग रही थी। मेरे कमरे में रज़ाई नहीं है।"
उमा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने कहा,
"तुम चलो। हम अभी लेकर आते हैं।"
बद्रीनाथ ने आवाज़ दी,
"बहू को अंदर ले आओ उमा। कुछ बात करनी है।"
उमा एक तरफ हो गईं। दिशा अंदर चली गई। बद्रीनाथ के पास जाकर बोली,
"क्या बात करनी है पापा ?"
बद्रीनाथ ने उसे बैठने को कहा। वह पास पड़ा मोढ़ा लेकर बैठ गई। उमा बद्रीनाथ के बगल में बैठ गईं। बद्रीनाथ ने कहा,
"बेटा तुम पुष्कर के साथ रिश्ता जोड़कर इस घर में आई थी। अब पुष्कर नहीं है। पर तुम्हारा इस घर से नाता हमेशा रहेगा। हम मानते हैं कि रिश्ते की शुरुआत ठीक नहीं हुई। लेकिन इस बात का यकीन दिलाते हैं कि हम तुमको हमेशा इस घर का हिस्सा मानेंगे।"
दिशा कुछ नहीं बोली। बद्रीनाथ ने आगे कहा,
"हमें पता है कि पुष्कर के जाने के बाद तुम्हारे लिए जीवन बहुत कठिन हो गया है। लेकिन किसी के जाने से ज़िंदगी रुक तो नहीं जाती है। हम जानना चाहते थे कि अब तुम आगे क्या करना चाहती हो ?"
दिशा ने बद्रीनाथ की तरफ देखकर कहा,
"आपने सही कहा पापा। पुष्कर के जाने का बहुत दुख है। पर ज़िंदगी तो जीना है। मैं वही करूँगी जो पुष्कर के रहते हुए करती। अपनी नौकरी ज्वाइन कर लूँगी। मम्मी ने ऑफिस में सारी बात बता दी थी। उन्होंने कहा था कि जब मैं सही समझूँ आकर ज्वाइन कर लूँ।"
बद्रीनाथ ने कहा,
"तुम्हारी मम्मी तो विशाल से कह रही थीं कि तुम्हें अपने साथ ले जाएंगी। नौकरी कैसे कर पाओगी ?"
"हाँ मम्मी ने मुझसे भी कहा था। उनके पास कुछ दिन रहकर फिर नौकरी के लिए चली जाऊँगी। मैंने और पुष्कर ने जो घर किराए पर लिया था फिलहाल उसी में रहूँगी। बाद में सोचूँगी कि क्या करना है।"
बद्रीनाथ कुछ नहीं बोले। वह उसकी बात से सहमत लग रहे थे। उमा के मन में कुछ था। उन्होंने कहा,
"ऐसा नहीं हो सकता है कि तुम हमारे साथ रहो।"
"मम्मी यहाँ रहकर करूँगी क्या ?"
दिशा ने उमा की तरफ देखकर सवाल किया। उसके बाद बोली,
"मम्मी मेरी परवरिश जिस तरह हुई है मैं घर पर नहीं बैठ सकती। पुष्कर होता तो भी मैं नौकरी करती। अभी भी करूँगी।"
बद्रीनाथ ने कहा,
"ठीक है बेटा.... तुम जैसा सही समझो। हम अपना फैसला तुम पर नहीं लादेंगे। अब जाओ जाकर आराम करो।"
दिशा उठकर खड़ी हो गई। उमा ने कहा,
"तुम चलो मैं रज़ाई लेकर आती हूँ।"
दिशा के जाने के बाद उमा ने बद्रीनाथ से कहा,
"आपने दिशा से कह दिया कि अपना फैसला उस पर नहीं लादेंगे। हम कह रहे हैं कि जिज्जी इस बात को मानेंगी नहीं।"
बद्रीनाथ कुछ सोचकर बोले,
"उस दिन तुम कह रही थीं कि हमारी और जिज्जी की ज़िद ने सब बिगाड़ दिया था। इस बार हम वैसा नहीं करेंगे। जिज्जी को समझा लेंगे।"
उमा कुछ क्षण रुकीं। उसके बाद रज़ाई निकालने स्टोररूम में चली गईं। वह बद्रीनाथ के सामने कुछ कह नहीं पाई थीं। लेकिन उनके मन में एक नई बात आई थी। पुष्कर और दिशा ने पहली रात बिता ली थी। उनके मन में आ रहा था कि ऐसा भी हो सकता है कि दिशा की कोख में पुष्कर के अंश ने जन्म ले लिया हो। जिसका पता अभी ना चला हो। दिशा अगर यहाँ से चली गई तो वह भी साथ चला जाएगा। बाद में हो सकता है कि दिशा की माँ को लगे कि वह उसकी राह का कांटा बन सकता है और उसे खत्म करवा दे। उन लोगों को कुछ पता भी ना चले। उन्होंने सोचा कि दिशा से इस बारे में बात करेंगी।
दिशा को रज़ाई देने के बाद वह उसके कमरे में खड़ी थीं। दिशा को लग रहा था कि वह कुछ कहना चाहती हैं। उसने कहा,
"मम्मी आपको कुछ कहना है।"
उमा ने उससे अपने मन की बात कह दी। सब सुनने के बाद दिशा ने कहा,
"मम्मी आप जो सोच रही हैं वैसा होना संभव नहीं है। पुष्कर और मैंने तय किया था कि कम से कम दो साल तक परिवार नहीं बढ़ाएंगे। हमने इस बात का खयाल भी रखा था।"
दिशा की बात ने उमा के दिल में जागी उम्मीद को पूरी तरह मिटा दिया था। उनके लिए यह बात और भी दुखदाई थी। वह चुपचाप उसके कमरे से चली गईं।

बद्रीनाथ ने किशोरी से बात की। पहले तो वह भी तैयार नहीं हुईं। उनके मन में भी उमा वाली बात आई थी। उमा ने उन्हें दिशा से हुई बातचीत के बारे में बताया। वह बहुत नाराज़ हुईं। उसके बाद बोलीं कि जो सही लगे कर लो।
तेरहवीं के चार दिन बाद मनीषा आकर दिशा को अपने साथ ले गईं। घर से जाते समय दिशा सबसे मिली। बद्रीनाथ ने चलते समय एकबार फिर कहा कि उसका इस घर से जीवन भर का नाता है। कभी किसी मदद की ज़रूरत हो तो उनके पास आ सकती है।