उसने झुककर गुलाब का एक फूल आगे बढ़ाया और अपने दिल पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहा—"I love you."उमा उसकी इस अदा पर पहले से ही फिदा थी। वह शलभ को मना कर भी नहीं सकती थी, फिर भी बनावटी नाराज़गी दिखाते हुए बोली—"यह सब क्या है? ऐसे रास्ता चलते कोई किसी से इस तरह कहता है क्या?"शलभ उसके चेहरे के भाव पढ़ चुका था। उसने हल्की मुस्कान दबाई और दूसरी ओर देखने लगा। उमा धीरे से उसके पीछे आई और उसके कंधे से लगते हुए बोली—"तुम्हें तो यार, मनाना भी नहीं आता। चलो, मैं ही मान जाती हूँ।"दोनों हँस पड़े। उस दिन मौसम भी जैसे उनके प्रेम का साथी बन गया था। उन्होंने साथ रहने की कसमें खाईं और उन्हें लगा मानो जिंदगी में सचमुच बहार आ गई हो।शलभ सामान्य कद-काठी का सांवला युवक था। वहीं उमा बेहद खूबसूरत—ऐसी कि राह चलते लोग भी एक बार पलटकर देख लें। शलभ कभी-कभी खुद को उसके सामने कमतर महसूस करता। वह बार-बार उमा से अपने प्यार का भरोसा मांगता और देता रहता।धीरे-धीरे उसके भीतर एक हीन भावना घर करने लगी।उसे लगता—शायद उमा उससे बेहतर किसी को पा सकती है। शायद वह उससे सचमुच प्यार नहीं करती, सिर्फ उसका मन रखती है। शायद एक दिन कोई और उसकी जिंदगी में आ जाएगा।उधर उमा इन सब बातों से अनजान थी। वह शलभ को पूरे मन से चाहती थी। उसके लिए प्रेम का मतलब केवल शलभ था। उसे अपने रिश्ते और अपने प्रेम पर पूरा विश्वास था।उमा नौकरी करती थी। काम के सिलसिले में उसे कभी-कभी दूसरे शहरों में जाना पड़ता। यात्राएँ होतीं, मीटिंग होतीं, सहकर्मियों के साथ समय भी बिताना पड़ता। उसके साथ पुरुष सहयोगी भी होते, लेकिन उसके मन में कभी किसी और के लिए कोई भाव नहीं आया।मगर शलभ बदलने लगा था।उसके सवाल बदल गए थे।"कौन-कौन गया था?""फोन इतनी देर से क्यों उठाया?""तुम्हारे साथ जो नया लड़का काम करता है, वही था ना?"शुरू में उमा मुस्कुराकर जवाब देती रही। उसे लगता—प्यार में थोड़ा अधिकार तो होता ही है।लेकिन धीरे-धीरे सवालों की जगह शक ने ले ली।एक दिन उमा काम से लौट रही थी। ट्रेन देर से आई थी। रात के दस बज चुके थे। स्टेशन के बाहर शलभ खड़ा मिला।उमा उसे देखकर खुश हो गई।"अरे! तुम लेने आए हो?"लेकिन शलभ के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।"सच बताओ... किसके साथ थी?"उमा कुछ पल उसे देखती रह गई।"क्या मतलब?""मतलब वही, जो तुम समझ रही हो।"उस रात पहली बार उमा बहुत रोई। किसी और की बात उसे इतना दुख नहीं देती, जितना उस इंसान का अविश्वास जिसने कभी उसके हाथ पकड़कर साथ निभाने की कसमें खाई थीं।उसके बाद दोनों के बीच दूरी बढ़ने लगी।अब उमा हर बात समझाने की कोशिश नहीं करती थी। और शलभ हर चुप्पी में नए शक ढूँढ़ता था।कुछ दिनों बाद, एक शाम शलभ उसी रास्ते पर खड़ा था जहाँ उसने कभी गुलाब देकर अपने प्यार का इज़हार किया था।उमा आई तो उसने धीमे स्वर में कहा—"मैं हार गया, उमा। तुमसे नहीं... अपने डर से।"उमा चुप रही।शलभ बोला—"मुझे हमेशा लगता रहा कि मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ। और उसी डर ने मुझे तुम पर शक करना सिखा दिया।"उमा की आँखें नम हो गईं।"प्यार में बराबरी खूबसूरती से नहीं होती, भरोसे से होती है, शलभ। मैं हमेशा तुम्हारे साथ थी। लेकिन तुम्हारा डर हमारे बीच आ गया।"शलभ ने सिर झुका लिया।कुछ पल दोनों चुप रहे।फिर उमा ने धीरे से कहा—"अगर साथ चलना है, तो शक को यहीं छोड़ना होगा। क्योंकि प्रेम पहरा नहीं चाहता... विश्वास चाहता है।"शलभ ने उसका हाथ थामा।इस बार दोनों साथ तो चले, लेकिन पहले की तरह कसमें खाकर नहीं—एक-दूसरे को समझकर।शायद यही प्रेम का दूसरा नाम है।
आलोक मिश्रा " मनमौजी "