Devil ki Daastaan - 6 in Hindi Horror Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 6

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Devil की दास्तान - 6

(सुबह की हल्की धूप खिड़की से कमरे में आ रही है। सिमरन नींद से उठती है, उसका चेहरा मासूम और बेख़बर। वो धीरे-धीरे उठकर पानी पीती है।)

"वो रात जो उसके लिए डर और रहस्य से भरी हुई थी... अब उसकी यादों से गायब हो चुकी थी।
करण ने उसकी आँखों से वो लम्हे मिटा दिए थे।
क्योंकि अगर सच सामने आ जाता... तो सिमरन हमेशा के लिए उससे दूर भाग जाती।"

(ऑफिस – सिमरन अपनी टेबल पर बैठी है, मासूम-सी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। बाकी एम्प्लॉई उसे देखकर हैरान होते हैं। फुसफुसाते हैं।)

Employee 1 (धीमे से) बोले - 
"कल रात तो इसको अकेले करण सर के साथ ऑफिस में रहना था न?"

Employee 2 बोला - 
"हाँ... लेकिन ये तो बिल्कुल नॉर्मल लग रही है। पता नहीं क्या हुआ होगा।"

(सिमरन को कुछ याद नहीं। वो बस हल्की-सी बेचैनी महसूस करती है, मगर समझ नहीं पाती क्यों।)

(कट टू: करण अपने केबिन में है। वो फाइल्स देख रहा है लेकिन उसका ध्यान कहीं और है। उसकी आँखों में हल्की लाल चमक है।)

"करण के लिए सबसे मुश्किल था... खुद को रोकना।
सिमरन का मासूम चेहरा, उसकी नर्मी, और उसकी नाज़ुक नसों में बहता ताज़ा खून...
हर पल उसकी प्यास को और तेज़ कर रहा था।"

(करण के हाथ में कॉफी का कप है। वो कप को कसकर दबाता है। कप फट जाता है और उसके हाथ से खून टपकता है।)

Karan (धीरे, खुद से) बोला - 
"नहीं... अभी नहीं।
मिशन पहले है... प्यास बाद में।
सही समय पर... उसका खून मेरा होगा।"

(उसकी आँखें एकदम लाल हो जाती हैं।)

(सिमरन, जो दूर से करण की तरफ़ देख रही है। उसे लगता है करण बहुत गुस्से में है। वो सहम जाती है और तुरंत नज़रें झुका लेती है।)

Simran (धीरे से, अपने आप से) बोली - 
"ये आदमी... इतना डरावना क्यों लगता है?
फिर भी... न जाने क्यों, इससे दूर भी नहीं हो पाती..."

"एक तरफ़ सिमरन की मासूमियत...
दूसरी तरफ़ करण की प्यास और उसका खतरनाक राज़।
दोनों के बीच ये खेल अब और गहरा होने वाला था।"

(रात का समय। करण अपनी कार में बैठा है, आँखें लाल चमक रही हैं। उसकी मुट्ठी भींची हुई।)

"वो काली परछाई... जो सिमरन की जान लेने आई थी...
अब करण के सामने अपना असली चेहरा दिखाने वाली थी।"

(ऑफिस की टॉप फ्लोर। सीईओ अपनी कुर्सी पर बैठा है, पर उसका चेहरा बदलता जा रहा है। आँखें काली, चेहरे पर दरारें, हाथों से धुआँ निकल रहा है।)

C.E.O (हँसते हुए) बोला - 
"करण... तू सोचता है मैं तेरे मिशन को सपोर्ट करता हूँ?
नहीं!
मैं उस लड़की को खत्म कर दूँगा...
क्योंकि वही तेरी कमजोरी है।"

(करण गुस्से में दरवाज़ा तोड़कर अंदर आता है। उसकी आँखें खून जैसी लाल, और हाथों से आग निकल रही है।)

Karan (गरजकर) बोला - 
"सिमरन... मेरी शिकार है।
तेरी हिम्मत कैसे हुई... उसे छूने की?

(दोनों के बीच ज़बरदस्त लड़ाई शुरू होती है। सीईओ हवा में उड़कर वार करता है, उसका शरीर काले धुएँ में बदलता है। करण अपने हाथों से आग की लपटें निकालकर उसे रोकता है। पूरा ऑफिस हिलने लगता है।)

"दो शैतानी ताक़तें... एक-दूसरे के खिलाफ़।
एक के लिए सिमरन सिर्फ़ मौत थी...
दूसरे के लिए... उसकी प्यास और उसका मिशन।"

(सीईओ करण को मज़ाक उड़ाते हुए कहता है।)

C.E.O बोला - 
"तेरी कमजोरी है वो लड़की।
जब तक वो जिंदा है... तू कभी पूरा नहीं हो पाएगा।"

(करण और गुस्से में उसकी गर्दन पकड़ लेता है, और ज़मीन पर पटक देता है।)

Karan (आवाज़ में आग) लेकर बोला - 
"कमजोरी नहीं... मेरा रास्ता है वो।
उसका खून पीकर मेरी शक्तियां बढ़ जाएंगी।
और तुझ जैसे गद्दार का... बस यही अंजाम है!"

(करण अपनी पूरी ताक़त छोड़ता है। सीईओ चीखता है और काले धुएँ में बदलकर गायब हो जाता है। उसका अस्तित्व मिट जाता है।)

(करण भारी सांसें लेता है, उसकी आँखें और भी ज्यादा लाल चमक रही हैं। वह अकेला खड़ा है।)

"करण ने अपने रास्ते का सबसे बड़ा कांटा हटा दिया था।
लेकिन साथ ही... उसने एक ऐसी जंग छेड़ दी थी...
जहाँ अब वो और सिमरन... दोनों ही खतरे में थे।"

(सुबह का समय। सिमरन अपने कमरे में है। बिस्तर पर बैठी, अभी भी रात की डरावनी यादों से थक चुकी। उसे कुछ भी याद नहीं कि रात को क्या हुआ था।)

"वो रात जो उसके लिए मौत और डर से भरी थी...
सिमरन की यादों से मिटा दी गई थी।
करण ने सब कुछ इस तरह हटा दिया कि उसका मिशन खतरे में न पड़े।"

( करण खिड़की के बाहर खड़ा है। उसकी लाल आँखें अब भी हल्की चमक रही हैं। वो खड़ा है, मानो सिमरन पर हर पल निगरानी रख रहा हो।)

"सीईओ गायब हो गया था।
लेकिन करण जानता था कि खतरा खत्म नहीं हुआ।
सिमरन की जान उसकी जिम्मेदारी थी...
और एक दिन उसे उसका खून पीना ही था।"

(सिमरन धीरे-धीरे बिस्तर से उठती है। खिड़की के बाहर उसे करण दिखता है। उसका चेहरा डरावना और लाल आँखों से चमकता हुआ। सिमरन डर से झटके में पीछे हटती है।)

Simran (धीमे स्वर में, डरते हुए) बोली - 
"आप... फिर यहाँ... क्यों हो?"

(करण कुछ नहीं कहता। सिर्फ़ उसकी आँखों की लाल चमक और गहरी नज़रें उसे डराती हैं।)

"सिमरन अब समझ रही थी...
करण सिर्फ़ उसका रक्षक नहीं था।
वो उसके डर, उसकी मासूमियत, और उसके भविष्य की कड़ी नजर भी रखता था।"

(ऑफिस। सिमरन अपने डेस्क पर बैठी है। करण की निगाहें उसे लगातार फॉलो कर रही हैं। कोई भी हल्की गलती, देर या डर उसकी नजरों से नहीं छूटती।)

"अब सिमरन की हर सांस, हर कदम...
करण की निगरानी में था।
मिशन और प्यास... दोनों का खेल अब और गहरा होने वाला था।"

(सिमरन अपने हाथों में फाइल्स दबाए बैठी है। वो सोचती है कि उसे क्यों इतना डर लग रहा है। उसकी मासूमियत अब भी उसका सबसे बड़ा हथियार और कमजोरी दोनों है।)

Simran (मन ही मन) बोली - 
"मैं... क्या करूँ?
ये boss... इतने डरावने हैं, फिर भी मुझे उनसे दूर नहीं जाना..."

"एक तरफ़ प्यार और सुरक्षा...
दूसरी तरफ़ खतरा और प्यास।
करण और सिमरन की कहानी अब उस मोड़ पर थी...
जहाँ डर और मोहब्बत दोनों एक साथ जिंदा थे।"

रात का समय। ऑफिस का कमरा खाली। सिमरन अपने डेस्क पर बैठी है, देर तक काम कर रही है। बाहर चाँदनी की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही है।)

"सिमरन अब भी मासूम थी।
लेकिन अब उसका डर... और करण की छुपी हुई प्यास दोनों सामने आने वाले थे।"

(करण अपनी केबिन के दरवाज़े पर खड़ा है। उसकी लाल आँखें आग जैसी चमक रही हैं। वो धीरे-धीरे सिमरन की तरफ़ बढ़ता है।)

Simran (धीमे स्वर में, अपने आप से) बोली - 
"क्यों... वो मुझे देख रहे हैं?
ये उनकी निगाहें... इतनी डरावनी क्यों हैं?"

(करण अचानक उसके पास आकर खड़ा हो जाता है। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान नहीं, बल्कि प्यास की झलक है।)

Karan (धीमी और भारी आवाज़ में) बोला - 
"तुम मेरी प्यास का अहसास कर रही हो...
बस थोड़ी देर और सब कुछ समझ जाओगी।"

(सिमरन पीछे हटती है। उसका हाथ कंपकंपा रहा है। आँखें बड़ी और डरावनी। वो फुसफुसाती है)

Simran बोली - 
"आपको... आपको... मुझे... नहीं मारना चाहिए, है ना?"

(करण उसका हाथ धीरे से पकड़ता है। उसकी लाल आँखें सीधे उसकी आँखों में जमी हुई हैं।)

Karan (धीमा, गहरी चेतावनी में) बोला - 
"तुम डर रही हो... और मुझे अपनी प्यास रोकनी पड़ रही है।
लेकिन याद रखो... ये प्यास कुछ ही दिन की है।
एक दिन... तुम्हारा खून मेरा होगा।"

(सिमरन काँपती है। उसकी साँसें तेज़ हैं। वो कुर्सी पर बैठी हुई जैसे ठंडी हवा में डूबी हो।)

"पहली बार... सिमरन ने महसूस किया कि उसके सामने खड़ा आदमी...
सिर्फ़ डरावना नहीं है।
वो प्यास वाला सैतान भी है।
और उसका मासूम दिल अब उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया था।"

(करण धीरे से पीछे हटता है। उसकी लाल आँखें अब भी चमक रही हैं। सिमरन उसकी हरकतों को देखकर डर के साथ चौंकती है।)

Simran (मन ही मन, डर और जिज्ञासा में) बोली - 
"ये आदमी... कौन है?
क्या मैं कभी उनसे सुरक्षित रह पाऊँगी?"

सुबह। ऑफिस। सिमरन अपने डेस्क पर बैठी है। उसका चेहरा मासूम, आँखों में हल्का डर। उसे अब तक याद नहीं कि रात में क्या हुआ था। उसे करण की प्यास के बारे में भी याद नहीं।)

"करण ने सब कुछ मिटा दिया था।
सिमरन को उस रात की कोई याद नहीं रही।
उसकी मासूम आँखों में अब भी डर था, लेकिन करण को सिर्फ़ इंसान समझ रही थी।
वो नहीं जानती थी कि सामने खड़ा आदमी... इंसान नहीं है।"

(करण अपने केबिन में बैठा है। उसकी आँखें लाल, गहरी और चमक रही हैं। उसके हाथ में हल्का कंपन है।)

"करण की प्यास अब बढ़ती जा रही थी।
कई दिन से उसने खून नहीं पीया था।
सिमरन को देखते ही, उसका दिल और दिमाग प्यास से भर जाता था।
लेकिन उसे खुद पर काबू रखना पड़ता था।"

(करण धीरे-धीरे सिमरन की तरफ़ देखता है। उसकी आँखें लाल आग जैसी चमक रही हैं। उसकी साँसें धीमी लेकिन भारी हैं।)

Karan (मन ही मन) बोला - 
"बस कुछ और दिन... और फिर...
उसका खून मेरा होगा।
लेकिन अभी नहीं... मिशन पहले है।"

(सिमरन उसकी तरफ़ देखती है, मुस्कान करती है और धीरे से बोलती है।)

Simran (मासूमियत भरे स्वर में) बोली - 
"सुप्रभात, सर! आज का दिन कैसा रहेगा?"

(करण मुस्कुराता है। उसके चेहरे पर लाल आँखें अब हल्की चमकती हैं, पर मुस्कान इंसानी सी लगती है।)

"सिमरन अब भी उसे इंसान समझ रही थी।
और करण के लिए यह और भी कठिन था...
क्योंकि हर बार उसे देखना उसकी प्यास और तेज़ कर देता था।
लेकिन वो खुद पर काबू रख रहा था।
मिशन पूरा करना ज़रूरी था... और सिमरन को सुरक्षित रखना भी।"

(सिमरन अपने काम में मशगूल। करण दूर से उसे देख रहा है। उसकी नज़रें लाल, आँखों में आग और गहरी प्यास का असर, पर उसका चेहरा शांत।)

"एक तरफ़ मासूमियत और नादानी...
दूसरी तरफ़ लाल आँखों वाला सैतान।
और बीच में ये अनजानी खतरनाक खिंचाव, जो धीरे-धीरे सिमरन को अपने जाल में खींच रहा था।"


(शाम का समय। ऑफिस का कमरा सुनसान। सिमरन अपने डेस्क पर बैठी है, फाइल्स देख रही है। करण दूर से खड़ा उसे देख रहा है। उसकी लाल आँखें धीरे-धीरे चमक रही हैं।)

"सिमरन अब भी मासूम थी।
वो नहीं जानती थी कि उसके सामने खड़ा आदमी इंसान नहीं है।
और उसी इंसान की प्यास धीरे-धीरे उस पर हावी होने लगी थी।"

(करण धीरे-धीरे सिमरन के डेस्क की तरफ़ बढ़ता है। उसके कदम भारी और सुनसान कमरे में गूंजते हैं।)

Simran (मन ही मन, डरते हुए) बोली - 
"क्यों... वो मेरे पास आ रहे हैं ?
मुझे डर लग रहा है..."

(करण उसके पास खड़ा हो जाता है। उसकी लाल आँखें आग जैसी चमकती हैं। वह धीरे से बोलता है।)

Karan (धीमे, गहरे स्वर में) बोला - 
"तुम यहाँ अकेली हो...
और तुम्हारे डर को देखकर...
मेरी प्यास और तेज़ हो जाती है।
लेकिन मैं खुद को रोक रहा हूँ।"

(सिमरन काँपती है। उसकी आँखों में डर और उलझन है।)

Simran (धीमे स्वर में, फुसफुसाते हुए) बोली - 
"आप... आप इंसान हो, है ना?"

(करण हल्की मुस्कान देता है, पर उसकी आँखें लाल चमकती रहती हैं।)

Karan बोला - 
"इंसान? हाँ, अब तुम्हारे सामने... मैं इंसान ही हूँ।
लेकिन याद रखो... मेरी प्यास का दिन दूर नहीं।"

(सिमरन हाथों में फाइल्स दबाकर पीछे हटती है। करण धीरे-धीरे पीछे हटकर अपनी जगह खड़ा हो जाता है।)

"सिमरन का मासूम दिल अब धीरे-धीरे उस डरावने आकर्षण को महसूस करने लगा था।
और करण की प्यास... जो हर पल बढ़ रही थी...
अब उसे रोकना मुश्किल होता जा रहा था।"

( दोनों के बीच दूरी। सिमरन डेस्क पर काम करती रहती है। करण दूर से उसे देखता है। उसकी नज़रें लाल, गहरी और खतरनाक। सिमरन पहली बार महसूस करती है कि डर और आकर्षण दोनों एक साथ हैं।)

"अब कहानी में...
डर, मासूमियत, प्यास और खतरनाक आकर्षण सभी एक साथ थे।
और ये जाल दोनों को धीरे-धीरे अपने कब्ज़े में ले रहा था।"