yognagri rishikesh in Hindi Philosophy by Kapil Tiwari books and stories PDF | योगनगरी ऋषिकेश

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योगनगरी ऋषिकेश

'योगनगरी ऋषिकेश'—यह एक ऐसा नाम है, जिसे शायद ही किसी ने न सुना हो। इस नाम के चर्चा में रहने का सबसे बड़ा कारण इसका एक विख्यात धार्मिक स्थल होना है; और सच कहें तो, यह नगरी वास्तव में अद्भुत है। जब भी मुझे अपने क्षेत्र में भीषण गर्मी सताती है, तो मैं भागकर ऋषिकेश की शरण में आ जाता हूँ। मैं पहले भी यहाँ आता रहा हूँ और आज फिर यहीं, गंगा के साए में हूँ।

समय के साथ ऋषिकेश में आने वाले लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। जब लोग बढ़े, तो उनके रहने के लिए बड़े-बड़े मकान और कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए; और इन सबके साथ यहाँ आया बेहिसाब कचरा।

ऋषिकेश के प्राकृतिक झरनों में कचरे का भर जाना कोई सामान्य या व्यर्थ की घटना नहीं है। यह वास्तव में उस पर्यटक समाज के विकृत रूप और उसकी संवेदनहीन मानसिकता को दर्शाता है, जो पहाड़ों में आता तो कचरे के ढेर के साथ है, लेकिन जाता यहाँ की नदियों के पानी के साथ हैं।


वक्त के साथ ऋषिकेश ने भी अपना मूल स्वरूप बदल लिया है। स्वरूप के साथ  लोगों के रहने का तरीका भी बदल गया है, यहाँ की धार्मिकता का स्वरूप बदल चुका है, और इन सामाजिक बदलावों के साथ ही यहाँ एक बड़ा और चिंताजनक पर्यावरणीय बदलाव भी आ गया है।

           यदि ऋषिकेश के इस बदलाव की गहराई से बात करूँ, तो यहाँ अब बड़े-बड़े रोड, कंक्रीट के मकान और विशाल धर्मशालाएँ खड़ी हो चुकी हैं। यहाँ की धार्मिकता की बात करूँ, तो अब वह अतरंगी कहानियों, झूठ और मात्र किसी को भी कोई कहानी बेच देने के व्यापारिक उद्देश्य तक सिमट कर रह गई है। हमारी सामाजिकता का स्वरूप भी बदल गया है; अब लोगों का यहाँ मिलना सिर्फ अपनी किसी निजी कामना की पूर्ति के लिए होता है। जिस ऋषिकेश को कभी मौन और ध्यान का सर्वोच्च स्थान माना जाता था, उसकी जगह अब तेज़ बजते स्पीकरों, डांस और रील (Reels) बनाने के शोर ने ले ली है। सच तो यह है कि हमने अपने शहरों के गड़बड़ और अशांत जीवन को ही उठाकर यहाँ पटक दिया है; और पर्यावरण का तो क्या ही कहना, कभी ठंडी रहने वाली इस योगनगरी ऋषिकेश में भी अब काफी गर्मी पड़ने लगी है।


     समझ नहीं आता कि यह पावन योगनगरी कब भोग की ओर अग्रसर हो गई? इसके साथ आगे बढ़ते जा रहे लोगों को इस बात की भनक तक न लगी कि वे कब अपने भीतर की अशांति को ही 'शांति' समझने की भूल कर बैठे। यहाँ तक पहुँचना और आना जैसे-जैसे आसान हुआ, लोग यहाँ खिंचे चले आते गए... और आने वाले समय में भी आते ही जाएँगे।


यहाँ के घाटों पर यदि आप अकेले आएँ, तो आपका किसी न किसी से दोस्त बन जाना लगभग तय है। वैसे, यहाँ आपको मुख्य रूप से दो अलग-अलग ग्रुपों में लोग बिखरे हुए मिलेंगे, और उन्हें देखते ही आप तुरंत पहचान लेंगे कि कौन ग्रामीण क्षेत्र से आया है और कौन शहरी क्षेत्र से। यहाँ तक कि वे लोग भी आपको साफ दिख जाएँगे, जो फिलहाल ग्रामीण से शहरी बनने की बदलाव वाली प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं।


ग्रामीण ग्रुप को अमूमन किसी एक वरिष्ठ पुरुष के नेतृत्व द्वारा संरक्षित किया जाता है। वही उस ग्रुप का जानकार गाइड या मुखिया होता है; वह जहाँ-जहाँ ले जाता है, बाकी सब उसे अपना नेता मानकर चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलते रहते हैं। गाँव के ये लोग ज़्यादा खरीदारी के चक्कर में नहीं पड़ते और न ही घंटों गंगा में पैर डालकर बैठना पसंद करते हैं। उनका बस एक ही स्पष्ट लक्ष्य होता है—जितने भी मंदिर हैं, उन्हें जल्दी से जल्दी निपटा दिया जाए, ताकि वे समय से अपने अगले गंतव्य या वापस रेलवे स्टेशन पहुँच सकें।


इसके ठीक विपरीत, शहर के लोग जोड़ों (Couples) में या दो-तीन लोगों के छोटे समूहों में घूमते हैं। वे जगह-जगह अलग-अलग पोज़ में फोटो लेते और घाटों पर सुस्ताते हुए दिखाई दे जाते हैं। ठंडे पानी में पैर डालना, घाट पर बैठकर गिटार बजाना—यह सब शहर के लोगों का अपना डोपामाइन (Dopamine) बढ़ाने और क्षणिक सुकून पाने का शौक होता है।


और जो लोग इन दोनों संस्कृतियों के बीच में होते हैं, उनके पास ध्वनि प्रसारित करने वाला एक खास यंत्र (ब्लूटूथ स्पीकर या मोबाइल) पाया जाता है। उससे निकलने वाली अजीबोगरीब ध्वनियाँ सामने वाले को यह सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं कि आखिर कानों के परदे फाड़ने वाला यह शोर है क्या? यदि थोड़ा सा और गहराई से विचार करें, तो पता चलता है कि उस तेज़ आवाज़ के पीछे कोई एक व्यक्ति या पूरा समूह होता है, जो आँखों पर अतरंगी चश्मा, सिर पर टोपी और अपने पिता के नाप के कपड़ों का भार लिए हुए दिखाई देता है।


इन सब विसंगतियों के बीच, ऋषिकेश की सुबह गंगा के किनारे चलने वाली ठंडी हवा सच में 'प्राण' का वास्तविक अर्थ समझा जाती है। यह जीवन को गहराई से महसूस करने का सर्वोच्च समय होता है। सुबह होते ही ऋषिकेश में दुकानें सजने लगती हैं। विडंबना देखिए कि इन दुकानों को सजाने वालों का अपना घर बिल्कुल भी सजा हुआ नहीं होता; उनका यहाँ का जीवन किसी कड़ी सज़ा से कम नहीं है। वे कई लोग मिलकर एक छोटी और गंदी झोपड़ी में रहते हैं, जहाँ दो वक्त के खाने के लिए सामान की चोरी, अपना माल बेचने के लिए दिनभर झूठ और रात को चैन की नींद सोने के लिए नशे का सहारा लेना उनकी आदत बन जाता है।


यहाँ सुबह-सुबह जहाँ एक तरफ लोग पारंपरिक ध्यान लगाने की विधि अपना रहे होते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ विचित्र चरित्र के प्राणी दिखाई देते हैं, जिन्हें हमारा यह तथाकथित लोकधर्म 'बाबा' कहता है। वे बाबा कुछ टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोलकर विदेशी पर्यटकों के रूप में अपने 'ग्राहक' तैयार कर रहे होते हैं। भूख लगने पर उन्हीं स्थानीय दुकानों से अपने 'बाबापन' (बावत्त्व) का रौब दिखाकर मुफ्त में खाना खा लेना, अब उनकी दैनिक जीवन प्रणाली का एक हिस्सा बन चुका है।

सबसे बड़ा विरोधाभास तो गंगा किनारे पूजा कराते उन पंडितों में दिखता है, जिन्होंने शास्त्रों में फूलों को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया; और फिर उन्हीं फूलों को बेचने के लिए मासूम बच्चों के पूरे जीवन और बचपन को दांव पर लगा दिया। हैरान करने वाली बात यह है कि इसे हम 'भक्ति' का नाम देते हैं।

एक जीवित पेड़ से फूल को बेरहमी से अलग करना, फिर उन फूलों को बेचने के लिए नासमझ बच्चों को महज़ एक साधन बना देना, और अंत में फूल की महत्ता को इतना बढ़ा देना कि उसे पेड़ से तोड़ना ही पड़े—इस पूरे चक्र का दोष आखिर किस पर मढ़ा जाए? उस पंडित पर जो पूजा कराता है, उस बच्चे पर जो उसे तोड़ता है, या उस श्रद्धालु पर जो उसे पुण्य समझकर गंगा में प्रवाहित कर देता है? या फिर इस कचरे को साफ न कर पाने वाली नगरपालिका पर? आखिर इस विडंबना का असली ज़िम्मेदार कौन है?

ऋषिकेश की शाम, जहाँ पहुँचकर मन स्वतः ही मौन होने लगता है। गंगा घाट की आरती सच में विशेष और अलौकिक हो सकती है, बशर्ते उसके साथ उसका वास्तविक और आध्यात्मिक अर्थ जोड़ा जाए। ऋषिकेश के ये घाट जहाँ एक तरफ मन को उत्कृष्टता और असीम शांति की ओर ले जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ यहाँ इंसानी अहंकार नशे में डूबता हुआ भी नज़र आता है। घाट के किनारे दूर-दूर तक मोबाइल की फ्लैश लाइटों के साथ लोग शराब और गांजे की धुन में इस कदर डूबे रहते हैं कि जहाँ सारे सवाल और जवाब थम जाते हैं। शाम होते ही घाटों पर नशे के खोजी अक्सर गांजा ढूँढ़ते और माँगते हुए मिल जाते हैं; और उन्हें रास्ता बताने वाले स्थानीय लोग भी बड़े विधान से समझाते हैं, "सीधे जाओ, थोड़ा और आगे जाकर फिर दाएँ मुड़ जाना... वहाँ एक मंदिर मिलेगा, वहीं आपको गांजा मिल जाएगा।"


अगर आप रात के समय यहाँ किसी घाट पर सो जाएँ, तो यह हो ही नहीं सकता कि आपके बगल से शराब की तीखी महक न आए; और जब यह महक और हुड़दंग बढ़ता है, तो फिर पुलिस को भी आना ही पड़ता है। पुलिस के बूटों की थाप के साथ ही घाटों पर ये आवाजें गूँजने लगती हैं, "अपना-अपना सामान देखते रहना, कहीं चोरी न हो जाए। यहाँ चोर घूम रहे हैं... चोरों से सावधान!"


शनिवार और रविवार (वीकेंड) को ऋषिकेश में इन तथाकथित भक्तों और पर्यटकों की बाढ़ आ जाती है। मई-जून की चिलचिलाती गर्मी और अपने दफ्तरों या रोज़मर्रा के घटिया काम की ऊब से बचने के लिए लोगों को सबसे सस्ता और आसान रास्ता ऋषिकेश का ही दिखता है। लेकिन क्या सच में यह इतना सस्ता है? यह सवाल हम खुद से कभी नहीं पूछते। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो रास्ता हमें आज बहुत सस्ता लग रहा है, उसकी वास्तविक और भारी कीमत हमारी यह बेज़ुबान प्रकृति चुका रही हो? प्रकृति फिलहाल आपसे कोई नगद मूल्य नहीं वसूल रही, शायद इसीलिए आपको यह सब बहुत सस्ता नज़र आ रहा है।


हम पहाड़ों में अपनी खाली बोतलें छोड़ आते हैं, चारों तरफ प्लास्टिक का कचरा बिखेर आते हैं—क्या सच में यह सैर-सपाटा इतना सस्ता है? नहीं, बिल्कुल नहीं! जिस दिन इस सहिष्णु प्रकृति ने अपनी वास्तविक कीमत वसूलनी शुरू की, उस दिन तुममें से कोई बच नहीं पाएगा। तुमने जिस प्रकृति को हमेशा 'माँ' का दर्जा दिया, अपनी विलासिता से उसी माँ के स्वरूप को विकृत और दूषित कर दिया। तुम्हें लगता है कि पहाड़ों में जाना और वहाँ गंदगी फैलाना बहुत सस्ता है, पर ऐसा नहीं है। उसने आज तक तुमसे कोई कीमत नहीं मांगी, इसलिए तुम्हें यह मुफ़्त लग रहा है। बदला लेने की प्रकृति की कोई नियति या स्वभाव नहीं है, लेकिन इस धरा पर संतुलन न रहे, यह भी तो ठीक नहीं है।


संतुलन बनाए रखना ही इस सृष्टि का शाश्वत नियम है। और याद रखो, जिस दिन प्रकृति द्वारा स्वयं ही 'संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया' (महाप्रलय या आपदा) चल रही होगी, उस दिन जीवन और अस्तित्व का वास्तविक अर्थ क्या होता है, उससे तुम्हारा सीधा सामना होगा।

अतः, शुभ योगनगरी ऋषिकेश!