episode 7 in Hindi Drama by Priya Chaudhary books and stories PDF | 50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 7

Featured Books
Categories
Share

50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 7

(एक बंजर ज़मीन पर ठंडी हवाओं का सन्नाटा। दूर कहीं एक कौवे के काँव-काँव की आवाज़ जो सन्नाटे को और भयावह बना रही है। आर्यन मल्होत्रा के पैरों के घिसटने की आवाज़ जो धूल भरी ज़मीन पर किसी थके हुए मुसाफिर की तरह लग रही है।)
आर्यन के हाथ से वह 'जेल की चाबी' रेत में कहीं खो गई थी। वह अब एक ऐसी ज़मीन पर खड़ा था, जिसे वह अपनी हवेली मानता था। लेकिन यहाँ अब ईंटें, पत्थर, कीमती फर्नीचर या वह भव्यता नहीं थी—सिर्फ धूल, राख और सन्नाटा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी शून्यता थी। उसके हाथ उस पत्र को कसकर पकड़े हुए थे जो उसे मिला था: "असली सज़ा यह है कि अब तुम खुद को ही नहीं ढूँढ पाओगे।"
सीन 1: भ्रम का घेरा
आर्यन को लगा कि शायद उसने अपनी आँखें बंद कर ली हैं। उसने ज़ोर से अपनी आँखों को मला और फिर खोला। नज़ारा नहीं बदला। "नहीं! यह नहीं हो सकता!" वह चिल्लाया। उसकी आवाज़ उस खाली मैदान में गुँजी और वापस उसे ही सुनाई दी।
उसने चलना शुरू किया। उसे लगा कि शायद हवेली के पीछे वाले गेट के पास उसे उसका भाई समीर या आयशा मिल जाएँगे। उसने दौड़ना शुरू किया—उसका महंगा सूट अब फट चुका था, चेहरे पर धूल और खून के धब्बे थे। वह अपनी ही यादों की भूलभुलैया में भाग रहा था। उसे याद आया कि कैसे उसने इस हवेली के हर पत्थर को अपनी मर्जी से लगवाया था। आज वही पत्थर गायब थे।
तभी, उसे ज़मीन पर एक पुरानी चीज़ दिखाई दी। एक चांदी का फ्रेम, जो पूरी तरह से मुड़ चुका था। उसने उसे उठाया। उसमें उसकी और समीर की एक बचपन की फोटो थी। लेकिन फोटो में समीर का चेहरा काले पेंट से पोता हुआ था। आर्यन के हाथ कांपने लगे। उसने पीछे मुड़कर देखा—वहाँ धुंध की एक मोटी चादर थी। उस धुंध के अंदर से उसे अपनी हवेली की परछाइयाँ दिखने लगीं।
सीन 2: मानसिक द्वंद्व और अपनी ही आवाज़ से सामना
आर्यन को अब ऐसा महसूस होने लगा कि वह अकेले नहीं है। हर तरफ फुसफुसाहटें थीं। 'धोखेबाज़', 'कातिल', 'लालची'—ये शब्द हवाओं में तैर रहे थे। वह अपने कानों को बंद करके ज़मीन पर बैठ गया।
"मैं कातिल नहीं हूँ! मैंने जो किया, वह बिज़नेस था!" उसने खुद को समझाने की कोशिश की।
तभी, उसके सामने हवा में एक परछाई उभरी। वह हूबहू आर्यन जैसा दिख रहा था—वही सूट, वही घड़ी, वही अंदाज़। लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह से काली थीं। वह परछाईं उसके पास आई और आर्यन के कान में फुसफुसाई, "बिज़नेस? क्या अपनी माँ के गहने बेचकर बिज़नेस शुरू करना बिज़नेस था, आर्यन? क्या अपने भाई को सलाखों के पीछे भेजकर उसकी हिस्सेदारी छीनना बिज़नेस था? तुम अपनी कामयाबी की सीढ़ी लाशों पर खड़े होकर बना रहे थे, और तुम्हें लगा कि कोई नहीं देख रहा?"
आर्यन ने उस परछाईं को धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उसका हाथ हवा में से गुज़र गया। वह परछाईं अब उसके चारों तरफ चक्कर काटने लगी। उसे ऐसा लगा जैसे वह एक बड़े आईने के अंदर फँस गया है, जहाँ से वह अपनी ही बुराइयों को देख पा रहा है।
सीन 3: आयशा और समीर का रहस्योद्घाटन
तभी, धुंध के बीच से दो आकृतियाँ बाहर निकलीं—समीर और आयशा। आर्यन को लगा कि उसे मुक्ति मिल गई। "समीर! आयशा! मुझे यहाँ से निकालो! मैं सब कुछ वापस करने को तैयार हूँ! मुझे जेल भेज दो, मुझे सज़ा दो, लेकिन यहाँ से निकालो!"
समीर उसकी तरफ बढ़ा, लेकिन उसका चेहरा अब एक पुतले जैसा लग रहा था। आयशा ने भी कोई भाव नहीं दिखाया।
"आर्यन," समीर ने कहा, उसकी आवाज़ अब मानवीय नहीं थी। "हमने तुम्हें सज़ा नहीं दी है। तुमने खुद को यह सज़ा दी है। यह हवेली, यह सन्नाटा, यह चाबी... ये सब तुम्हारी उस याददाश्त का हिस्सा हैं, जिसे तुमने ज़हर देकर मारने की कोशिश की थी। तुम जिस शून्यता में हो, उसे 'अस्तित्व का अंत' कहते हैं।"
आर्यन का दिल जोर से धड़कने लगा। "तुम क्या कह रहे हो? मैं यहाँ हूँ, मैं जीवित हूँ!"
आयशा ने धीरे से आर्यन के चेहरे पर हाथ रखा। उसका हाथ पत्थर जैसा ठंडा था। "नहीं, आर्यन। तुम जीवित नहीं हो। जिस रात हवेली ढही थी—बीस साल पहले, जब तुम उस एक्सीडेंट के बाद सदमे में थे—तुम उसी दिन मर चुके थे। यह हवेली तुम्हारी कल्पना थी, और हम सब तुम्हारे वहम थे।"
सीन 4: 45वां दिन—सत्य का आखिरी पर्दा
आर्यन को याद आया—वह रात। बारिश, एक्सीडेंट, और हवेली की नींव में दबा वह सच। उसने अपनी जान बचाने के लिए हवेली का नाम रखा था, लेकिन उसका अपना मन उसे कभी नहीं भूल पाया था। समीर की मौत जेल में नहीं, बल्कि उसी एक्सीडेंट में हुई थी।
आर्यन का शरीर धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा। उसके चारों तरफ की दुनिया धुंधली पड़ रही थी। अब उसे अपनी हवेली का एक-एक कोना याद आ रहा था। वह कोई हवेली नहीं थी, वह एक 'पागलखाना' था, जहाँ उसे बीस साल पहले भर्ती कराया गया था।
"मैं मर चुका हूँ?" आर्यन ने फुसफुसाते हुए पूछा।
समीर और आयशा गायब हो गए। अब वह सिर्फ एक सफेद कमरा देख पा रहा था। एक नर्स उसके पास आई और उसने उसके माथे पर हाथ रखा। "अभी भी वही पुरानी हवेली का सपना देख रहे हैं, मिस्टर मल्होत्रा? 20 साल हो गए हैं। आपको यहाँ से बाहर निकले हुए ज़माना हो गया।"
आर्यन को एहसास हुआ—हवेली का ढहना, कबीर का बदला, आयशा का जासूस होना—ये सब उसकी अपनी ही बनाई हुई कहानियाँ थीं, ताकि वह अपने अपराधों के बोझ को कम कर सके।
सीन 5: शून्यता का अंत या नई शुरुआत
आर्यन उस सफेद कमरे में लेटा था। उसके पास एक नोटबुक रखी थी। उसने उसे खोला। उसमें 50 पन्ने थे। 45 पन्ने भरे हुए थे—जिसमें उसने 50 दिनों की वह पूरी कहानी लिखी थी, जो उसने खुद के लिए बनाई थी। अब सिर्फ 5 पन्ने खाली थे।
उसे समझ आ गया कि जो कुछ भी उसने अब तक अनुभव किया, वह सिर्फ उसकी मानसिक स्थिति का एक खेल था। नर्स ने उसे दवा दी और चली गई। कमरे की खिड़की से बाहर का नज़ारा अब साफ था। बाहर कोई शहर नहीं था, कोई लोग नहीं थे, सिर्फ एक शांत बगीचा था जहाँ सन्नाटा था।
उसने नोटबुक का 46वां पन्ना खोला और लिखना शुरू किया: "आज मैंने अपनी हवेली को ढहते हुए देखा। सन्नाटा अब मेरा दोस्त है।"
उसने चाबी को ढूंढा। वह चाबी वहीं थी, लेकिन अब वह लोहे की नहीं, बल्कि एक कागज की बनी थी। उसने उसे हाथ में लिया और मुस्कुराया। उसने अब तय कर लिया था—अगले 5 दिनों में, वह अपनी इस काल्पनिक हवेली को अपने अंदर ही पूरी तरह जला देगा।
नैरेटर: 44 दिन शेष हैं। आर्यन का सच अब उसके सामने है। वह न तो किसी हवेली में है, न ही वह किसी का बदला है। वह तो सिर्फ अपने ही बनाए हुए जाल में फँसा हुआ एक कैदी है। क्या आर्यन अपने इस पागलपन से कभी उबर पाएगा, या ये आखिरी 5 दिन उसकी यादों को पूरी तरह मिटा देंगे?
(सस्पेंस पॉइंट: आर्यन ने खिड़की के बाहर देखा—उस बगीचे में, जहाँ सन्नाटा था, उसे माया का चेहरा दिखाई दिया। माया ने उसे हाथ हिलाकर बुलाया—ठीक वैसे ही, जैसे उसने उस एक्सीडेंट वाली रात किया था। आर्यन खड़ा हुआ, उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी। उसने दरवाज़ा खोला और बगीचे की तरफ कदम बढ़ा दिए। क्या वह बगीचा सच है, या यह उसके मरने की एक और कोशिश है?)
लेखक: प्रिया
आर्यन अब वास्तविकता और कल्पना के बीच की लकीर खो चुका है। क्या ये अगले 5 दिन उसे मुक्ति देंगे या और भी गहरे अंधकार में ले जाएंगे?