Tumse Mohabbat he - 5 in Hindi Love Stories by Deepshikha Kedia books and stories PDF | तुमसे मोहब्बत है - 5

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तुमसे मोहब्बत है - 5

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अगस्त्य अपनी घड़ी पर समय देखता है—रात काफ़ी हो चुकी थी, पर उसका दिमाग़ अटका हुआ था उस लड़की पर, जिसे उसने सड़क पर मुश्किल में देखा था।

ऑफिस की केबिन में हल्की-सी पीली रोशनी थी। फाइलें मेज़ पर बिखरी पड़ी थीं, पर अगस्त्य का ध्यान कहीं और था।वो धीरे से मोबाइल उठाता है… और वाणी की फोटो फिर से खोलता है।

फोटो में उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था।बस दो बड़ी, काजल से घिरी आँखें… और हल्का-सा हताशा भरा डर।

अगस्त्य स्क्रीन पर उँगलियाँ रूकी हुई रखता है।दिल में एक अनजानी-सी खलबली महसूस होती है—कुछ ऐसा, जिसे उसने बहुत सालों से महसूस नहीं किया था।

वो अपने आपको समझाने की कोशिश करता है—“अगस्त्य, पागल मत बन… एक लड़की की आँखें देखकर कौन यूँ बेचैन होता है?”

पर बेचैनी बढ़ जाती है।

फोटो के पिक्सल तक को देखता है…जैसे उसकी आँखों में छुपी कहानी पढ़ लेना चाहता हो।

पहली बार, उसके अंदर कुछ अजीब-सा…कुछ नया…कुछ खींच लेने वाला एहसास जगता है।

वो अपना फोन मेज़ पर रख देता है, पर मन वहीं अटका रहता है।आँखें बंद करता है तो भी सिर्फ़ वही आँखें नज़र आती हैं।

अगस्त्य धीरे से खुद ही मुस्कुराता है—“कौन हो तुम…? और क्यों इतना असर कर रही हो ?”

अगस्त्य बचपन से ऐसा नहीं था…

कभी वह बहुत हँसमुख, चंचल और लाइमलाइट से दूर रहने वाला लड़का था।उसकी दुनिया दो लोगों के इर्द–गिर्द घूमती थी—

उसकी माँ — आरती शेखावतऔर छोटी बहन — आरोही

उसके पिता एक बिज़नेसमैन थे, जिन्हें अपना नाम, power और इज़्ज़त ही सबसे ज़्यादा प्यारी थी।वह घर में कम रहते और ग़ुस्से में ज़्यादा।

अगस्त्य बचपन से अपनी माँ को सहता देखता था—हर गलती पर ताने, हर काम पर शक, हर बात पर छोटा महसूस कराना।माँ हमेशा मुस्कुरा कर सब झेल लेतीं।

पर एक दिन… मुस्कान टूट गई।

अगस्त्य तब सिर्फ़ 17 साल का था।उस दिन घर में ज़ोरदार झगड़ा हुआ था।उसके पिता ने उसकी माँ पर बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाया था—“तुम मेरे लाइफ़ को बर्बाद कर रही हो… मेरे बिज़नेस को, मेरी इज़्ज़त को…”

अगस्त्य ने पहली बार अपने पिता के सामने खड़े होते हुए कहा था—“Enough. Aap galat ho.”

उस रात उसकी माँ ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया था।सुबह तक… दरवाज़ा नहीं खुला।

अगस्त्य ने जब दरवाज़ा तोड़ा, वह दृश्य आज भी उसकी रूह को चीर देता है—उसकी माँ ने अपनी जान दे दी थी।

उस दिन उसने तीन बातें सीख ली थीं—कमज़ोर होने की कोई कीमत नहीं।दुनिया सिर्फ़ ताक़त और सक्सेस को मानती है।

प्यार एक कमज़ोरी है — इसलिए किसी को दिल के पास मत आने दो।

ओर तिसरी अक्सर लोग अपना बनके धोखा देते हैं । क्योंकि  उसके मां के जाते ही उसके पापा ने उसकी मांसी से शादी कर ली थी।

लोग तो ये तक बोलते थे उसके पापा विजय सिंघानिया का अपनी साली के साथ अफेयर था जिसकी वजह से उसकी मां आरती ने सुसाइड किया था। उस दिन से उसे अपने पापा ओर मासी से नफरत हो गई थी।

माँ की मौत के बाद पिता ने आरोही की कस्टडी लेकर उसे hostel भेज दिया।अगस्त्य ने खुद को फिर कभी टूटने नहीं दिया।उसने अपनी माँ की कसम खाई थी—आज के बाद वो कभी किसी पर भरोसा नहीं करेगा और प्यार वो कभी नहीं करेगा क्योंकि प्यार ने ही उसकी मां को जिंदगी ली थी।

सफलता जितनी ऊँची हुई,अगस्त्य उतना ही अकेला होता चला गया।

लोग उससे डरते थे,उसकी नज़रों में softness के लिए कोई जगह नहीं थी,और उसकी आवाज़ में tenderness का कोई अक्स नहीं बचा था।

आज जब उसने वाणी की आँखों को देखा—उन आँखों की मासूम, शांत, गहरी सादगी को…

उसके दिल में कुछ ऐसा हिला,जैसे किसी ने बंद पड़ी खिड़की पर हल्का-सा दस्तक दी हो।

वह खुद से बोल उठा—

“Why… why do her eyes feel familiar?”

उसे पता नहीं था—वाणी की सादगी उसी softness की याद दिलाती थीजो उसने अपनी माँ में आखिरी बार देखी थी।

और बस… अगस्त्य जैसे पत्थर जैसे इंसान मेंएक बाल भर दरार आ गई थी।

सुबह के हल्के-हल्के उजाले के साथ हवा में एक अजीब-सी ठंडक थी।सड़कें लगभग सुनसान… और अगस्त्य, बिना किसी संगीत या ध्यान भंग करने वाली चीज़ के,बस अपने ही भारी विचारों के साथ दौड़ता जा रहा था।

कल रात की ऑफिस की उथल–पुथल,वाणी की आँखों की अनकही गहराई,और अंदर ही अंदर उमड़ता उसका अजीब-सा बेचैन एहसास—सब उसकी दौड़ की रफ्तार में शामिल हो चुके थे।

तभी उसका फोन लगातार तीसरी बार बज उठा।

अगस्त्य ने हल्का-सा झुंझलाकर गर्दन पीछे की, साँस रोकी और कॉल उठा ली—

“Aap mujhe baar-baar kyu phone kar rahi hain?”

फोन के उस पार से एक प्यार, चिंता और हल्की झिड़की से भरी आवाज़ आई—

“इसलिए कि मुझे तेरी फ़िक्र है।तू भले ही मुझसे प्यार न करता हो…पर मैं तुझसे करती हूँ।तुझे मेरी चिंता, परवाह—किसी चीज़ की कद्र नहीं,पर मुझे है!”

अगस्त्य के होंठों पर अनायास ही एक छोटी-सी मुस्कान आ गई।“चिंता, परवाह, फ़िक्र…तीनों एक ही बात होती है, ताई माँ।”

उधर से उसी प्यारभरे गुस्से में जवाब आया—

“जो भी हो, पर तुझे मेरी तीनों नहीं है।”

अगस्त्य धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए दौड़ता रहा—

“और आपको ऐसा क्यों लगता है?”

इस बार फोन पर आवाज़ ज्यादा भावुक हो गई—

“तू कल ही मुंबई आया है,

और अब तक घर नहीं आया।मैं जानती हूँ… तू बचपन से ही ऐसा है—कुछ भी परेशान करे तो चुपचाप कहीं निकल जाता है

अगस्त्य की मुस्कान पल भर में गायब हो गई।आवाज़ भारी और सख़्त हो उठी—

“आपको पता है न… वह घर पर है।

और जब वह घर पर हो,तो मैं घर नहीं आ सकता।”

फोन की दूसरी तरफ़ कुछ क्षण का घना सन्नाटा छा गया।

फिर अचानक एक तेज़, अधिकार भरी आवाज़ गूंजी—

“उसे कुएँ में गिरने दे…

पर तू अपनी ताई माँ को ऐसे तड़पाएगा?”

अगस्त्य की चाल धीमी पड़ गई।आवाज़ फिर से कोमल हो गई—

“ताई माँ… मैं घर नहीं आ सकता।

पर आप तो मुझसे मिलने आ सकती हैं।”

फिर हल्की-सी शरारत उसके स्वर में आ गई—

“आपके आलू के परांठे याद आ रहे हैं।”

ताई माँ—जानकी जी—हँस पड़ीं, जैसे उनके हँसने से फोन की ठंडक भी पिघल गई हो—

“अच्छा, मेरे बच्चे!

ठीक है… आज दोपहर मैं खुद ऑफिस आऊँगी।और तेरे लिए गरम-गरम आलू के परांठे लेकर आऊँगी।”

अगस्त्य के चेहरे पर एक सच्ची, मासूम सी मुस्कान आई…जो शायद महीनों बाद उसके होठों पर आई थी।

पर अगले ही पल वह मुस्कान गायब हो गई…