रावल जैत्र सिंह (1213-1253 ईसवी)
रावल जैत्रसिंह का जीवन एवं कार्य तीन कारणों से विशेष रहा। प्रथम, रावल जैत्र सिंह तेरहवीं शताब्दी में अफगानों एवं तुर्क आक्रमणकारियों के विरुद्ध हिंदू संघां में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी रहे।
बाप्पा रावल, खुमाण तथा शक्ति कुमार की इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध विजय-यात्राओं के पश्चात् रावल जैत्र सिंह ने इस संघर्ष को जीवित रखा।
द्वितीय, जैत्र सिंह की विभिन्न युद्धों में विजय के परिणाम स्वरूप दिल्ली सल्तनत नाम का झूठ पुनः खुलकर सामने आ जाता है। पराजित मुसलमान लुटेरों को सुल्तान बताने में इस देश के इतिहासकारों को लज्जा भी नहीं आई।
इनमें 1224 से 1234 ईसवी तक शमसुद्दीन इल्तुत्मिश के साथ लड़ा गया एक दीर्घकालीन युद्ध प्रमुख है।
तृतीय एवं सबसे महत्त्वपूर्ण कारण, क्योंकि श्यामलदास एवं टॉड द्वारा अपने लेखन में इस महान राजा का उल्लेख नहीं किया गया है, अतः ऐसे महापराक्रमी राजा के विषय में पाठकों को अवगत कराना और भी आवश्यक हो जाता है। उनके राज्यकाल के विषय में पुराने इतिहासकारों द्वारा न लिखे जाने का कारण कदाचित् उनके विषय में शोध की कमी को दर्शाता है।
चीड़वा ग्राम में मिले 1273 ईसवी के एक शिलालेख से रावल जैत्र सिंह के विषय में कुछ तथ्यपरक जानकारी प्राप्त हुई है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा द्वारा 1983 में लिखित ‘राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत’ नामक पुस्तक में पृष्ठ संख्या 110 पर, उदयपुर से आठ मील दूर चित्तौड़गढ़ में प्रतापगढ़ तहसील में बने एक मंदिर के मुख्य द्वार पर बाप्पा रावल के वंशजों पद्म सिंह, जैत्र सिंह, तेज सिंह एवं समर सिंह के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
इसे ‘चीड़वा आलेख’ कहा गया है, वियना के ‘ओरिएंटल एंड इंडियन एंटिक्वेरी जर्नल्स’ में चीड़वा तथा माउंट आबू के आलेखों का और उनमें जैत्र सिंह के विषय में किए गए महत्त्वपूर्ण उल्लेखों का पता चलता है।
इंडियन एंटिक्वेरी, भाग 57 में भी चीड़वा आलेख तथा जैत्र सिंह के विषय में एक लेख प्राप्त होता है। इन्हीं स्रोतों के आधार पर हम मेवाड़ के इस महान रावल की कथा कहने का प्रयास करेंगे।
1192 ईसवी में तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गौरी के सामने हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान को पहली बार पराजय का सामना करना पड़ा। इस पराजय से भारत में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का स्वरूप सदा के लिए बदल गया। इससे पूर्व अरब, अफगान लुटेरों को 500 वर्षों तक हिंदुओं ने भारत में नहीं घुसने दिया। गजनी का महमूद, सोमनाथ का विध्वंस करके वापस जाने को विवश हुआ। पृथ्वीराज चौहान की हत्या के बाद ये लुटेरे यहीं रुक गए। भारत माँ के वक्ष पर यह शूल सदा के लिए गड़ गया।
गौरी ने पृथ्वीराज की हत्या कर दी एवं अपने दास कुतुबुद्दीन ऐबक को उत्तर भारत का गवर्नर बना दिया।
ऐबक, गौरी का दास था और उसे गवर्नर बनाने का कारण था, गौरी की एकमात्र संतान का पुत्री होना। ऐबक की 1210 ईसवी में पोलो खेलते समय मृत्यु हो गई तथा शमसुद्दीन इल्तुत्मिश को ऐबक का कार्यभार प्राप्त हुआ। इल्तुत्मिश एक क्रूर इस्लामी शासक था, जिसने एक बड़ी सेना तैयार कर रणथंभौर तथा मंडोर के हिंदू राज्यों को नष्ट करना आरंभ कर दिया। इल्तुत्मिश ने राजस्थान के कई प्रमुख शिक्षा स्थलों को ध्वस्त कर मेवाड़ की ओर मुँह किया। यहाँ उसका सामना मेवाड़ के रावल जैत्र सिंह से हुआ, जो उस समय नागदा नामक सुंदर मंदिरों की नगरी से मेवाड़ का शासन चलाते थे। यह नागदा नगरी, वर्तमान के उदयपुर से 20 किलोमीटर दूर स्थित थी तथा चित्तौड़ के अतिरिक्त इसे भी मेवाड़ की वैकल्पिक राजधानी होने का गौरव प्राप्त था।
ऐसा कहा जाता है कि उस समय नागदा में 999 शैव-वैष्णव एवं जैन मंदिर थे।
जैत्र सिंह के राज्यकाल में मेवाड़, चाँदी के व्यापार का एक प्रमुख केंद्र बनकर भी उभरा था।
इल्तुत्मिश ने मेवाड़ एवं अजमेर के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया था। चौहान अब भी क्षीण थे, अतः पराजित हुए तथा इल्तुत्मिश ने नंदेशमा के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को भी तोड़ दिया।
उस समय में मग ब्राह्मण, महान ज्योतिषी माने जाते थे एवं इन सूर्य मंदिरों का निर्माण, ग्रहों की गणना हेतु उन्हीं के द्वारा करवाया जाता रहा था। ये सूर्य मंदिर ज्योतिष शिक्षा के महान केंद्र भी माने जाते थे। ऐसा माना गया है कि नांदेशमा का सूर्य मंदिर मेवाड़ में तोड़े गए मंदिरों में पहला था।
1229 ईसवी में जैत्र सिंह एवं पामराज टाँटेड़ की अगुवाई में मेवाड़ की सेना ने इल्तुत्मिश पर उस घाटी में आक्रमण किया, जो गोगँदा को नागदा से जोड़ती थी। इसे ‘भूताला का युद्ध’ भी कहा जाता है। राजस्थान में हुए युद्धों में यह सबसे भीषण युद्ध था, क्योंकि इसमें दोनों ही ओर से सहस्रों योद्धा मारे गए थे। टाँटेड़ अपने राजा की रक्षा में वीरगति को प्राप्त हुए, किंतु उससे पूर्व उन्होंने अपने राजा जैत्र सिंह को इस्लामियों से बचा लिया। जैत्र सिंह ने यहाँ से बचकर नागदा के एक घर में शरण ली, किंतु इल्तुत्मिश ने अपनी क्रूरता का परिचय देते हुए संपूर्ण नागदा नगरी को जला दिया एवं वहाँ के समस्त मंदिरों को भी ध्वस्त कर दिया।
चौहानों, सोलंकियों, परमारों, चारणों एवं वनवासी भीलों के दलों ने मुसलमानों की सेना पर भरपूर आक्रमण किया। इसका लाभउठाकर जैत्र सिंह सकुशल वहाँ से बच निकले। इस युद्ध में इल्तुत्मिश की सेना को भी भीषण हानि उठानी पड़ी तथा वह भी पीछे हट गया। नागदा का विध्वंस, हिंदू धर्म पर इस्लामियों द्वारा भारतीय उप महाद्वीप में बड़ा ही क्रूर एवं इतिहास द्वारा उपेक्षित आघात है। प्रत्येक मूर्ति एवं मंदिर को इस प्रकार तोड़ा गया था कि उसे पुनः बनाया ही न जा सके।
मेवाड़ में एक प्रसिद्ध कहावत है, जो इस निर्दयी विध्वंस का सटीक चित्रण करती है–
‘अल्त्या रे मस मूरताऊं बाध्यां आवै,
जैत नीं पावै तो नागदो हलगावै।’
(अर्थात् इल्तुत्मिश के मुसलमान मूर्तियों से युद्ध कर रहे हैं, जैत्र सिंह को न पाकर नागदा को ही जला रहे हैं।)
हिंदू मंदिरों को तोड़ने की धर्मांधता एवं मद में चूर इल्तुत्मिश ने अमूल्य स्थापत्य तथा ऐतिहासिक आलेखों का भी विनाश कर दिया। आज भी नागदा के अवशेष इस्लामी लुटेरों की क्रूरता के हाथों विधूसरित मेवाड़ की क्षत-विक्षत आत्मा के मूक उदाहरण बने खड़े हैं। इन अवशेषों का वैभव देखकर प्रतीत होता है कि कितने महान और गौरवशाली स्थापत्य के निर्माण, दुष्टों की मदांधता की भेंट चढ़ गए। जैत्र सिंह ने नागदा में भूताला के बलिदानियों की स्मृति में बाघेला तालाब खुदवाया। नागदा में एक बहुप्रसिद्ध सहस्त्रबाहु का मंदिर आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। इसके नाम के अपभ्रंश के कारण इसे ‘सास-बहू’ का मंदिर भी कहा जाता है।
लगभग सभी जिहादी इतिहासकारों ने मुस्लिम आक्रांताओं की झूठी उदारता के विषय में लिख लिखकर अपनी लेखनी को घिस डाला। यह झूठ भी फैलाया कि मुसलमान शासकों द्वारा हिंदू मंदिरों को तोड़े जाने की घटनाएँ हिंदुवादियों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर बताई जाती रही हैं। कदाचित् कभी तो इतिहासकारों का रूप धरे ये मिथ्याचारी वामपंथी, नागदा के इन अवशेषों को स्वयं देख पाएँ तो उन्हें वास्तविकता ज्ञात होगी कि इस्लामियों ने हिंदुओं एवं उनकी धार्मिक आस्था पर कितनी क्रूर और भीषण चोट की है। कदाचित् उन्हें थोड़ी लज्जा आए कि देश की सरल-मन जनता को वो किस प्रकार से झूठ के ग्रास खिला रहे हैं।
इसी कालखंड में गुजरात पर सोलंकी राजा भीम देव का शासन था, जिन्हें ‘भोला भीम’ भी कहा जाता था। इसका कारण कुछ तो उनकी छोटी आयु और कुछ उनका स्वभाव था। वास्तव में सत्ता पर बघेल पिता-पुत्र, राणा लवण प्रसाद एवं उनके पुत्र वीरधवल का प्रभाव था। इस काल में गुजरात की शक्ति का निरंतर ह्रास हो रहा था और फलस्वरूप इल्तुत्मिश ने गुजरात पर अपनी लोभी दृष्टि डाल दी थी। ऐसे में वीरधवल ने नागदा के विध्वंस से पूर्व मेवाड़ के जैत्र सिंह तथा मारवाड़ के सोम सिंह, उदय सिंह एवं धारावर्ष से उनकी सैन्य सहायता हेतु संपर्क किया। जैत्र सिंह के पूर्वज, मेवाड़ के रावल सामंत सिंह को चार पीढ़ी पूर्व गुजरात के कीटू चौहान ने पराजित किया था एवं कुमार सिंह तथा पद्म सिंह के राज्यकाल में मेवाड़, गुजरात का एक हिस्सा मात्र बनकर रह गया था।
ऐसे में जैत्र सिंह ने अपने राज्यकाल के शुरुआती दिनों में गुजरात से संबंध विच्छेद कर लिया था और इसी कारण उन्होंने वीरधवल के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसी बीच इल्तुत्मिश ने राजस्थान को लूटकर अथाह धन प्राप्त किया तथा उसने हिंदू सैनिकों को भी इसी धन के बल पर अपनी सेना में सम्मिलित कर एक बड़ी सेना का निर्माण कर लिया।
जैत्र सिंह ने इल्तुत्मिश की सैन्य शक्ति का अनुचित अनुमान किया, परिणामस्वरूप उन्हें इल्तुत्मिश के सामने पराजय का मुँह देखना पड़ा। इस युद्ध में उनके कई प्रमुख राजपूत सरदार वीरगति को प्राप्त हुए तथा नागदा का पूर्णतया विनाश भी हो गया।
जैत्र सिंह ने चित्तौड़ में शरण ली तथा वीरधवल के पास अपने दूत भेजकर इल्तुत्मिश के विरुद्ध लड़ने का प्रस्ताव रखा। अंततः हिंदुओं ने एकता जुटाई और मेवाड़ में एक अनजान जगह पर 1234 ईसवी में तुमुल युद्ध में इल्तुत्मिश की पराजय हुई। यह युद्ध आठ माह तक चला। अपनी पराजय से व्यथित इल्तुत्मिश इस युद्ध के कुछ समय पश्चात् 1236 ईसवी में मर गया। तथाकथित दिल्ली सल्तनत की यह प्रथम पराजय थी, वह भी मेवाड़ के एक राजा के हाथों। चीड़वा के आलेख में इस विजय को कुछ इस प्रकार लिखा गया है “जैत्र सिंह ने पृथ्वी को बचा लिया और ऋषि अगस्त्य की भाँति तुर्कों की सेना के प्राण पी लिये।” इस आलेख में हिंदू ऋषि अगस्त्य का उल्लेख किया गया है, जिनके विषय में कथा है कि उन्होंने पूरा समुद्र पी लिया था।
इस प्रकार जैत्र सिंह ने मेवाड़ के चाँदी के व्यापार को बचा लिया और अपने राज्य को भी, जो विनाश के कगार पर खड़ा था। इसके पश्चात् नागदा को पूरी तरह छोड़ दिया गया और जैत्र सिंह ने चित्तौड़ को मेवाड़ की राजधानी घोषित किया।
जैत्र सिंह ने सिंध के मुसलमानों की सेना को भी पराजित किया था। आबू के आलेख में इस विजय का वर्णन कुछ इस प्रकार है–
“मेवाड़ की सेना प्रेतों की भाँति सिंध की सेना का रक्तपान कर रही थी और जैत्र सिंह की जय-जयकार कर रही थी।” श्री गौरीशंकर ओझा ने फारसी ग्रंथों के अध्ययन के बाद लिखा है कि जलालुद्दीन के नेतृत्व में सिंध के मुसलमानों की सेना ने सिंध में थट्टा के जय सिंह को पराजित कर गुजरात की ओर कदम बढ़ाए, किंतु रावल जैत्र सिंह ने उसे रास्ते में ही रोक लिया और उसे पराजित कर उसकी धन-संपदा इत्यादि को लूट लिया।
जैत्र सिंह का अंतिम युद्ध दिल्ली के नसरुद्दीन महमूद से 1248 ईसवी में हुआ। यह युद्ध आठ महीनों तक चला, जिसके पश्चात् नसरुद्दीन पुनः दिल्ली को लौट गया। इस्लामी आक्रांताओं से संघर्ष के अतिरिक्त जैत्र सिंह ने 1242 ईसवी में गुजरात के त्रिभुवन पाल, मालवा के परमार शासकों एवं मेवाड़ के आस-पास छोटे राज्यों को पराजित कर अपने परिवार की सत्ता एवं संप्रभुता स्थापित की। मेवाड़ के इन महान राजा ने लंबे समय तक शासन किया एवं शासन का भार अपने पुत्र तेज सिंह को अपने जीवनकाल में ही सौंप दिया। जैत्र सिंह दीर्घायु को प्राप्त हुए एवं 1253-61 ईसवी के मध्य प्राकृतिक कारणों से उनका देहावसान हुआ।
रावल तेज सिंह भी पिता के समान प्रतापी और शौर्यवान राजा थे और उन्होंने भी मेवाड़ की सीमाओं एवं ख्याति का विस्तार किया। अपने जीवनकाल में उन्होंने गुजरात के बीसल देव को पराजित किया। तेज सिंह ने 1273 ईसवी तक शासन किया एवं उनके पश्चात् उनके पुत्र समर सिंह ने 30 वर्षों तक मेवाड़ पर शासन किया। समर सिंह ने गुजरात के साथ मैत्री करके दास वंश के दुर्दात इस्लामी हत्यारे, गयासुद्दीन बल्बन को पराजित कर उसे पुनः दिल्ली की सीमाओं तक ही सीमित कर दिया। चीड़वा के आलेख में रावल समर सिंह को 'शत्रुओं के हंता सिंह' के समान बताया गया है, जिसका तेज चंद्रमा के समान शीतल है, उसे अपने कर्म का धनी और धर्म का प्रबल अनुयायी बताया गया है। रावल समर सिंह का देहावसान 1303 ईसवी में हुआ और उनके पश्चात् रावल रतन सिंह मेवाड़ के शासक बने। युवा रावल रतन सिंह के राज्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा किया गया धूर्तता एवं क्रूरतापूर्ण आक्रमण मेवाड़ के इतिहास में ही नहीं, वरन् भारतीय उपमहाद्वीप में हुए हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के इतिहास में भी काले अक्षरों में अंकित है।
इसके साथ अब हम उस कालखंड के अंत पर आ पहुँचे हैं, जिसमें 600 वर्षों तक हिंदुओं ने इस्लाम को टिकने नहीं दिया। यहाँ से आगे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष एक भिन्न स्वरूप में खेला गया।
पृथ्वीराज की हत्या के पश्चात्, भारत के उत्तरी भाग में अफगान और तुर्क मुसलमानों के दासों द्वारा इस्लामी शासन की स्थापना हो चुकी थी। अरबों के आक्रमण अब भूतकाल की बात हो चुकी थी। इस्लाम 600 वर्षों के संघर्ष और नरसंहार के बाद अब भारत में प्रवेश कर चुका था। मेवाड़ ने अपने अंतहीन प्रयासों से चित्तौड़ को इस्लामी शासन से दूर ही रखा था, किंतु अपनी सीमाओं से परे अब वो भी इसे रोक नहीं सका। अतः देश के अन्य भागों, जैसे- सिंध, बंगाल, बिहार इत्यादि में इस्लामी शासन कुकुरमुत्तों की तरह प्रसार करने लगा। कन्नौज से राठौड़ों को मारवाड़ की ओर आने पर बाध्य होना पड़ा, इसी प्रकार ग्वालियर के राजपूतों को भी अपना क्षेत्र छोड़कर आमेर के कच्छावा राजाओं के पास आना पड़ा।
मेवाड़ के अतिरिक्त आमेर व मारवाड़ के दोनों वंश, आगामी 400 वर्षों के लिए इस्लामी उपद्रवियों से संघर्ष के लिए राजस्थान की पवित्र भूमि पर बीज रूप में स्थापित हो चुके थे। रावल जैत्र सिंह तथा समर सिंह राजस्थान की लोक-गाथाओं में ऐसे अमर पात्र बन गए, जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों को इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
लेखक को पुस्तक के इस भाग में, हिंदुओं द्वारा विस्मृत रावल जैत्र सिंह के शौर्य की गाथा लिखने में अतुलनीय संतोष प्राप्त हुआ है। किंतु एक बात, जो उल्लेखनीय है कि जैत्र सिंह के बिना, मुसलमानों का दास वंश अत्यंत सरलता से पूरे भारतवर्ष का इस्लामीकरण कर चुका होता। अतः हमें इन सभी महाराणाओं को उनकी दूरदर्शिता को तथा उनके शौर्य को हृदय से नमन करना चाहिए, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों से उठकर इस्लामी विस्तारवादियों से संघर्ष कर उन्हें पराजित किया।
यदि इस्लामिक सामाजिक व्यवस्था ने धर्मोन्मत्त मनोरोगियों की सेना को जन्म दिया है, जो अपनी धर्मांधता के प्रसार हेतु बार-बार आक्रमण करते रहे, तो हिंदू धर्म ने भी ऐसे महान मेवाड़ के महाराणाओं को उत्पन्न किया है, जिन्होंने अपनी संघर्षशीलता, शौर्य एवं हिंदू धर्म के प्रति अपने प्रेम और आस्था से कुल एक सहस्त्र वर्षों तक सतत संघर्ष किया और अपने देश तथा धर्म को बचाए रखा।