lokdharm in Hindi Philosophy by Kapil Tiwari books and stories PDF | लोकधर्म की कहानियाँ

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लोकधर्म की कहानियाँ

✨ आज दोपहर मैं ऋषिकेश के एक लोकधार्मिक प्रतिष्ठित मंदिर में बैठा था। वहाँ बैठे-बैठे मुझे हर थोड़ी देर में एक जैसी कहानियाँ बार-बार सुनाई दे रही थीं। कौतूहलवश जब मैं सच जानने के लिए थोड़ा और नज़दीक आया, तब जाकर स्थिति स्पष्ट हुई। वे कहानियाँ वास्तव में मंदिरों के गाइड वहाँ आने वाले लोगों (लोकधार्मिक श्रद्धालु) को सुना रहे थे।

वे ऐसी-ऐसी कहानियाँ थीं, जिन्हें सुनते ही साफ पता चल जाए कि ये पूरी तरह तर्कहीन और विवेकहीन हैं। वे गाइड लोगों को अंधविश्वास से भरी कहानियाँ बेच रहे थे और लोग भी उन्हें बड़े आश्चर्य से सुनकर कुछ रुपयों में खरीद रहे थे। कभी किसी पेड़ को पाँच हज़ार साल पुराना बताकर उसका संबंध सीधे 'समुद्र मंथन' से जोड़ दिया जाता, तो कभी काँच के मंदिर में बनी आधुनिक मूर्तियों का संबंध भगवान विष्णु के प्राचीन अवतारों से बिठा दिया जाता। लोकधर्म के नाम पर ऐसी अनेकों मनगढ़ंत कहानियाँ बाज़ार में उपलब्ध हैं, जिन्हें बेचकर यह व्यवस्था अपनी सामाजिक और आर्थिक मज़बूती पाती है।

📌 जैसा कि उत्कृष्ट चेतना के ऋषि कहते हैं—"कहानी भी उपयोगी हो सकती है, लेकिन कम से कम उसका सही अर्थ तो पता हो।" बिना किसी वास्तविक अर्थ के, या उसका विकृत (बिगाड़ा हुआ) रूप लोगों को बताना तो सिर्फ एक औपचारिकता और खानापूर्ति है। विडंबना देखिए कि इन्हीं अंधविश्वास से भरी कहानियों को खरीदने के लिए लोग दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं। इन लोगों को बुलाने के लिए समय-समय पर बड़े-बड़े विज्ञापनों का सहारा लिया जाता है, और यहीं से पूरा मामला धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेने लगता है।

लोग आते हैं, उन्हें ये झूठी कहानियाँ परोसी जाती हैं और लोग भी इन कहानियों के बदले में अपना मानसिक, शारीरिक और आर्थिक योगदान देकर चले जाते हैं।

🔥ऋषि कहते है _अहंकार कहानियों में इसलिए जीना पसंद करता है क्योंकि कहानी ही अहंकार का अस्तित्व है।

अहंकार "मैं यह हूँ" की अनुभूति है। यह कहानी के बिना नहीं रह सकता। कहानी में अहंकार को तीन चीजें मिलती हैं:

पहली - पहचान। कहानी अहंकार को बताती है कि वह कौन है। "मैं यह घटना का शिकार हूँ," "मैं यह उपलब्धि का मालिक हूँ," "मैं इस तरह का व्यक्ति हूँ।" कहानी के बिना अहंकार खाली है।

दूसरी - न्याय। कहानी अहंकार को अपने आप को सही ठहराने का तरीका देती है। "मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि..." कहानी अहंकार के हर कार्य को अर्थ देती है, हर प्रतिक्रिया को तर्कसंगत बनाती है।

तीसरी - स्थायित्व। कहानी अहंकार को समय में बाँधती है। अतीत को याद रखना, भविष्य की योजना बनाना - ये सब कहानी के माध्यम से होता है। कहानी के बिना अहंकार वर्तमान में विघटित हो जाता है।

जब आप अपनी कहानी को देखते हैं - सच में देखते हैं - तो आप देखते हैं कि यह सब अहंकार की रचना है। और उस देखने में ही कहानी की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।

          हम क्या करते हैं, क्या सोचते हैं? हमारे चुनाव कैसे हैं? इन सब पर ध्यान रखना, मन को खुद के प्रति सतर्क रखना ही खुद का अवलोकन करना होता हैं। जब तक हम खुद को नहीं जानते हैं तब तक हम दूसरे को जानने का वादा नहीं कर सकते हैं। इसलिए अवलोकन जरूरी हैं।

~ यथार्थ