Shakunpankhi - 9 books and stories free download online pdf in Hindi

शाकुनपाॅंखी - 9 - सभा में हल्ला मच गया

14. सभा में हल्ला मच गया

सज्जित सभागार इत्र और चन्दन की सुगन्ध से महमहा रहा है। राजा और राजपुत्र सज्जित मंच पर अपनी आभा बिखेर रहे हैं। कान्यकुब्ज के सामन्त एवं अधिकारी अपने आसनों पर बैठ चुके हैं। सभी सन्नद्ध चौकन्ने । महाराज भी आकर बैठे। सभी ने उनका स्वागत किया। सभी की आँखें मंच के भीतरी द्वार पर लग गई। राजपुत्री की आकांक्षा पाले हुए राजपुत्रों का हृदय धक-धक कर रहा है । चारण विरुद बखानने के लिए शब्दों पर धार चढ़ा रहे हैं। महाराज की दृष्टि बार बार द्वार की ओर जाती । प्रतीक्षा का एक एक क्षण भारी पड़ रहा है। बार बार उचक कर लोग झाँकते। दौवारिक, भृत्य सभी स्फूर्ति से भरे हुए। संयुक्ता सहेलियों के साथ आती हुई दिखी। सभी की दृष्टि उधर ही टिक गई। मंगल गीतों की ध्वनि के बीच संयुक्ता ने मण्डप में प्रवेश किया। एक सहेली जयमाल लिए, साथ में श्री कंठ पुरोहित । संयुक्ता धीरे-धीरे मंच पर बढ़ी। राजपुत्रों के चारण प्रशस्तिगान के लिए ओठों पर जीभ फेरने लगे। एक एक राजकुमार के सामने से संयुक्ता बढ़ने लगी। चारणों ने बिना अवसर गँवाए विरुद बखान कर अपने को आश्वस्त किया। संयुक्ता एक क्षण रुकती । चारणों की वाक्पटुता का निदर्श देखती, कुछ विचारती और आगे बढ़ जाती । यही क्रम चलता रहा । पर उसके मन में आँधी चल रही थी। एक तरफ संपूर्ण कान्यकुब्ज और सत्ता, दूसरी ओर वह अकेली । धीरे-धीरे बढ़ती रही और संकल्प के अनुरूप अपने को तैयार करती रही । शाकुनपाँखी नहीं है, वह मन को पुष्ट करती हुई संकल्प दुहराती रही । अन्तिम राजकुमार तक पहुँचते ही उसने अपने को सन्नद्ध किया । चारणों के चेहरों पर निराशा के भाव उग आए थे। राजपुत्र भी चकित, विस्मित द्वार पर चाहमान नरेश की मूर्ति दिप रही थी। उसकी आभा से वह अभिभूत हो उठी। उसके पग आगे बढ़े। मंगलगान का स्वर धीमा हो गया। पलक झपकते ही उसने जयमाल चाहमान नरेश की मूर्ति के गले में डाल दिया। कुछ अनजान बच्चों की तालियाँ बज उठीं, वयस्कों की कोई ताली नहीं बजी। सभी सन्न और महाराज अवाक् । संयुक्ता लौट पड़ी। धीरे धीरे अन्तः द्वार की ओर बढ़ने लगी । सामन्तों के मुख सूख गए। कई राजकुमार आवेश में आ गए, 'हमारा अपमान किया गया है। हम इसे सहन नहीं करेंगे।' महाराज को विश्वास नहीं था कि संयुक्ता ऐसा करेगी। वे भी आवेश में आ गए। जैसे ही संयुक्ता अन्तःद्वार के निकट पहुँची, महाराज ने कहा 'रुको' । संयुक्ता रुक गई। 'बेटी तुमसे भूल हो गई। मूर्ति को जयमाल डालने का कोई औचित्य नहीं है । पुनः एक बार चलकर राजपुत्रों के प्रस्ताव पर विचार करो ।'
संयुक्ता के साथ एक सहेली जयमाल लेकर आ गई। श्री कंट पुनः साथ चल पड़े। चारणों ने दुगने उत्साह से प्रशस्तिगान प्रारंभ किया। प्रशस्ति सुनती और आगे बढ़ती रही । महाराज की भौहों पर बल पड़ने लगे। इस बार संयुक्ता ने देर नहीं की। वह आगे बढ़ गई। एक बार दृष्टि उठाकर मंच की ओर देखा । फिर पलट कर पृथ्वीराज की मूर्ति को जयमाल पहनाकर लौट पड़ी। महाराज गरज उठे पर उसका कोई असर नहीं हुआ। राजपुत्र बड़बड़ा उठे। पर संयुक्ता अन्तः द्वार की ओर बढ़ गई। सभा में हल्ला मच गया। लोग तरह तरह की बातें करने लगे। कौन किसको रोकता ? संयुक्ता अपने प्रासाद की ओर चल पड़ी। अन्तः कक्ष में पहुँचकर भोले शंकर के चित्र के सम्मुख खड़ी हो गई। आँखें धारासार वर्षा करने लगीं।

15. हर गंगे

चन्द के नेतृत्व में सौ सामन्त, ग्यारह सौ अश्वारोही और छह सेवक महाराज के साथ कान्यकुब्ज के लिए तैयार हुए। चैत बदी तृतीया दिन रविवार । गुरु राम और मधुशाह को दिल्लिका की रक्षा का भार सौंपा। सामन्तों में कन्ह, गोविन्द, पज्जून, सलख, निडर, चन्द्रपुण्डीर, पहाड़राय, जामराय, सिंहपरमार, बलीभद्र, प्रसंगराय, जैसे शूरवीर थे। गोपनीय रखने के लिए अधिकतर यात्रा रात्रि में छद्म बेष में की जानी थी। यह जानते हुए कि कवि, पंडित, विद्वान, अश्वारोही छद्मवेष में भी पहचान लिए जाते हैं, सामन्तों ने छद्मवेष स्वीकार किया। अजयमेरु और दिल्लिका की सुरक्षा में सैन्य बल लगा, पृथ्वीराज कान्यकुब्ज यात्रा के लिए तैयार हुए। भटिंडा पर पहले ही चाहमान सेना घेरा डाले हुए थी ।
कवि चन्द के मंगलपाठ से यात्रा शुरू हुई। कालिन्दी पार कर दल चल पड़ा । चलते समय अपशकुन देख दल ठिठक जाता । शकुन-अपशकुन पर चर्चा होने लगती । बाईस कोस यात्रा कर दल जल की सुविधा देख एक ग्राम के निकट रुका। शिविर लग गए। आस पास के खेतों में गेहूँ, जौ की बालियाँ लहरा रही थीं। चने के पौधों में दाने गदरा गए थे। जो पहले बो गए थे उन खेतों की फसल पक चुकी थी । इक्का दुक्का कटाई भी हो रही थी । आम्र मंजरियों तथा महुआ की गमक महमहा उठी। पृथ्वीराज के साथ ही प्रमुख सामंत बैठे । कन्हदेव जैसे लोग छद्म वेष में असुविधा अनुभव कर रहे थे, मुँह से निकल गया, 'भँटवा जो न करे।' चन्द ने सुना और हँस पड़े ।
प्रातः यात्रा शुरू हुई। कोई पूछता तो 'तीर्थ यात्रा पर जा रहे है' कहकर पिण्ड छुड़ाया जाता। कभी अश्वों की दौड़ होती, कभी दुलकी चाल का आनन्द लिया जाता । एड़ लगते ही अश्व फनफना कर गति पकड़ लेते। रास खिंचते ही अश्व अपनी कला दिखाने लगते। चौबीस कोस चल कर दूसरे दिन आम के एक बड़े बाग़ के निकट कान्यकुब्ज की सीमा पर पड़ाव पड़ा। रात्रि विश्राम हुआ । विचार विमर्श कर यह निश्चित हुआ कि कान्यकुब्ज की सीमा में छोटी-छोटी टोलियों में बँट कर रात में ही चला जाए। तीसरे दिन सायं टोलियाँ निकलीं। एक कृष्ण मृग महाराज के सामने से निकला। एक तीर चला कर महाराज ने उसे मार दिया। दल थोड़ी देर के लिए ठिठका। ग्राम वासी यदा कदा इन दलों को देखकर कभी कुछ जिज्ञासा करते पर उन्हें कुछ संकेत करते हुए अश्वारोही आगे बढ़ जाते । पहर दिन तक दल चलता रहा। तीस कोस चलकर अश्वों के तंग खुले । भोजन विश्राम में दिन बीता । अश्वारोही नींद से उठे तो देखे गए स्वप्नों का विवरण सुनाने लगे। तरह-तरह के स्वप्न और उनकी अर्थपूर्ण व्याख्याएँ प्रारम्भ हो गईं। महाराज ने भी एक विचित्र स्वप्न देखा था । चन्द से उसकी चर्चा की। शुभ अशुभ की चर्चा चल पड़ी। प्रारम्भ में सपने ही चर्चा में छाए रहे। 'संयुक्ता मिलेगी पर बलिदान भी अधिक देना होगा,' चंद ने कहा । 'बलिदान होने से कौन डर रहा है?" पज्जून राय ने कहा । इन्हीं बातों में बत्तीस कोस निकल गए। अब कान्यकुब्ज केवल आठ कोस रह गया था। गंगा के निकट एक स्वच्छ स्थान देख कर दल रुका। सब ने अपने अपने वस्त्र बदले। महाराज ने सामन्तों को बुलाकर कहा, 'चंद के सेवक के रूप में हम लोग चल रहे हैं, अब लाज आपके ही हाथ है।' 'नेह के नयन, सुगन्ध के पात्र अपनी कथा कह देते हैं राजन्', जैत ने कहा । 'अब तो कान्यकुब्ज देखना ही है, जो कुछ होगा देखा जाएगा', महाराज ने कहा । 'आप चिन्ता न करें। हम लोग हर स्थिति से निबटने के लिए तैयार हैं।' जामराय ने विश्वास दिलाया। दिन में विश्राम हुआ । रात के पिछले प्रहर यात्रा प्रारम्भ हुई। यात्री ओस कणों से भीग गए पर चलते रहे । कान्यकुब्ज निकट आने पर प्रकाश फैलने लगा। कुछ और बढ़ने पर कान्यकुब्ज के मन्दिर, कलश दिखने लगे। मन्दिरों का नगर था वह । पयस्विनी गंगा उसके चरण धोती। गंगा की शुभ्र धवल धारा पर उगते सूर्य की किरणें जलधार में स्वर्णिम आभा विखेर रही थीं। 'गंगा में स्नान कर ही नगर में प्रवेश किया जाए,' चन्द ने परामर्श दिया। सभी सहमत थे। गंगा तट पर ही डेरा लग गया। सभी स्नान-ध्यान की तैयारी में लग गए। नगर में अब भी विभिन्न प्रदेशों के राजे और सामन्त उपस्थित थे । गुप्तचर भी निरन्तर सक्रिय रहते। एक सामान्य सा आदमी डेरे के निकट आया । 'किसका शिविर है? आप लोग कौन हैं? कहाँ जाना है?' कई प्रश्न वह एक साथ ही पूछ गया । कवि चन्द ने सुना । वे स्वयं आ गए। 'मैं चाहमान नरेश का राजकवि हूँ। तीर्थ यात्रा के लिए निकला हूँ । सोचा कान्य कुब्ज नरेश का भी दर्शन करता चलूँ । राजा में सब तीर्थों का वास है।' चाहमान नरेश की मूर्ति पर संयुक्ता ने जयमाल डाल कर महाराज के लिए संकट पैदा कर दिया है। यह सूचना वन वह्नि की भाँति चारों ओर फैल चुकी थी। गुप्तचर भी सजग थे। पूछने वाले व्यक्ति ने तत्काल यह सूचना महाराज तक पहुँचाना उपयुक्त समझा ।
'स्वागत है आपका,' कहकर वह व्यक्ति तुरन्त वहाँ से चला गया। हँसते हुए चन्द आगे बढ़े। सेवकों से कहा, 'महाराज तक सूचना हो गई।' कहते हुए झम से गंगा में कूद पड़े। डुबकी लगाई और स्तुति करने लगे। सभी लोग 'हर गंगे' कहकर डुबकी लगाने लगे। नगर के नर-नारी गंगा में नहा रहे थे । नवोढ़ाओं का एक झुण्ड घड़े लिए नदी में उतरा । घड़ों में पानी भरकर रखा, नहाया और घड़े को सिर पर रखकर चल पड़ा। उनके कमनीय गठे शरीर को लोग देखते रह गए। महाराज ने भी इन्हें देखा। उन्हें संयुक्ता का स्मरण हो आया। वे गंगा की स्तुति करने लगे। पर ध्यान संयुक्ता में ही लगा रहा।