अगली सुबह घर में हमेशा की तरह जल्दी हलचल शुरू हो गई रसोई से तवे पर सिकती रोटियों की हल्की खुशबू आ रही थी। सुषेला चुपचाप अपने काम में लगी हुई थीगैस पर एक तरफ साधारण आलू की सब्ज़ी पक रही थी, और साथ में चाय चढ़ी हुई थी न कोई खास बात, न कोई उत्साह सब कुछ सामान्य, लेकिन उस सामान्य में भी एक ठंडापन था।
तुषार नींद से उठा, कुछ देर छत को देखता रहा फिर धीरे से उठकर तैयार होने चला गया जब वो हॉल में आया, महेश पहले से ही कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे तुषार उनके पास बैठ गया।
तुषार - मम्मी एक चाय मिल जाएगी?
रसोई से बिना उसकी तरफ देखे ही आवाज़ आई,
सुषीला - रख दी है टेबल पर
तुषार ने कप उठाया चाय साधारण थी ठीक वैसी ही जैसी रोज़ होती थी कुछ पल तक बस अख़बार की सरसराहट और बर्तनों की हल्की आवाज़ सुनाई देती रही पायल भी बाहर आई, लेकिन आज उसने तुषार की तरफ देखा तक नहीं। वो सीधे टेबल के दूसरे कोने पर बैठ गई और बिना कुछ बोले खाना लेने लगी।
तुषार ने हल्का सा उसकी तरफ देखा फिर नजरें हटा लीं कल की बात शायद सबके मन में थी, लेकिन कोई उसे छेड़ना नहीं चाहता था।
महेश ने अख़बार मोड़ा और सीधे मुद्दे पर आए,
तुषार - पंडित जी से बात हो गई है अगले हफ्ते की एक तारीख अच्छी है हम लोग आज शाम तक फाइनल बता देंगे
तुषार ने बस सिर हिला दिया
महेश - और रिश्तेदारों को भी धीरे-धीरे खबर करनी होगी
सुषेला इस बार बाहर आई उसके हाथ में रोटियों की प्लेट थी उसने प्लेट टेबल पर रखी, लेकिन तुषार की तरफ देखे बिना वापस मुड़ने लगी
सुषीला बिना कुछ बोले फिर से रसोई में चली गई तुषार ने चुपचाप रोटी तोड़ी और सब्ज़ी के साथ खाने लगा हर कौर के साथ उसे एहसास हो रहा था ये घर पहले जैसा नहीं रहा
या शायद वो खुद पहले जैसा नहीं रहा नाश्ता खत्म करके वो उठने ही वाला था कि महेश की आवाज़ फिर आई
महेश - शाम को तैयार रहना पंडित जी के पास चलना है
जी ने जवाब दिया
वो अपने कमरे की तरफ बढ़ गया दरवाज़ा बंद करते ही उसने गहरी साँस ली बाहर सब कुछ सामान्य था साधारण खाना, रोज़ की बातें, वही घर लेकिन उसके अंदर सब कुछ धीरे-धीरे बदल रहा था
रवीना की सुबह अब पहले से भी ज्यादा व्यस्त हो गई थी शादी तय हो जाने के बाद घर में सुकून नहीं बल्कि एक अजीब सी जल्दी आ गई थी हर दिन जैसे किसी तैयारी का हिस्सा बन गया था
रसोई में वो अकेली खड़ी थी गैस पर चाय चढ़ी थी, साथ में लौकी की सब्ज़ी बन रही थी उसने जल्दी-जल्दी आटा बेलना शुरू किया।
रवीना, जल्दी कर मुझे भी बहुत काम है,सरोज की आवाज़ आई उसने तुरंत जवाब दिया, हाथ तेज़ करते हुए
रवीना - बस दो मिनट
कुछ ही देर में उसने नाश्ता तैयार करके टेबल पर लगा दिया उसके पिता चुपचाप बैठकर खाना खाने लगे उसी वक्त उसकी छोटी बहन, नेहा, कमरे से बाहर आई उसके चेहरे पर हल्की झुंझलाहट थी क्योंकि उसके पिछले 27 इंटरव्यू खराब गए थे और आज 28वा था
नेहा - माँ, आज फिर मुझे अकेले ही जाना पड़ेगा?
उसने बैग कंधे पर डालते हुए कहा सरोज ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया,
सरोज - तो क्या करूँ? तेरी दीदी के सिर पर शादी है, हर वक्त तेरे पीछे घूमे क्या?
नेहा ने एक नजर रवीना की तरफ डाली फिर हल्का सा मुँह बनाकर कुर्सी पर बैठ गई
नेहा - पहले तो सब कुछ दीदी ही संभालती थी अब तो बस शादी-शादी
उसने धीमे से कहा, लेकिन इतना कि सुनाई दे जाए रवीना के हाथ एक पल के लिए रुक गए वो कुछ कहना चाहती थी लेकिन उसने खुद को रोक लिया
सरोज ने इस बार सीधे नेहा की तरफ देखा,
सरोज - तू भी समझ लिया कर जब तक इसकी शादी नहीं होती, तेरी बात कोई नहीं करेगा
ये बात साफ थी और चुभने वाली भी नेहा चुप हो गई, लेकिन उसके चेहरे पर नाखुशी साफ दिख रही थी रवीना ने धीरे से उसकी प्लेट आगे बढ़ाई,
रवीना - खा ले देर हो जाएगी
नेहा ने बिना कुछ कहे खाना शुरू कर दिया कुछ देर बाद वो उठी और बिना पीछे देखे घर से निकल गई दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ पूरे घर में गूँज गई।
रवीना कुछ पल वहीं खड़ी रही उसे एहसास था उसकी शादी सिर्फ उसकी नहीं है उसकी बहन की जिंदगी भी उसी के वजह से अटकी हुई है
सरोज - आज पंडित जी के पास जाना है, याद है ना?
सरोज की आवाज़ ने उसे फिर से reality में खींच लिया।
रवीना - हाँ माँ
वो अपने कमरे में गई और अलमारी खोली अंदर कुछ ही कपड़े थे सादे, रोज़मर्रा वाले उसने एक सूट निकाला और कुछ पल उसे देखती रही फिर आईने के सामने खड़ी हो गई उसने खुद को देखा ना कोई खास सिंगार, ना कोई चमक
बस एक साधारण लड़की
जिसकी शादी तय हो चुकी थी लेकिन उसके दिल में अभी भी हल्का सा डर था “क्या वो मुझे अपनाएगा?”
उसने धीरे से अपनी नजरें झुका लीं और फिर चुपचाप तैयार होने लगी एक अनचाहा डर उसके अंदर से खाएं जा रहा था क्या तुषार को ,सच में उससे सादी करने में इंटरेस्ट था...