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स्कूल गर्ल

वाजिद हुसैन की कहानी- मार्मिक
वह स्कूल जाने के लिए फार्म हाउस के बाहर निकली तो अपने दोस्त को ढोर-डंगर चराते देख विचलित हो गई। पूछा, 'स्कूल नहीं जाएगा?' बलवीर ने गमगीन लहजे में कहा, 'पढ़ाई छोड़ दी। ... 'क्यों।' ... 'पापा को सांप ने डस लिया, ढोर-डंगर चराकर गुज़र करता हूं।' ...उसके दादा सतनाम सिंह ने पूछा, 'पुत्तर, रामस्वरूप का मुंडा है?'... 'हां।' ... फिर हमदर्दी के लहजे में कहा, 'मां को लेकर आ जाना, पेंशन बनवा दूंगा। ... बलवीर यादों में खो गया। वह उसके साथ सरकारी स्कूल में पढ़ा है और लुकाछिपी खेला है। वह अमीर बच्चों के साथ चटाई पर बैठती थी। वह ज़मीन पर ग़रीब बच्चों के झुंड में बैठता था। मास्टर जी अमीर बच्चों को पढ़ाते थे पर गरीब बच्चों से बेपरवाह रहते थे। मन में पढ़ने की लालसा लिए बलवीर पढ़ते बच्चों के पास खड़ा उन्हें ताकता रहता था।
स्कूल में एक लड़की थी, नाम था सलोनी, भूरी आंखों वाली यह लड़की जितनी सुंदर थी, उतनी ही भोली थी। जिधर से निकल जाती, आकर्षक का केन्द्र बन जाती‌। उसके पास आई, हाथ पकड़कर ले गई और‌ अपने पास बिठा लिया। अपनी नाज़ुक हथेलियों से आंसू पोछे और उसे पराठा खाने को दिया। लफंगे लड़के उस पर फिक़रे कसने लगे, जिसकी उसने परवाह न की। इस तरह उनकी दोस्ती की शुरुआत हूई‌। कुछ समय बाद दोनों में ऐसी दोस्ती हुई। सलोनी बलवीर को बिल्लू कहने लगी, बलवीर उसे सल्लू कहने लगा। किसी बात को लेकर नाराजगी होती तो भूरी बिल्ली कहता था।
दोपहर को बलवीर ने पोटली में बंधी रोटियां पेड़ की छांव में बैठकर खाईं और पानी पीने के लिए ट्यूबवेल पर गया। उसने एक घुमंतु औरत को फार्म हाउस में जाते देखा। वह औरतों के सौंदर्य प्रसाधन बेच रही थी। उसे देखकर बलवीर को याद आया, 'एक बार वह अपने पापा के साथ नहर पर जामुन खाने गया था। वहां नहर की पटरी के किनारे लगे महुए और जामुन के पेड़ों के नीचे घुमंतु अपनी झोपड़ी नुमा डेरे डाले हुए थे। जहां उनके साथ ही उनकी भैंसें, कुत्ते, बकरियां, मुर्गियां भी रहती थी। पापा ने उसे बताया था- यह लोग घूम-फिरकर, जहां मिल जाती, मेहनत मज़दूरी करते, देसी जड़ी बूटियां, दवाइयां और भी जाने क्या-क्या सामान बेचते थे। कुछ ऐसे भी थे जो इन कामों के साथ ही इधर-उधर घूमने के दौरान कोई ऐसा घर ताड़ते रहते, जहां चोरी करने पर अच्छा माल मत्ता मिलने की संभावना होती। ऐसे लोग पुलिस से मिले रहते थे। घरों की शिनाख्त करने में उनके घर की औरतें भी शामिल रहती थी। कभी कभार उनमें से कुछ गरीब लड़कियों को बहला फुसला कर और कभी अपहरण करके भी दूर दराज़ के शहरों और गांवो में बेच दिया करते थे।
पानी पीकर बलवीर लौटा, तो उसने उस औरत को अपने साथी घुमंतु से कहते सुना, 'एक गड्डी की भूरी बिल्ली है, आज निबटाओ, कल का ठौर नहीं।' बलवीर इस पहेली को सुलझाने लगा। उसे याद आया - वह गुस्से में सलोनी को भूरी बिल्ली कहता था। गड्डी से मतलब नोटों की गड्डी से है। इसका मतलब आज ही सलोनी का अपहरण कर एक लाख रुपये में बेचने की बात कर रही थी। बलवीर व्याकुल हो गया और सल्लू को बचाने के उपाय सोचने लगा, पर मजबूर था ढोर-डंगर छोड़कर कैसे जाता?
घर पहुंचा, तब तक अंधेरा हो चुका था। उसने मां को पहेली सुनाई। पहेली सुनकर उसकी मां रामकली चिंतित हो गई, 'हमें उन्हें इसी समय आगाह करना होगा।' वह उसके साथ फार्म हाऊस गई। बलवीर ने सरदार जी को सब कुछ बताया, जो उसने देखा और सुना था। ... सरदार जी ने आह भरते हुए कहा, 'कितना दुर्भाग्य है हमारे मुल्क का, जिस बच्ची का बाप सरहद पर दुश्मनों से लोहा ले रहा है, यहां उसके अपहरण की योजना बन रही है, वह भी पुलिस की नाक के नीचे।' सलोनी की मां ने कहा, 'बाबा, चिंतन का समय नहीं है, कुछ उपाय कीजिए।' ... रामकली बोली, 'मैं कुछ कहुंगी तो छोटा मुंह बड़ी बात होगी।'...सरदार जी बोले, 'पुत्तर बेहिचक कह डाल जो तेरे मन में है।' उसने कहा, 'रात भर के लिए बिटिया को मेरे घर भेज दीजिए। भले ही मेरी जान चली जाए, पर बच्ची पर आंच नहीं आने दूंगी।' उसका सुझाव सभी को भा गया और सलोनी को उसके साथ भेज दिया।
बच्चों को सुलाने के बाद, रामकली हाथ में हसिया लेकर दरवाज़े पर खड़ी हो गई। देर रात को दरवाज़े पर आहट सुनकर, उसे लगा, घुमंतु सलोनी को ढूंढते हुए आ पहुंचे। उसने हसिये से प्रहार किया, जिससे सरदार जी बाल-बाल बचे। उन्होंने शाबाश कहकर उसकी पीठ थपथपाई। फिर कहा, 'घुमंतु आए थे, घर में जगनई देख, गुस्से से कहा, 'साले, डंगर चराने वाले लौंडे ने मुख़बरी की है। उसे निबटाने के बाद आयेंगे।' तुम्हारी और बच्चों की जान को ख़तरा है। तुम हमारे घर चली जाओ, मैं बच्चों को यहां से ले जाता हूं। रामकली ने पूछा, 'कहां ले जाओगे?' सरदार जी ने कहा, 'रब जाने।' वह बच्चों को मोटरसाइकिल से ले गए। रामकली रोती हुई फार्म हाउस चली गई।
सरदार जी ने सलोनी को बुआ के घर छोड़ दिया था। बलवीर का दाख़िला गुरुद्वारे के स्कूल में करा दिया और वहीं उसके रहने की व्यवस्था कर दी थी। घर पहुंचकर रामकली को दिलासा दी, 'कुछ वर्ष प्रतीक्षा कर, तेरा लला साहब बनकर लौटेगा, तुझे मोटर में बिठाकर ले जाएगा।'
यौवन की दहलीज पर पहुंचते समय सलोनी खिलखिलाती नदी की धारा बन चुकी थी पर दहलीज पार करते ही उसका जीवन ऊबड़खाबड़ बन गया था। पिछली साल हुई उसकी शादी आम शादियों जैसी नहीं थी। शादी से पहले हुई तय मुलाक़ातों में, बहुत शालीन और भद्र से दिखने वाले विवेक की वास्तविकता से परिचय, हनीमून पर ही हो गया था। गोवा के मनोरम दृश्यों के बीच दूसरे ही दिन विवेक का 'थोड़ी देर में आता हूं' कहकर शराब के नशे में धुत होकर लौटना फिर सारी रात उल्टियां करना, गालियां बकना, सलोनी कांप गई थी। शालीन जीवन साथी का स्वप्न भंग होकर बिस्तर पर बेसुध पड़ा था और वह उबकाई लेती हुई, उसकी उल्टियां साफ कर रही थी। आंखों में पानी का सैलाब फूट पड़ा था, मम्मी बहुत याद आ रहीं थीं ... सलोनी सुबक पड़ी‌। विवेक के ख़र्राटों के बीच उसकी सिसकियां रतजगा करती रही। सुबह विवेक बिल्कुल सामान्य था जैसे कुछ हुआ ही न हो ...तबियत ख़राब होने का बहाना करके वह तीसरे दिन ही गोवा से लौट आई।
ससुराल के क़ायदे क़ानून और कमज़ोर धागों में कसकर लपेटने की, सास की चेष्टाएं तब निष्फल हो गईं जब विवेक दिन-रात नशे में चूर रहने लगा।ऐसा नहीं था उसने कोशिशें ना की हों, की थीं ...बहुत की थी। दया, नम्रता, सहानुभूति के कोमल तंतुओं से उसे सहलाना चाहा, उसके दंभ को प्रवृत्ति समझ कर स्नेह से कम करना चाहा .. पर उसे दिन की घटना ...
उस दिन उनकी पहली वेडिंग एनिवर्सरी थी। डिनर पर बाहर जाने का प्रोग्राम था। विवेक ऑफिस से आते ही शराब पीने लगा था ...
'विवेक आज यह सब नहीं ...' सलोनी ने अपने स्वर को नम्र रखने की भरसक कोशिश की पर स्वर में मन की झल्लाहट शामिल हो गई। विवेक जो अब तक कई गिलास ख़ाली कर चुका था, अपनी लाल लाल आंखों से उसे घूरने लगा ..
'रोब जमाती है.. सा...ली' विवेक का स्वर फटकर उसके चारों तरफ विफर गया...
'विवेक प्लीज़... 'सलोनी थर्रा गई, 'मैं बहुत कोशिश कर रही हूं, रिश्ते को संभालने की और एक तुम.. कम-से- कम आज तो यह सब मत करो ...' सलोनी लगभग रो पड़ी।
शराब पीते ही विवेक का वास्तविक स्वरूप बाहर आ गया.. 'साली...हराम...तू रोक लगाएगी मुझ पर, विवेक का चेहरा वीभत्स हो उठा और उसने सलोनी के लंबे लहराते बालों को अपनी गिरफ्त में ले लिया...
'विवेक ...'सलोनी चीख़ पड़ी। ...सलोनी का चांटा अचानक कसकर विवेक के गालों पर पड़ा। रोती हुई सलोनी दूसरे कमरे में पहुंच गई और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। विवेक बहुत देर तक गालियां बकता रहा.. दरवाज़ा पीटता रहा और फिर शायद वहीं फर्श पर लुढ़क गया। उस दिन विवेक की मम्मी अपने दूसरे बेटे के पास गई हुई थी। वैसे उनके होने से भी क्या ही हो जाता? अपने मन से बीमार बेटे की शादी के लिए वे कितनी उतावली थी? हमारे देश और समाज में शादी को हर मर्ज़ की दवा क्यों समझा जाता है? सलोनी चीत्कार कर उठी ...और फिर सोफे पर जर्जर दीवार के जैसी ढह सी गई थी।
पिछली एक साल में वह कितनी ही बार, विवेक को छोड़कर मायके जा बैठी थी पर वह फिर उसके पास निरीह- सा चला आता था और वह न जाने क्यों फिर उसके साथ चली आती?
'कौन सम्भालेगा इसे ...?' शायद उसका प्रेम उसे इस लत और कुंठा से मुक्त कर सके? ...पर आज विवेक का यह वहशी व्यवहार... ।
उस दिन उसके भीतर की नदी रात भर बहकर ख़ाली हो गई थी। दर्द के मारे उसका सिर चकरा रहा था, उठकर दरवाज़ा खोला, विवेक अभी भी खर्राटों से लबालब था‌। उस दिन वह मम्मी- पापा के पास नहीं गई, दादा के पास फार्म हाउस चली गई।
एम. टैक. करने के बाद बलवीर का प्लेसमेंट मल्टीनेशनल कंपनी में हुआ था। चमचमाती लाल गाड़ी से सरदार जी का आशीर्वाद लेने और मां को साथ ले जाने के लिए फार्म हाउस आया था।... लंबे अरसे बाद सलोनी ने बलवीर को देखा था। दरमियाने क़द का किसी नदी के रेतीले किनारे पर रेत बटोरता, आकर्षक.. उसकी शर्ट के रंगों में जैसे उसकी पसंद उतर आई थी...फिर वह भी कब उसके साथ नदी के किनारे जाकर रेत बटोरने लगी
सरदार जी ने बलवीर से कहा, 'पुत्तर, एक तू ही तो है जिसके कंधे पर सिर रखकर वह रो लेती, तू भी जा रहा है। बिखरी हुई पंखुड़ियां अब कौन सजोएगा?
बलवीर ने कहा, 'सलोनी चंदन-सी है, जिस पर सांप लिपट गया था। उसकी ख़ुशबु पर सांप फिर आएगा। वह नहीं तो दूसरा केचुली उतारकर आएगा। बलवीर ने आह भरते हुए कहा, 'दर्द की साझेदारी, शायद उसकी सबसे कमज़ोर नस है जो कोई भी आकर दबा लेता है। स्कूल में मेरे आंसुओं ने उसकी यह नस दबाई थी, खुद भूखी रहती थी और मुझे पराठा खिला देती थी। अफसोस है, उसके अपने भी उसकी इस ख़ूबी से अंजान हैं । उसकी आंखों में आप मेरे लिए प्यार पढ़ सकते हैं, पर सुन नहीं सकते। मैं उससे मुहब्बत करता हूं, पाक मुहब्बत, पर इज़हार नहीं कर सकता। उसका कारण है - आज मैं जो कुछ भी हूं, आपकी बदौलत ही हूं। आपके एहसान ने मेरे मूंह पर ताला लगा दिया है। आज भी इज़हारे- ए- मुहब्बत नहीं करता, यदि उसके स्वप्न घायल पक्षी की तरह पंख फड़फड़ाकरअपनी लाचारी को व्यक्त नहीं करते होते।'
'सलोनी के आंसुओ ने बलवीर की सच्चाई पर मुहर लगा दी थी। रामकली ने साड़ी के पल्लू से उसके आंसू पोछे। सलोनी के मम्मी-पापा आ चुके थे। सभी के चेहरे खिल उठे, जब सरदार जी सलोनी का बलवीर से विवाह करने का ऐलान किया।
बलवीर की वापसी का समय हो गया था। आनन-फानन में गुरुद्वारे में उनका विवाह हुआ। बलवीर ने हाथ पकड़ कर सलोनी को गाड़ी में अपने पास बिठाया, ठीक उसी तरह जैसे पंद्रह साल पहले एक स्कूल गर्ल ने उसे अपने पास बिठाया था। आंखों में आंसू भरे हाथ हिलने लगे और चांदनी से नहाई सड़क पर गाड़ी रिंगने लगी।
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