Asamartho ka bal Samarth Rmadas - 7 books and stories free download online pdf in Hindi

असमर्थों का बल समर्थ रामदास - भाग 7

सामाजिक बदहाली बनी देशाटन के लिए निमित्त

टाकली गाँव में निवास के दौरान समर्थ रामदास की कीर्ति दूर-दूर तक पहुँचने लगी थी। कई लोग उनके भक्त बन गए थे। उनसे मिलकर अपनी समस्या का हल जानने दूर दराज़ के गाँव से लोग आने लगे थे, जिनमें से अधिकतर लोग आर्थिक दुर्दशा में होते थे।

देश की प्रजा के लिए उस वक्त बड़ा ही कठिन समय था। कहीं बाढ़ तो कहीं अकाल, ऐसी कुदरती आपत्तियाँ बार-बार आती थीं। लोगों को न पूरा अनाज मिलता और न पीने के लिए ढंग का पानी। किसानों के पालतू जानवरों की चारे के अभाव में मृत्यु होना आम बात थी। किसी तरह लोग अपना पेट पालते थे। इस संकट के साथ समाज पर एक और संकट भी था – सुलतान का।

यवनों* के आक्रमण से उस वक्त के लोग त्रस्त थे। वे आक्रमण करके यहाँ अपना राज्य स्थापित करते जा रहे थे। सत्ता पाने के बाद वे यहाँ की प्रजा को भी छलते। उनके सैनिकों का कहर उस वक्त चरम पर था।

मंदिरों को ध्वस्त किया जाता था, मूर्तियों को तोड़ा जाता था। स्त्रियों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था। सुलतान के निर्दयी सैनिक सारे गाँव को लूट ले जाते और जाते-जाते खेत में लहराती फसल में भी आग लगा जाते। बाढ़ और अकाल के नुकसान से यदि कोई बच भी जाता तो उसे सुलतानी ताकतें तबाह कर देतीं।

देश में चारों ओर निर्धनता और दहशतभरा वातावरण था। उस वक्त शायद ही कोई घर ऐसा बचा हो, जिसने यवनों का अत्याचार नहीं सहा। अपने ही देश में लोग ज़ुल्म के डर से छिप-छिपकर रहते थे। यवनों के आक्रमण कभी भी, कहीं भी हुआ करते थे, जिसके आगे सभी बेबस थे।

जहाँ भी यवन शासक अपना राज्य बनाता, वहाँ की प्रजा पर कई पाबंदियाँ लगाईं जातीं। उनके धार्मिक कार्य, जप-तप, अनुष्ठान करने पर रोक लगा दी जाती। लोगों को धर्मभ्रष्ट करने की कोशिश पूरे ज़ोरों पर थीं। लोगों से ज़ुल्मज़बरदस्ती के साथ धर्म परिवर्तन करवाया जाता था और जो ऐसा नहीं करते, उनका या तो कत्ल किया जाता या उनसे ज़जिया नामक लगान वसूला जाता। जो उनकी आमदनी के हिसाब से कई ज़्यादा होता था।

समाज की दुर्दशा देखकर समर्थ रामदास को बड़ा दुःख होता। वे सोचते थे कि हर प्राणी अपनी रक्षा करने के लिए सक्षम है और मनुष्य तो सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है, फिर ऐसा क्या है, जो आज ये लोग अपने परिवार, देश और धर्म की रक्षा करने में अक्षम हैं?

वे बचपन से देखते आए थे कि देश की जनता आत्मविस्मृत है। अपनी क्षमता, अपना गौरवशाली इतिहास लोग भूल चुके हैं। उन्हें वापस जगाना आवश्यक है वरना वे ऐसे ही ज़ुल्म सहते रहेंगे। ऐसे समाज को परमार्थ का उपदेश देना उनके लिए और भी हानिकारक साबित होता।

सामाजिक दशा में सुधार लाने हेतु समाज को संगठित और शक्तिशाली बनाना, उनमें खोया हुआ आत्मविश्वास, आत्मसम्मान जगाना बहुत आवश्यक था।

उन्होंने ठान लिया कि जिस तरह जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्तियों की याद दिलाई थी, उसी तरह वे भी प्रजा को समाज और देश के प्रति उनके कर्तव्य की याद दिलाएँगे। उन्हें उनकी सोई हुई ताकत याद दिलाएँगे।

आज की तरह उस वक्त यह कार्य किसी एक स्थान पर बैठकर करना संभव नहीं था बल्कि लोगों के बीच जाना ही एक मात्र पर्याय था। इसलिए उन्होंने देशाटन पर निकलने का निर्णय लिया। नगर नगर, द्वार द्वार जाकर अलख जगाने के उद्देश्य से वे देशाटन की तैयारी में जुट गए।

उद्धव बाल्यकाल से ही अपने माता-पिता के साथ स्वामी से मिलने आता था। उसके मन में गुरु के प्रति अपार प्रेम और भक्तिभाव बचपन से ही था। उसे जब पता चला कि समर्थ रामदास उस स्थान का त्याग करके कहीं जानेवाले हैं तो गुरु के विरह के विचार से उसे बड़ा दुःख हुआ । गुरु के चरण पकड़कर रोते हुए वह उन्हें वहाँ से न जाने की विनती करने लगा। उद्धव का हठ था कि जब उनके सारे भक्त उनसे मिलने टाकली में ही आते हैं तो उन्हें कहीं जाने की क्या आवश्यकता है?

रामदास ने उसे अपने हृदय से लगाकर समझाया कि कैसे विधर्मियों ने देश की जनता को त्रस्त कर दिया है और आत्मरक्षा के लिए लोगों को जगाना क्यों आवश्यक है। यह होना तभी संभव है, जब वे लोगों से अलग-अलग स्थलों पर जाकर मिलेंगे।

मठ में स्थापित हनुमान जी की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए समर्थ रामदास ने कहा, ‘यह है असली रामदास। यही तुम्हें बल, बुद्धि और प्रेरणा देंगे। मैं पास न भी रहूँ लेकिन ये तुम्हें मार्गदर्शन देंगे।'

गुरु वचन सुनकर, उद्धव शांत हुआ और उन्हें जाने देने के लिए राज़ी हुआ। जाने से पूर्व उसने गुरुदेव को उस आश्रम को अपना तपस्थल बनाने का वचन दिया और समर्थ रामदास देश की जनता का सामर्थ्य जगाने के लिए वहाँ से निकल पड़े।

जो वर्तमान के प्रति सचेत होते हैं, उनमें जाग्रति आती है। जाग्रति के साथ जो अव्यक्तिगत लक्ष्य पर चल पड़ते हैं, वे बड़े रूपांतरण के लिए निमित्त बनते हैं।

पुढें पाहतां सर्व ही कोंदलेंसे। अभाग्यास हें दृष्य पाषाण भासे॥
अभावें कदा पुण्य गांठीं पडेना । जुनें ठेवणें मीपणें आकळेना ॥139 ॥

अर्थ - आँखें खेलकर देखा जाए तो सर्वत्र भगवंत ही नज़र आएगा। लेकिन अभागों को बस निर्जीव पत्थर ही दिखाई देते हैं। भगवंत के अस्तित्व की खबर न होने की वजह से ऐसा इंसान पुण्य संचय भी नहीं कर पाता। इसलिए अहंकारवश उसे शाश्वत ज्ञान जो पहले ही बताया गया है, वह नहीं मिल पाता।

अर्क - आत्मज्ञान मिलता है, स्व-ज्ञान होता है तो द्वैतभाव समाप्त होकर सर्वत्र ईश्वर ही नजर आता है। आँखें होकर भी जो ईश्वर को नहीं देख पाता उसे समर्थ रामदास अभागा कहते हैं। उसे बस स्थूल चीजें ही दिखाई देती हैं, उनके अंदर स्थित चेतना को वह नहीं पहचान पाता। 'मैं' का अहंकार ही इंसान को अंधा बना देता है और इंसान इस अनमोल ज्ञान को ग्रहण नहीं कर पाता।

जगी पाहतां साच तें काय आहे। अती आदरें सत्य शोधूनि पाहें।
पुढें पाहतां पाहतां देव जोडे। भ्रमें भांति अज्ञान हें सर्व मोडे ॥144॥

अर्थ - दुनिया में सत्य क्या है, उसकी खोज दिल से करो। यह खोज करते-करते ही ईश्वर मिलता है और इसके साथ ही भ्रम, भ्रांति, अज्ञान यह सब मिट जाता है।

अर्क - ‘खोजने से ही मिलता है लेकिन खोजनेवाले को नहीं मिलता', इस पहेली को समझ जाए तो ईश्वर को पाना आसान है। खोजनेवाला ('मैं', अपने आपको अलग माननेवाला) मिट जाता है तो ईश्वर (स्व-ज्ञान) प्रकट होता है। ‘मैं’ का अहंकार, भ्रम मिट जाता है तो ईश्वर कहीं और नहीं, हमारे अंदर ही है और सर्वत्र सिर्फ ईश्वर ही है, यह सत्य प्रकट होता है।


* मुगल सैनिक, सुलतान शासक, विधर्मी आक्रमणकारी, म्लेच्छ-नित्य हिंसा करनेवाले




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