Anusuya Sadan in Hindi Short Stories by Deepak sharma books and stories PDF | अनुसूया सदन

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अनुसूया सदन

 

                  लखनऊ से जब आप कस्बापुर की ओर आते हैं,तो कस्बापुर शुरू होते ही अनुसूया रोड पड़ती है— खूब  चौड़ी और वृक्षदार।

                 अनुसूया रोड पर एक विशाल हरा बंगला है : अनुसूया सदन।

                 बंगले को उस का नाम दिया, मेरे नाना ने । जिस वर्ष उन्हों ने मेरे पिता को अपना घर- जमाई बनाया। 

                और सड़क को अपना नाम मिला जब मेरी मां का देहांत हुआ।

                 मेरे जन्म की खुशी मां अभी पूरी भी न मना पाईं थीं— अभी मैं तीन महीने ही का था— जब अंगघात ने मेरे नाना को चारपाई से लगा दिया और मेरी मां को उन की सेवा में।          असल में मां के सिवा मेरे नाना का कोई आत्मीय रहा भी नहीं। वह अपने माता- पिता के दत्तक पुत्र रहे थे और गोद लेने वाले उन के पिता जल्दी ही मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। उन की पत्नी की तरह। हां, उन की मां ज़रूर देर तक जीवित रहीं। किंतु उन का जीवित रहना, न रहना एक बराबर था। उन का दिमाग उन के वश में जो नहीं रह पाया था।

                 अपने होश संभालने तक मैं इतना ज़रूर समझ लिया था, हमारे घर पर हमेशा युद्ध- स्थिति बनी रहती थी। और एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध- रत उन दो फ़ौजों के युद्ध में भाग लेने को अग्रसर हमारे घर के नौकर- चाकर अपनी- अपनी फ़ौज समय- समय पर चुनते-बदलते रहते थे।

                 एक फ़ौज की मुखिया मेरी मां थीं और दूसरी के मेरे पिता।

                 मेवालाल मेरे पिता का टहलुवा था। और चिरंजी मेरे नाना का। परसाद रसोई देखता था और उस की पत्नी रसोई के बरतन। पुत्तन के ज़िम्मे बागीचा था और उस की पत्नी के ज़िम्मे घर के कपड़ों की धुलाई। और गुलाब महरिन घर की झाड़- पोंछ किया करती थी।

                 शुरू में मेवालाल भी चिरंजी की तरह कुंवारा था, मगर जैसे ही उस की शादी हुई, वह एक से दो होते ही अपनी पत्नी को अपने संग यहीं ले आया।

                 परिणाम,  हमारे घर की फ़ौजों की जोड़ खत्म हो गई। 

                उस की शादी से पहले चिरंजी, पुत्तन और परसाद मां की फ़ौज में थे और मेवालाल के साथ सभी स्त्रियां मेरे पिता की फ़ौज में।

                 मगर अब किसी भी फ़ौजी की रुचि घर में छिड़े युद्ध में न रही थी। बिखर कर मेवालाल की पत्नी काशनी पर आ टिकी थी।

मां के दो फ़ौजी,पुत्तन और परसाद, मेरे पिता की फ़ौज में चले गए थे और तीनों स्त्रियों ने मेरे पिता की फ़ौज छोड़ कर मां की फ़ौज में भर्ती ले ली थी।

                नई भर्ती पाते ही स्त्रियों ने काशनी का नाम बदल कर ‘चटोरी’ धर दिया था। खाने- पीने का काशनी को खूब शौक रहा भी। 

                खाना तैयार होते ही अपने नियमानुसार मां अभी नाना की थाली परोस ही रहीं होतीं कि काशनी रसोई में झांकने लगती, ‘मलकिन तनिक सब्ज़ी दे दी जाए,  हम परांठा सेकेंगीं,’ अथवा, ‘मलकिन, तनिक लहसुन तो दीजियो, हम चटनी पीसेंगीं,’ या फिर, ‘मलकिन, तनिक अचार की दो- चार फांक तो दिलवाइयो, हम खिचड़ी डीलेंगीं’।

                दिन के आधे घंटे वह अपना मुंह भरने में बिताती और आधे घंटे मेरे पिता के जिमनेज़ियम में।

 

                 मां का देहांत मुझे अच्छी तरह याद है।

                “चिरंजी कहीं गया है क्या?” जुलाई की उस तेरह तारीख को सुबह के पांच बजे मां मेरे पास आईं थीं। वह प्रातः बहुत जल्दी उठ जाया करतीं।

                 “नाना के कमरे में नहीं क्या?” मेरी नींद उड़ गई। 

                 चिरंजी जितना मां को प्यारा था, उतना ही मुझे भी। नाना की देखभाल तो करता ही, मुझे भी खूब बहलाता। उधर जिमनेज़ियम में जब भी मेरे पिता न रहते, वह अक्सर मुझे उंगली से पकड़ता और उधर लिवा ले जाता।

               “नहीं,” मां ने कहा, “बाबूजी के कमरे में नहीं है। खैर उसे फिर बाद में देख लेंगे। तुम पहले मेरे साथ बाबूजी के पास चलो। उन्हें पेशाब कराना है।”

               नाना के काम से फ़ुर्सत पा कर मैं अपने कमरे की ओर लौट रहा था कि आंगन बुहार रही गुलाब महरिन ने मुझे रास्ते में रोक लिया, “वे लोग कहां गए होंगे, भैय्या जी?”

              “कौन लोग?” मैं चौंका।

              “मेवालाल और चाशनी भी अपने क्वार्टर में नहीं हैं। अपने सामान समेत गायब हैं….”

              “कब से?”

               गुलाब महरिन अपना मुंह मेरे पास ले आई, “उधर वर्जिश वाले कमरे में ताला लटक रहा है….”

               नौकर लोग मेरे पिता के जिम को ‘वर्जिश वाला कमरा’ ही कहा करते। व्यायाम उन की दिनचर्या का एक अनिवार्य अंग था। सुबह के साढ़े आठ से साढ़े दस तक के दो घंटे वह अपने जिम में बिताते थे। जहां अपने व्यायाम के लिए उन्हों ने स्थावर साइकल से लेकर छोटे- बड़े बटखरे, डम्बैल, मुद्गर, लोचदार स्प्रिंग इत्यादि जमा कर रखे थे। 

               अपने समय के नामी जिमनास्ट,मेरे पिता, ऊंची कूद में दो अंतरराष्ट्रीय पदक पा चुके थे। 

               “कैसा ताला?” मेरी हैरानी बढ़ ली। जिम तो हमेशा खुला रहा करता। मेवालाल के मुंह की तरह।

               “जो कुछ भी अनर्थ हुआ हो,अब तो ताले के पीछे ही बंद है,” गुलाब ने अपने हाथ नचाए। 

 

                “चिरंजी को आप ने जिम में बंद किया क्या?” अपनी हड़बड़ाहट को अपने तक सीमित रखने में मैं असमर्थ रहा था और मां को नाना के कमरे से अपने पिता के कमरे में लिवा लाया था।

               “क्या बकती हो?” जुलाई के उन दिनों में मेरे पिता सात बजे से पहले न जागा करते और उस समय अभी सुबह के साढ़े पांच ही बज रहे थे, “मेरा उस से आज तक कोई वास्ता रहा क्या?”

               मां के समय में मेरे नाना के किसी भी टहलुवे से मेेरे पिता का कोई मतलब न रहा करता।

              नाना के कमरे में भी मैं ने उन्हें नाना की मृत्यु ही पर देखा।

              “वह सुबह से मिल नहीं रहा,” मां ने कहा।

               “तो?” मेरे पिता ने युद्ध का अपना नारा उच्चारा।

               “कहीं उसे आप ही ने तो जिम में बंद नहीं कर दिया?”

               “बंद? मैं क्यों उसे बंद करूंगा?और वह भी अपने जिम में?”

                “क्योंकि आप को वहां किसी का भी आप का सामान छूना पसंद नहीं….”

                 “तुम जानतीं थीं,वह वहां जाता था?”

                  “था? ‘था’ कहा आप ने?” मां कांपने लगीं।

                  “अपनी चाबियां लो, और देख आओ….”

                   घर में एक भी ताला ऐसा न था जिस की चाबी मां के गुच्छे में न लगी रहती।

 

                   ताला परसाद रसोइए ने खोला। मां और मेरे सामने। 

                   दरवाज़ा खुलते ही हमें चिरंजी नज़र आया। फ़र्श पर। अचेत। मुंह के बल।

लहू से लथपथ।

                   हम ने उसे उस के कपड़ों से पहचाना।

                  “पुत्तन को बुलाओ, परसाद,”  मां बहुत बहादुर थीं, “फ़ौरन। चिरंजी को अस्पताल ले कर जाएगें….”

                  मेरे पिता को कुछ भी कहने- बताने की उन्हें तनिक ज़रूरत न महसूस हुई। 

                 मां को गलत समझने का और उन के विरुद्ध गलत निर्णय देने का मेरे पिता को बहुत शौक रहा था। परिणामस्वरूप वह उन से बहुत कम सलाह लिया करतीं।

                 फिर उन के पास अपनी अलग मोटर थी। नाना की टाटा निक्सौन। शादी इत्यादि में जाते समय भले ही मां मेरे पिता वाली टोऔटा फ़ौर्चयूनर में उन के साथ बैठ लेतीं थीं, वरना बहुधा वह नाना वाली निक्सौन ही इस्तेमाल करतीं। खुद चला कर।

                “बहुत अच्छा हुज़ूर,” परसाद रसोइया बाहर लपक लिया।

 

                 “आप इसे सही वक्त पर लायीं,” अस्पताल के एमरजेन्सी डाक्टर ने चिरंजी की जांच करने के बाद मां को बधाई दी, “वरना इस के सिर की चोट से हो रही हैवी ब्लीडिंग इस की जान भी ले सकती थी….”

                 “आप इसे सही चिकित्सा उपलब्ध करवाइए,” मां ने कहा, “इस के इलाज में कितना भी खर्च क्यों न हो, मैं सब देख लूंगी….”

                 “अभी तो पहले हम टांके लगाना चाहेंगे। ताकि खून बहना बंद हो जाए। और उस में समय लगेगा…. काफ़ी समय लगेगा….आप बेशक घर हो आइए….”

                 “नहीं,” मां ने सिर हिलाया, “मैं अपने बेटे के साथ अपनी मोटर में बैठी हूं। कोई बात होगी तो मेरे इन दो नौकरों में से किसी एक को हमारे पास पार्किंग में हमें लिवाने भेज दीजिएगा। हम चले आएंगे….”

                  मां की निक्सौन की पिछली सीट पर पुत्तन माली और परसाद रसोइया चिरंजी को इधर अस्पताल लाए थे।

                 “आओ,” मां ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया।

                 “तुम चाहो तो यहां लेट लो,” अगली सीट का पंखा खोल कर मां ने अपना पर्स अपनी झोली में रख लिया, “जब तक मैं अपनी प्रार्थना पूरी कर लूं….”

                  मां की भगवद्गीता उन के पर्स में रहा करती और उन के लिए उस का एक अध्याय सुबह के नाश्ते से पहले पढ़ना अनिवार्य रहता।

                  उस सुबह का वह मंद, नीरव व निश्चेष्ट घंटा आज भी मेरे मस्तिष्क में सजीव है। मनोविज्ञानी कहते हैं कि स्मृतियों में उन स्मृतियों का हमारे पास सुरक्षित रहना अधिक सहज है, जिन पलों में शब्द व शोर दूरस्थ रहते हैं। शायद इसीलिए वे पल आज तीस साल बाद भी मेरे पास सुरक्षित हैं, जबकि उस समय मेरी आयु कुल नौ वर्ष थी। मेरी एक गाल मां की गोद के स्पर्श में थी और दूसरी उन के बांए हाथ के। उनके दांए हाथ में भगवद्गीता थी। उस की पड़ोस में उन के परफ़्यूम्ड रुमाल थे, जिन की सौगंध का विस्तार उन की भगवद्गीता तक व्याप रहा था। मां के स्नान साबुन की सुगंध,  मां के केश शैम्पू की सुगंध, मां के टूथपेस्ट की सुगंध और मां की अपनी निजी विशिष्ट सुगंध उन की भगवद्गीता से आ रही सुगंध से मिल कर एक चमत्कारी कोष मेरे भीतर जमा करती रही थी और उस कोष का दोलन आज भी मेरे अंदर हिलोरें लेता है।

 

                  “चिरंजी को होश आ गया है,” हुज़ूर,” पुत्तन माली ने जब हमें यह सूचना दी तो मां की घड़ी में आठ बज रहे थे। 

                  मां की साड़ी के पल्लू का एक कोना अपने हाथों में भींचे- भींचे मैं भी चिरंजी के पास पहुंच लिया।

                  “मुझे डर था कि सिर की वह चोट इस लड़के की याद- दाश्त को गड़बड़ा देगी,” डाक्टर ने मां की शाबाशी लेनी चाही, “लेकिन नहीं। इस का दिमाग इस के पास पूरी तरह सलामत है। फिर उम्र में भी इक्कीस- बाइस से ज़्यादा क्या होगा? इसीलिए इसे आपे में लाना नामुमकिन नहीं था। हां, मुश्किल ज़रूर था। अब यह संभल रहा है। संभल जाएगा….”

                  “धन्यवाद,” मां बोली, आप का यह अहसान मुझे हमेशा याद रहेगा….”

                  “नहीं,मैडम,” डाक्टर मुस्कराया, “आप के नौकरों से पता चला, आप लाला हरिचंद की बेटी हैं। उन के कोयले का डिपो तो शहर-भर में अपना नाम रखता था। एक समय में तो केवल उन्हीं के पास लाइसेंस था और छोटे- छोटे डिपो वाले सभी उन्हीं से कोयला खरीद कर आगे बेचा करते थे….”

                 “दिन जाते देर नहीं लगती,” मां ने कहा।

                  “यह भी मुझे इन्हीं लोग ने बताया, अनुसूया सदन की अनुसूया आप हैं….”

                 “ओह!” मां की आंखों में आंसू चले आए। 

                  “ये दोनों बता रहे थे कि उस समय पूरी- पूरी मालगाड़ियां आप के कोयले की लदानों से भरी आती थीं….”

                  “दिनों के फेर ने फिर बाबूजी का दिल ऐसा तोड़ा कि वह चारपाई के होकर रह गए। यह लड़का उन्हीं का दहलुवा है….”

                  “इसके लिए आपकी कद्र मैं समझ सकता हूं….”

                  चिरंजी की आंखों में आंसू तैर आए। हाथ जोड़ने के लिए उस के हाथ खाली न रहे। एक हाथ में एक स्टैंड से लटक रही बोतल की नली थी और दूसरे हाथ की नब्ज़ पर एक नर्स की उंगलियां जमी हुईं थीं।

                 “मेवालाल का कार्यकलाप है यह? काशनी के कारण,” मां उस पर झुक लीं।

                  काशनी से चिरंजी की गहरी छनती थी और अक्सर जब भी वह मुझे मेरे पिता के जिम लिवा ले जाता था तो काशनी भी हमारे साथ वहां हो लिया करती थी।हम तीनों जी भर कर जिमनेज़ियम की चीज़ों को खूब छूते, हिलाते- डुलाते और उन के संग कई करतब करते। मेरे पिता के अंदाज़ में। अपने पिता का हैंड-स्प्रिंग मुझे सर्वाधिक मनभावन था जब कि चिरंजी उन के मुद्गल का शौकीन था और काशनी उन की साइकल की। काशनी के पिता रिक्शा चलाया करते थे और उस का बचपन उन के रिक्शे से खेलते हुए बीता था। शायद इसीलिए वह मेरे पिता के स्थावर साइकल की कुछ ज़्यादा ही दीवानी रही थी। छिप कर वह मेरे पिता को उस साइकल पर पैडल चलाते समय उस के स्पीडोमीटर को आगे- पीछे करते हुए ज़रूर देख चुकी थी और उन की अनुपस्थिति में वह उस पर सवार होकर अपनी रफ़्तार उसी को घुमा- फिरा कर तेज़ और कम कर लिया करती थी।उस जैसी कुशाग्र बुद्धि और उस जैसी फ़ुर्ती उस के बाद मैं ने किसी भी लड़की में न देखी।

                 ‘न!’ चिरंजी ने ‘न’ में अपना सिर हिला दिया। उस के बाकी शब्द उस के गले से बाहर न निकल पाए। 

                 “तो क्या काशनी से तुम चोटा गए?”

                 ‘ न!!’ चिरंजी ने इस बार दुगुने वेग से अपना सिर हिलाया।

                 “फिर क्या? किस ने? मेवालाल और काशनी के सामने? बेटू के पापा ने?” 

                  चिरंजी का सिर इस बार ‘हां’ में हिला।

                  “डाक्टर साहब,”  तेेज़ी से मां डाक्टर की ओर मुड़ लीं, “इस का आप पूरा ध्यान रखिएगा….मैं आप से अभी बाद में मिलती हूं….”

 

                  जब तक परसाद रसोइए के साथ मां और मैं बंगले में लौटे, मेरे पिता अपने व्यायाम के लिए अपने जिमनेज़ियम पर जा चुके थे।

                  मां वहीं पहुंच लीं।

                 “अब तो न कहोगे मेरे पुण्य का कोई भी फल तुम तक नहीं पहुंचता,” मां ने कटाक्ष किया। अकेले में मां कभी भी मेरे पिता से सीधी बात न कहा करतीं। हमेशा तिरछी बोली- ठोली ही छोड़ा करतीं।

                 “अब क्या है?” अपनी मांसपेशियों के लिए उस समय मेरे पिता अपने बटखरे उठा- गिरा रहे थे।

                 “तुम्हारे जानलेवा क्रियाकलाप से तुम्हें विमुक्त करा कर आ रही हूं….”

                 “क्या बकती हो?” हाथ का मझोला बटखरा नीचे रख कर मेरे पिता ने अपना सब से वज़नी बटखरा उठा लिया, “उन टहुलवों- टहलनी की दंडादंडि के बीच मैं कहां से आ टपका?”

                  “चिरंजी ने मुझे सब के सामने बताया उसे मेवालाल ने नहीं, आप ने ज़ख्मी किया था और फिर मेवालाल और काशनी को भी आप ही ने भगाया था….”

                 “तो?” हाथ का वह बटखरा मेरे पिता ने मां की दिशा में छोड़ दिया।

                  खड़ी- खड़ी मां साइकल के हत्थों पर जा गिरीं और उन की कनपटी से खून बहने लगा।

                   मेरे पिता ने आगे बढ़ कर मां को फ़र्श पर लिटा दिया।

                  “मां को अस्पताल ले चलिए,” मैं उन पर झपट लिया, “वरना यह हैवी ब्लीडिंग इन की जान ले लेगी….”

                 “चु-अ-अ-अ-प,” एक ज़ोरदार चपत मेरे कान में गूंजी मैं फ़र्श पर गिर पड़ा।

 

                  प्राणहर मां की मूर्च्छा को डाक्टर ने दिल के दौरे की वजह से जिमनेज़ियम के उस स्थावर साइकल के हत्थों पर गिर जाने का नतीजा बताया और मां का दाह-संस्कार भी उसी दिन निपटा दिया गया।

                  चिरंजी जब अस्पताल से स्वस्थ हो कर लौटा तो मेरे पिता ने उसे लौटा दिया।

                  जब तक नाना के और उन के अपने नए टहलुवे नहीं रखे गए, पुत्तन माली और परसाद रसोइया ही गुलाब महरिन की सहायता ले कर सभी काम नियमित रूप से निपटाते रहे।