ऑफिस का देर रात का सीन। घड़ी में रात के 12 बज रहे हैं। पूरा फ्लोर खाली है। टेबल पर फाइलें बिखरी हैं। सिमरन थकी हुई कुर्सी पर बैठी-बैठी सो जाती है। उसके मासूम चेहरे पर नींद की झलक है।
सिमरन मासूम और थकी हुई।
उसे नहीं पता था कि उसकी नींद किसी और के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान थी।
करण अंधेरे से बाहर आता है। उसकी आँखें लाल चमक रही हैं। वह धीरे-धीरे सिमरन की ओर बढ़ता है। उसके चेहरे पर पजेसिव गुस्सा और अंदर से निकलती भूख साफ दिखाई देती है।
करण धीरे से खुद से फुसफुसाते हुए बोला
यही मौका है।
ये मेरे बिल्कुल पास है।
इसकी गर्दन की नसें साफ दिखाई दे रही हैं।
करण झुककर सिमरन के करीब आता है। उसकी साँसें सिमरन की गर्दन को छूने लगती हैं। उसके दाँत बाहर निकलने लगते हैं।
अचानक करण रुक जाता है। वह गहरी साँस लेता है और अपनी मुट्ठी भींच लेता है।
करण अपने आप से गुस्से में बोला
नहीं। अभी नहीं।
ये सही समय नहीं है।
मुझे यह ज़िंदा चाहिए।
मिशन के लिए और मेरे लिए भी।
सिमरन नींद में ही हिलती है जैसे कोई बच्चा करवट बदलता है। उसकी आँखों से नींद की नमी झलक रही है। करण उसे देखता है और उसकी आँखों में प्यास और नरमी का अजीब सा टकराव होता है।
करण धीमे स्वर में सर्द लहजे में बोला
तुम्हें नहीं पता सिमरन।
तुम सिर्फ मेरी कमजोरी नहीं हो।
बल्कि मेरी सबसे बड़ी जरूरत हो।
तुम्हारा खून मेरे लिए बहुत जरूरी है।
करण पीछे हट जाता है। अंधेरे में चला जाता है। सिमरन शांति से सो रही है। उसे अंदाज़ा भी नहीं कि मौत अभी उसके सिरहाने खड़ी थी।
प्यास अधूरी रही।
लेकिन इस अधूरी प्यास ने करण के इरादों को और मजबूत कर दिया।
अब सिमरन के पास वक्त बहुत कम था।
क्योंकि करण उसे किसी भी हाल में अपने मिशन के लिए चाहता था।
सिमरन काम कर रही है। थकी हुई और डरी-सहमी।
अचानक उसके फोन पर मैसेज आता है। घर कब जा रही हो। करण का मैसेज। सिमरन घबरा जाती है।
सिमरन धीरे से बुदबुदाते हुए बोली
ये मुझे हर जगह देखते कैसे हैं।
वह इधर-उधर देखती है। करण पास की केबिन से उसकी ओर घूर रहा होता है। सिमरन नजरें झुका लेती है।
दूसरा दिन। रात को। सिमरन ऑटो में बैठकर घर जाने लगती है।
रास्ते में फिर मैसेज आता है। कहा था न सिर्फ मेरी कार से आना जाना है।
उसी वक्त ऑटो रुकता है और सामने करण की कार खड़ी होती है।
करण खिड़की खोलते हुए ठंडी आवाज़ में बोला
उतर जाओ। मैंने कहा था कि अब से सिर्फ मेरी कार में जाना है।
सिमरन डरते-डरते ऑटो से उतरती है और उसकी कार में बैठ जाती है। उसका चेहरा पसीने से भीगा है।
घर पहुँचकर सिमरन जल्दी से गेट की तरफ बढ़ती है। तभी करण उसके पास आकर फुसफुसाता है।
करण बोला
कल से तुम्हारा फोन मेरे पास रहेगा।
तुम कब आती हो कब जाती हो
हर चीज मैं तय करूँगा।
फोन तब मिलेगा जब तुम घर जाओगी।
तुम्हें बस वही करना है जो मैं कहूँ।
सिमरन की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वह काँपती हुई सिर हिलाती है।
रात के समय। सिमरन अपने कमरे में रो रही है।
खिड़की से बाहर देखती है तो अंधेरे में करण की लाल आँखें उसे घूर रही होती हैं।
वह चीखना चाहती है लेकिन गला सूख जाता है।
सिमरन का हर कदम और हर साँस अब करण की कैद में थी।
वह चाह कर भी भाग नहीं सकती थी।
करण का पजेसिव साया उसकी रूह तक में उतर चुका था।
ऑफिस का कॉन्फ़्रेंस हॉल। रात के 10 बज चुके हैं।
पूरा ऑफिस खाली है।
बस एक टेबल पर ढेर सारी फाइलें रखी हैं।
सिमरन का चेहरा पसीने से भीगा हुआ है।
CEO सख्त आवाज़ में बोला
सिमरन, इतनी बड़ी गलती। तुम्हें सबक मिलना चाहिए।
आज रात तुम यहीं रहकर करण के साथ ओवरटाइम करोगी।
सुबह तक सारा काम खत्म होना चाहिए।
सिमरन घबराकर नीचे देखती है। उसके होंठ कांपते हैं।
सिमरन मन ही मन बोली
हे भगवान, पूरी रात उनके साथ।
मैं तो मर जाऊँगी डर से।
CEO चला जाता है।
कमरे में सिर्फ करण और सिमरन रह जाते हैं।
खामोशी का बोझ हर तरफ फैल जाता है।
करण अपनी लाल आँखों से उसे घूरता है और धीरे-धीरे उसके पास आता है।
करण ठंडी और डरावनी आवाज़ में बोला
अब कोई बहाना मत बनाना।
पूरी रात काम करना होगा।
और याद रखना, यहाँ से जाने का हक सिर्फ मुझे है तुम्हारा नहीं।
और जब तक तुम यहाँ हो मैं यहाँ से जाने से रहा।
सिमरन काँपते हाथों से फाइल खोलती है। उसका पेन बार-बार गिर जाता है।
करण मेज़ पर हाथ मारकर उसे चौंका देता है।
करण धीमे स्वर में आँखें गड़ाते हुए बोला
इतनी भी डरपोक क्यों हो।
तुम्हें मेरे साथ ही रहना है चाहे तुम चाहो या न चाहो।
रात गहरी होती है। बाहर तूफ़ान चल रहा है।
बिजली चमकती है।
खिड़की से आती रोशनी करण के चेहरे को और डरावना बना देती है।
सिमरन की साँसें तेज हो जाती हैं।
सिमरन मन में बोली
हे भगवान, यह कहाँ फँस गई मैं।
मुझे इतना डर क्यों लग रहा है।
उस रात ऑफिस की हर टिक-टिक सिमरन के लिए मौत की आहट जैसी थी।
वह अकेली थी और सामने खड़ा था करण।
जो इंसान कम और डरावनी छाया ज्यादा लग रहा था।
अचानक सिमरन की उंगली से खून निकल जाता है पन्ने पलटते समय।
वह घबरा कर पीछे हटती है।
करण की नज़र खून पर टिक जाती है।
उसकी पुतलियाँ और गहरी लाल हो जाती हैं।
वह बड़ी मुश्किल से खुद को रोकता है।
करण दाँत भीचते हुए बहुत धीमे बोला
अभी नहीं। सही समय आने दो।
सिमरन उसकी ओर देखती है और सहमकर कुर्सी पर बैठ जाती है।
उसके चेहरे का रंग उड़ चुका है।
ऑफिस बिल्डिंग, आधी रात। बाहर तूफान और अंदर गहरी खामोशी थी। करण ने बोतल उठाई, पर वह खाली थी।
करण बोला -
पानी खत्म हो गया, मैं लेकर आता हूं। तुम यहां से कहीं मत जाना, समझी।
सिमरन ने हां में सिर हिलाया।
करण किसी बहाने से बाहर चला गया। सिमरन अकेली रह गई। अचानक लाइट्स टिमटिमाईं और बुझ गईं। कमरा अंधेरे में डूब गया।
सिमरन घबराकर कांपती आवाज़ में बोली -
हेलो, कोई है? करण सर, कहां हो आप? मुझे डर लग रहा है। ओह गॉड, ये लाइट्स को क्या हो गया।
उसके पसीने छूट गए। तभी सामने से एक काली परछाई उभरी। उस साये के हाथ में लंबा सा चाकू था। वह धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा।
सिमरन चीखते हुए बोली -
आआआआ।
वह कांपते हुए पीछे हटती हुई अचानक दौड़ पड़ी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, बैग गिर गया। वह दौड़ते-दौड़ते गलियारे में पहुंची। पीछे वही डरावना साया था।
उस रात मासूम सिमरन के लिए दिल्ली की वह इमारत मौत का क़ब्रिस्तान बन गई थी। हर दीवार से अंधेरा टपक रहा था और एक परछाई उसका पीछा कर रही थी।
सिमरन बुरी तरह हांफ रही थी। तभी वह किसी मजबूत जिस्म से टकराई। उसका चेहरा ऊपर उठा। सामने करण खड़ा था। लेकिन अब वह इंसान नहीं दिख रहा था।
करण का असली रूप सामने था। उसकी लाल आंखें आग की तरह चमक रहीं थीं, लंबे दांत बाहर निकले हुए थे, सिर पर काले तीखे सींग थे। उसके पीछे फैलते काले, विशाल पंख दीवार से दीवार तक छा रहे थे।
सिमरन हकलाते हुए, बुरी तरह डरकर बोली -
नहीं, आप… ये क्या हो रहा है? हे भगवान।
उसके पैर कांप रहे थे। सांसें रुक-सी गई थीं।
करण गहरी गूंजती आवाज़ में बोला -
चुप रहो।
उसकी आवाज़ दीवारों से टकराकर गूंज गई। सिमरन वहीं ज़मीन पर गिर गई। उसकी आंखों में आंसू भर आए और चेहरा सफेद पड़ चुका था।
आख़िरकार वो सच जो अब तक छुपा था, सिमरन के सामने आ चुका था। उसका बॉस करण रघुवंशी इंसान नहीं था। वह एक सैतान था।
करण उसके ऊपर झुक गया। उसकी आंखों की लाल चमक और तेज हो गई। सिमरन का दिल इतनी तेज धड़क रहा था मानो सीने से बाहर निकल जाएगा। करण सिमरन के सामने ही बैठ गया।
अंधेरे हॉलवे में काली परछाई चाकू लेकर आगे बढ़ रही थी। सिमरन ज़मीन पर बैठी कांप रही थी। तभी करण की लाल आंखें और ज्यादा चमक उठीं। उसके काले पंख पूरी तरह फैल गए।
करण गरजते हुए बोला -
हट जा उसके पास से।
काली परछाई करण को देखकर ठिठक गई। करण तुरंत सिमरन को अपनी बाहों में खींचकर ले गया। उसके विशाल पंख फैलकर सिमरन को पूरी तरह ढक चुके थे। चारों तरफ बस काले पंखों की दीवार थी।
वह मासूम लड़की, जो उसकी दानवी शक्ल देखकर डर के मारे मर ही जाती, उसी की बांहों में कैद थी।
पर आश्चर्य की बात यह थी कि उसके पंखों की ओट में वह सुरक्षित थी।
सिमरन कांपते हाथों से करण के सीने को पकड़ रही थी। उसकी आंखें बंद थीं, आंसू लगातार गिर रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किसके साथ है, बस यह एहसास हो रहा था कि बाहर से आती धमकी अब उस तक नहीं पहुंच पा रही थी।
सिमरन टूटती आवाज़ में बोली -
ये क्या हो रहा है? प्लीज़ मुझे जाने दीजिए।
करण उसे और कसकर अपने सीने से लगाए रहा। उसकी सांसें गर्म और भारी थीं।
करण धीमे, भारी स्वर में बोला -
चुप रहो। जब तक मैं हूं, कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।
काली परछाई बोली -
करण उसे मेरे हवाले कर दो। उसका खून मेरा है।
करण बोला -
खबरदार अगर छुआ भी तो। इसका खून सिर्फ मेरा है।
काली परछाई बोली -
तुम्हारा खून है तो मार क्यों नहीं देते? क्यों उसका खून नहीं पी रहे तुम?
करण बोला -
क्योंकि मेरा मिशन अभी अधूरा है।
करण ने अपनी शक्ति से उस पर वार किया।
काली परछाई धीमे-धीमे धुंधली होकर गायब हो गई। तूफान की आवाज़ थमने लगी। करण ने अपने पंख समेटे। सिमरन अब भी उसकी छाती से लगी कांप रही थी।
करण झुककर उसके चेहरे को देखने लगा। उसकी आंखों में डर, मासूमियत और आंसू थे। पहली बार करण उस डर के पार कुछ और महसूस कर रहा था।
यह कैसी विडंबना थी।
जिस सैतान को देखकर इंसान डर के मारे मर जाए, उसी की बाहों में सिमरन को पहली बार सुरक्षित होने का एहसास हुआ।
ऑफिस का अंधेरा कॉरिडोर था। खिड़कियों से चांदनी छनकर अंदर आ रही थी। पवन की तेज आवाज गूंज रही थी। करण ने अभी-अभी पंख समेटे ही थे कि वही काली परछाई फिर उभर आई। उसके हाथ में चमकता हुआ चाकू था।
सिमरन डर से चीख उठी -
आआआ, वो फिर आ गया।
सिमरन के कांपते हाथों को करण कसकर पकड़ चुका था। उसकी आंखें आग की तरह चमक रही थीं।
करण गरजते हुए बोला -
अबकी बार बचकर नहीं जाएगा।
वह सिमरन का हाथ पकड़कर कॉरिडोर में भागने लगा। सिमरन मुश्किल से उसके साथ दौड़ रही थी, आंसू उसके चेहरे पर बह रहे थे।
पूनम की रात थी।
इस रात चांदनी से करण की ताकतें कम हो जाती थीं।
उसके पंख थे, पर वह उड़ नहीं पा रहा था।
वह सिर्फ भाग सकता था।
सिमरन बार-बार ठोकर खा रही थी। उसका बैग और संतुलन, दोनों छूट चुके थे। करण उसका हाथ कसकर थामे खींचता चला जा रहा था। पीछे से वह परछाई चीखती हुई उनकी तरफ बढ़ रही थी।
सिमरन हांफती हुई टूटी आवाज़ में बोली -
प्लीज़, छोड़ दीजिए मुझे। मैं और नहीं भाग सकती। मेरे माइग्रेन का दर्द बढ़ रहा है।
करण अचानक एक दरवाजा खोलकर सिमरन को अंदर ले गया। दरवाजा जोर से बंद कर दिया। वे दोनों एक पुराने अंधेरे कमरे में कैद हो गए। बाहर परछाई दरवाजे पर ज़ोर-ज़ोर से चोट कर रही थी।
धड़ाम… धड़ाम…
सिमरन कांपते हुए दीवार से लगकर बैठ गई। उसकी आंखें करण के डरावने चेहरे पर टिकी थीं।
सिमरन डर से फुसफुसाती हुई बोली -
आप इंसान नहीं हो… आप आखिर हो क्या?
करण उसके करीब आया। उसकी लाल आंखें चांदनी में और खतरनाक लग रही थीं। मगर उसके चेहरे पर इस बार गुस्से से ज्यादा बेचैनी थी।
करण धीमे लेकिन भारी स्वर में बोला -
जो भी हूं… अभी तुम्हारी ढाल हूं।
एक कमरे में कैद।
एक मासूम लड़की।
और उसके पास था शैतान।
बाहर मौत दस्तक दे रही थी।
और अंदर दोनों के बीच एक अजीब रिश्ता बनने लगा था।