🌦️ तालाब सूख रहे हैं, आसमान तप रहा है और बेजुबान प्यास से तड़प रहे हैं। हमारे प्राचीन संतों, प्रतापी राजाओं और विज्ञान के संदेश को समेटे हुए मेरा यह विशेष लेख ज़रूर पढ़ें और इस गर्मी में किसी एक पक्षी की प्यास बुझाने का जरिया बनें। शेयर करें ताकि हर छत पर एक सकोरा सज सके! 🙏✨
भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप न केवल इंसानों को बल्कि बेजुबान पशु-पक्षियों को भी बेहाल कर देती है। गर्मियों के मौसम में प्राकृतिक जलस्रोत जैसे तालाब, नदियाँ और पोखर सूख जाते हैं, जिससे इन मूक प्राणियों के लिए पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। चिलचिलाती धूप में भोजन और पानी की तलाश में भटकते हुए कई पक्षी और लावारिस पशु दम तोड़ देते हैं। ऐसे समय में इन बेजुबानों की मदद करना केवल मानवता नहीं, बल्कि हमारा परम धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्य भी है।
हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने वेदों और उपनिषदों में 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' का सिद्धांत दिया है, जिसका अर्थ है कि संसार के सभी जीवों को अपनी ही आत्मा के समान समझो। ऋषियों ने पंचमहायज्ञों के अंतर्गत 'भूत यज्ञ' का विधान अनिवार्य किया था, जिसके अनुसार भोजन करने से पहले गाय, कुत्ते, पक्षियों और चींटियों के हिस्से का अन्न-जल निकालना हर गृहस्थ का धर्म है। धार्मिक दृष्टिकोण से जीवों की सेवा को सीधे ईश्वर की सेवा से जोड़ा गया है क्योंकि हर जीव में उसी परमपिता परमात्मा का अंश है। गरुड़ पुराण और स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों में स्पष्ट लिखा है कि प्यासे और भूखे बेजुबानों को पानी और अन्न देने से मनुष्य के कई जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत, समर्थ होने पर भी इन बेजुबानों को प्यासा या भूखा छोड़ देना घोर पाप की श्रेणी में आता है, जिसके दुष्परिणाम मनुष्य को भुगतने पड़ते हैं।
इतिहास गवाह है कि संसार के तमाम महापुरुषों, संतों और विचारकों ने हमेशा जीवों के प्रति अगाध करुणा रखने का संदेश दिया है।
★ स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जो साक्षात ईश्वर के रूपों यानी जीवों की सेवा करता है, वही वास्तव में ईश्वर की सच्ची पूजा करता है। भूखे और प्यासे जीवों की सेवा से बढ़कर कोई दूसरा योग नहीं है।
★महात्मा कबीरदास जी ने अपनी अमृत वाणी में बेजुबानों पर दया करने को ही सबसे बड़ा धर्म माना है और मांस-मदिरा या जीव हिंसा करने वालों को कड़ी चेतावनी दी है। कबीर जी कहते हैं:
“कबीर तेई सुई मुआ, जाके घट में नाहिं दया।”
“जीव मत मारो बापुरे, सबमें एकै प्रान।
हत्या कबहूँ न छूटिहै, कोटिन सुनहु पुरान॥”
इसका सीधा अर्थ है कि जिस मनुष्य के हृदय में दया नहीं है, वह जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है। संसार के सभी छोटे-बड़े जीवों में एक ही ईश्वर का प्राण धड़क रहा है, इसलिए उनकी रक्षा करना ही हमारा एकमात्र सत्य कर्म है।
★ संत रविदास जी ने भी अपनी वाणी में सिखाया है कि ऊंच-नीच का भेद भूलकर संसार के हर जीव के प्रति समभाव रखना ही सच्ची भक्ति है। वे कहते हैं:
“स्थावर जंगम कीट पतंगा, पूरि रह्यो हरि सब ही रंगा।”
अर्थात ईश्वर केवल इंसानों में नहीं, बल्कि पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़ों और पशु-पक्षियों में भी समान रूप से समाया हुआ है। इसलिए किसी भी जीव को तड़पता छोड़ना साक्षात ईश्वर को कष्ट देने जैसा है।
★ महात्मा गांधी ने भी किसी देश की महानता को वहां के पशुओं के साथ होने वाले व्यवहार से जोड़ा था। गांधी जी का प्रसिद्ध कथन है,
“किसी देश की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां के जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।”
★ सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने भी ‘सबना जीआ का इकु दाता’ कहकर संदेश दिया कि सभी जीवों का रखवाला एक ही है, इसलिए हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए।
★ जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के साथ-साथ ‘जीओ और जीने दो’ का सार्वभौमिक सिद्धांत दिया, जो गर्मियों की इस मार में सबसे सटीक बैठता है।
★ महाराष्ट्र की पावन भूमि पर हुए महान संतों ने तो जीव-सेवा को अपने जीवन का मुख्य ध्येय बनाया। संत तुकाराम महाराज ने धर्म की सबसे सुंदर और व्यावहारिक परिभाषा देते हुए कहा है:
“जे का रंजले गांजले, त्यासी म्हणे जो आपुले।
तोचि साधु ओळखावा, देव तेथेचि जाणावा॥”
अर्थात जो व्यक्ति इस संसार के पीड़ित, असहाय और बेजुबान जीवों को अपना समझकर गले लगाता है, वही सच्चा साधु है और ईश्वर का वास भी उसी के पास होता है।
★ संत एकनाथ महाराज के जीवन की तो एक प्रसिद्ध घटना है कि जब वे गंगाजल लेकर रामेश्वरम जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में एक प्यासे गधे को तड़पते देखा। उन्होंने बिना एक पल गंवाए कांवड़ का पवित्र गंगाजल उस प्यासे जानवर को पिला दिया। जब लोगों ने उन पर सवाल उठाए, तो उन्होंने कहा कि इस प्यासे जीव की तृप्ति में ही मुझे साक्षात भगवान शिव के दर्शन हो गए हैं।
★ संत शिरोमणि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में स्पष्ट लिखा है कि संसार के जड़ और चेतन, सभी रूपों में साक्षात भगवान राम का ही वास है। वे कहते हैं:
“सीय राममय सब जग जानी।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥”
तुलसीदास जी आगे लिखते हैं, “परहित सरिस धरम नहिं भाई।” अर्थात दूसरों की भलाई और सेवा करने से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है।
★ शिरडी के संत साईं बाबा का पूरा जीवन ही जीव-दया का एक साक्षात दस्तावेज था। साईं बाबा अक्सर अपने शिष्यों से कहते थे, “यदि तुम भूखे और प्यासे जीवो को भोजन और जल देते हो, तो तुम साक्षात मुझे तृप्त करते हो।” उनके जीवन की प्रसिद्ध कथा है कि वे अपनी हांडी का भोजन स्वयं खाने से पहले कुत्तों, बिल्लियों और कौवों को खिलाते थे। बाबा का स्पष्ट संदेश था कि हर मूक प्राणी की भूख और प्यास में ईश्वर ही पुकार रहा होता है। उनकी करुणा किसी सीमा को नहीं जानती थी; वे बीमार और चोटिल जानवरों को गले से लगाते थे और उनकी सेवा करते थे।
★ भारत के शूरवीर और प्रतापी शासकों ने भी युद्ध के मैदान में शौर्य दिखाने के साथ-साथ प्रकृति और मूक पशुओं के प्रति अगाध संवेदनशीलता का परिचय दिया।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य में पर्यावरण और पशु रक्षा के लिए कड़े नियम बनाए थे। उनका स्पष्ट आदेश था कि युद्ध या संकट के समय भी किसी के मवेशियों, खेतों और जंगलों को नुकसान न पहुँचाया जाए। उन्होंने बेजुबानों के चारे और पानी की व्यवस्था को राजधर्म का हिस्सा बनाया।
★ इसी प्रकार, मेवाड़ के गौरव महाराणा प्रताप का अपने प्रिय अश्व 'चेतक' और हाथियों के प्रति अनूठा प्रेम जगजाहिर है। वे मानते थे कि जो राज्य अपनी सीमाओं की रक्षा के साथ-साथ अपने जंगलों और वहां रहने वाले वन्यजीवों की रक्षा नहीं कर सकता, वह समृद्ध नहीं रह सकता।
★ पंजाब के शेर महाराजा रणजीत सिंह ने तो अपने शासनकाल में जीव-हत्या पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। उन्होंने अपनी प्रजा को सख्त हिदायत दी थी कि गर्मियों के मौसम में राहगीरों के साथ-साथ पशु-पक्षियों के लिए पानी की प्याऊ (नांद) और छाया की व्यवस्था करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
★ इतिहास के सबसे महान शासकों में से एक सम्राट अशोक ने जब कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म और अहिंसा के मार्ग को अपनाया, तो उन्होंने जीव-कल्याण के क्षेत्र में ऐतिहासिक क्रांति ला दी। सम्राट अशोक विश्व के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने पशु-पक्षियों और मनुष्यों के लिए समान रूप से चिकित्सालय (अस्पताल) खुलवाए। उनके शिलालेखों (जैसे कि उनके दूसरे मुख्य शिलालेख) में स्पष्ट अंकित है कि उन्होंने न केवल सड़कों के किनारे इंसानों और जानवरों को छाया देने के लिए बरगद और आम के पेड़ लगवाए, बल्कि हर आधे कोस पर कुएं खुदवाए और जलशालाएं बनवाईं। अशोक ने वन्यजीवों के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और कड़े नियम बनाए कि गर्मियों में नदियों और जंगलों के जलस्रोतों को कृत्रिम रूप से भरा रखा जाए ताकि कोई भी वन्यजीव प्यासा न मरे।
★ उज्जैन के प्रतापी और चक्रवर्ती राजा सम्राट विक्रमादित्य का नाम भारतीय इतिहास में केवल उनके अदम्य पराक्रम, शौर्य और न्यायप्रियता के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति उनकी अगाध संवेदनशीलता के लिए भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। मालवा की तप्त धरती पर शासन करते हुए उन्होंने राजधर्म की एक ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसमें प्रजा का अर्थ केवल मनुष्य नहीं थे, बल्कि राज्य के पशु-पक्षी, वृक्ष और संपूर्ण पर्यावरण भी उस परिवार का हिस्सा माने जाते थे। प्राचीन लोक-साहित्य, 'विक्रम चरित' और उज्जैन की प्राचीन लोककथाओं के अनुसार, सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में जीव-रक्षा और जल-संरक्षण को लेकर कुछ अत्यंत कड़े और दूरदर्शी नियम बनाए गए थे, जो आज के आधुनिक युग के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं।
★ आचार्य चाणक्य के नीति शास्त्र और उनके जीव-कल्याण के सिद्धांतों का भी यही सार है कि जो मनुष्य असहाय जीवों के प्रति करुणा रखता है, वह अप्रत्यक्ष रूप से समाज और राष्ट्र की उन्नति में योगदान देता है। चाणक्य के अनुसार, दया ही धर्म का मूल है और निस्वार्थ सेवा से मिलने वाली आंतरिक शांति मनुष्य के यश को बढ़ाती है।
★ केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि पाश्चात्य वैज्ञानिक और दार्शनिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा था, “हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हम सभी जीवित प्राणियों को गले लगाने के लिए करुणा के अपने दायरे को व्यापक बनाएं।”
इन सभी महापुरुषों के विचार यही सिखाते हैं कि जीव सेवा ही परलोक सुधारने का एकमात्र मार्ग है।
लोक-परलोक के कल्याण की दृष्टि से देखें तो यह मान्यता है कि तपती गर्मी में जब कोई प्यासा पक्षी आपके रखे पानी से अपनी प्यास बुझाकर तृप्त होता है, तो उसकी मूक दुआएं मनुष्य के जीवन के सारे संकटों को हर लेती हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस लोक में पशु-पक्षियों की सेवा करने वाले व्यक्ति को परलोक में उत्तम गति और मानसिक शांति मिलती है। ज्योतिष शास्त्र में भी पक्षियों को दाना-पानी देने से राहु, केतु और शनि जैसे ग्रहों के दोष शांत होने की बात कही गई है।
यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो प्रकृति में हर जीव का एक विशिष्ट महत्व है जो हमारे इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) को संतुलित रखता है। पक्षी केवल सुंदर नहीं होते, बल्कि वे कीट-पतंगों को खाकर फसलों की रक्षा करते हैं, बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाकर नए जंगलों को उगाने में (सीड डिस्पर्सल) मुख्य भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि पक्षी पर्यावरण के सबसे बड़े संकेतक (बायो-इंडिकेटर) होते हैं; यदि किसी क्षेत्र से पक्षी लुप्त होने लगें, तो समझ लीजिए कि वहां का पर्यावरण इंसानों के रहने लायक भी नहीं बचा है। गर्मियों में जब पक्षी पानी की कमी से डिहाइड्रेशन (जलाभाव) का शिकार होकर मरने लगते हैं, तो जैव-विविधता का पूरा चक्र बिगड़ जाता है। इसलिए उन्हें बचाना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पृथ्वी पर मानव जीवन की निरंतरता के लिए एक अनिवार्य वैज्ञानिक आवश्यकता भी है।
गर्मियों में इन मूक जीवों की रक्षा के लिए हम अपने स्तर पर कुछ बहुत ही छोटे लेकिन जीवन रक्षक प्रयास कर सकते हैं। इसके लिए सबसे आसान तरीका है कि हम अपने घरों की छतों, बालकोनी, खिड़कियों या आंगन में मिट्टी के बर्तनों (सकोरों) में साफ पानी भरकर रखें। मिट्टी के बर्तनों में पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है, जिससे पक्षियों को राहत मिलती है। पानी के साथ-साथ एक अन्य बर्तन में ज्वार, बाजरा, चावल या कनक के दाने भी रखें, ताकि उन्हें भोजन के लिए धूप में दूर न भटकना पड़े। इसके अलावा, अपने घर के बाहर या सड़क के किनारे किसी छायादार स्थान पर एक बड़ा पानी का टब या नांद रखें, ताकि गली के आवारा पशु जैसे गाय और श्वान (कुत्ते) अपनी प्यास बुझा सकें।
पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी का प्रबंध करते समय कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। पानी के बर्तनों को नियमित रूप से हर रोज साफ करना चाहिए और उसमें ताजा पानी भरना चाहिए, ताकि गंदे पानी के कारण मच्छर न पनपें और बीमारियां न फैलें। बर्तनों को हमेशा ऐसे सुरक्षित या छायादार स्थानों पर रखें जहाँ बिल्ली या अन्य हिंसक जानवरों का खतरा न हो। याद रखिए, तपती गर्मी में आपकी बालकनी में रखा पानी का एक छोटा सा सकोरा किसी प्यासे पक्षी का जीवन बचा सकता है। आइए, इस गर्मी में हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि किसी भी बेजुबान को प्यास के कारण अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी। इस लोक में धर्म का पालन करते हुए परलोक सुधारने और विज्ञान के संतुलन को बचाने का यह सबसे सरल मार्ग है। ✍️
जीव-दया ही सबसे बड़ा धर्म है, प्यासे को पानी देना ही सच्चा कर्म है।
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