भाग ६
क्लास की छुट्टी हो गई थी। मैं और सुनी चलते हुए थोड़े ही आगे आए थे कि हमें सचिन के साइकिल की वही खड़खड़ सुनाई दी।
"आ गया!!" सुनी मेरी तरफ देखकर हंसते हुए बोली
"एकदम समय पर आए है सचिन!! तू बिल्कुल चुकता नहीं। वह बोली
वह पास आकर रुक, सुनी ने अपनी बैग में से कॉपी निकाली और उसके सामने की।
" Thanks यार..तेरी वजह से मेरे लिए बहुत आसानी हो गई है।" वह बोला उसने कॉपी लेने के लिए हाथ बढाया ही था कि मुझे कुछ सूझा... अचानक...।
"मैंने आज कुछ भी नहीं लिखा क्लास में। सुनी मुझे तेरी कॉपी चाहिए।" दिल की बड़ी हुई धड़कनों को इग्नोर करते हुए मैंने बेशर्मों की तरह दोनों के बीच टांग अड़ा दी
दोनों ने चौक कर मेरी तरफ देखा। हां तो फिर..मैं, समर, सचिन या किसी और को कुछ नहीं कर रहा था, तब भी यह मुझे ही परेशान कर रहे थे। मेरे और सुनी के बीच टांग अड़ा रहे थे।
"सच बोल रहा है..?? क्या तो क्या कर रहा था क्लास में
.??" सुनी बोली
"कुछ नहीं!! मेरा मन ही नहीं लग रहा था आज।" मैंने कहा
"अरे तो मैं बताती हूं ना तुझे..क्या पढ़ाया आज उसे ले जाने दे कॉपी।" वह बोली
"नहीं !! पिछले दो-तीन क्लास का भी बाकी है, सिर्फ आज का ही नहीं। मेरा एक दिन में पूरा नहीं होगा लिखकर। दो दिन का समय तब भी चाहिए मैं बिल्कुल छोटे बच्चों की तरह जिद कर रहा था। यह मुझे समझ आ रहा था। मुझे उस सचिन पर गुस्सा आ रहा था, पर गुस्से में मैं सुनी को परेशान कर रहा था। यह भी मुझे समझ नहीं आ रहा था।
"नेत्र!! रहने दो..दे दो उसे कॉपी। ऐसा करो.. मैं रविवार को तुम्हारे घर आता हूं । सिर्फ आधा घंटा..मुझे बस इतना बता देना कि क्या पढ़ाया। क्योंकि फिर स्कूल में जो व्याकरण पढ़ाई जाती है वह ठीक से समझ नहीं आती, बहुत मुश्किल होती है। और हां...एक बात और वह अलजेब्रा के दो-तीन कठिन सवाल हैं, वह कैसे हल करूं वह भी बताना। प्लीज हां ..." वह बोला और उसकी हां ना का रास्ता देखे बिना चला गया
नेत्रा!! यह सचिन उसे नेत्र बुलाता है?? यह कब हुआ?? और इतने अधिकार पूर्वक कैसे बोल सकता है?? उससे ज्यादा से ज्यादा दो ढाई महीने की पहचान है। इतने कम समय में इनकी इसकी इतनी हिम्मत हो गई?? ऐसा क्या है उसमें?? अगर मैं कभी कुछ मांगू तो सुनी कभी आगे पीछे नहीं देखी थी। उसने आज उसके सामने मुझे नकारात्मक जवाब दिया। पर उसने मेरा प्लेन मुझ पर ही उल्टा दिया। सुनी उसके साथ रविवार को पढ़ाई करने वाली थी। अच्छा दिमाग चलाया उसने। मैं ही मूर्ख साबित हुआ।
"यह क्या था रे??" वह बोली
"क्या हुआ??" मैं बोला
"तूने कॉपी देने क्यों नहीं दी उसे?? मुझे पता है तू यूं ही बैठा नहीं रहता क्लास में ,सब ध्यान रहता है तेरा ,अगर काम भी करता है तो भी मन लगाकर करता है पढ़ाई। मैं बहुत पढ़ती हूं ,तब जाकर मुझे इतने मार्क्स मिलते हैं। पर तू एकपाठी है ,और एक बार तुझे समझाया तो तुझे फॉरेन समझ आ जाता है। ज्यादा पढ़ाई न करने के बाद भी तुझे बहुत अच्छे नंबर मिलते हैं। सच कहूं, तो तुझे मेरी कॉपी की जरूरत नहीं है। क्या मैं तुझे जानती नहीं हूं मोटू..क्या हुआ?? सच-सच बात .." उसने पूछा
बस यही एक मुसीबत थी, कि सुनी मेरा झूठ बोलना या बात छुपाना झट से पकड़ लेती थी, इसलिए मैं यह नाटक ज्यादा देर नहीं खींच सकता था। आखिरकार मुझे बताना ही पड़ा।
"सुनी !! वह सचिन.. वह मुझे ठीक लड़का नहीं लगता।" मैं बोला
"क्यों..?? तुझे ऐसा क्यों लगता है??" उसने पूछा
"पता नहीं ..पर बहुत नौटंकी बाज लगता है मुझे वह। कुछ छुपा कर बनावटी व्यवहार करता है। बहुत उथला है वह, पर अंदर कुछ और ही पकता रहता है उसमें।" मैंने कहा मुझे अभी भी ठीक तरह से कुछ बताते नहीं आया।
"ऐसा क्या बनावटीपन देखा तूने ..ऐसा क्या महसूस हुआ तुझे... वह बता ना। वह पूछ रही थी
"जाने दे ना!! मैं ठीक तरह से नहीं बता पाऊंगा, और तुझे भी कुछ ढंग से समझ नहीं आएगा..मरने दे..वैसे भी मैं बोल रहा हूं, इसलिए तू तुरंत थोड़े ही भरोसा कर लेगी। इतना बोलकर चिढ़ते हुए मैं जल्दी-जल्दी चलते हुए निकल गया।
" ए मोटू!! ऐसा क्यों कर रहा है... अरे रुक तो...ठीक से बोल तो... मोटू... पागल...।" सुनी चिल्ला रही थी पर मैं सुन ही नहीं रहा था। मैं वहां से निकल गया।
पहली बार ऐसा हुआ होगा, कि मैं सुनी पर नाराज हुआ था। उसकी क्या गलती थी?? मेरे इस व्यवहार से वह दुखी होगी, इस बात की परवाह मैंने उस समय नहीं की, पर रात को सोते समय मुझे बहुत बुरा लग रहा था।
अपने इतने सहज रिश्ते को अगर हम खुद ही नुकसान पहुंचने लगे तो फिर इतने साल संभाली हुई दोस्ती को टूटने की कगार पर ले जाऊंगा। इस तरह से तो सुनी ही दूर हो जाएगी ।सुनी तो जिंदगी में चाहिए... किसी और भी रूप में चाहिए... उसकी दोस्ती महत्वपूर्ण है मुझे। मैं उसे दूर नहीं कर रहा। मैं गुस्से में उसे ना समझ कर चिढ़ रहा हूं, इस बात का मुझे एहसास होने लगा। वैसे मेरी उम्र के लोगों में सनी के अलावा मेरे करीब कोई नहीं था। सुनी को कल sorry बोलना है, यह तय करके मैं सो गया।
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उसके घर जाने के लिए मैं निकलने ही वाला था, कि तभी सुनी घर आ गई। मैं उसकी तरफ देखकर खिसियानी हंसी हंस दिया।
" दिमाग ठंडा हुआ क्या??" उसने पूछा
"Sorry यार सुनी!! ऐसी बेवकूफी दोबारा नहीं होगी मुझसे । बेवजह गुस्से में मैं बहुत कुछ बोल गया तुझे। तू सचिन को कॉपी दे.. उसे पढ़ाई में मदद कर..बेवजह तेरे अच्छे स्वभाव को गलत समझ कर मेरा इस बारे में बात करना सही नहीं है ,मुझे समझ आ गया है।" मैं बोला
"ऐ मोटू !! अरेsorry क्यों बोल रहा है। तू मुझे कुछ भी बोल सकता है। बाकी किसी से भी ज्यादा मेरे लिए तू महत्वपूर्ण है। पूरी क्लास एक तरफ और मोटू एक तरफ समझा.. और हां ...और रहा सवाल सचिन का या किसी और का, तो पापा कहते हैं कि ,कोई हमारे पास कोई क्यों आता है ,दोस्ती क्यों करता है ,यह ना देखते हुए बस अपनी तरफ से जो भला हम कर सकते हैं वह करना चाहिए।
मोटू तू बहुत होशियार है मुझसे भी बहुत.. मुझे पता है तू बहुत तरक्की करेगा। बस अभी एक काम कर जरा दिल बड़ा कर। यह भी तू कर सकता है। तू मेरे जैसा नहीं है। तुझे वैसे तो गुस्सा आता नहीं है, पर आया तो भी तू उसे कंट्रोल भी कर सकता है । मेरे पापा मुझे कहते हैं , अपने दोस्त से शांत रहना सीख... मैं सीख रही हूं तुझसे...पर मोटू कल तो लाल टमाटर हो गया था तू.." वह हंसते हुए बोली
"उसे सचिन के बारे में तु मत सोच। अगर मुझे कुछ गलत लगा, तो मैं खुद उसे ठीक कर दूंगी। तुझे पता है ना तेरी सुनी कैसी है।" सुन ने मुझे समझाया
सच ही तो था!! मुझे सुनी की क्षमता पर विश्वास नहीं दिखाना चाहिए। यह गलत है। वह मजबूत है। दोस्ती का रिश्ता बंधन मुक्त होना चाहिए, यह मैं समझ गया था। एक दूसरे की क्षमता पर विश्वास रखते हुए, जहां जरूरत हो वहां सहारा देते हुए, आगे बढ़ना चाहिए सुनी की बातों मे तथ्य तो था।
मेरी गलतफहमी दूर हो गई थी। छोटे-मोटे अंधेरे को घनघोर बादल समझने की गलती मैं दोबारा नहीं करने वाला। इसके विपरीत मैं अपना इरादा पक्का करके मजबूती से आगे बढ़ने वाला था। उसमें सुनी मेरे साथ रहने वाली थी।
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ना शक की कोई परत होगी, ना धुंध छा पाएगी
भड़क ना जाए यह रास्ता, ऐसी नौबत ना आएगी।
दिखावे के यह भंवर, सिर्फ एक आजमाइश है,
मगर यह कश्ती, किनारे पर जरूर आयेगी।
क्रमशः
मूल लेखक :- शब्द भ्रमर
अनुवाद कर्ता :- शब्द सरिता