The Pain in Hindi Moral Stories by राज बोहरे books and stories PDF | तक़लीफ़

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तक़लीफ़

 तक़लीफ़

दोपहर की धूप अपनी पूरी तल्खी के साथ शहर की पुरानी सिविल लाइन की मंत्री निवास की बिल्डिंग पर झुकी हुई थी। बाहर खड़े नीम के पेड़ की छाया भी जैसे सिमटकर खुद में सिमट गई थी। भीतर, दूसरी मंज़िल के एक बंद कमरे में ए.सी. की ठंडी हवा बह रही थी—एक ऐसी ठंडक, जो बाहर की तपती ज़मीन से बिलकुल अलग थी।

कमरे में मंत्री हरकिसन अपनी भारी-भरकम कुर्सी पर टिके बैठे थे। सफ़ेद कुरता-पाजामा, कंधे पर हल्की-सी अँगोछे की तह, और माथे पर पसीने की जगह संतोष की चिकनाहट। सामने चार कुर्सियाँ थीं, जिन पर बैठे थे—पंडित श्यामनारायण, रतन श्रीवास्तव, अग्रवाल सेठ रमेशचंद्र और ठाकुर रणविजय सिंह।

दरवाज़ा भीतर से बंद था।

“देखिए,” हरकिसन ने धीमी आवाज़ में कहा, “इस बार हमें बहुत सोच-समझकर नाम भेजने हैं। कॉलेज की प्रशासक समिति हो, जिला परामर्श समिति या नगर पालिका—हर जगह अपने लोग होने चाहिए।”

पंडित श्यामनारायण ने अपनी चश्मा ठीक करते हुए कहा, “बिलकुल मंत्री जी, पर एक बात साफ़ होनी चाहिए—अध्यक्ष पद पर कोई… वो… नीचे वर्ग का आदमी नहीं होना चाहिए।”

कमरे में हल्की-सी खामोशी छा गई। जैसे किसी ने अनकहा सच कह दिया हो।

अग्रवाल सेठ ने बात को आगे बढ़ाया—“देखिए, सदस्य बना दीजिए, कोई दिक्कत नहीं है। दिखावा भी हो जाएगा कि सबको साथ लेकर चल रहे हैं… लेकिन असली निर्णय तो अध्यक्ष ही करता है।”

ठाकुर रणविजय सिंह ने कुर्सी पर थोड़ा आगे झुकते हुए कहा—“और फिर, समाज का संतुलन भी तो बनाए रखना है। हर किसी को उसकी जगह पर ही अच्छा लगता है।”

हरकिसन ने सिर हिलाया। “ठीक है… यही तय रहा।”

दरवाज़े के बाहर, गलियारे में खड़ा एक आदमी यह सब सुन रहा था।

वह था—रामसेवक।

रामसेवक, जो मंत्री हरकिसन का पुराना कार्यकर्ता था। जिसने हर चुनाव में रात-दिन एक कर दिया था। जिसने अपने गाँव के हर घर तक पार्टी का झंडा पहुँचाया था। जिसने अपने हिस्से की ज़मीन बेचकर भी पार्टी के लिए चंदा दिया था।

वह आज यहाँ इसलिए आया था कि शायद… इस बार… उसका नाम भी किसी समिति में आ जाए।

उसके हाथ में एक फाइल थी, जिसमें उसके कामों का ब्यौरा था। उसकी उंगलियाँ उस फाइल को कसकर पकड़े थीं, जैसे वह उसके सपनों का आख़िरी सहारा हो।

भीतर की बातें सुनकर उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

वह धीरे-धीरे पीछे हट गया। उसकी आँखों में कोई आँसू नहीं थे—बस एक खालीपन था, जो किसी भी दर्द से ज़्यादा गहरा होता है।

रामसेवक शहर और गाँव के बीच कहीं अटका हुआ आदमी था।

गाँव में लोग उसे “नेता जी” कहकर बुलाते थे, और शहर में वह बस एक “कार्यकर्ता” था। उसका घर कच्चा था, पर दीवारों पर शहर के नेताओं के साथ खिंचवाई गई तस्वीरें टंगी थीं।

उसकी पत्नी सुशीला अक्सर कहती—“तुम दिन-रात उनके पीछे घूमते रहते हो, कभी अपने घर की भी सोचो।”

रामसेवक मुस्कुरा देता—“बस एक बार नाम आ जाए ना, फिर सब ठीक हो जाएगा।”

उस दिन जब वह घर लौटा, तो सुशीला ने उसके चेहरे को पढ़ लिया।

“क्या हुआ?” उसने पूछा।

रामसेवक ने फाइल को कोने में रख दिया। “कुछ नहीं… बस, आज भी कुछ नहीं हुआ।”

“फिर वही?” सुशीला की आवाज़ में थकान थी, गुस्सा नहीं।

रामसेवक चुप रहा। फिर अचानक बोला—

“मैं इस समाज का हिस्सा था, पर हर फैसले के समय मुझे बाहर कर दिया जाता था।”

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

सुशीला ने पहली बार उसके चेहरे पर वह दर्द देखा, जो अब तक उसके शब्दों में छिपा रहता था।

अगले दिन शहर में खबर फैल गई कि विभिन्न समितियों के नाम तय हो गए हैं।

कॉलेज की प्रशासक समिति के अध्यक्ष बने—पंडित श्यामनारायण।

जिला परामर्श समिति में प्रमुख सदस्य—श्रीवास्तव और अग्रवाल।

नगर पालिका में एल्डरमैन—ठाकुर रणविजय सिंह।

और हाँ… “संतुलन” बनाए रखने के लिए दो-तीन नाम “नीचे वर्ग” से भी जोड़े गए—सदस्य के रूप में।

रामसेवक का नाम भी था—एक सदस्य के तौर पर।

गाँव में मिठाई बँटी। लोग उसे बधाई देने आए।

“अरे नेता जी, अब तो आप भी बड़े आदमी हो गए!”

रामसेवक मुस्कुरा रहा था। पर उसकी मुस्कान में कोई चमक नहीं थी।

उसे पता था—यह पद सिर्फ एक कुर्सी है, जिसमें बैठने की इजाज़त है, पर बोलने का अधिकार नहीं।

पहली बैठक का दिन आया।

बड़े हॉल में कुर्सियाँ सजी थीं। सामने मंच पर अध्यक्ष की बड़ी कुर्सी थी, और उसके दोनों ओर छोटी-छोटी कुर्सियाँ।

रामसेवक पीछे की पंक्ति में बैठा था।

बैठक शुरू हुई। एजेंडा पढ़ा गया। फैसले लिए गए।

हर बार जब कोई मुद्दा आता, रामसेवक का मन करता कि वह कुछ कहे—अपने गाँव के स्कूल की हालत, अस्पताल में दवाइयों की कमी, नालियों का गंदा पानी…

पर हर बार उसकी आवाज़ गले में ही अटक जाती।

क्योंकि उसे पता था—यहाँ उसकी बात सुनी नहीं जाएगी, सिर्फ दर्ज कर ली जाएगी।

एक बार उसने हिम्मत जुटाई।

“अध्यक्ष जी, हमारे गाँव में—”

“हाँ-हाँ, बाद में देखेंगे,” पंडित श्यामनारायण ने उसे बीच में ही रोक दिया।

बैठक आगे बढ़ गई।

रामसेवक फिर चुप हो गया।

दिन बीतते गए।

रामसेवक अब शहर में और भी ज़्यादा समय बिताने लगा। वह बैठकों में जाता, फाइलें उठाता, दस्तखत करता—और वापस आ जाता।

उसकी ज़िंदगी एक अजीब-सी भूलभुलैया बन गई थी, जिसमें रास्ते तो बहुत थे, पर मंज़िल कहीं नहीं।

गाँव में लोग अब भी उसे “नेता जी” कहते थे, पर उनके सवाल बढ़ते जा रहे थे।

“हमारे मोहल्ले में पानी कब आएगा?”

“स्कूल में मास्टर क्यों नहीं आता?”

“अस्पताल में दवाई क्यों नहीं मिलती?”

रामसेवक के पास जवाब नहीं थे।

एक दिन उसका बेटा, छोटू, स्कूल से लौटकर बोला—“बाबा, मास्टर जी कहते हैं कि तुम बड़े आदमी हो, फिर हमारे स्कूल में किताबें क्यों नहीं आतीं?”

रामसेवक ने उसकी ओर देखा। वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द नहीं मिले।

उसने बस इतना कहा—“बेटा, सब ठीक हो जाएगा।”

पर उसे खुद भी यकीन नहीं था।

एक शाम, वह अकेला बैठा था। सामने वही फाइल पड़ी थी, जो वह उस दिन लेकर गया था।

उसने फाइल खोली। उसमें उसके कामों की सूची थी—रैलियाँ, सभाएँ, चंदा, प्रचार…

उसने एक-एक पन्ना पलटा।

हर पन्ना जैसे उससे एक सवाल पूछ रहा था—“क्या मिला?”

रामसेवक ने फाइल बंद कर दी।

उसने बाहर देखा। सूरज ढल रहा था। उसकी लालिमा आसमान में फैल रही थी—जैसे किसी ने दर्द को रंग दिया हो।

उसे लगा, वह भी उसी सूरज की तरह है—दिन भर जलता है, और शाम को चुपचाप डूब जाता है।

कुछ दिनों बाद, एक और बैठक थी।

इस बार एजेंडा था—नए कॉलेज भवन का निर्माण।

रामसेवक के गाँव के पास खाली ज़मीन थी, जहाँ कॉलेज बन सकता था। वह जानता था कि इससे पूरे इलाके के बच्चों को फायदा होगा।

बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि कॉलेज शहर के पास बनेगा।

रामसेवक का दिल धड़कने लगा।

उसने इस बार ठान लिया कि वह बोलेगा।

“अध्यक्ष जी,” उसने खड़े होकर कहा, “अगर कॉलेज हमारे गाँव के पास बने, तो—”

“बैठ जाइए,” पंडित जी ने सख्ती से कहा, “यह निर्णय ऊपर से आया है।”

“पर सर, वहाँ ज़मीन भी है और—”

“आप समझते क्यों नहीं?” श्रीवास्तव ने बीच में टोका, “हर चीज़ की एक प्रक्रिया होती है।”

कमरे में बैठे लोग उसे देख रहे थे—जैसे वह कोई गलती कर रहा हो।

रामसेवक धीरे-धीरे बैठ गया।

उसकी आवाज़ फिर से कहीं खो गई।

उस रात वह बहुत देर तक सो नहीं पाया।

सुशीला ने पूछा—“क्या सोच रहे हो?”

रामसेवक ने कहा—“सोच रहा हूँ कि मैं आखिर हूँ क्या?”

“क्या मतलब?”

“गाँव में मैं नेता हूँ, शहर में मैं कोई नहीं। यहाँ मैं सदस्य हूँ, पर मेरी कोई आवाज़ नहीं। मैं इस व्यवस्था का हिस्सा हूँ, पर मेरे हिस्से में कुछ नहीं आता।”

सुशीला ने उसकी ओर देखा—“तो छोड़ दो यह सब।”

रामसेवक चुप हो गया।

छोड़ देना इतना आसान नहीं था। क्योंकि यह सिर्फ उसका काम नहीं था—यह उसकी पहचान बन चुकी थी।

अगले दिन, वह फिर उसी कलेक्ट्रेट बिल्डिंग के सामने खड़ा था।

वही नीम का पेड़, वही धूप, वही गलियारा।

पर आज उसके हाथ में कोई फाइल नहीं थी।

वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ा, और उस कमरे के सामने जाकर खड़ा हो गया, जहाँ उस दिन बैठक हुई थी।

दरवाज़ा बंद था।

उसने दरवाज़े को छुआ—जैसे वह उस दूरी को महसूस करना चाहता हो, जो उसके और फैसलों के बीच थी।

फिर उसने हाथ वापस खींच लिया।

और बिना कुछ कहे, सीढ़ियों से उतर गया।

गाँव लौटते समय रास्ते में उसे बच्चे खेलते हुए दिखे।

वे मिट्टी में लकीरें खींच रहे थे—अपनी-अपनी जगह तय कर रहे थे।

एक बच्चा बोला—“यह मेरी जगह है, तुम यहाँ नहीं आ सकते।”

दूसरा बच्चा चुपचाप पीछे हट गया।

रामसेवक ने वह दृश्य देखा।

उसे लगा, जैसे वह बच्चा वही है—जो हर बार पीछे हट जाता है।

उसने आसमान की ओर देखा।

सूरज फिर ढल रहा था।

पर इस बार, उसने मन ही मन एक सवाल किया—

“क्या कभी कोई सुबह ऐसी भी होगी, जहाँ मुझे पीछे नहीं हटना पड़े?”

उसके पास जवाब नहीं था।

पर शायद, यही सवाल ही उसकी सबसे बड़ी तक़लीफ़ थी।

और यही तक़लीफ़… उसकी पहचान भी।