रावल रतन सिंहः
खिलजी द्वारा चित्तौड़ का नाश व पहला साका जौहर
(1303 ईसवी)
रावल रतन सिंह, रावल समर सिंह के पुत्र थे, जो असाधारण और शूरवीर राजा थे। रावल रतन सिंह की एक अप्रतिम सुंदर पत्नी थी, जिनका नाम था रानी पद्मिनी। पद्मिनी, जो कि मेवाड़ की महारानी भी थीं, उनकी सुंदरता एवं उसी सुंदरता के प्रति अलाउद्दीन खिलजी की वासना के विषय में बहुत कुछ लिखा और अनुमान लगाया गया है। यह निश्चित है कि चित्तौड़ की पहली घेराबंदी और पहला साका जौहर, अलाउद्दीन खिलजी की पाशविक वृत्ति के कारण ही हुआ।
रतन सिंह और पद्मिनी के इर्द-गिर्द एक काल्पनिक गाथा ‘पद्मावत’ लिखने वाले मलिक मोहम्मद जायसी के काव्यात्मक प्रस्तुतीकरण पर विश्वास करने से इस युग के आस-पास बहुत भ्रम पैदा हुआ है। किंतु ऐतिहासिक रूप से जायसी का लेखा-जोखा अविश्वसनीय है और इसे केवल रानी पद्मिनी और रावल रतन सिंह के आस-पास के कुछ मिथकों को दूर करने के लिए यहाँ स्पष्ट किया जा रहा है।
सर्वप्रथम, पद्मावती के नाम से कोई रानी नहीं थी, यह एक काल्पनिक चरित्र है, जो जायसी ने अपने काव्य के लिए बनाया था, यद्यपि यह रानी पद्मिनी से ही प्रेरित था। इसलिए चित्तौड़ की महान रानी पद्मिनी को पद्मावती के रूप में दिखाने के सभी प्रयासों और योजनाओं का विरोध किया जाना चाहिए। एक मुसलमान व्यक्ति की कल्पना को इस बात की अनुमति नहीं दी जा सकती कि जिस महान हिंदू रानी ने अपने सम्मान और धर्म की रक्षा के लिए अकल्पनीय बलिदान दिया हो, उस महानतम रानी का नाम ही वह परिवर्तित कर दे!
दूसरी बात, चित्तौड़ की वास्तविक घेराबंदी के 250 साल पश्चात् जायसी ने ‘पद्मावत’ काव्य लिखा था। इसलिए जायसी की रचना उस समय की घटनाओं के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण का आधार हो ही नहीं सकती।
अलाउद्दीन खिलजी का जन्म 1267 ईसवी में हुआ था और उसका पालन-पोषण उसके चचा जलालुद्दीन खिलजी ने किया था, जो दिल्ली के निकट के कुछ भाग पर राज्य करता था।
जलालुद्दीन ने दासवंश में एक छोटे अधिकारी के रूप में अपने जीवन की शुरुआत की थी और अंतिम दास राजा मुईजुदीन कैक़ाबाद की मृत्यु के पश्चात् उसने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। उसकी पुत्री का विवाह जलालुद्दीन से हुआ था।
अलाउद्दीन ने 1296 ईसवी में जलालुद्दीन की हत्या कर दिल्ली का राज्य हथिया लिया एवं उत्तर भारत के हिंदू राजाओं पर आक्रमण करना शुरु कर दिया।
हिंदू साम्राज्यों, जैसे परमार, वाघेला, चाहमना तथा मेवाड़ के रावलों के पूरे वंश का नाश करने का काम अलाउद्दीन ने ही किया। उसका कुख्यात किन्नर दास सेनापति मलिक काफूर पहला मुसलमान सेनापति था, जिसने विन्ध्य पर्वत पार कर दक्षिण भारत के यादव, काकातीया तथा होयसल राजाओं को परास्त किया था।
काफूर का जन्म हिंदू परिवार में हुआ था और उसे अलाउद्दीन के सेनापति नुसरत खाँ ने 1299 ईसवी में एक दास के रूप में खरीदा था।
हम केवल अलाउद्दीन द्वारा राजस्थान में दो मुख्य आक्रमणों के विषय में बात करेंगे, रणथंभौर एवं चित्तौड़।
1297 ईसवी में अलाउद्दीन के अनुभवी सेनापति उलुग खाँ एवं नुसरत खाँ ने रूद्र महालय तथा सोमनाथ के मंदिरों को लूटा और शिवलिंग के भग्नांशों को अलाउद्दीन को दिखाने साथ ले गए। जालौर के राजकुमार कान्हड़ देव सोनगरा एवं एक नवीन परिवर्तित मुसलमान मुहम्मद शाह ने मिलकर अलाउद्दीन की सेनाओं से युद्ध कर उन्हें परास्त किया। कान्हड़ देव ने शिवलिंग के भग्नांशों में से नवीन शिवलिंग बनवाए एवं उन्हें प्रभास पाटन, बागदा, आबू, जालौर एवं अपने निजी उद्यान में स्थापित करवाए।
कान्हड़ देव का बाद में मुहम्मद शाह से मतभेद हो गया, क्योंकि उसके सैनिक और वो स्वयं गौमांस खाते थे। ऐसे में मुहम्मद शाह एवं एक और मुसलमान सेनापति कभ्रू, अलाउद्दीन के भय से भागते हुए रणथंभौर के राजा हम्मीर देव चौहान की शरण में चले गए।
हम्मीर ने उन्हें शरण दी, ताकि समय आने पर अलाउद्दीन के विरुद्ध वो इनका प्रयोग कर सके।
अलाउद्दीन ने राजस्थान के रणथंभौर दुर्ग पर 1301 ईसवी में आक्रमण कर दिया तथा अंततः उस पर अधिकार भी कर लिया।
अधिकांश ऐतिहासिक उल्लेखों में रणथंभौर के चौहान शासक हम्मीर देव पर अलाउद्दीन की विजय के विषय में लिखा है। किंतु स्थानीय गौरव गाथाओं में शौर्य और विश्वासघात की बिल्कुल भिन्न कथा का वर्णन है।
लेखक ने रणथंभौर दुर्ग के निकट कई दिवस तक इस विषय में स्थानीय लोगों एवं गाइडों से बातचीत की, किंतु सभी खिलजी एवं हम्मीर के मध्य हुए उस युद्ध में हम्मीर की विजय पर एकमत थे।
यह कथा खिलजी का हिंसक व जिहादी रूप दिखाने के लिए लिखी जा रही है, यद्यपि इतिहासकारों ने जो मिथ्याचार फैला रखा है, उसी पर भारत विखंडन शक्तियाँ अपना दाँव खेल रही हैं।
1300 ईसवी में अलाउद्दीन ने अपने दोनों सेनापतियों नुसरत खाँ एवं उलुग खाँ को रणथंभौर पर आक्रमण करने भेजा।
अलाउद्दीन की अस्सी हजार की सेना ने हम्मीर की सेना पर आक्रमण किया, किंतु मुसलमानों को इसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ा। नुसरत खाँ एक बड़ी गुलेल से छूटे शिलाखंड से मारा गया।
इसके पश्चात् हम्मीर की सेना ने दुर्ग से बाहर आकर मुसलमानों की सेना को तहस-नहस कर दिया।
उलुग खाँ यहाँ से बच निकला और उसने दिल्ली से मदद मँगवाकर इस अभियान को जारी रखा, इसके पश्चात् 1301 ईसवी में खिलजी स्वयं अपनी सेना लेकर इस अभियान में शामिल हो गया।
लंबे समय से दुर्ग को घेरे जाने के कारण दुर्ग में भोजन-पानी समाप्त हो चला था।
राजपूतों के पास अन्य कोई विकल्प नहीं था, सिवाय इसके कि दुर्ग का द्वार खोलकर खुले में युद्ध किया जाए !
विरमा, जाजा, मुहम्मद शाह इत्यादि के साथ मिलकर हम्मीर देव ने दुर्ग के निकट ही खिलजी की सेनाओं पर जमकर आक्रमण किया एवं यह पहले से ही निश्चित किया गया था कि यदि राजपूत हारे तो दुर्ग में महिलाएँ, बच्चों के साथ जौहर करेंगी।
हम्मीर ने खिलजी एवं उलुग की सम्मिलित सेनाओं को भीषण टक्कर दी एवं उन्हें परास्त किया तथा अपने सेनापति रणमल से कहा कि वो ये सूचना दुर्ग में पहुँचा दे। किंतु हम्मीर को ये ज्ञात नहीं था कि रणमल अपने तुच्छ स्वार्थों के चलते खिलजी से जा मिला था और खिलजी ने रणथंभौर विजय के पश्चात् दुर्ग एवं राज्य रणमल को सौंपने का प्रलोभन दे दिया था।
रणमल तथा उसके सहायक रतनपाल ने दुर्ग में रानियों तथा निवासियों को ये बताया कि राजा युद्ध हार गए हैं। इसी समय रतनपाल ने सैनिकों को दुर्ग के पीछे के दरवाजे खोलने का आदेश दिया, जहाँ से खिलजी की सेना ने चुपके से दुर्ग में प्रवेश कर लिया।
हम्मीर देव का परिवार व्यथित हो उठा, उनकी पटरानी रंगा देवी ने अन्य रानियों एवं बच्चों के साथ जौहर कर लिया। हम्मीर की पुत्री, राजकुमारी पद्मला ने शरीर पर शिलाखंड बाँधकर दुर्ग के ही एक कुंड में कूदकर जल-जौहर कर लिया। भारतवर्ष में जल जौहर की ये प्रथम घटना थी। दुर्ग में स्थित ‘पद्मला तालाब’ आज भी उस राजकुमारी के जौहर और बलिदान की गाथा सुनाता प्रतीत होता है।
हम्मीर ने दुर्ग से उठती जौहर की लपटें देखीं तो वो अधीर होकर दुर्ग की ओर दौड़े, किंतु वहाँ जाकर उन्हें रणमल तथा उसके साथियों के विश्वासघात के विषय में ज्ञात हुआ।
उन्होंने रणमल और रतनपाल को दुर्ग के द्वार के निकट ही शिवमंदिर के सामने शिरच्छेद कर मार दिया।
इसके बाद व्यथित हम्मीर, शिव मंदिर में अपना शीश काटकर शिव में लीन हो गए।
इधर रणभूमि में राजपूत सैनिक अपने राजा के बिना भी वीरतापूर्वक लड़ रहे थे, किंतु वो भी अधिक देर तक टिक नहीं पाए। अंततः यद्यपि खिलजी पराजित हुआ था, किंतु फिर भी दुर्ग उसके हाथों में आ गया, जो कि हम्मीर के ही सेनापति के विश्वासघात का परिणाम था।
इधर मलिक काफूर ने भी दक्षिण भारतीय साम्राज्यों को लूटकर उनसे भारी मात्रा में लूटा गया धन अलाउद्दीन की सेवा में भेज दिया।
रणथंभौर पर जीत खिलजी के लिए एक मनोबल बढ़ाने वाली जीत थी और उसने इस दुर्ग को अपने भाड़े के सैनिकों को ‘अल्लाह का पवित्र उपहार’ कहकर उन्हीं के संरक्षण में दे दिया।
अब हम चित्तौड़ की ओर वापस चलते हैं। धीरे-धीरे लूटकर धन एकत्र करना और भाड़े के सैनिकों की एक सेना खड़ी करना ही अब अलाउद्दीन का मुख्य कार्य बन चुका था।
अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर अपनी नजरें गड़ा दीं, क्योंकि चित्तौड़ उत्तरी भारत में हिंदू प्रतिरोध का केंद्र था। अलाउद्दीन अब अपनी धन-संपदा में वृद्धि करने के लिए दक्षिण भारत पर आक्रमण करना चाहता था, किंतु चित्तौड़ उसके लिए एक बड़ी बाधा था। न केवल सैन्य दृष्टि से, वरन् चित्तौड़ अपने दोनों ओर व्यापार के मार्ग भी नियंत्रित करता था।
रानी पद्मिनी की सुंदरता की कहानी मेवाड़ राजमहल के एक सेवक रघुनाथ ने खिलजी के कानों तक पहुँचाई थी। रावल रतन सिंह के दरबार में रघुनाथ कवि था और दरबार में मनोरंजन करता था।
रघुनाथ को हिंदी फिल्मों में और साहित्य में मुख्य ब्राह्मण पुजारी के रूप दिखाया गया है। इसका एकमात्र उद्देश्य है, हमारे पुरोहित वर्ग को विश्वासघाती व देशद्रोही के रूप में नीचा दिखाना। जबकि राजस्थान के ब्राह्मण सबसे प्रतिबद्ध हिंदू थे, जो कि ना केवल राजाओं व प्रजा को धर्म के प्रति जागृत रखते थे, बल्कि, अस्त्र शस्त्र की शिक्षा भी देते थे। उनमें से कई ब्राह्मण स्वयं योद्धा थे और हिंदू युवाओं को युद्ध में प्रशिक्षित करने के लिए अखाड़े चलाते थे।
रणथंभौर और शिवाना के किलों की जीत की सफलताओं के साथ खिलजी ने 1302 ईसवी में चित्तौड़ दुर्ग पर घेराबंदी की। खिलजी ने घेराबंदी हटाने के बदले में राजपूतों के सामने पद्मिनी को समर्पित करने की शर्त रखी।
यह प्रस्ताव राजपूतों के लिए आत्मसमर्पण से भी अधिक अपमानजनक था। जिहादी हत्यारों से लड़ने के लिए आस-पास के राज्यों के सहस्रों राजपूत और हिंदू योद्धा, रतन सिंह के लिए आ खड़े हुए। रावल रतन सिंह और खिलजी के बीच भीषण रक्तपात हुआ और दोनों पक्षों के सहस्रों योद्धा मारे गए। खिलजी ने युद्ध से त्रस्त होकर रतन सिंह को शांति का प्रस्ताव दिया और राणा के साथ सभा का आयोजन करने के लिए कहा।
यह असत्य बहुत प्रचारित किया जाता है कि खिलजी ने पद्मिनी के मुख को दर्पण में प्रतिबिंब के माध्यम से देखने की बाध्यता रखी थी, किंतु किसी भी ऐतिहासिक विवरण से इसकी पुष्टि नहीं हुई है। लेखक को एक भी पुस्तक में इस असत्य का उल्लेख नहीं मिला।
मेवाड़ वंश की परंपरा के अनुसार इस बात की कोई संभावना नहीं है कि स्वाभिमानी राजपूत, खिलजी की माँग को मानने के लिए सहमत हुए होंगे। यद्यपि चित्तौड़ किले में आज यदि कोई पर्यटक आता है तो उसे प्रतिबिंब के इस झूठ के किस्से सुनाए जाते हैं।
खिलजी व रतन सिंह की बैठक केवल युद्धरत राजाओं के बीच संधि की शर्तों पर चर्चा करने के लिए हुई थी। खिलजी अपने साथी जिहादियों के साथ, धर्म के प्रति सत्यनिष्ठ रतन सिंह से मीठी-मीठी बातें करता रहा और कुछ उपहारों के बदले घेराबंदी उठाने को तैयार हो गया। इसके पश्चात् रावल रतन सिंह अपनी सरलता और शिष्टता के चलते खिलजी को दुर्ग के नीचे तक छोड़ने आए। दुर्ग के नीचे पहुँचते ही खिलजी ने अपनी धृष्टता एवं कपटी होने का प्रमाण दे रावल रतन सिंह को बंदी बना लिया। खिलजी ने रावल रतन सिंह को मुक्त करने के बदले शर्त रखी कि रानी पद्मिनी स्वयं खिलजी के पास चली आए।
खिलजी यह भलीभाँति जानता था कि राजपूत सरदार अपनी रानी को कभी समर्पण नहीं करने देंगे तथा खिलजी की सेना से उन्हें युद्ध करना ही पड़ेगा। रावल रतन सिंह की सेना अपने राजा के बिना हताश और व्याकुल हो चुकी थी और खिलजी जानता था कि हतोत्साहित सेना को वह सरलता से पराजित कर देगा।
किंतु खिलजी, एक क्षत्राणी के संकल्प व शौर्य के विषय में कुछ नहीं जानता था। उसके अपने समाज में तो स्त्री का यह रूप उसकी कल्पना से भी परे था।
रानी पद्मिनी स्वयं एक कुशल योद्धा और चतुर नीतिकार थीं।
रानी पद्मिनी ने अपने चाचा गोरा और भतीजे बादल के नेतृत्व में मेवाड़ के श्रेष्ठ योद्धाओं के साथ रतन सिंह को छुड़ा लाने की योजना बनाई।
बादल बहुत कम वय के थे, किंतु राजपूतों से अपेक्षा की जाती थी कि वे इतनी कम आयु में भी दुश्मन से युद्ध करेंगे और बादल के लिए यही बड़े सम्मान की बात थी।
खिलजी को सूचित किया गया कि जब वह चित्तौड़ के आस-पास की खाइयों से अपने सैनिकों को हटा लेगा, उसके पश्चात् ही महारानी पदिमनी को भेजा जाएगा, किंतु केवल उनकी साथी महिलाओं और दासियों के साथ। रानी पद्मिनी ने स्वयं अपनी और अपने साथ आने वाली महिलाओं की मर्यादा और निजता का उल्लंघन रोकने के लिए स्पष्ट माँग की थी।
सात सौ से अधिक पालकियों को तैयार कर लुटेरों के शिविर में भेज दिया गया। प्रत्येक में मेवाड़ के सबसे वीर योद्धाओं को रखा गया था और उनकी पालकी उठाने वालों के वेश में छह सशस्त्र सैनिक थे।
खिलजी ने रतन सिंह और पद्मिनी को बिछड़ने से पूर्व, भेंट के लिए आधे घंटे का समय दिया। रतन सिंह और पद्मिनी कुछ दूर तक पालकी में गए, थोड़ी दूरी पर अश्वारोहियों का एक समूह प्रतीक्षा कर रहा था और इसके आगे वे सुरक्षित रूप से चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश कर गए। इधर 5,000 हिंदू सैनिकों ने खिलजी की सेना को चित्तौड़ के दुर्ग में प्रवेश करने से रोकने के लिए बाहरी द्वार पर मोर्चा बना लिया। खिलजी इस घटनाक्रम से भौंचक्का रह गया और उसने आक्रमण कर दिया।
अपने महाराज रतन सिंह की सुरक्षा के प्रति कटिबद्ध और रानी के सम्मान की रक्षा की एकमात्र इच्छा से गोरा और बादल ने खिलजी के सैनिकों पर विनाश का तांडव शुरू कर दिया। इस विनाशकारी युद्ध में सहस्रों योद्धा मारे गए, किंतु मेवाड़ के योद्धाओं ने आक्रमणकारियों को व्यापक रूप से पीछे धकेल दिया।
अलाउद्दीन खिलजी अपने उद्देश्य में पूरी तरह से पराजित हो गया था और राजपूत सेना द्वारा किए गए विध्वंस को देखकर खिलजी अपनी घेराबंदी समाप्त करने और दिल्ली वापस जाने के लिए बाध्य हो गया।
चित्तौड़ के द्वार पर गोरा वीरगति को प्राप्त हुए। बहुत कम बचे हिंदू योद्धा वापस दुर्ग की सुरक्षा में लौट पाए थे, जिसमें बुरी तरह घायल किशोर बादल भी था।
बादल और उनकी चाची, गोरा की वीर पत्नी के बीच का अद्भुत वार्तालाप उस समय की मान्यताओं पर प्रकाश डालता है। जेम्स टॉड ने इस वार्तालाप को महाकाव्य ‘खुमाण रासो’ से उद्धृत किया है –
चाची बादल से पूछती हैं, “जब वह उनके स्वामी के साथ था तो उन्होंने युद्ध में क्या-क्या किया था?”
बादल ने उत्तर दिया, “वह युद्ध में किसी कृषक की भाँति अपनी तैयार फसल को काट रहे थे। जहाँ-जहाँ उनकी तलवार की चमक दिखाई देती, मैं उनके साथ ही रहा। वे स्वयं शत्रुओं के मृत शरीरों की शय्या बनाकर उनका तकिया लगाकर सम्मानपूर्वक सो रहे हैं, जहाँ एक बर्बर राजकुमार ने उन पर घात किया और वे वीरगति को प्राप्त हुए।”
चाची ने पुनः पूछा, “मुझे बताओ बादल, मेरे स्वामी ने कैसा शौर्य दिखाया?”
इस पर बादल कहते हैं, “अरे माँ! उनके साहसपूर्ण कृत्यों का कोई क्या वर्णन करेगा! उन्होंने तो स्वयं से भय खाने अथवा उनकी प्रशंसा करने के लिए भी किसी शत्रु को जीवित ही नहीं छोड़ा।”
वीर गोरा की पत्नी ने स्मित मुसकान के साथ बालक से विदा लेते हुए कहा, “यदि मुझे और विलंब हुआ, तो मेरे स्वामी क्रुद्ध होंगे।”
इतना कहकर वह वीरांगना अग्नि में प्रवेश कर गई।
इस्लामी बर्बरों को हमारी धरती से दूर रखने के लिए हमारे पूर्वजों ने इस तरह असंख्य बलिदान दिए हैं। अलाउद्दीन ने शेष राजस्थान को लूटकर अपने संसाधनों को फिर से भर दिया एवं दो साल के पश्चात् चित्तौड़ फिर लौट आया। मेवाड़ अभी तक अपने इतने सारे पुत्रों के खोने से उबर भी नहीं पाया था कि खिलजी ने इस बार अपने आक्रमणों को और अधिक सुचारु रूप से नियोजित किया।
महीनों की घेराबंदी के पश्चात् खिलजी ने चित्तौड़ के दक्षिणी भाग में अधिकार कर अपनी सेना का शिविर स्थापित किया। लोकगाथा के अनुसार, रतनसिंह को एक बार स्वप्न आया था। चित्तौड़ की रक्षक देवी ने उससे कहा, “चित्तौड़ पर राजपूत नियंत्रण जारी रखने के लिए राजसी रक्त की आवश्यकता है। जो मुकुट धारण करते हैं, उन्हें चित्तौड़ के लिए अपना रक्त देना होगा, अन्यथा चित्तौड़ की भूमि उनके हाथों से छिन जाएगी।”
रतन सिंह ने मध्यरात्रि में ही अपने सभी सरदारों इत्यादि की एक परिषद् बुलाई और दिव्य स्वप्न के विषय में उन्हें बताया। रतन सिंह के 12 बेटे और भतीजे तैयार थे और यह निर्धारित किया गया कि उनमें से प्रत्येक, एक-एक करके आक्रमण का नेतृत्व करेगा।
खिलजी पर मेवाड़ द्वारा तीन दिन के भारी हमले में सबसे बड़े राजकुँवर अरि सिंह सहित ग्यारह राजकुमार वीरगति को प्राप्त हो गए। तीसरी रात को रतन सिंह के प्रिय पुत्र करण सिंह उत्तरी द्वार से निकलकर केलवाड़ा की सुरक्षा में चले गए। चौथे दिन, रतन सिंह ने घोषणा की, “अब मैं स्वयं को चित्तौड़ की रक्षा में तिरोहित करता हूँ।”
किंतु यह कोई साधारण घोषणा नहीं थी, क्योंकि उस घोषणा के साथ ही भारत की आत्मा पर एक घना अंधकार छा जाने वाला था। 18 अगस्त, 1303 ईसवी को चित्तौड़ दुर्ग के भीतर सहस्रों अन्य महिलाओं के साथ मेवाड़ की महारानी, परम सुंदरी, वीरांगना पद्मिनी ने स्वयं को अग्नि को समर्पित करने हेतु ‘जौहर’ के लिए तैयार किया।
म्लेच्छों द्वारा बंदी बनाए जाने या अपवित्र किए जाने से बचने के लिए और कोई विकल्प अब नहीं बचा था। भूमिगत सुरंग में बने अभेद्य कक्षों में इन ललनाओं ने प्रवेश किया, जहाँ प्रकाश की किरणें तक नहीं पहुँच सकती थीं। चित्तौड़ के रक्षक योद्धा अपना हृदय कठोर कर, पथराई आँखों से अपनी पत्नियों, माँओं, बहनों एवं पुत्रियों को एक जुलूस के रूप में, मोक्ष के पथ पर जाते हुए देख रहे थे।
पतियों ने अपनी पत्नियों की माँग अंतिम बार भरी। जिन स्त्रियों के आलिंगन में प्रेम की चरम अनुभूतियाँ छुई थीं, उनसे अंतिम बार आँखें मिलीं। हर पुरुष असहाय भी था और निश्चिंत भी। असहाय, क्योंकि अपनी स्त्री को जलने भेज रहा था, निश्चिंत इसलिए कि अब कोई दुर्गंध से युक्त म्लेच्छ उसकी स्त्री को नहीं छू सकता था।
बापों ने बेटियों के माथे चूमे होंगे! अंतिम बार अपनी लाड़ली के तन की सुगंध से अपनी आत्मा को तरंगित किया होगा! नन्हे बच्चों को माँओं से बाँधते समय झूठा दिलासा दिया होगा कि मैं भी पीछे-पीछे आ रहा हूँ।
सब वीरांगनाओं ने पुरोहितों, गुरुओं व चारणों से आशीष लिया होगा कि इस परीक्षा की घड़ी में चित्त में कायरता का कोई कंपन न हो जाए!
पुरुषों व गुरुओं ने अपना हृदय पाषाण का कर, सब संवेदनाओं से रिक्त कर लिया होगा, कि यदि दुर्बलता की एक लकीर भी चेहरे पर दिखी तो हमारी नारियों की अंतिम यात्रा ही कष्टपूर्ण हो जाएगी।
और यह सौ, दो सौ, पाँच सौ लोगों की नहीं, पूरे चित्तौड़ के सहस्रों लड़ाकों व उनके परिवार की भावदशा थी।
आत्मसम्मान की रक्षा व बर्बरता के प्रति अस्वीकार की हठ के सम्मुख जीवन, संबंध, करुणा, प्रेम, ममता सब गौण व निरर्थक हो गया था।
जब सभी महिलाएँ सुरंग में प्रवेश कर गईं तो महारानी पद्मिनी ने सुरंग के कपाट बंद कर लिये, ताकि उस अग्निकुंड में जो भी महिलाएँ-बालिकाएँ थीं, उनके सम्मान और शुचिता को तातारियों की वासना से दूषित होने से बचाया जा सके।
मेवाड़ की वीरांगनाओं का गौरव, अब उस कपाट के पीछे सुरंग में बंद था, ताकि वे अग्नि के वृत्त में अपने सम्मान को सुरक्षित रख पाएँ। हमारे इन अद्भुत पूर्वजों से जो क्रूरतम शक्तियाँ थी नहीं छीन सकती थीं, वह था ‘आत्मगौरव’। उस दिन जौहर की उठती ज्वाला में जो अब सुरक्षित था।
अग्नि की ज्वाला में अपना जीवित शरीर समर्पित कर देना किसी भी प्रकार से सरल नहीं है। काल व वार्धक्य से एक दिन जो शरीर चुक ही जाना था, हिंदू वीरांगनाओं ने उस दिन स्वेच्छा से राख कर दिया। सभी जातियों की महिलाएँ, चाहे वे किसी भी आयु की हों या उनके वस्त्र कैसे भी हों, सभी ने जौहर के उस गौरवशाली दिन, सिर उठा, स्वेच्छा से स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया।
अत्यंत सुंदर रानी पद्मिनी ने अपने सुंदर शरीर, गौरवर्णी त्वचा को जलते हुए फफोलों में बदलने का पीड़ादायक मार्ग चुना, क्योंकि अफगानिस्तान से आए इन बर्बर, कामुक हत्यारों ने उनके पास और कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा था। जौहर, मेवाड़ की उन महान स्त्रियों के साहसी अस्वीकार का एक उदाहरण है, जिन्होंने तातारी आक्रमणकारियों के सामने किसी भी तरह के समर्पण से मना कर दिया।
यह उन स्त्रियों का दृढ़ संकल्प ही था, जिसके कारण आक्रांता उन्हें छूना तो दूर, उनके शरीर को देख भी नहीं पाए। यही कारण है कि चित्तौड़ की महान रानी पद्मिनी ने, लगभग 20,000 विश्वासपात्र दासियों, सखियों एवं चित्तौड़ की साधारण नारियों के साथ उन क्रूर व्यभिचारी आक्रांताओं के मुँह पर द्वार बंद कर दिया, जिनके आचार-विचार-व्यवहार में सुंदरता एवं शुचिता का कोई मूल्य नहीं था। हिंदू स्त्री शक्ति ने मुसलमान पुरुषों की कुरूप वासना को एक भयानक उपक्रम से अस्वीकार कर, तिरस्कृत कर दिया।
चित्तौड़ दुर्ग की शिलाओं के गर्भ में बनी उस भूमिगत सुरंग में प्रवेश कर मेवाड़ की गौरवशाली वीरांगनाओं ने इस्लामी आक्रांताओं एवं इस देश के हिंदुओं को भी स्पष्ट संदेश दे दिया था कि सम्मान और स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
जौहर की आत्माहुति से देवीस्वरूपा महारानी पद्मिनी ने भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष को सदा के लिए जड़वत कर दिया। जौहर की ज्वाला से उड़ते अंगारों ने इन बर्बर शक्तियों के साथ सह अस्तित्व की सभी संभावनाओं को भस्म कर दिया। यह स्पष्ट हो गया था कि ये मतांध तातार हमें बलपूर्वक अपने अधीन करना चाहते हैं और हम यह होने नहीं देंगे।
उस पवित्र दिन हुए जौहर ने, आने वाली पीढ़ियों को भी यह संदेश दिया कि लुटेरों के इस झुंड से लड़ने के लिए उन्हें भी बलिदान देना होगा, जैसा महारानी पद्मिनी ने किया और सम्मान के साथ अमरत्व को प्राप्त हो गईं।
चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी इस देश के महान लोगों के हृदय में तब तक जीवित रहेंगी, जब तक आखिरी हिंदू जीवित है। अलाउद्दीन खिलजी को अपनी वासना की संतुष्टि के लिए वहाँ राख के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला और क्रोध में उसने चित्तौड़ को लूटने और नरसंहार करने का आदेश दे दिया।
इस प्रकार, कासिम के सिंध पर आक्रमण के छह सौ वर्षों के संघर्ष के बाद, वर्ष 1303 ईसवी में, इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध हिंदू प्रतिरोध का सबसे बड़ा केंद्र चित्तौड़; हिंदुओं के हाथ से छिनकर, इस देश में आए सबसे भयंकर आक्रांता के हाथों में चला गया।
अपनी खीज में अलाउद्दीन ने 26 अगस्त, 1303 ईसवी को चित्तौड़ के तीस सहस्र साधारण नागरिकों की हत्या का आदेश दिया।
महत्त्वाकांक्षा एवं धर्मांधता के विषय में अलाउद्दीन खिलजी, औरंगजेब के समान ही निकृष्ट था।
उसने स्वयं को ‘सिकंदर-ए-सानी’ यानी दूसरे सिकंदर के रूप में भी प्रचलित किया, जिसे उसने अपने समय के सिक्कों पर लिखवाया। खिलजी ने अगले कुछ दिनों में चित्तौड़ में निर्मित प्रत्येक भवन एवं भव्य मंदिरों को लूटा व तोड़ा।
धर्मांधता से प्रेरित होकर उसने बर्बरता एवं धृष्टता की समस्त सीमाएँ पार कर दीं तथा कला और स्थापत्य के अद्भुत उदाहरण सभी स्मारकों को ध्वस्त कर, दुर्ग को अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंप वह शेष राजस्थान में विध्वंस फैलाने आगे बढ़ गया।
गौरवशाली अहुलवाड़ा, प्राचीन धार और अवंती, मंडोर और देवगीर, सोलंकी, परमार और प्रतिहारों की गद्दियाँ तथा अग्निकुल के समस्त वंशों को अलाउद्दीन खिलजी की दरिंदगी ने हमेशा के लिए उलट दिया था।
जैसलमेर, गागरौन, बूँदी, जालौर सभी के हिंदुओं को इस भयावह दुश्मन के आक्रमण का सामना करना पड़ा। यह राजपूतों की दृढ़ता एवं धैर्य ही था, जिसके बल पर वह खिलजी जैसे कट्टर धर्मावलंबी शत्रु द्वारा इतनी बुरी तरह ध्वंस होने के पश्चात् भी कुछ ही वर्षों में पुनः इस्लामी साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष हेतु उठ खड़े हुए।
खिलजी ने राजपूतों को युद्ध और धार्मिक घृणा का अत्यंत कटु अनुभव करवा दिया था। जिहाद की इस हत्यारी मशीन के विरुद्ध युद्ध में सरल हृदय, न्यायपूर्ण और नैतिक सिद्धांतों का कोई स्थान ही नहीं था और आने वाली शताब्दियों में यह स्पष्ट भी हो गया कि राजपूतों ने इस भीषण ध्वंस से बहुत कुछ सीखा।
जैसे-जैसे पश्चिमी सीमा से आक्रमणकारियों की भीड़ भारत में आती रही, मेवाड़ के महाराणाओं के नेतृत्व में भारत के हिंदू लड़ते रहे और उन्हें पराजित करते रहे।
खिलजी से तुगलक और सैयद से लोदी और फिर मुगल, शताब्दियों तक आक्रमणकारियों के जाति एवं वंश बदलते रहे, किंतु उन्होंने मेवाड़ राजवंश में स्थापित सिसोदिया वंश को सदैव गौरव के साथ केसरिया ध्वज और स्वतंत्रता की भावना को प्रबलता से उठाए हुए पाया।
महारानी पद्मिनी और चित्तौड़ में उनके साथियों द्वारा स्वैच्छिक बलिदान की ऊष्मा ही थी, जिसने मेवाड़ के वंशजों में आक्रमणकारियों की क्रूर शक्ति के समक्ष संघर्ष की उस ज्वाला को प्रज्वलित रखा, जो उनके पूर्वजों ने जौहर से चेतन की थी।
रतन सिंह के पुत्र करण सिंह ने केलवाड़ा के पर्वतीय क्षेत्र में शरण ली एवं चित्तौड़ को पुनः प्राप्त करने के लिए सेना एकत्र करना प्रारंभ किया। करण के दो पुत्र राहप एवं माहप हुए। बड़े पुत्र माहप, डूंगरपुर की ओर निकल गए एवं उस पर अधिकार कर लिया। छोटे राहप, कुशल योद्धा था। वो सिसोद नाम के गाँव में बस गए। इसी सिसोद गाँव के पीछे उनके वंशजों को कालांतर में ‘सिसोदिया’ के नाम से जाना जाने लगा।
चित्तौड़ को पुनः प्राप्त करने के लिए हुए युद्ध में राहप अपने पिता करण सिंह के साथ वीरगति को प्राप्त हुए।
तीन दशकों की एक छोटी सी अवधि में सिसोदिया वंश की नौ पीढ़ियाँ चित्तौड़ को पुनः प्राप्त करने के उद्योग में समाप्त हो गईं, जिसे अंततः भुवन सिंह ने एक भयंकर लड़ाई के पश्चात् पुनः प्राप्त कर लिया।
इस प्रकार रेगिस्तान के धर्मांध आक्रांताओं द्वारा चित्तौड़ के पहले अधिग्रहण और मेवाड़ के गौरवशाली पुत्रों द्वारा पुनः प्राप्त करने की कथा समाप्त होती है।
इस युद्ध की स्मृतियों, तथ्यों एवं सत्य ने शताब्दियों तक राजस्थान की लोककथाओं में वीरता और प्रेम की कई कल्पनाओं, कविताओं व कथाओं को जन्म दिया है। किंतु कोई भी इस तथ्य को अस्वीकार नहीं कर सकता कि एक गौरवर्णी, अति सुंदर, बुद्धिमान और साहसी रानी पद्मिनी थीं, जिन्होंने राजस्थान के हिंदू इतिहास का पहला जौहर किया। इस प्रकार इस्लामी लुटेरों द्वारा हमारी वैदिक भूमि की महिलाओं का हरण करने और हिंदुओं का विनाश करने के मंतव्य के विरुद्ध एक अपरिवर्तनीय संघर्ष की आधारशिला रखी।
यह संघर्ष शताब्दियों के पश्चात् भी आज भी कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूप में चल रहा है और जब तक हिंदुओं में स्वतंत्रता की उत्कट प्यास है, यह संघर्ष चलता रहेगा। महारानी पद्मिनी आज भी उस दृढ़ हिंदू भावना का प्रतीक हैं, जिसके सम्मान और स्वतंत्रता को बलपूर्वक झुकाया नहीं जा सकता।
हमें स्वयं को धन्य मानना चाहिए कि हम उन अद्भुत रानी एवं वीर राजा, रावल रतन सिंह की परंपरा के वाहक हैं। अब यह हम पर निर्भर है कि हम रानी पद्मिनी के सर्वोच्च बलिदान द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देने वाले उस संघर्ष को जारी रखें और कभी भी, किसी भी मूल्य पर, कामांध हत्यारों के समक्ष आत्मसमर्पण न करें।