Shakunpankhi - 10 books and stories free download online pdf in Hindi

शाकुनपाॅंखी - 10 - बरद्द दुबला क्यों है?

16. बरद्द दुबला क्यों है?

स्नान कर चन्द ने धवल वस्त्र धारण किया। सभी ने मधुपर्क पान किया। ग्यारह सामन्त वेष बदलकर तथा चन्द के सेवक के रूप में पृथ्वीराज तैयार हुए। सभी के वेष एक थे। नगर हाट को देखते हुए चन्द के नेतृत्व में सभी आगे बढ़े। कान्यकुब्ज के पास विपुल सम्पत्ति थी। हाट की दुकानों से वैभव टपकता । नागरिकों की वेष-भूषा आकर्षक थी, व्यवहार संस्कृत, संयत, उल्फुल्लतादायक । सभी जिज्ञासु की भाँति हाट का निरीक्षण करते चलते रहे । व्यवस्थित पण्यशाला में वणिक् ग्राहकों को प्रभावित करने में लगे थे। मंदिरों की घंटियाँ बजती रहीं। जगह जगह उद्यान नगर की शोभा बढ़ा रहे थे। नागरिक आ जा रहे थे। रंगशालाओं एवं मंदिरों के रख-रखाव से सांस्कृतिक धार्मिक अभिरुचि का पता चलता । कथकों के टोले विकसित हो गए थे। चन्द सब का आनन्द लेते हुए प्रतोली द्वार पर पहुँच गए। एक प्रहर दिन चढ़ आया था। महाराज मंत्रणा कक्ष में आ चुके थे। भव्य द्वार पर रक्षकों की पंक्ति सन्नद्ध थी । द्वार प्रमुख ने बढ़ कर चन्द का स्वागत किया, परिचय और गंतव्य के सम्बन्ध में जिज्ञासा की । चन्द ने प्रसन्नता पूर्वक उनकी जिज्ञासा का उत्तर दिया। द्वार प्रमुख के संकेत पर एक प्रहरी ने महाराज के सम्मुख उपस्थित हो निवेदन किया, 'महाराज द्वार पर चाहमान नरेश के राजकवि चन्द वरदायी उपस्थित हैं ।'
प्रहरी के इतना कहते ही महाराज चौंक पड़े। ऐसे अवसर पर चाहमान राजकवि? पर तुरन्त सँभलते हुए राजकवि को संकेत किया, 'जाँच कर देखो ।' राजकवि उठे और प्रहरी के साथ द्वार की ओर चल पड़े।
चन्द को देखकर उन्होंने पहचाना। दो बार उनसे भेंट हो चुकी थी, प्रयाग स्नान के समय चन्द भी उन्हें पहचान गए। दोनों गले मिले। चन्द को लेकर महाराज के सम्मुख उपस्थित हुए । चन्द ने श्लोक पढ़कर महाराज को आशीष दिया। बारह सहयोगी भी पीछे पीछे गए। कक्ष में यथा स्थान बैठ गए। महाराज और चन्द दोनों ने एक दूसरे को देखा। दोनों के मुखमण्डल पर स्मिति का भाव तैर उठा । चन्द ने पंगुराज जयचन्द का प्रशस्तिगान करते हुए चाहमान नरेश की भी प्रशंसा कर दी। जयचन्द समझ गए कि चाहमान राजकवि अत्यन्त कुशल है । उनकी परीक्षा वृत्ति जगी, कह गए, 'जांगल राव का सुहृद् बरद्द दुबला क्यों है?' चन्द ने भी तत्काल जोड़ा, 'महाराज, चाहमान नरेश द्वारा विजित राजाओं ने तृण दबा दबा कर सब घास चौपट कर दी, बरद्द दुबला न हो तो क्या हो?' चन्द के इस कथन से पृथ्वीराज सहित ग्यारह सामन्तों के चेहरे खिल उठे पर पंगुराज का चेहरा लाल हो उठा। चन्द ने भी इसे अनुभव किया। वे झट से बोल उठे, 'नीलकंठ महादेव का वाहन भी बरद्द है, आपने मुझे इस योग्य समझा, यह मेरा अहोभाग्य है ।"
महाराज का तेवर कुछ ढीला हुआ। उन्होंने कुछ छन्द सुनने की इच्छा व्यक्त की। चन्द ने उनकी रुचि के अनुकूल सरस छन्दों का पाठ किया। पूरी सभा रसमय हो उठी । चन्द के सहयोगियों ने चन्द की प्रतिभा का निखार देखा। महाराज जयचन्द की दृष्टि चन्द के सेवकों पर पड़ी। सब के सब शक्तिपुंज ! उन्हें कुछ आशंका हुई 'इनमे पृथ्वीराज तो नहीं है?" उन्होंने अस्फुट स्वरों में भृत्य से कुछ कहा। भृत्य तेजी से निकल गया। महाराज ने चन्द से मुस्कराते हुए कहा, 'आप तो आशु कवि हैं?" चन्द ने संकेत को ग्रहण कर आशुपाठ प्रारंभ कर दिया। उन्हें गहड़वाल और चाहमान के बीच संतुलन बनाते हुए पाठ करना था। कुछ क्षण उन्होंने कान्यकुब्ज की सुषमा का वर्णन किया, महाराज की वंशावली का उल्लेख करते हुए गंगा महिमा के विमल मार्ग पर चल पड़े। अब धारा प्रवाह काव्य पाठ चलने लगा। सभा में उपस्थित सामन्त और अधिकारी मग्न हो उठे। महाराज को भी लगा कि राजकवि सचमुच कुशल चितेरा है। तब तक कारु सहित पाँच सेविकाओं ने ताम्बूल भरे थाल लेकर प्रवेश किया। महाकवि चन्द को देखकर कारु ठिठकी। सभा में पृथ्वीराज को देखकर उसका शरीर सनसना उठा । पैर धरती में गड़ गए। जैसे ही उसकी दृष्टि चन्द पर पड़ी उन्होंने आँखों से ही संकेत किया । तुरन्त अपने को सामान्य बना, कारु ने बालिकाओं के साथ थाल को रखा और लौट पड़ी। महाराज ने उसके क्रिया कलाप को ध्यान से देखा । ताम्बूल पान सम्पन्न होते ही महाराज ने नगर अध्यक्ष को बुलाकर चंद और उनके साथियों के लिए भोजन विश्राम की व्यवस्था करने के लिए कहा। कुल पुरोहित के आशीष पाठ से सभा समाप्त हुई।



17. असंभव है उसकी इच्छापूर्ति

चंद को गंगा के किनारे ही एक विशाल अतिथि गृह में ठहराया गया। चन्द के साथ जो अश्वारोही थे, सबके लिए व्यवस्था की गई। सेवक लग गए। चन्द ने एक भीतरी कक्ष पर अपने रक्षक बिठा कर चाहमान नरेश के विश्राम की व्यवस्था की । चाहमान नरेश को विश्राम कहाँ ? अब क्या किया जाए? यही सभी की चिन्ता का विषय था। महाराज ने प्रमुख सामन्तों के बीच विमर्श किया। जिस कार्य के लिए आए हैं, उसे सम्पन्न करने का उपाय सोचना चाहिए', कन्हदेव ने कहा। सभी ने हामी भरी। विचार विमर्श होता रहा। सभी ने कुछ न कुछ बताकर रणनीति निश्चित करने की बात कही। चंद और महाराज सामन्तों के विचार सुनते रहे। इसी बीच जलपान आ गया। विमर्श स्थगित हो गया। कारु ताम्बूल देकर लौटी। अपने कक्ष में जाकर पड़ रही । उसे आशंका हुई, 'महाराज पूछेंगे।' क्या उत्तर दे वह ? यदि वह सच उगल देती है तो चाहमान नरेश के लिए संकट पैदा हो जाएगा। नहीं, वह चाहमान नरेश की गोपनीयता भंग नहीं कर सकती। पर महाराज के प्रश्न का उत्तर ? एक बार कांप उठी वह । तभी कंचुकी ने आवाज़ दी। वह बाहर आ गई। प्रणाम कर बोली, 'आप ?' 'हाँ, महाराज ने बुलाया है। साथ चलो।' सोचते विचारते वह कंचुकी के साथ चल पड़ी। माथ नवाकर महाराज जयचन्द्र के सामने खड़ी हो गई। कंचुकी हट गए। 'ताम्बूल लाते सभा को देखकर तुम्हारा व्यवहार असामान्य क्यों हो गया था ?' महाराज ने पूछा । 'अपराध हुआ महाराज ।' वह एक बार फिर काँप उठी। 'मैं अपराध की बात नहीं कर रहा हूँ । कारण जानना चाहता हूँ।' कान्यकुब्जेश्वर बोल पड़े। 'अचानक चाहमान नरेश के सखा महाकवि को देखकर मैं काँप गई। शरीर सनसना गया। अपराधी हूँ महाराज ।' "क्या किसी और को भी देखा ?" नहीं महाराज, महाकवि को देखते ही आँखें धरती में गड़ गईं।' 'हूँ', कहकर महाराज टहलने लगे। कारु शीश नवाकर लौट पड़ी ।
'चाहमान नरेश महाकवि के सेवक क्यों बनेंगे? वे नरेश हैं। कान्यकुब्ज की तरह बड़ा राज्य नहीं है उनका। पर राजा की एक प्रतिष्ठा होती है। वे मेरे प्रतिद्वन्द्वी बन कर उभर रहे हैं, यह बात अलग है पर स्तरहीन कार्य में संलग्न होंगे, यह नहीं सोचा जा सकता। महाकवि के सेवकों में पृथ्वीराज भी हैं यह मेरा भ्रम भी हो सकता है । पर शक्ति शाली सेवकों में यदि...।' महाराज सोचते रहे।
"कंचुकी?” उन्होंने पुकारा ।
'संजू की मनस्थिति में कोई परिवर्तन ?”
"अनेक प्रयास के बाद भी कोई सकारात्मक परिणाम.......।'
'कोई सार्थक प्रयास नहीं हो सका। मैं स्वयं उससे बात करूँगा । उसे अपना हठ छोड़ना पड़ेगा। अवसर मिले तो संकेत करना। असंभव है उसकी इच्छापूर्ति । किसी ने उसे बहका दिया है। यह भी ज्ञात करो, किसने उसे .....। सतर्क रहो, निरन्तर सावधान।' कहते हुए महाराज अन्तः कक्ष की ओर चले गए ।