Tumse Mohabbat he - 4 in Hindi Love Stories by Deepshikha Kedia books and stories PDF | तुमसे मोहब्बत है - 4

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तुमसे मोहब्बत है - 4


उधर वो लड़की आखिरकार अपने घर के बाहर पहुँचती है।थकी हुई साँसें… माथे पर पसीना… और अभी भी हल्का सा बुखार।

वो जैसे ही बेल दबाने के लिए हाथ बढ़ाती है—दरवाज़ा अपने-आप खुल जाता है।

सामने खड़ा था एक 16 साल का दुबला-पतला लड़का, बाँहें सीने पर बाँधे, बिलकुल मकान मालिक की तरह अकड़ में।

लड़का (कड़क आवाज़ में):“तुम्हें कितनी बार कहा है टाइम से घर आया करो!लेकिन तुम मानती ही नहीं!आखिर तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है?किराए पर रहती हो, तो अच्छी किरायेदार बनकर रहा करो!”

वो लड़की थकी हुई, ठंड में कँपकँपाती हुई…और हल्की सी शर्मीली मुस्कान देकर बोलती है—

“सॉरी मकान मालिक जी… इस बार गलती हो गई।आगे से नहीं होगी।”

लड़का भौंहें तानकर और अकड़ दिखाता है—

लड़का:“आगे से होनी भी नहीं चाहिए… वरना—”

अचानक पीछे से कड़क, भारी आवाज़ गूँजती है—

“वरना… क्या?”

दोनों— वो लड़की और लड़का—एक साथ चौंक जाते हैं।लड़का उस आवाज़ की तरफ़ मुड़ता है।

एक गंभीर, तेज नज़र वाली औरत दरवाज़े पर खड़ी थी।उसकी आँखें तीर जैसी तेज।

लड़का (तुरंत नरम पड़ते हुए):“म…माँ, मैं बस इसे यही समझा रहा था कि घर शरीफ़ों का है…ये लड़की टाइम से नहीं आती…”

औरत एक पल के लिए वाणी को घूरती है।फिर गुस्से में तमतमाते हुए उसकी तरफ़ बढ़ती है।

वो लड़की घबरा जाती है, एक कदम पीछे हट जाती है।उसे लगता है शायद डांट पड़ेगी… या थप्पड़ भी।

औरत उसका हाथ उठाती है—वो लड़की आँख बंद कर लेती है, डर से काँपती हुई।

लेकिन अगले ही सेकंड…उसका हाथ उस लड़की के माथे पर ठहर जाता है।

औरत की आँखों में चिंता भर जाती है।

औरत:“अभी भी बुखार है तुम्हें…तुम अपना ध्यान क्यों नहीं रखती, वाणी?”

वाणी धीरे से अपना चेहरा ऊपर करती है,दुपट्टा नीचे खिसकाती है और मासूमियत से कहती है—

वाणी (नाराज़गी और प्यार के मिश्रण में):“मासी… आपने तो मुझे डरा ही दिया था।”

औरत—उसकी मासी—गहरी सांस लेकर उसे अपने पास खींच लेती है।वाणी की आँखों में घर पहुँचने का सुकून साफ़ दिखता है।

ये है हमारी कहानी की main लीड वाणी मेहरा।

Vaani Mehra की ख़ूबसूरती वो नहीं थी जो शोर मचाकर लोगों का ध्यान खींच ले;वो तो ख़ामोशी से दिल में उतर जाने वाली, बहुत ही सुकून देने वाली ख़ूबसूरती थी।वो आग की तरह तेज़ नहीं थी,बल्कि एक शांत, ठहरी हुई चाँदनी थी—जो बिना कुछ कहे भी मन को ठंडक पहुँचा दे।

उसका सबसे बड़ा श्रृंगार उसकी सादगी थी।वो हमेशा हल्के रंग के सलवार-सूट या मुलायम कॉटन साड़ियों में नजर आती थी—जिनमें भारतीय संस्कृति की कोमल झलक बसती थी।

उसके चलने का अंदाज़…उसकी हर हरकत…उसके कपड़ों की लहरों जैसा नफ़ासत (elegance) लिए हुए था।वो जिसे भी देख ले, बस एक पल में मन में इज़्ज़त और सुकून छोड़ जाती थी।

उम्र भले ही करीब 30 साल थी,पर उसका चेहरा अब भी 21 की मासूम युवती जैसा खिलता था।

उसका रंग नर्म, दूध जैसा साफ़ था—ना दिखावे वाला, ना चकाचौंध वाला—बस एक सच्ची, नैसर्गिक रोशनी जो भीतर से चमकती थी।

उसके चेहरे पर एक ऐसी कोमलता थी,जिसे देखकर किसी के भी मन मेंममता, सुरक्षा और सम्मान का भाव जाग जाए।

जब वाणी मुस्कुराती थी,तो उसके होंठों से ज़्यादाउसकी मासूम आँखें मुस्कुराती थीं।उसकी मुस्कान में इतनी गरमाहट थीकि वह गुस्से को पिघला दे,कोलाहल को शांत कर दे।

उसकी आँखें सिर्फ़ भोली नहीं थीं—वो गहरी, समझदार, औरहल्की सी बुद्धिमान चमक से भरी थीं।

उनमें सवाल भी थे…और सवालों के जवाब भी।उनमें जिद भी थी…और जिद को शांत करने का अपना तरीका भी।

वाणी जब बोलती थी,तो उसकी आवाज़ धीमी होती थी—पर उसके शब्दों में इतनी समझदारी,इतनी गहराई,और इतनी मृदु शक्ति छिपी होती थीकि सामने वाला इंसान खुद-ब-खुदरुककर,सुनकर,और सोचने पर मजबूर हो जाता था।

वो सिर्फ ख़ूबसूरत नहीं—एक एहसास थी। जिसे हर कोई पाना चाहता हो।

वाणी मुस्कुराते हुए बोली—"मासी, आप हो ना मेरा ध्यान रखने के लिए… फिर मुझे और किस चीज़ की जरूरत पड़ेगी?"

पर मासी कुछ कह पाती, उससे पहले पीछे से वो 16 साल का लड़का चिड़चिड़े अंदाज़ में आकर बोला—"माँ! इससे पहले ये पूछो कि ये आज लेट क्यों आई है?"

मासी ने वाणी की तरफ़ एक कड़ी नज़र डाली, जैसे जवाब उसी की आँखों से निकाल लेना चाहती हों।

वाणी तुरंत बोल पड़ी—"मासी, मैं तो इसकी खटारा स्कूटी की वजह से लेट हुई हूँ।"उसने लड़के की तरफ़ हल्की सी आँखें तरेरी—"आज फिर बीच रास्ते में बंद हो गई थी।"

लड़का शर्मिंदगी में नज़रें झुका लेता है।

वाणी आगे बोली—"अच्छा हुआ जो मुझे रास्ते में एक भला मनुष्य मिल गया… उसी ने अपने आदमियों को बोलकर मुझे घर तक छुड़वाया, वरना न जाने कब पहुँचती।"

मासी की आँखों में हल्की हैरानी उभरी—"भला मनुष्य…?"

उनके स्वर में थोड़सा अविश्वास और थोड़ी चिंता दोनों थे—जैसे वो सोच रही हों कि आजकल की दुनिया में सच में कोई इतना भला भी हो सकता है क्या?

वाणी ने धीरे-धीरे अपनी मासी के पास बैठते हुए पूरा किस्सा बताना शुरू किया।उसकी आवाज़ में हल्की थकान थी, पर आँखों में वो सच्चाई साफ़ झलक रही थी।

"मासी, पहले तो मुझे लगा कि उस आदमी ने मुझे बीच सड़क पर अकेला छोड़ दिया…"वाणी ने हल्का सा सिर झुका दिया, शर्मिंदगी साफ़ दिख रही थी।"इतनी देर रात… सुनसान सड़क… मुझे डर भी लग रहा था और गुस्सा भी। इसीलिए मैंने मन ही मन उसे खूब बुरा-भला कहा।"

मासी ने भौंहें चढ़ाईं—"अरे वाणी…!"

वाणी ने हजैसे सफाई दी—"पर… कुछ ही मिनट बाद उसके आदमी आए। उन्होंने बताया कि वही इंसान था जिसकी कार रुकवाई, और उन्हें कहा कि उनके बास ने उन्हें मेरी मदद करने के लिए भेजा है… वो मुझे घर तक छोड़ कर गए।"

उसने धीरे से मुस्कुराकर कहा—"मुझे लगा था वो बिल्कुल बेरहम होगा… पर वो तो उल्टा मेरे बारे में इतना सोच गया।"

कुछ पल रुककर, जैसे अपने शब्द तोलते हुए, वाणी बोली—"गलती मेरी थी मासी। मैं उसे बिना जाने ही गलत समझ बैठी… उस पर शक भी किया… और मन ही मन गालियाँ भी दे दीं।"उसने लंबा साँस लिया—"पर असल में  उसकी वजह से मैं सुरक्षित घर तक पहुँच पाई।

मासी वाणी को गौर से देखती रहीं—उनकी आँखों में चिंता से ज़्यादा अब राहत थी… और थोड़ा-सा आश्चर्य भी।

"आजकल के ज़माने में ऐसा कौन करता है…"मासी ने धीरे से कहा।

वाणी ने बस हल्की-सी हामी में सिर हिला दिया—पर अंदर ही अंदर उसे उस अनजाने, खामोश, तनोखे, ठंडे नज़रों वाले आदमी की याद फिर से आ गई…जिसकी आँखें उसने बस एक झलक में देखी थीं—पर जिसकी खामोशी अब भी उसके दिल की धड़कनें थोड़ी तेज़ कर देती थी।

तभी वो 16 साल का लड़का  गुस्से-नाक-मज़ाक वाले अंदाज़ में कहता है—“ये झूठ है! ऐसा थोड़ी होता है… मुझसे ज़्यादा अच्छा इंसान तो इस दुनिया में पैदा ही नहीं हुआ!”

वाणी और उसकी मास़ी एक साथ तेज़ आवाज़ में बोल उठती हैं—“शट अप, रोहन…!”

रोहन मासूम-सा चेहरा बनाता है, होंठ सिकोड़ता है और धीरे से मुड़कर अपने कमरे में चला जाता है, जैसे कोई छोटा बच्चा डांट खाकर चुपचाप पीछे हट जाता हो।

कुछ पल की खामोशी के बाद वाणी धीमी आवाज़ में पूछती है—“मासी… चाचू कैसे हैं? आज भी नाराज़ हैं क्या?”

मासी रेखा जी थकान भरी सांस लेकर कहती हैं—“तुम सुबह उनसे बात कर लेना, अभी उनका मूड ठीक नहीं है।”और यह कहकर वो अपने कमरे में चली जाती हैं।

कमरे का माहौल एकदम शांत हो जाता है। वाणी भी वहीं खड़ी रह जाती है… जैसे मन में कई बातें उमड़ रही हों, पर कह नहीं पा रही।

××××××××××××वाणी की ज़िन्दगी हमेशा से आसान नहीं रही थी।

उसके पिता भारतीय सेना में थे, और देश के लिए शहीद हो गए। पिता की मौत के बाद वाणी अपने दादाजी नेमीचंद गुप्ता के साथ रहने लगी थी। नेमीचंद जी वाणी की दुनिया थे। पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था…

एक साल पहले दादाजी भी बीमारी की वजह से चल बसे।और वाणी फिर से अकेली हो गई।

वाणी की मासी की शादी उसके पिता के सबसे अच्छे दोस्त साहिल अवस्थी के साथ हुई थी।साहिल अवस्थी पेशे से लॉयेर (वकील) थे।उनके दो बेटे — कबीर और रोहन।

साहिल जी ने वाणी को कभी भांजी नहीं माना…हमेशा अपनी असली बेटी की तरह पाला।वाणी की मां तो बचपन में ही दुनिया छोड़ चुकी थीं, इसलिए ये परिवार ही उसके लिए सबकुछ बन गया।

वाणी अब मुंबई में लॉ की प्रैक्टिस कर रही थी और वहीं मासी-चाचू के घर रहती थी।उसके नाम पर “अपना” कहने लायक बस यही परिवार था…और वो गाँव… जहाँ उसका बचपन गुज़रा,जहाँ उसे पूरा गाँव “हमारी वाणी” कहकर पुकारता था।