Mahabharat ki Kahaani - 213 in Hindi Spiritual Stories by Ashoke Ghosh books and stories PDF | महाभारत की कहानी - भाग 213

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महाभारत की कहानी - भाग 213

महाभारत की कहानी - भाग-२१७

भीष्म द्वारा वर्णित छाता, पादुका, फूल, धूप और दीप की उपयोगिता

 

प्रस्तावना

कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।

संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।

महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।

मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।

अशोक घोष

 

भीष्म द्वारा वर्णित छाता, पादुका, फूल, धूप और दीप की उपयोगिता

युधिष्ठिर ने कहा, पितामह, श्राद्ध आदि में जो छाता और पादुका दिए जाते हैं, उनका प्रर्वतन कैसे हुआ था? भीष्म ने कहा, एक दिन ज्येष्ठ मास में दोपहर के समय महर्षि जमदग्नि धनुष द्वारा तीर निक्षेप के अभ्यास कर रहे थे, उनकी स्त्री रेणुका वे तीर उठाकर ला रही थीं। प्रखर रौद्र में रेणुका को कष्ट होने लगा। उनके आने में विलम्ब हो रहा हैं देखकर जमदग्नि क्रुद्ध होकर बोले, तीर लाने में विलम्ब क्यों हुआ? रेणुका बोलीं, सूर्यकीरण के ताप से मेरे सिर और पैर तप रहे थे, इसलिए मैं वृक्ष की छाया में आश्रय ले ली! तब जमदग्नि दिव्य धनुष और तीर लेकर सूर्य को दण्ड देने के लिए उद्यत हुए।

तब सूर्य ब्राह्मण के वेश में आकर बोले, ब्रह्मर्षि, सूर्य आकाश से किरण द्वारा जल शोषण करते हैं और वर्षा में वह जल वर्षण करते हैं, उससे अन्न उत्पन्न होता है। सूर्य को निपातित करने से तुम्हारा क्या लाभ होगा? सूर्य आकाश में स्थिर नहीं रहते, उन्हें तुम कैसे भेदोगे? जमदग्नि बोले, मैं ज्ञाननेत्र द्वारा तुम्हें जानता हूँ, दोपहर में तुम अर्ध निमेष काल स्थिर रहते हो, उसी समय तुम्हें भेद दूँगा। सूर्य बोले, मैं तुम्हारी शरण लेता हूँ। जमदग्नि बोले, लेकिन तुम डरो नहीं, किन्तु ऐसा उपाय करो कि मनुष्य रौद्रतप्त पथ पर बिना कष्ट के चल सके। तब सूर्य ने जमदग्नि को छाता और पादुका देकर कहा, महर्षि, इन दोनों से मेरे ताप से सिर और पैर की रक्षा होगी।

कथा समाप्त करके भीष्म बोले, युधिष्ठिर, सूर्य ही छाता और पादुका के प्रर्वतक हैं, जो ब्राह्मणों को दान करने से महान धर्म होता है। उसके बाद भीष्म ने देवताओं की पूजा में फूल, धूप और दीप की उपयोगिता के विषय में कहा - फूल मन को आनन्दित करता है इसलिए उसका नाम सुमनाः। काँटारहित वृक्ष के श्वेत पुष्प ही देवता पसन्द करते हैं। पद्म और अन्य जलज पुष्प गन्धर्व, नाग और यक्षों को देने का योग्य हैं। कटु और कण्टकमय औषधि तथा रक्तवर्ण पुष्प शत्रुओं के अभिचार के लिए अथर्ववेद में निर्दिष्ट हैं। धूप तीन प्रकार - गुग्गुल आदि को निःक्षार, काष्ठमय धूप को सारी तथा मिश्रित द्रव्य से निर्मित धूप को कृत्रिम कहते हैं। निःक्षार में गुग्गुल श्रेष्ठ, सारी धूप में अगुरु श्रेष्ठ। शल्लकी और उस जातीय निःक्षार धूप दैत्य के प्रिय है। धूना और चन्दन आदि का मिश्रण जिससे कृत्रिम धूप बनता है वह देव, दानव, मनुष्य सब पसंद करते हैं। दीप दान करने से मनुष्य का तेज बढ़ता है, उत्तरायण की रात्रि में दीपदान करना चाहिए।

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(धीरे-धीरे)