लखनऊ की उस काली और जर्जर मिल में जो धमाका हुआ था, उसकी गूँज शायद मीलों दूर तक सुनाई दी थी, लेकिन कबीर मेहरा के कानों में उस वक्त सिर्फ एक ही आवाज गूँज रही थी—सिया के जलते हुए पैरों की वह खामोश चीख. कबीर, जो खुद मार्शल आर्ट्स का माहिर था और जिसका शरीर लोहे जैसा सख्त था,
आज अपनी ही बाहों में सिमटी उस लडकी के वजन से कांप रहा था. कबीर के अपने शरीर पर अनगिनत घाव थे; रणविजय के गुंडों के साथ हुई उस खूनी लडाई में उसकी पीठ पर लोहे की रॉड के निशान थे, उसके हाथ की कलाई रस्सियों के घर्षण से छिल चुकी थी,
और क्लोरोफॉर्म का जहर अब भी उसके दिमाग को सुन्न कर रहा था. लेकिन कबीर को अपनी एक भी चोट का अहसास नहीं था. उसे बस दिख रहे थे सिया के वो कोमल पैर,
जिन्हें उसने अपने लिए अंगारों की भेंट चढा दिया था. कबीर ने सिया को एम्बुलेंस का इंतजार किए बिना अपनी लैंड रोवर की पिछली सीट पर बहुत ही कोमलता से लिटाया, जैसे वह कोई कांच की मूरत हो जो जरा सी छुअन से बिखर जाएगी.
सिया का चेहरा पीला पड चुका था, और उसके पैरों के तलवे पूरी तरह झुलस गए थे. कबीर ने जैसे ही गाडी स्टार्ट की, उसकी आँखों के सामने धुंध छा गई, पर उसने अपने आंसुओं को पी लिया.
वह पागलों की तरह गाडी दौडाने लगा. शहर की गलियां, लाल बत्तियां, और ट्रैफिक—आज कबीर मेहरा के लिए कुछ भी मायने नहीं रखता था.
उसका एक हाथ स्टीयरिंग व्हील पर था और दूसरा पीछे मुडकर सिया के बर्फीले ठंडे माथे को छू रहा था। सिया! मेरी तरफ देखो सिया. तुम्हें कुछ नहीं होगा. मैं वादा करता हूँ, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा !
कबीर की आवाज, जो कभी पूरी दुनिया पर हुक्म चलाने के लिए जानी जाती थी, आज फटी हुई थी और उसमें एक ऐसी तडप थी जो शायद खुदा का दिल भी पिघला दे. उसने गाडी चलाते- चलाते ही सिया के माथे पर अपना हाथ रखा और रोते हुए बुदबुदाया, तुम ठीक हो जाओगी. बस एक बार अपनी आँखें खोल दो. मुझे वो नफरत वाली निगाहें फिर से देखनी हैं, मुझे वो डाँट फिर से सुननी है.
बस तुम मुझे छोडकर मत जाओ। लखनऊ के सबसे बडे' सिटी हॉस्पिटल' के इमरजेंसी गेट पर जैसे ही कबीर की गाडी चीखते हुए रुकी, पूरे अस्पताल में हडकंप मच गया. कबीर ने स्ट्रेचर का इंतजार नहीं किया; उसने सिया को अपनी गोद में उठाया और सीधे अंदर की ओर भागा. उसके अपने कपडों पर खून के धब्बे थे, उसका चेहरा धूल और पसीने से अटा पडा था,
लेकिन उसका रुतबा ऐसा था कि बडे से बडा डॉक्टर भी उसके सामने हाथ जोडकर खडा हो गया। अगर इस लडकी की जान पर कोई आंच आई, तो याद रखना. मैं इस शहर का एक- एक पत्थर उखाड दूँगा!
मुझे इंडिया के बेस्ट डॉक्टर्स चाहिए, अभी इसी वक्त! कबीर की दहाड ने पूरे अस्पताल के कॉरिडोर को हिला दिया. सिया को तुरंत इमरजेंसी वॉर्ड में ले जाया गया.
लाल बत्ती जल गई और कबीर वहीं बाहर ठंडी जमीन पर दीवार का सहारा लेकर बैठ गया. वह अपनी हथेलियों को देख रहा था, जहाँ सिया के जलते हुए हाथों की गर्माहट अब भी महसूस हो रही थी. कबीर को पहली बार अपनी दौलत और अपनी ताकत से नफरत हो रही थी. उसे लग रहा था कि उसका ये' मेहरा' होना ही सिया की इस हालत का जिम्मेदार है. उसने मन ही मन सोचा—जिस लडकी को उसने' चरित्रहीन' कहा, जिसे उसने' चोर' समझा, उसी ने आज उसके लिए अपनी खाल जलवा ली.
तभी, अस्पताल के सन्नाटे को कुछ भारी और संजीदा कदमों की आहट ने तोडा. कबीर ने अपनी गर्दन उठाई तो सामने अपनी पूरी गरिमा के साथ उसके पिता, सूर्यप्रताप मेहरा और माँ सुमित्रा मेहरा खडे थे. उनके चेहरे पर सफर की थकान से ज्यादा अपने बेटे को खोने का डर था. उनके ठीक पीछे कबीर का छोटा भाई, शिवांश' खडा था. शिवांश कोई और नहीं शिवांश कबीर के मासी का लडका था. जो कि, कबीर के काफी करीब था वह उसे अपना छोटा भाई मानता था.
शिवांश अभी- अभी अमेरिका से अपनी पढाई पूरी करके लौटा था. उसका चेहरा कबीर से मिलता- जुलता था, लेकिन उसकी आँखों में कबीर जैसी सख्ती नहीं, बल्कि एक अजीब सी कोमलता थी. सुमित्रा जी जैसे ही अपने बडे बेटे की ये हालत देखी,
वो दौडकर उसके पास पहुँचीं और उसका चेहरा अपने हाथों में भर लिया.
कबीर! मेरा बच्चा. ये क्या हाल बना लिया है तूने?
हमें जैसे ही अमेरिका में खबर मिली, हम एक पल के लिए भी वहां नहीं रुक सके।
कबीर ने अपनी माँ की ममता भरी गोद में अपना सिर रख दिया और फूट- फूटकर रोने लगा. एक ऐसा मर्द, जो कभी पत्थर की मूरत लगता था, आज अपनी माँ के सामने रेत की दीवार की तरह ढह गया.
माँ. वो लडकी. सिया. उसने मुझे बचाने के लिए खुद को आग में झोंक दिया. मैंने उसे बहुत दुख दिया माँ, मैंने उस पर शक किया, उसे जलील किया. और उसने बदले में मुझे अपनी जिंदगी दे दी. माँ, मैं इस लायक नहीं हूँ.
सूर्यप्रताप जी ने कबीर के कंधे पर अपना मजबूत हाथ रखा. उनका रुतबा कबीर से भी कहीं ऊँचा था, लेकिन आज उनकी आँखों में अपने बेटे के लिए गर्व और दर्द का मिला- जुला भाव था. कबीर, एक मेहरा कभी टूटता नहीं है. जो हुआ वो नियति थी,
लेकिन अब हमारा फर्ज है कि हम उस बच्ची को वो सम्मान दें जिसकी वो हकदार है. सुमित्रा, अब इस घर में सिया सिर्फ एक कर्मचारी नहीं, बल्कि इस घर की अमानत बनकर रहेगी.
तभी शिवांश आगे आया. उसने कबीर का हाथ पकडा और उसे जोर से दबाया. भाई, मैंने दादी से फोन पर सब सुना है. सिया जी ने जो किया है, वो कोई आम इंसान नहीं कर सकता. आप फिक्र मत कीजिए, अब हम सब यहाँ हैं. आप जाइए और अपनी इन चोटों पर मरहम लगवाइए, वरना जब सिया जी को होश आएगा और वो आपको इस हाल में देखेंगी, तो उन्हें और भी दुख होगा। शिवांश का स्वभाव बहुत ही खुशमिजाज और दोस्ताना था.
उसने आते ही अस्पताल के भारी माहौल को थोडा हल्का करने की कोशिश की. कबीर ने अपने छोटे भाई को गले लगा लिया. शिवांश के आने से कबीर को एक ऐसा मानसिक सहारा मिला जिसकी उसे इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी. अगले कई घंटे कबीर और उसके परिवार के लिए किसी सदी जैसे लंबे थे.
डॉक्टर्स बाहर आए और उन्होंने बताया कि सिया के पैरों के जख्म बहुत गहरे हैं, उन्हें रिकवर होने में हफ्तों लगेंगे और शायद कुछ निशान हमेशा के लिए रह जाएं, लेकिन उसकी जान अब खतरे से बाहर है.
कबीर ने जैसे ही ये सुना, उसने पहली बार चैन की सांस ली. शाम के वक्त जब अस्पताल के कमरे में हलचल हुई, तो सिया ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं. कमरे में सुमित्रा जी और शिवांश भी मौजूद थे. सिया ने जैसे ही कबीर को वहां देखा, उसकी आँखों से बेसाख्ता आँसू बहने लगे। आप. आप ठीक हैं Mister मेहरा ?
सिया की आवाज में अब भी वही फिक्र थी. कबीर ने सिया का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और उसके माथे को चूम लिया. मैं ठीक हूँ सिया, क्योंकि तुमने मुझे नई जिंदगी दी है. आज से कबीर मेहरा की ये साँसें तुम्हारी कर्जदार हैं. मैंने जो किया, जो कहा. उसके लिए मैं मरते दम तक खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा, पर मैं तुम्हें अब कभी खुद से दूर नहीं होने दूँगा.
सुमित्रा जी आगे आईं और सिया के सिर पर प्यार से हाथ फेरा. बेटी, आज से तुम अकेली नहीं हो. ये कबीर की माँ का वादा है, तुम इस घर की बेटी बनकर रहोगी. कबीर ने जो गलतियाँ कीं, वो उसका अहंकार था, पर अब वो अहंकार उसी आग में जलकर राख हो चुका है। शिवांश ने मुस्कुराते हुए सिया की तरफ हाथ बढाया. नमस्ते भाभी जी. ओप्स! मेरा मतलब है सिया जी.
मैं शिवांश हूँ, इस खडूस कबीर भाई का छोटा भाई. मैंने सुना है आपने भाई के अहंकार के साथ- साथ गुंडों की भी खूब धुलाई करवाई है. अब आप जल्दी ठीक हो जाइए, क्योंकि मुझे आपसे मार्शल आर्ट्स नहीं, बल्कि भाई को काबू करने के टिप्स सीखने हैं! सिया की आँखों में फिर से आँसू आ गए, पर इस बार ये खुशी के थे.
उसे पहली बार उस घर में' अपनेपन' की वह खुशबू आई जिसकी उसे लखनऊ छोडने के बाद से तलाश थी. कबीर ने मन ही मन कसम खाई कि अब सिया के रास्ते में कभी कोई कांटा नहीं आने देगा. लेकिन उसके दिमाग के एक कोने में अब भी काम्या बुआ का वो चेहरा घूम रहा था. उसे पता था कि मेंशन वापस पहुँचते ही उसे अपनी बुआ का हिसाब चुकता करना होगा,
जिन्होंने एक बेकसूर लडकी की जिंदगी को नरक बनाने में कोई कसर नहीं छोडी थी. सूरज की आखिरी किरणें अस्पताल की खिडकी से झांक रही थीं, और वे कबीर और सिया के इस नए, पवित्र और अटूट रिश्ते की गवाह बन रही थीं. उन्नीसवें अध्याय में अब मेहरा मेंशन में क्या होता है
यह जानने के लिए अगला एपिसोड जरूर देखें,,,,,,
क्या कमीनी हुआ कुछ नया चाल चलेगी,,,,,,
या फिर कबीर और सिया के बीच टकराव होगा,,,,,,
या प्यार का एक नया फूल खिलेगा अगला अध्याय अवश्य देखें क्या होता है,,,,,,
दोस्तों, एक कहानी लिखना एक साधना की तरह है जिसमें बहुत धैर्य और कठिन परिश्रम लगता है. मैं अपनी हर कहानी को पूरी ईमानदारी और आत्मीयता से लिखता हूँ. इस कहानी को आगे बढाने और इसे नई ऊंचाइयों तक पहुँचाने में आपका एक छोटा सा सहयोग बहुत बडा बदलाव ला सकता है.
कृपया अपनी प्रतिक्रिया कमेंट के माध्यम से साझा करें और मुझे फॉलो करना न भूलें. आपका समर्थन ही मेरी असली पूंजी है।
अगला अध्याय और भी रोमांचक होने वाला है इसलिए अगला अध्याय जरूर देखें,