kusum in Hindi Motivational Stories by Rajesh Maheshwari books and stories PDF | कुसुम

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कुसुम

कुसुम 

रायपुर शहर में कुसुम अपने पति और बच्चों के साथ बडी शान से अपना जीवन व्यतीत कर रही थी। वह बहुत अमीर थी। उसका पति शहर का एक माना हुआ डान और सट्टेबाज था जिसकी प्रतिदिन की कमाई हजारों रूपये में थी। वह अपनी अनैतिक गतिविधियों के सुचारू रूप से संचालन हेतु अनेक शासकीय कर्मचारियों को धन बांटा करता था और अनेक अधिकारी भी इसी तारतम्य में उसके पास आते जाते थे जिस कारण से उसकी अनेक शासकीय विभागों में गहरी पैठ थी। कुसुम के बच्चे भी अनैतिक ढंग से प्राप्त अनाप शनाप धन से बिगड चुके थे और सारा दिन निठल्लों की तरह समय व्यतीत करते और धन खर्च करते रहते थे। कुसुम और उसके पति को इसमें कुछ भी बुरा नही लगता था बल्कि वे प्रसन्न होते कि हमारे पास इतना धन है कि हमारे बच्चे यदि कोई भी काम ना करे तो भी उनका जीवन बडी आसानी से कट जायेगा। 
हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार अनैतिकता और बेईमानी से कमाया हुआ धन कभी टिकता नही है और व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता हैं। यही बात कुसुम के जीवन पर भी लागू हुई। एक दिन एक कार एक्सीडेंट में उसके पति की मौत हो गई । पति की मृत्यु के बाद जैसे जैसे समय बीत रहा था कुसुम के जीवन में कष्ट बढते जा रहे थे। वे सभी अधिकारी और कर्मचारी जो सुबह शाम उसके घर पर बैठे रहते थे वे सब धीरे धीरे दूरी बनाने लगे। उसके पति की कमाई का मुख्य साधन सट्टा था जो कि पति की मृत्यु के बाद पूरी तरह से बंद हो गया और इस प्रकार उसकी आय का स्त्रोत समाप्त हो गया। जिन लोगों को कुसुम ने उधार दिया था वे भी रूपये लौटाने में आनाकानी करने लगे। धीरे धीरे कुसुम की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही थी। उसके दोनो बच्चे भी किसी काम के नही निकले। लोगों से रूपये उधार लेना और अपना जीवन चलाना यही उनका ध्येय था। रूपये चुकाने की जवाबदारी कुसुम की थी। इस तरह धीरे धीरे कर्ज बढता गया संपत्तियाँ बिकती गई और एक दिन ऐसी स्थिति आ गई कि कुसुम को अपना घर खर्च चलाने के नौकरी का सहारा लेना पडा। उसके बच्चों को फिर भी किसी प्रकार की दया नही आई कि हमारी माँ दिनभर बाहर काम करती है और हम घर में पडे रहते है। इस प्रकार जैसे तैसे बडी कठिनाई से उसका जीवन यापन हो रहा था। एक दिन प्रभु कृपा से उसे एक सभ्य, सुसंस्कृत व संपन्न परिवार में सेविका के रूप में काम मिल गया और धीरे धीरे कुसुम उस परिवार की विश्वास पात्र सेविका बन गईं। 
वह एक बहुत वफादार, परिश्रमी और अपने मालिकों के प्रति समर्पित विनम्र स्वभाव की महिला थी। एक बार उसके मालिक दयाराम की पत्नी का हीरों से जडा हुआ कीमती हार उसकी ड्रेसिंग टेबल से खिसक कर पीछे की ओर गिर गया उसे इस बात का पता नही चला और पूरे घर में हार को ढूंढा गया परंतु हार कही नही नही मिला। थक हार कर परिवार के सदस्य दुखी मन से इस घटना को भूल गये। इस घटना के लगभग एक महीने बाद कुसुम मालकिन के कमरे की साफ सफाई कर रही थी। इसी दौरान उसकी नजर ड्रेसिंग टेबिल के नीचे गई उसने देखा कि कुछ चमकती हुई वस्तु वहाँ पडी हुई है। उसने झाडू की मदद से टेबल को खिसकाते हुए उस वस्तु को निकाला उसे देखकर वह भौचक्की रह गई कि यह तो मालकिन का वहीं हार है जो कि कुछ समय पहले गुम हो गया था और काफी प्रयास के बाद भी नही मिला था। उस हार को देखकर एक बार तो कुसुम के मन में आया कि इस हार को तो सब भूल चुके है अगर मैं इस हार को रख लूँ और इसे बेच दूँ तो मेरी बहुत सी आर्थिक समस्याएं समाप्त हो जायेंगी। यह सोचकर उसने एक क्षण के लिए उस हार को अपने पास रख लिया परंतु कुछ ही देर में उसे एक और विचार आया कि यह बेईमानी से प्राप्त धन होगा अगर इसका मैंने उपयोग किया तो निश्चित ही मेरा विनाश होगा इसके पहले भी मैं अपने जीवन में बेईमानी से प्राप्त धन का परिणाम देख चुकी हूं। साथ ही साथ इस परिवार ने ही मुझे उस भयानक परिस्थिति ने निकालकर एक सम्मानजनक जीवन जीने का मौका दिया है और इस प्रकार का कार्य करना विश्वासघात होगा। यह विचार आते ही उसकी मनः स्थिति बिल्कुल बदल गई और उसने वह हार ले जाकर घर के मुखिया दयाराम को सौंप दिया और किस तरह प्राप्त हुआ वह सब बता दिया। यह खबर सुनकर पूरा परिवार प्रसन्न हो गया और मालिक ने अपनी तरफ से कुसुम को कुछ इनाम देना चाहा परंतु उसने वह अस्वीकार कर दिया और कहा कि आप लोग मुझ पर इतना विश्वास रखते हैं एवं परिवार के सदस्य की तरह मुझसे व्यवहार करते हैं यही मेरा सबसे बडा इनाम है। कुसुम की यह बात सुनकर सब बहुत प्रसन्न हुए और उनके दिलों में उसके प्रति सम्मान और विश्वास और भी अधिक बढ गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जब कभी पूरा परिवार बाहर जाता तो कुसुम के भरोसे पर पूरा घर छोड दिया जाता था और कभी भी किसी भी प्रकार की हेरा फेरी नही हुई।
कुसुम जहाँ काम करती थी वहाँ पर वह बहुत खुश थी, पुरानी सेविका होने के कारण वह सबकी विश्वासपात्र थी। उसका एक लडका और एक लडकी थी। दोनो ही कुसुम से रूपये पाने के लिये मिलने आते थे। उसको मिलने वाली प्रतिमाह की तनख्वाह भी ये लोग ले लेते थे और शराब, जुए एवं सट्टे में खर्च कर देते थे। कुसुम हर महिने के अंत तक कर्ज लेकर किसी प्रकार से अपना काम चलाती थी। उसको सभी बहुत समझाते थे कि तुम्हारे बेटा और बेटी कहीं भी छोटा मोटा काम कर सकते हैं परंतु तुम उन्हें इस प्रकार अपने उपर निर्भर बनाकर उनका जीवन खराब कर रही हो। वह अपने बच्चों के प्रेम में अंधी होकर सभी की बातें सुनकर अनसुना कर देती थी और उसके स्वभाव में किसी प्रकार का परिवर्तन नही आया। कुसुम को सभी लोग समझाते थे कि कुछ धन तुम अपने भविष्य के लिए जोड कर रखो क्या पता कौन सी विपरीत परिस्थिति उत्पन्न हो जाए ? परंतु कुसुम के उपर इन सब बातों का कोई असर नही होता था।
आज कुसुम काफी खुश नजर आ रही थी क्योंकि आज उसका जन्मदिन था और इस शुभ अवसर पर उसने अपने सभी निकटतम रिश्तेदारों और साथियों को कुछ न कुछ उपहार भेंट किए। इसी दौरान चलते चलते अचानक कुसुम गिर पडी। तुरंत ही दूसरे कर्मचारियेां ने उसे संभाला और कुर्सी पर बैठालकर पानी पिलाकर इस हादसे की सूचना मालिक दयाराम तक पहुँचायी। कुसुम का उनके मालिकों के प्रति अत्यंत प्रेम और सद्भाव का व्यवहार था वे यह सुनते ही तुरंत दौडते हुए कुसुम के पास आंगन में पहुँचे और उसकी गंभीर अवस्था को देखते हुए तुरंत ही नजदीकी अस्पताल की ओर ले गये जहाँ से उसकी गंभीर हालत के कारण उसे समुचित इलाज हेतु शासकीय चिकित्सालय भेज दिया गया। शासकीय चिकित्सालय में भर्ती करने उपरांत जांच में यह बात सामने आई की अत्याधिक ब्लड प्रेशर बढने के कारण वह बहोशी की स्थिति में चली गयी है साथ ही साथ उसके शरीर का लगभग आधा हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया है जिसके ठीक होने की संभावना बहुत मुश्किल है। चिकित्सकों के मन में उसके प्रति सहानुभूति थी परंतु इसका इलाज हो पाना अत्यंत मुश्किल था साथ ही साथ ठीक होने की संभावना भी ना के बराबर थी इसलिये चिकित्सकों ने उन्हें घर ले जाकर उनकी अंतिम समय तक सेवा करने की सलाह दी। 
कुसुम के गिरकर अचेत होने की खबर कुसुम के परिवार तक भी पहुँची। कुसुम का एक भरा पूरा परिवार था जिसमें उसके बेटे, बहुएँ, नाती, पोते आदि सभी थे परंतु घर ले जाकर सेवा करने की बात सुनकर सबके चेहरे पर हवाइंयाँ उडने लगी कि इनकी सेवा कौन करेगा और साथ ही साथ दवाईयों पर होने वाला खर्च कौन वहन करेगा। कुसुम के परिजन आर्थिक खर्च और अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर कतराने लगे। तब कुसुम के मालिक दयाराम ने उनके परिजनों को आश्वस्त किया कि कुसुम के उपर होने वाले इलाज के सारे खर्चे वे वहन कर लेंगे। यह सुनकर कुसुम के परिजनों को बडी शांति मिली। कुसुम ज्यादा दिन अस्पताल में नही जी सकी और इलाज के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गई। कुसुम के अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी मालिक ने ही करवाई। कुसुम की मृत्यु ने दयाराम को सोचने पर मजबूर कर दिया कि आज के युग में मानवीयता ना जाने कहाँ खो गई है। धन के लिये मनुष्य इतना अंधा हो गया है कि उसे धर्म, नैतिकता, मर्यादा आदि कुछ भी नही दिखता और वह पागल के जैसा धन संग्रह में लगा रहता है।