episode 9 in Hindi Drama by Priya Chaudhary books and stories PDF | 50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 9

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50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 9

(डाइनिंग हॉल में सन्नाटा इतना गहरा है कि आर्यन की अपनी धड़कन उसे किसी ढोल की गूँज की तरह सुनाई दे रही है। मेज पर बैठे 44 लोग पत्थर की मूर्तियों की तरह स्थिर हैं। हवा में एक पुरानी, बंद कमरे की घुटन वाली गंध है।)
आर्यन के हाथ में वह भारी, पीतल की चाबी थी। वह चाबी किसी साधारण ताले की नहीं लग रही थी, बल्कि वह किसी ऐसी चीज़ का प्रतीक थी जिसे आर्यन ने अपने पूरे अस्तित्व के सबसे अंधेरे कोने में छिपा रखा था। मेज के चारों ओर बैठे लोग—समीर, आयशा, माया—सब उसे देख रहे थे। उनकी आँखें अब इंसानी नहीं थीं; उनमें एक काला शून्य था जो आर्यन की रूह को स्कैन कर रहा था।
सीन 1: मेज से अलमारी तक का रास्ता
आर्यन धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठा। उसका हर कदम फर्श पर एक भारी गूँज पैदा कर रहा था। उसने मुड़कर मेज की तरफ देखा, तो वहाँ अब कोई नहीं था। मेज पर सिर्फ वो खून भरा खाना था जिसे आर्यन ने अभी-अभी निगला था। हॉल की दीवारें धीरे-धीरे पिघल रही थीं और एक धुंधले गलियारे का रूप ले रही थीं, जिसके अंत में एक भारी लकड़ी का दरवाज़ा था—वही 'अंतिम अलमारी'।
जैसे-जैसे आर्यन उस दरवाज़े के करीब पहुँचा, उसे अपने कानों में अपनी ही माँ की आवाज़ सुनाई दी, "आर्यन, जो चीज़ अंदर है, उसे बाहर मत आने देना। अगर वह बाहर आ गई, तो दुनिया तुम्हारे उस झूठ को नहीं, तुम्हारे असली चेहरे को देखेगी।"
सीन 2: 43वां दिन—दहलीज पर खड़ा आर्यन
आर्यन उस दरवाज़े के सामने आकर रुक गया। दरवाज़े पर कोई हैंडल नहीं था, सिर्फ एक छोटा सा की-होल (keyhole) था। उसने कांपते हुए हाथ से वह चाबी उसमें डाली। जैसे ही चाबी घूमी, एक ऐसी आवाज़ आई जैसे बीस सालों से बंद कोई साया बाहर निकलने के लिए बेताब हो।
कड़क... चरररर...
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। अंदर कोई अलमारी नहीं थी, बल्कि एक छोटा सा कमरा था। उस कमरे के बीचों-बीच एक आईना था और उस आईने के सामने एक कुर्सी थी। आर्यन अंदर गया। कमरे की दीवारें पूरी तरह से अखबारों की कतरनों से ढकी थीं। ये अखबार उसके बिजनेस के नहीं थे, बल्कि उन सभी अपराधों के थे जो उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में किए थे—और जो पुलिस तक कभी नहीं पहुँचे थे।
सीन 3: आईने के पीछे का वहशी
आर्यन ने उस कुर्सी पर बैठकर आईने में देखा। आईना उसे वह नहीं दिखा रहा था जो वह था, बल्कि वह दिखा रहा था जो उसने 'बनने के लिए' दूसरों को कुचला था। आईने में उसने देखा कि उसके बचपन से ही उसके अंदर एक 'अहंकार' का कीड़ा था। वह देख सकता था कि कैसे उसने स्कूल में अपने दोस्तों को फँसाया था, कैसे उसने पहली बार किसी का विश्वास तोड़कर पैसे कमाए थे।
"क्या मैं हमेशा से ऐसा ही था?" उसने आईने से पूछा।
आईने में उसकी परछाईं हँसने लगी। "तुम ऐसे ही पैदा हुए थे, आर्यन। हवेली, माया, समीर, आयशा—ये सब तो सिर्फ बहाने थे। तुम्हें एक 'देवता' बनना था, जबकि तुम सिर्फ एक 'शैतान' के अंश थे।"
आर्यन का सिर फटने लगा। उसने आईने पर हाथ मारा, लेकिन इस बार हाथ आईने के आर-पार चला गया। आईने के दूसरी तरफ एक दूसरी दुनिया थी। वहाँ उसने खुद को देखा—एक ऐसा आर्यन जो जेल में नहीं, बल्कि एक आलीशान महल में बैठा था, लेकिन वह महल पूरी तरह से इंसानी हड्डियों से बना था।
सीन 4: 43वें दिन का प्रहार
तभी, कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया और अंदर से आवाज़ आई, "43 दिन बीत चुके हैं, आर्यन। अब तुम्हारे पास केवल 7 दिन बचे हैं। अगर 7 दिनों के भीतर तुमने इस 'अंतिम अलमारी' का रहस्य नहीं सुलझाया और यह स्वीकार नहीं किया कि तुम खुद ही अपने सबसे बड़े दुश्मन हो, तो तुम इस आईने के अंदर हमेशा के लिए कैद हो जाओगे।"
आर्यन उस आईने वाली दुनिया में गिर गया। उसे महसूस हुआ कि वह अब हकीकत में नहीं, बल्कि अपने ही दिमाग की परतों (layers) के बीच फँस गया है। उसके चारों तरफ हज़ारों आर्यन थे, और हर आर्यन एक अलग अपराध का चेहरा था। कोई चोर था, कोई हत्यारा था, कोई धोखेबाज़ था।
"मुझे वापस जाना है!" वह चिल्लाया।
"वापस कहाँ?" समीर की आवाज़ आई, जो अब उस आईने के पीछे से आ रही थी। "उस हवेली में जो अब है ही नहीं? या उस ज़िन्दगी में जो तुमने कभी जी ही नहीं?"
सीन 5: एक नई चुनौती
आर्यन ने देखा कि उन हज़ारों 'आर्यन' के बीच एक छोटा सा आर्यन भी था—उसका बचपन का रूप। वह बच्चा रो रहा था और उसने अपने हाथ में एक छोटी सी गेंद पकड़ी हुई थी। आर्यन उसके पास पहुँचा और उसे उठाने की कोशिश की। जैसे ही उसने बच्चे को छुआ, उसे एक बिजली का झटका लगा।
उसे याद आया कि वह गेंद उसकी नहीं थी, वह समीर की थी। उसने समीर की वो गेंद चुराई थी और उसी दिन से उसने नफरत का पाठ सीखा था।
नैरेटर: 43 दिन शेष हैं। आर्यन को समझ आ गया है कि उसका यह पागलपन किसी एक्सीडेंट या कबीर के बदले से शुरू नहीं हुआ था, बल्कि यह तो उसके बचपन की उस पहली चोरी से शुरू हुआ था जिसने उसे एक अपराधी बना दिया था।
(सस्पेंस पॉइंट: उस आईने वाली दुनिया में, आर्यन के बचपन के रूप ने अचानक अपना सिर उठाया और आर्यन की आँखों में देखकर कहा—"तुम मुझे नहीं बदल सकते, क्योंकि मैं ही तुम हूँ।" और अचानक, उस कमरे की दीवारें आईने में बदलने लगीं। अब आर्यन जिस तरफ भी देख रहा था, उसे सिर्फ अपना ही चेहरा दिख रहा था, हज़ारों बार, हज़ारों रूप में। क्या आर्यन खुद से लड़कर जीत पाएगा?)
लेखक: प्रिया
अगले एपिसोड में: आर्यन का अपनी ही परछाइयों से युद्ध। क्या वह अपने बचपन के उस 'अपराधी' को मार पाएगा जो उसे अंदर ही अंदर खा रहा है?