Double Standard in Hindi Moral Stories by Shree Kriti books and stories PDF | डबल स्टैंडर्ड

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डबल स्टैंडर्ड


शाम का गहरा मगर सुहाना वक्त था। सत्तर वर्ष की मीरा देवी ड्राइंग रूम के आरामदेह सोफे पर बैठीं अपनी ब्याहता बेटी, चित्रा, से फोन पर बात कर रही थीं। किचन से मसालों की बड़ी ही अच्छी खुशबू आ रही थी और प्रेशर कुकर की सीटी के बीच मीरा जी की आवाज साफ और सख्त सुनाई दे रही थी। उनकी बहू, सिया, किचन में रात के खाने की तैयारी कर रही थी। जैसे ही मीरा जी ने अपनी आवाज थोड़ी नीची की, सिया के कान चौकन्ने हो गए... मीरा जी की फुसफुसाहट उसे साफ़ सुनाई दे रही थी।

"देख चित्रा, मेरी बात कान खोलकर सुन ले।" 
मीरा जी फोन पर चित्रा को समझा रही थीं, 
" कुन्दन बाबू तुमसे कहेंगे कि उनकी बीमार मां को बंगलौर ले आते हैं ताकि अच्छे से इलाज हो सके, पर तू साफ मना कर देना। एक बार तेरी सास बंगलौर आ गई, तो तेरी आजादी खत्म। दिन भर सेवा-टहल में ही निकल जाएगा और फिर वह उनकी मां है, तेरी तो नहीं। उसकी जिम्मेदारी उठाना उनके बच्चों का काम है, तेरा नहीं।"
सिया के हाथ रुक गए। वह चाकू से गोभी काट रही थी पर उसका ध्यान पूरी तरह बाहर की बातचीत पर था।
मीरा जी आगे बोलीं, 
"और ये जो उनके छोटी बहन की पैसों से मदद की बात चल रही है ना? ऐसा कत‌ई होने मत देना... एक बार तेरे ननद को पैसे की मदद मिली तो उसे इसकी लत लग जायेगी... फिर सारा आड़ा - टेढ़ा खर्चा कुन्दन बाबू के माथे। अपनी सोच बेटा...अपने बच्चों का भविष्य देख। जरुरत के वक्त कोई किसी का नहीं होता। अपने हाथ में पैसा रखेगी तभी तेरी इज्जत होगी।"
किचन में खड़ी सिया के मन में एक अजीब सी घृणा हो रही थी। मीरा जी वही महिला थीं जो हर दिन सिया को यह एहसास कराती थीं कि एक बहू का धर्म क्या होता है और वो कैसे इस धर्म को निभाने में बुरी तरह से फेल हुई है। अपने समय में वह खुद कितनी महान बहु - पत्नी और मां थीं...वाक‌ई??? कल ही जब सिया के सिर में दर्द था, तब मीरा देवी ने मुंह बिचका कर कहा था,
" घर की बड़ी-बूढ़ी काम करें और हम आराम करें... अरे भाई हमारे संस्कार ऐसे नहीं थे। आजकल की लड़कियों के नखरे बहुत हैं।"
आज वही महिला अपनी बेटी को सिखा रही थी कि सास की सेवा करना उसकी जिम्मेदारी नहीं है।  सिया ने धीमी आवाज़ में खुद से कहा, 
'अजीब डबल स्टैंडर्ड है...बहू के लिए जो धर्म है, बेटी के लिए वही बोझ बन जाता है।  हम अपनी बेटियों के लिए जहां अधिकार और सुकून मांगते हैं, लेकिन वहीं अपनी बहुओं से सिर्फ त्याग और कर्तव्य की उम्मीद करते हैं।'
बाहर मीरा जी का फोन कट चुका था। वह चहकती हुई किचन के दरवाजे पर आईं और बोलीं, 
" सिया, जरा अदरक वाली चाय पिला दो। और सुनो, जरा प्याज़ के पकौड़े भी तल देना, आज मन कर रहा है खाने का।"
सिया ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया पर उस मुस्कान के पीछे एक गहरी टीस थी। उसने समझ लिया था कि रिश्तों की परिभाषा अक्सर इस बात पर तय होती है कि रिश्ता ख़ून का है या नहीं।
अगले दिन की सुबह मीरा जी के लिए किसी झटके से कम नहीं थी। आज़ सुबह आठ बजे तक रसोई में चाय तक नहीं बना था... सिया अभी तक अपने कमरे से बाहर भी नहीं निकली थी। जब निकली, तो सीधे योगा करने बैठ गई।  मीरा जी ने तंज़ कसते हुए कहा, 
"सिया,आज चाय बनाने का इरादा है या नहीं ?"
सिया ने बिना उनकी तरफ देखे शांत भाव से जवाब दिया,
"मां, आपने कल चित्रा जी से कहा था ना कि खुद का ख्याल पहले रखना चाहिए? मैं भी बस वही कर रही हूँ। मेरी सेहत मेरी जिम्मेदारी है, और आपकी चाय... आप तो अभी स्वस्थ हैं, खुद बना लीजिए।"
मीरा जी अवाक रह गईं। इस दिन के बाद सिया के रंग-ढंग ऐसे बदल ग‌ए की मीरा जी बौखला ग‌ईं । उन्होंने सारे घरेलू हथकंडे अपना के देख लिए....हर दिन ताने मारे... सिया के मायके वालों को कोसा...यहाँ तक कि उसे खूब खरी-खोटी सुनाई। पर सिया ने जवाब में चिल्लाने के बजाय सिर्फ इतना कहा, 
"मैं बस आपके नक्शेकदम पर चल रही हूँ मां। क्या आप नहीं चाहतीं कि मैं भी वैसी ही एक 'मॉडर्न और अवेयर' स्त्री बनूँ, जैसी चित्रा जी हैं?"
हार मानकर मीरा जी ने चित्रा को फोन लगाया... वैसे भी दोनों में आजकल इस नई स्थिति को लेकर फोन पर खूब चर्चा होती थी। चित्रा ने आज भी पहले तो अपनी भाभी को खूब कोसा...गालियां दीं। फिर आखिरकार अपनी मां को एक शातिर सलाह दी,
"मां, अब एक ही रास्ता है। भैया के आते ही रोना-धोना शुरू कर दो, सारी बातें बताओ पर बढ़ा- चढ़ाकर । देखना तब वो ही अपनी बीवी को सीधा कर देगा।"
मीरा जी ने भी अजीब तरह से मुस्कुरा कर कहा,
" हां ! वो मेरा बेटा है, मेरी बात मानेगा... आखिर मैंने ही तो पाल-पोस कर इतना बड़ा किया है... क्या मुफ्त में।"
रात को जैसे ही उनका बेटा,आदर्श, ऑफिस से घर लौटा तो देखा कि मीरा जी सोफे पर रूआंसा चेहरा लिए बैठीं थीं। आदर्श के पास आते ही उनके आंसू बह निकले। आदर्श ने बैग एक तरफ रखते हुए पूछा,
" क्या हुआ मां?"
मीरा जी सिसकते हुए बोली,
"बेटा, अब इस घर में मेरा गुजर नहीं। तेरी बीवी तो अब मुझे पानी तक नहीं पूछती, ऊपर से सारा दिन मुझे नीचा दिखाती रहती है, मेरे आगे जुबान चलाती है......."
बात अधूरी छोड़ कर वो जोर-जोर से रोने लगीं। आदर्श ने शांति से अपनी मां को चुप कराया, फिर पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। उसके चेहरे पर वैसी नाराजगी नहीं थी जैसी मीरा जी को उम्मीद थी। आदर्श बिल्कुल ठंडे आवाज़ में बोला,
"मां, ड्रामा बंद कीजिए। मुझे सब पता है।"
मीरा जी के आंसू पलक झपकते ही सूख गए... वो हैरानी से आदर्श की तरफ देखने लगीं।
"क्या मतलब?"
आदर्श ने गहरी सांस ली, 
"मतलब यह कि सिया जो कुछ भी कर रही है, वह हम दोनों ने मिलकर तय किया था। हर रोज़ जो आप चित्रा को फोन पर ज्ञान देतीं हैं... वो ज्ञान मुझे और सिया को भी तो मिलता है ना! "
अब तो मीरा जी की बोलती बंद हो गई। आदर्श ने आगे कहा, 
"मां, आपको क्या लगा? आप घर में इस तरह दरार डालेंगी और हमें पता भी नहीं चलेगा? और चित्रा... वह जो दूसरे शहर में... दूसरे घर में बैठकर यहाँ की जासूसी करती रहती है कि भाभी ने क्या पहना...क्या खाया... भाई  कितनी बार तुम्हारे हालचाल पूछने आया, उससे कहिए कि रिमोट कंट्रोल से यह घर चलाना बंद करे।"
उसने सख्त लहजे में बात जारी रखी,
"चित्रा को कहिए कि वह अपने जीवन में कुछ सार्थक काम ढूँढे। यहाँ हुकूमत चलाने और आग लगाने से उसका घर नहीं बसेगा। आपने उसे सिखाया कि सास की जिम्मेदारी उसकी नहीं है, तो फिर सिया यह पाठ क्यों नहीं सीखेगी? अगर आपकी बेटी के लिए नियम अलग हैं, तो मेरी पत्नी के लिए अलग क्यों?"
मीरा जी आवाक सी खड़ी थीं। उनकी अपनी ही बातें उनके सामने दीवार बनकर खड़ी हो गई थीं। आदर्श ने अंत में बस इतना कहा,
"रिश्ते और घर प्यार से चलते हैं मां, चालाकी और बुर्जुगों वाला विक्टिम कार्ड खेलने से नहीं। क्योंकि अक्सर जो जहर हम दूसरों के लिए घोलते हैं, अंततः वह हमें ही पीना पड़ता है। अब चॉइस आपकी है कि आप आगे क्या करना चाहतीं हैं।"
आदर्श की खरी-खरी बातें सुनकर मीरा जी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा था। एक आम मां शायद अपनी गलती मान लेती, पर मीरा जी का 'नार्सिसिस्ट'  व्यक्तित्व उन्हें झुकने नहीं दे रहा था। उन्होंने सोफे से उठते हुए अपना आखिरी दांव खेला।
"बस आदर्श ! बहुत सुन लिया मैंने। जोरू के ग़ुलाम तुझे तेरी बीवी मुबारक हो। मुझे नहीं रहना इस घर में जहाँ मेरी कोई इज्जत नहीं।" 
उन्होंने और ऊंची आवाज में कहा, 
"मैं कल ही चित्रा के पास जा रही हूँ। मेरी बेटी मेरा बहुत इज्जत करती है, वह मुझे पलकों पर बिठाकर रखेगी। कम से कम वहाँ मुझे ये 'सबक' तो नहीं झेलने पड़ेंगे!"
आदर्श ने एक ठंडी मुस्कान के साथ जवाब दिया, 
"ठीक है मां, जैसा आपको सही लगे। अब मैं भी आपके इस बेवजह के विक्टिम कार्ड के खेल से और चित्रा के हिटलरशाही से मैं तंग आ गया हूं। वैसे भी मैं और चित्रा दोनों ही आपकी संतान हैं, आपकी जिम्मेदारी भी हम दोनों की बराबर है। ये ठीक है, अब मैं भी वही करूँगा जो चित्रा करती आई है...दूर बैठकर, हर रोज़ क‌ई बार आपको फोन करके 'श्रवण कुमार' बनने का नाटक! दूर से तो प्यार जताना बहुत आसान होता है मां, असल परीक्षा तो साथ रहने पर होती है।"
मीरा जी का अहंकार इस बात से और भड़क गया। उन्होंने तुरंत चित्रा को फोन लगाया। उनका इरादा आदर्श और सिया को नीचा दिखाने का था। फोन उठते ही उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा, 
"चित्रा बेटा, मैं कल ही तेरे पास रहने आ रही हूँ। आदर्श और सिया ने मेरा जीना मुहाल कर दिया है। अब मैं तेरे पास ही रहूँगी।"
दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। फिर चित्रा की हिचकिचाती हुई आवाज आई, 
"पर मां... अभी? अचानक? मेरा मतलब है, आपको तो पता है कि कुन्दन के ऑफिस का काम कितना बढ़ा हुआ है और विहान के एग्जाम्स भी आने वाले हैं। आपने ही तो कल कहा था कि घर में किसी और की जिम्मेदारी लेना अपनी आजादी खोना है। मेरा फ्लैट भी बहुत छोटा है मां... आप यहाँ परेशान हो जाएंगी। वैसे भी वो मकान आपका है, आप क्यों कहीं जायेंगी! उन दोनों को वहां से निकाल बाहर किजिए!! एक फुल टाइम नौकरानी का इंतज़ाम कर लिजिए और आराम से वहीं रहिए!!! 
मीरा जी के हाथ से फोन जैसे छूटने ही वाला था। उन्होंने हकलाते हुए कहा,
"यह सब तू क्या कह रही है! मैं तेरी भी मां हूँ चित्रा..."
चित्रा ने सफाई देते हुए कहा, 
"मां, मैं मना नहीं कर रही बल्कि मैं आपके भले के लिए कह रही हूं। आपको अपना हक़ नहीं छोड़ना चाहिए मां........! अभी तो आप वही किजिए जो मैंने कहा... यही सही रहेगा। और फिर छुट्टियों में मैं आया ही करूंगी... कभी-कभी आपको भी बंगलौर बुला लिया करूंगी। आपने ही तो सिखाया था कि अपनी गृहस्थी में किसी तीसरे को दखल नहीं देने देना चाहिए, चाहे वो कोई भी हो।"
मीरा जी ने धीरे से फोन काट दिया। कमरे में पसरा सन्नाटा उन्हें काटने को दौड़ रहा था। जिस बेटी को उन्होंने स्वार्थ का पाठ पढ़ाया था, आज उसी बेटी ने वह पाठ उन्हीं पर आजमा लिया था। उन्होंने मुड़कर आदर्श और सिया की ओर देखा, उनके होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कान थी। मीरा जी बेदम होकर सोफे पर बैठ गईं और अपना सिर पकड़ लिया। उन्हें समझ आ गया था कि दूर बैठकर उनकी सबसे बड़ी हितैषी बनने वाली बेटी कितने पानी में है। आखिर यह किसी और की साजिश नहीं, बल्कि उनकी अपनी परवरिश का नतीजा था। उन्होंने दूसरों के घरों में आग लगाने के लिए जो माचिस तैयार की थी, आज उसी से उनका अपना भविष्य जल रहा था। बेटे ने सही कहा था...दूर बैठकर रिश्ते निभाना आसान है, पर जब बात जिम्मेदारी की आती है, तो वही संस्कार काम आते हैं जो दिल में बोए गए हों, दिमाग में नहीं। 'अधिकार' और 'स्वार्थ' के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है, जिसे उन्होंने खुद ही अपनी सोच से धुंधला कर दिया था।

                            ✨इति✨