Neeloo aur Neela taara in Hindi Short Stories by Makvana Bhavek books and stories PDF | नीलू और नीला तारा

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नीलू और नीला तारा

 

धनपुर की सुबह :

धनपुर की सुबह धूल और आदतों से बनी होती है। सूरज निकलने से पहले ही गलियों में झाड़ू की सरसराहट, चूल्हों की खटखट और अधखुली नींद की खाँसी तैरने लगती है। नीलू इन्हीं आवाज़ों में जागती थी—बिना अलार्म के, बिना उम्मीद के।

उसका घर छोटा था, पर खामोशियों से भरा। दीवारों पर नमी के धब्बे ऐसे लगते थे जैसे समय ने उँगलियों से छूकर उन्हें वहीं छोड़ दिया हो। नीलू आईने से नज़र चुराती—क्योंकि आईना सवाल पूछता था, और उसके पास जवाब नहीं थे।

 

स्कूल, जहाँ नाम खो जाते हैं :

सरकारी स्कूल की दीवारें उतनी ही फीकी थीं

जितनी वहाँ पढ़ने वाली ज़िंदगियाँ।

 

टीचर ने हाज़िरी लगाई—

नीलू का नाम आया,

उसकी आवाज़ नहीं।

 

पीछे की बेंच पर बैठी नीलू जानती थी,

यहाँ सबसे सुरक्षित जगह वही होती है

जहाँ कोई ध्यान न दे।

 

कुछ लड़कियाँ हँसीं,

किसी ने धक्का दिया,

किसी ने किताब छीनी।

 

नीलू ने सिर झुका लिया।

यही उसकी आदत थी।

 

घर की दीवारें :

माँ खाट पर लेटी थी।

दवा की शीशी खाली थी।

 

पिता देर रात आए—

शराब की गंध के साथ।

उन्होंने कुछ नहीं कहा,

पर उनकी चुप्पी सबसे ज़्यादा डराती थी।

 

नीलू ने रोटी बनाई।

खुद नहीं खाई।

 

कुछ बच्चों को भूख लगती है,

और कुछ को खाने का मन नहीं करता।

 

बरसात और नीली रोशनी:

उस रात बारिश अलग थी।

बूँदें जैसे सवाल पूछ रही हों।

 

नीलू छत पर गई-

बस हवा महसूस करने।

तभी आसमान फटा नहीं,

चमका।

 

एक नीली रोशनी,

धीरे-धीरे ज़मीन पर उतरी।

 

वह डरावनी नहीं थी।

बस… अजीब थी।

 

तारा:

वह छोटा था।

नीला।

आँखें बड़ी, मासूम।

 

उसने कहा,

“तुम दुखी हो।”

 

नीलू चौंकी।

पहली बार किसी ने पूछा नहीं,

बताया।

 

“मैं तारा हूँ।

मैं खुशियाँ ठीक करता हूँ।”

 

नीलू हँसी नहीं।

वह रोई भी नहीं।

 

खुशी ठीक करने की कोशिश:

तारा अपने उपकरण दिखाता।

समय, यादें, घटनाएँ।

 

“अगर कोई बुरा हुआ,

तो हम उसे मिटा सकते हैं।”

 

नीलू ने धीरे कहा,

“अगर सब मिट गया,

तो मैं क्या रह जाऊँगी?”

 

तारा समझ नहीं पाया।

 

बदलाव:

एक घटना बदली गई।

स्कूल का अपमान-

अब कभी हुआ ही नहीं।

 

अगले दिन स्कूल शांत था।

बहुत ज़्यादा शांत।

 

नीलू सुरक्षित थी।

पर कोई और लड़की रो रही थी।

 

तारा खुश था।

नीलू नहीं।

 

समय की कीमत:

हर बदलाव कुछ और छीन लेता।

यादें हल्की होती गईं।

नीलू खुद को पहचान नहीं पा रही थी।

 

“क्या अब ठीक है?”

तारा पूछता।

 

नीलू जवाब नहीं देती।

 

पहली आवाज़:

एक रात नीलू बोली-

ज़ोर से नहीं,

पर सच से।

 

“मेरा दुख गलती नहीं है।”

 

तारा पहली बार डर गया।

 

अपराधबोध:

तारा ने सीखा-

खुशी देना आसान है,

दर्द समझना कठिन।

 

वह रोया।

नीलू ने देखा।

 

कोई बदलाव नहीं:

इस बार कोई मशीन नहीं चली।

कोई समय नहीं बदला गया।

 

बस दोनों बैठे रहे।

बरसात में।

 

स्वीकार:

नीलू अब भी दुखी थी।

पर अकेली नहीं।

 

तारा अब भी मासूम था।

पर अज्ञानी नहीं।

 

अंतिम पंक्तियाँ:

कुछ घाव मिटाए नहीं जाते।

लेकिन अगर कोई उन्हें ढोंग न कहे,

तो शायद इंसान थोड़ा और खुश रह सकता है।