Khand - 02 Maharana in Hindi Motivational Stories by Hind Gaurav books and stories PDF | खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 1

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खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 1

महाराणा प्रताप सिंह : बाल्यकाल व युवावस्था
(1572-1597 ईसवी)

बाल्यकाल एवं यौवन
सांगा की हत्या के उपरांत मेवाड़ में सत्ता पाने के लिए गृहयुद्ध छिड़ गया। उस काल का संक्षिप्त विवरण इसलिए आवश्यक हो जाता है, क्योंकि इस गृहयुद्ध का प्रताप के जीवन व व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। साथ ही हमें यह संदेश भी मिलता है कि एक राष्ट्र की प्रगति व स्वतंत्रता के संघर्ष में नेतृत्व की रक्षा कितनी आवश्यक है! सभ्यता जब एक विराट समझ वाले नेता को खोती है तो अराजकता व अशांति ही परिणाम होता है।

समाज का संतुलन व शांति का निर्वहन, क्षणभंगुर होता है। कभी एक व्यक्ति की अनुपस्थिति से समाज की पूरी संरचना ढह सकती है, तो कभी एक व्यक्ति की उपस्थिति डूबती हुई सभ्यताओं को बचा सकती है।

1528 ईसवी में सांगा की हत्या के पश्चात् उनके पुत्र रतन सिंह द्वितीय सिंहासन पर विराजे। रतन सिंह ने मालवा के सुल्तान को पराजित किया। वे सुदृढ़ शासन चला रहे थे कि उनके सौतेले मामा सूरजमल के साथ उनका वैर हो गया। दोनों के बीच हुए तलवार युद्ध में रतन सिंह का निधन हो गया।

सूरजमल, सांगा की पत्नी, महारानी कर्मावती के भाई थे। कर्मावती अपने पुत्र विक्रमादित्य को राजा बनाना चाहती थीं तथा यह अवसर उन्हें रतन सिंह की हत्या से मिल गया। विक्रमादित्य बहुत ही निम्न कोटि का शासक व राजा सिद्ध हुआ। वह मल्ल युद्ध करने वाले पहलवानों को अपने आस-पास रखता तथा मेवाड के निष्ठावान व बुद्धिमान सामंतों का निरंतर अपमान करता। मेवाड़ के सामंत चित्तौड़ से दूर होते गए। यह जानकर गुजरात के मुसलमान शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी। यह वही बहादुर शाह था, जिसे सांगा ने चित्तौड़ में शरण दी थी।

यहाँ एक और असत्य को गिराना आवश्यक हो जाता है। एक विचित्र व पूर्ण रूप से निराधार बात महारानी कर्मावती के विषय में प्रचलित की गई है। वह यह कि कर्मावती ने बाबर के बेटे हूमायूँ को एक राखी भेजकर चित्तौड़ की रक्षा की गुहार लगाई। जबकि ऐसी कोई राखी महारानी के द्वारा भेजी ही नहीं गई। ‘वीर विनोद’ के अनुसार, मेवाड़ के कुछ अपमानित सामंतों ने हुमायूँ से अवश्य सहायता माँगी थी। हुमायूँ ने चित्तौड़ के लिए कूच भी किया, किंतु ग्वालियर के पास उसे बहादुर शाह का पत्र मिला, जिसकी पंक्तियाँ हिंदू-मुस्लिम एकता की पींगें बजाने वालों के लिए विशेष रूप से उद्धृत करना उचित होगा।

बहादुर ने लिखा, “मैं जिहाद करने जा रहा हूँ। यदि तुम विक्रमादित्य का साथ देते हो तो अल्लाह के सम्मुख क्या मुँह लेकर जाओगे ?”

हुमायूँ ने अपने धर्म सहोदर की बात मानते हुए ग्वालियर में ही डेरा डाल लिया। यह सफेद झूठ प्रचारित किया गया कि हुमायूँ चित्तौड़ विलंब से पहुँचा था, जबकि हुमायूँ ग्वालियर में ही ठहर गया था, मेवाड़ कभी पहुँचा ही नहीं। बहादुर का हमला सर पर जानकर कर्मावती ने मेवाड़ के सामंतों से गुहार लगाई।

रानी कर्मावती ने जो पत्र सामंतों को लिखा, वह ‘वीर विनोद’ तथा गौरीशंकर ओझाजी, दोनों ने ही उद्धृत किया है।

रानी ने लिखा, “अब तक चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उनके हाथ से निकलने का समय आ गया है। मैं किला तुम्हें सौंपती हूँ, चाहे रखो, चाहे शत्रु को दे दो। मान लो, तुम्हारा स्वामी अयोग्य ही है, तो भी जो राज्य, वंश परंपरा से तुम्हारा है, उसके शत्रु के हाथ चले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी।”

एक बार पुनः मेवाड के यशस्वी व विश्वासपात्र सामंतों ने मातृभूमि की पुकार का उत्तर दिया तथा चित्तौड़ की रक्षा हेतु सब लामबंद हुए।

रावत बाघ सिंह के नेतृत्व में अर्जुन हाड़ा, राव सत्ता, माला सोनगरा, डोडिया भाण, भैरव दास सोलंकी, झाला सज्जा तथा एक दर्जन से अधिक बड़े सामंत चित्तौड़ की रक्षा हेतु एकत्रित हो गए। मुसलमान अपनी तोपों के कारण चित्तौड़ की सेना को हराने में सफल रहे। 8 मार्च, 1535 ईसवी को 32,000 राजपूत व अन्य हिंदू सैनिकों ने चित्तौड़ की रक्षा में प्राण गँवाए। रानी कर्मावती ने 13,000 अन्य हिंदू स्त्रियों के साथ जौहर किया।

विक्रमादित्य, छोटे भाई उदय सिंह व कुछ सैनिकों के साथ दुर्ग से भाग निकला। बहादुर शाह की सेना को राजपूतों ने भयंकर हानि पहुँचाई थी। कुछ दिनों बाद मालवा के मंदसौर में, हुमायूँ व बहादुर शाह के बीच हुए युद्ध में बहादुर शाह पराजित हुआ। मेवाड़ के सामंतों ने अवसर पाकर चित्तौड़ पुनर्गृहित कर लिया। विक्रमादित्य को पुनः मेवाड़ का राजा बना दिया गया।

पाठकों को स्मरण होगा कि सांगा के एक बड़े भाई पृथ्वीराज थे। एक दासी के द्वारा पृथ्वीराज का एक पुत्र था, जिसका नाम बनबीर था। बनबीर क्रोधी व ओछे स्वभाव का व्यक्ति था, जिसे सांगा ने देश निकाला दिया था। प्रभावहीन विक्रमादित्य को देख बनबीर चित्तौड़ लौट आया और धोखे से विक्रमादित्य की हत्या कर दी। इसके पश्चात् बनबीर, विक्रमादित्य के छोटे भाई उदय सिंह की हत्या करने महलों की तरफ आया।

यहाँ हम उदय सिंह की धाय माँ के अकल्पनीय, अविश्वसनीय त्याग के साक्षी बनते हैं। पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन को उदय सिंह के स्थान पर राजसी शयनकक्ष में सुला दिया। बनबीर ने चंदन को उदय सिंह समझ सोते बच्चे के दो टुकड़े कर दिए। पन्ना धाय, उदय सिंह का नाम लेकर जोर-जोर से विलाप करने लगी, ताकि बनबीर को संदेह न हो जाए। पन्ना धाय अपने पुत्र की अंत्येष्टि में अंत तक रुकी और फिर उदय सिंह को सबसे छिपाकर कुंभलगढ़ ले गई। अपने पति के साथ भयंकर कष्ट पाते हुए, किसी तरह छिपते-छिपाते यह महान स्त्री कुंभलगढ़ के स्वामी, आशा देवपुरा के पास पहुँची तथा उन्हें सत्य कह सुनाया। आशा देवपुरा ने बालक उदय सिंह को प्रश्रय देकर मेवाड़ के सामंतों को सूचित किया। मेवाड़ के सभी सामंतों ने उदय सिंह को अपना राणा माना तथा उनके नेतृत्व में मावली के युद्ध में बनबीर को पराजित कर उसका वध किया।

यूँ एक और विलक्षण त्याग की गाथा के फलस्वरूप मेवाड़ राजवंश समाप्त होते-होते बचा लिया गया। पन्ना धाय माँ ने स्वामिभक्ति व निष्ठा के भाव को उस शिखर पर आरूढ़ कर दिया, जिसे छूना असंभव है।

एक क्षण के लिए हम उस संकल्प व पीड़ा को अनुभव कर सकते हैं, जिसके चलते पन्ना धाय माँ ने अपने बच्चे की बलि चढ़ा दी ! हिंदू धर्म यूँ ही नहीं बचा है। बहुत माँओं की गोद उजड़ी हैं, बहुत स्त्रियाँ अनाथ हुई हैं, म्लेच्छों के समूह के इस लंबे संघर्ष में मेवाड़ के जन-जन ने मूल्य चुकाया था।

ऐसे अनगिनत बलिदानियों ने मुसलमानों के साथ युद्ध की इस अग्नि में अपने रुधिर का घी बनाकर डाला था। तब जाकर धर्म की यह जोत निरंतर अकंप ज्वाला बनकर जलती रही थी।

यदि उस रात, उदय सिंह बनवीर के हाथों मारे जाते तो कभी कोई महाराणा प्रताप नहीं होते।

प्रताप के अभाव में, अकबर हमारे पूरे देश को ग्रस लेता तथा फिर हिंदू धर्म के अंतिम चिह्न भी समाप्त हो जाते। मानव इतिहास में सभ्यताएँ इतनी ही क्षणभंगुर हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में धर्म की अग्नि को प्रज्वलित करने का श्रेय पन्ना धाय के उस महान बलिदान को भी जाता है, जिसने मातृभूमि और स्वामिभक्ति के आगे अपना सर्वस्व लुटा दिया।

पन्ना धाय माँ को उदय सिंह ने सगी माँ की तरह ससम्मान अपने पास चित्तौड़ में रखा। 1540 ईसवी में उदय सिंह मेवाड़ के महाराणा बने। उसी वर्ष 9 मई को उनकी सबसे बड़ी रानी, जयवंता बाई के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम प्रताप रखा गया।

बाल्यकाल
प्रताप, मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह के ज्येष्ठ पुत्र एवं महाराणा सांगा के पौत्र थे। इनकी माता जयवंता बाई ने इनका लालन-पालन कर इन्हें संस्कारित किया था।

प्रताप हृष्ट-पुष्ट एवं साहसी बालक थे। बाल्यकाल में ही उनकी माता ने उन्हें अपने राजवंश, हिंदू धर्म एवं मेवाड़ की धरती के प्रति निष्ठावान रहने की शिक्षा दी थी। जयवंता बाई ने ही प्रताप को दो खड्ग रखने के लिए भी कहा था, क्योंकि वही राज्य के ध्वज को धारण करने वाले थे। यह वचन उन्होंने जीवनपर्यंत निभाया।

प्रताप के पिता उदय सिंह अपनी छोटी रानी एवं प्रताप की विमाता भटियाणी रानी धीर बाई पर अनुरक्त थे। उदय सिंह के इन्हीं रानी भटियानी से दो और पुत्र थे, जिनका नाम जगमाल व सगर था। जगमाल को उनकी माता ने मेवाड का महाराणा बनाने की महत्त्वाकांक्षा से पाला था। उदय सिंह की आसक्ति का लाभ उठाकर भटियाणी रानी अपनी योजना पर आरंभ से ही काम कर रही थीं। जब प्रताप अपनी जन्मस्थली कुंभलगढ़ से उदयपुर आए, तब उदय सिंह ने प्रताप को वहाँ नहीं रहने दिया तथा उन्हें एवं उनकी माताजी को चित्तौड़गढ़ दुर्ग के नीचे कुँवरपदा अर्थात् राजकुमारों के निवास में रहने का आदेश दिया।

प्रताप एवं उनकी माताजी की सुरक्षा हेतु केवल दस सशस्त्र सैनिक दिए गए थे तथा प्रताप एवं उनकी माताजी के लिए भोजन भी चित्तौड़ के दुर्ग से बड़े ही अपमानजनक तरीके से भेजा जाता था। मेवाड़ में किसी भी राजकुमार के साथ आज तक ऐसा व्यवहार नहीं हुआ था। किंतु प्रताप ने इस अपमान के समय को भी अवसर में परिवर्तित कर लिया।

प्रताप अपने बाल्यकाल में भी उदार हृदय के व्यक्ति थे एवं उन्होंने ‘भोजन पेटी’ की एक परंपरा प्रारंभ की। जो भी भोजन प्रताप एवं उनकी माताजी के लिए दुर्ग से आता था, प्रताप उसको अपनी रक्षा में लगे सैनिकों के साथ बैठकर ग्रहण करते थे।

यह कृत्य उनके समय से पूर्व किसी ने भी नहीं किया था तथा इसके कारण प्रताप के प्रति उनके सैनिकों की निष्ठा एवं सम्मान बहुत बढ गया था।

यह प्रथा प्रताप ने स्वयं जीवनपर्यंत निभाई। सेना के प्रत्येक नायक के साथ जननायक प्रताप के अत्यंत मधुर संबंध बन गए। सभी उन्हें प्रेम एवं सम्मान की दृष्टि से देखते थे।

प्रताप के वंचित बाल्यकाल ने मेवाड़ राज्य के लिए भी एक अवसर उत्पन्न किया, जो प्रताप द्वारा मुगलों की सेना पर विजय में निर्णायक सिद्ध हुआ और इसी कारण यहाँ उसका उल्लेख होना आवश्यक है। मेवाड़ में सदा से ही पर्वतों में रहने एवं वनों पर निर्भर रहने वाली स्थानीय भील जाति का निवास था। ये भील, राजसी भोजन, रीति-नीति, भाषा इत्यादि से दूर रहते थे। यद्यपि बाप्पा रावल का जीवन प्रथमतया, ओगुना पनरवा के भीलों ने ही बचाया था और राजपूतों एवं भीलों का संबंध सातवीं शताब्दी से प्रारंभ हो चुका था, किंतु प्रताप के काल में इस संबंध को और अधिक दृढ़ता मिली। आने वाली शताब्दियों में मेवाड़ के मुगल साम्राज्यवादियों के साथ हुए युद्धों में इस संबंध का प्रभाव अभूतपूर्व था।

प्रताप ने राजवंश एवं प्रजा के मध्य की सीमाओं को धुँधला कर दिया। प्रताप, मेवाड़ के राजकुमार होकर बहुत सहजता से नितांत निर्धन व सामान्य प्रजाजनों के साथ खाना-पीना व उठना-बैठना रखने लगे। यह एक ऐसी घटना थी, जो राजस्थान के सामंतवादी समाज में कभी देखी-सुनी नहीं गई थी। भीलों के साथ रहने के कारण प्रताप मेवाड़ की एकता को कई सोपान ऊपर ले गए।

बाल्यकाल में प्रताप चित्तौड़ के निकट के वनों में विचरण करते थे, जहाँ उन्होंने अपनी आयु के भील बालकों से मित्रता स्थापित की और आखेट के अतिरिक्त अरावली के पर्वतों एवं घाटियों में जीवन जीने की कला सीखी। भील समाज का मेवाड़ के आमजनों पर एक और उपकार का उल्लेख आवश्यक है।

मेवाड़ के महाराणा जब प्रजा को मैदानों से उठकर पठारों की ओर पलायन का आदेश देते थे, तो इसे ‘शुष्क भूमि नीति’ कहा जाता था। यह शत्रु की सेना को भूखा-प्यासा रखने के लिए मेवाड़ की जनता का अप्रतिम बलिदान था।

ऐसी विपत्ति के समय भील समाज ही पूरे राज्य की जनता का भरण-पोषण करता था। भील समाज का हिंदुओं की स्वतंत्रता में राजपूतों के समान ही महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिंदू समाज को हृदय से हमारे इन भील पुरखों के प्रति अनुगृहीत होना चाहिए।

भीलों ने प्रेमवश प्रताप को ‘कीका’ कहकर संबोधित करना आरंभ कर दिया, जिसका अर्थ भीलों की भाषा में ‘छोटा बालक’ होता है। इस घटना का यह भी अर्थ हो सकता है कि बालक प्रताप के प्रति भील स्त्रियों का मातृवत् विशेष स्नेह था, अन्यथा भील समाज में ‘कीका’ शब्द अपनी जड़ें नहीं जमा पाता।

मेवाड़ के कई इतिहासकारों द्वारा एवं गाथाओं में प्रताप एवं भीलों की इस अभिन्न मित्रता का उल्लेख किया गया है। जब प्रताप का मेवाड के सिंहासन पर राज्यारोहण हुआ, तब भी भील उन्हें ‘राणा कीका’ के नाम से ही संबोधित करते थे और स्वयं प्रताप भी इस संबोधन को उतने ही प्रेम से स्वीकार करते थे। मानव इतिहास में ऐसा मुश्किल से ही पाया जाता है, जहाँ भारत के सबसे बड़े और धनाढ्य राजवंशों में से एक का राजकुमार, अपनी प्रजा के साथ ऐसा घनिष्ठ संबंध रखे कि राजा और प्रजा में कोई अंतर ही नहीं रहा और यही विचित्र संबंध हमारे देश की अद्भुत संस्कृति और सभ्यता का द्योतक है।

एक ओर जहाँ मध्यकालीन राजस्थानी जीवन-शैली में सामंतवाद एवं जातिवाद की आलोचना होती है तथा इनसे पीड़ित लोगों के लिए घड़ियाली आँसू बहाए जाते हैं, कोई बुद्धिजीवी, मेवाड़ के राजवंश एवं मेवाड़ के विस्मृत सपूत, अर्थात् भीलों के बीच के इस अटूट व विलक्षण संबंध का यशगान तो दूर, चर्चा भी नहीं करता !

भीलों ने प्रताप को अरावली की संकीर्ण घाटियों में रहना तथा वन में जीवन रक्षा करना सिखाया। जंगली पशुओं से आत्मरक्षा तथा इस स्थिति में भी अपने एवं अन्य सभी के लिए भोजन व्यवस्था करना इत्यादि सभी बातें सिखाईं। प्रताप के निर्देश पर भील योद्धाओं को मेवाड़ की सेना में सम्मिलित किया गया एवं उन्हें सैन्य प्रशिक्षण प्रदान किया गया। भील सेना, प्रताप की आँख व कान बन गई। मुगलों की सेना की छोटी सी गतिविधि की सूचना, प्रताप के पास घंटों पहले पहुँच जाती। इस सामरिक बढ़त के कारण ही प्रताप मुगलों को पराजित कर पाए।

भीलों ने जीवनपर्यंत प्रताप की सेना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई एवं प्रताप तथा उनके वंशजों के साथ अपनी निष्ठा बनाए रखी। प्रताप के जीवन के सबसे कठिन समय, हल्दीघाटी के युद्ध से दिवेर के अभियान तक, ये भील ही थे, जिन्होंने मेवाड़ की सीमाओं की सुरक्षा का भार सँभाला एवं मुगलों को इस पूरे काल में सीमाओं के समीप भी नहीं आने दिया।

आधुनिक विज्ञान कहता है कि बाल्यकाल के अनुभव, व्यक्ति के चरित्र निर्माण में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। प्रताप के बाल्यकाल की इन घटनाओं का उनके व्यक्तित्व पर प्रभाव हम स्पष्टता से देख सकते हैं। प्रताप के बाल्यकाल के विषय में हम इतना कह सकते हैं कि यद्यपि वह मेवाड़ के राजवंश में जन्मे जयेष्ठ पुत्र थे, फिर भी उन्होंने अपने जीवन के आरंभ में ही संघर्ष एवं कष्टों को अनुभव किया। तथापि स्वयं को दीन-हीन मान, हृदय में क्रोध व द्वेष पालने के स्थान पर उन्होंने अपनी प्रज्ञा व करुणा को निखारा। अपने परिवार, प्रजा एवं बाह्य विश्व में मानवीय मूल्यों के आधार पर संबंधों को सुगंधित एवं प्रगाढ़ किया।

एक समझ, जो उन्हें अपने संचित कर्मों से प्राप्त हुई थीं उनकी माता के वीतराग लालन-पालन और साथ ही उनके आध्यात्मिक झुकाव ने उन्हें सांसारिक दुर्बलताओं से दूर, शिक्षा, युद्ध कौशल, परिजनों के प्रति प्रेम व सम्मान जैसे मूल्यों पर आधारित जीवन जीने को प्रेरित किया। 

उन्होंने विश्व को अपूरणीय वासना की दृष्टि से न देख कर, केवल कर्तव्य कर्म की दृष्टि से ही देखा। वह सब सहज स्वीकार किया जो जीवन ने उन्हें दिया। अपने प्रारंभिक दिनों के अपने जीवन के प्रत्येक अवसर का भरपूर सदुपयोग कर प्रताप अपने परिवार तथा धर्म के गौरव हेतु सूर्य के तेज के सदृश आलोकित हुए।

युवावस्था
प्रताप लंबी-चौड़ी कद-काठी वाले प्रभावशाली व्यक्तित्व और चुंबकीय आकर्षण वाली आभा से समृद्ध युवराज बने। सुंदर बड़ी आँखें तथा गोल चेहरे पर सज्जित भरी हुई राजपूती मूँछें, प्रताप को सहज ही राजपुरुष की भंगिमा देती थीं। प्रताप के शरीर सौष्ठव के विषय में कई अविश्वसनीय कथाएँ हैं, किंतु अनेक पुस्तकों का गहन अध्ययन करने के पश्चात् ये सभी कोरी कथाएँ ही लगती हैं। गूगल सर्च में भी प्रताप की ऊँचाई सात फीट पाँच इंच बताई गई है, किंतु इस बात का कोई प्रमाण कम-से-कम लेखक को तो नहीं मिला है।

यद्यपि उदयपुर के राजमहल में रखे कवच को देखकर कहा जा सकता है कि उनकी ऊँचाई छह से सात फीट के मध्य रही होगी। उनकी दोनों खड्ग, उनका भाला, उनकी बंदूक एवं उनका लौह कवच, ये सभी कुल मिलाकर अस्सी से सौ किलोग्राम के अवश्य रहे होंगे। इस प्रकार का भार धारण करके युद्धस्थल पर जाने के लिए न केवल दृढ़ इच्छाशक्ति, वरन् शक्तिशाली शरीर का होना भी आवश्यक है। प्रताप के पास दोनों थे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

आखेट के प्रति प्रताप का उत्साह एवं दशकों तक वनों में उनका विचरण, उन्हें पहाड़ी युद्ध का सिद्धहस्त योद्धा बनाने में बहुत सहायक रहे। प्रताप, मेवाड़ के सर्वोत्तम खड्गधारियों के साथ स्वयं प्रशिक्षण लेते थे, अतः उनका खड्ग-कौशल घातक था। किंतु प्रताप को भाले का उपयोग करना सबसे अधिक प्रिय था। यही मेवाड़ के अधिकांश योद्धाओं की परंपरा थी।

रावत कृष्णदास चूँडावत व जयमल राठौड़ पर प्रताप के संपूर्ण शस्त्र प्रशिक्षण का दायित्व था।

चूँकि मेवाड़ के अधिकांश युद्ध पर्वतीय क्षेत्रों में लड़े गए, भाले को फेंकना, उसका दूर तक घात करना व हल्का भार, मेवाड़ के योद्धाओं के लिए भाले को सर्वोत्तम अस्त्र बनाता था। प्रताप को उनके शिक्षकों द्वारा सिखाया गया था कि किसी भी व्यक्ति को अपना अश्व, अपनी खड्ग एवं अपनी स्त्री को कभी छोड़ना नहीं चाहिए।

इन शिक्षाओं को प्रताप ने अपने आचरण में आत्मसात् किया। प्रताप ने स्वयं को आखेट में निपुण कर लिया। मेवाड़ में आखेट बड़ा ही महत्त्वपूर्ण माना जाता था। आखेट, एक परंपरा की महत्ता और भाले, खड्ग एवं कटार इत्यादि के प्रशिक्षण का उत्कृष्ट तरीका था। इसे ‘टीकादौड़’ भी कहा जाता था एवं मेवाड़ के प्रत्येक राजकुमार को साहस की परीक्षा के रूप में यह करना ही पड़ता था।

यद्यपि प्रताप की आखेट में तीव्र स्वाभाविक रुचि भी थी। यह एक विचित्र संयोग है कि अपने राजतिलक के समय की अशांति के मध्य भी प्रताप आखेट के लिए जंगल में चले गए थे। दुर्भाग्यवश, 1597 ईसवी में आखेट करते समय जो आघात प्रताप को लगा, उसके कारण ही केवल सत्तावन वर्ष की अल्पायु में वे परमतत्व में लीन हो गए।

प्रताप स्वयं एक अनुपम द्वंद्व योद्धा थे एवं इसके प्रशिक्षण के लिए वे अपने मित्रों के साथ द्वंद्व क्रीड़ा किया करते थे। शीघ्र ही मेवाड़ की प्रजा में प्रताप के व्यक्तित्व एवं आचरण के विषय में बात फैली, तो उन्हें अपने राजकुमार प्रताप में असंख्य संभावनाएँ दिखाई दीं। प्रताप को पहले ही अंदेशा था कि उनके पिता उनके स्थान पर जगमाल को अपना उत्तराधिकारी चुन सकते हैं, किंतु फिर भी उन्होंने स्वयं को इस उहापोह से अलग रखा।

उन्होंने केवल अपने पिता के दैनिक राजकार्यों के निष्पादन तथा मेवाड़ राज्य के सुचारु संचालन में सहयोग किया। प्रताप में परिवार के प्रति बहुत गहरी निष्ठा थी। एक समय वर्षाकाल में, राजपरिवार पिछोला झील के दक्षिणी तट पर था एवं राणा उदय सिंह अपनी रानी के साथ राजप्रासाद में थे।

भीषण वर्षा के कारण एक रात राजप्रासाद में पानी भर गया। प्रताप पिछोला के दसरे तट पर थे। वे वर्षा की चिंता न करते हुए नावें लेकर राजप्रासाद पहुंचे तथा अपने पिता एवं परिवार को सुरक्षित वहाँ से निकाल लिया।

प्रत्येक संध्या को, प्रताप, चित्तौड़ दुर्ग से निकलकर मेवाड़ की सेवा करने वाले एक साधारण सरदार की भाँति अपनी माता के पास आते, उनके साथ रहते एवं स्थानीय लोगों से मेल-मिलाप, वार्ता इत्यादि में समय व्यतीत करते।

प्रताप का ज्ञान एवं राजकार्यों में उनकी व्यस्तता, अपने सेनानायकों एवं सलाहकारों के साथ सम्मानजनक व्यवहार के कारण वे मेवाड़ के सामंतों के प्रिय बन गए थे। देवगढ़, सलूंबर, आमेट एवं भैंसरोड़गढ़ इत्यादि के सभी सामंत एवं नायक, राज्य संबंधी विषयों में प्रताप से परामर्श करते और इसी कारण उनकी प्रताप के प्रति निष्ठा जीवनपर्यंत बनी रही। यही वह महत्त्वपूर्ण बात थी, जिसके चलते प्रताप को मेवाड़ के राज्यारोहण में सहायता मिली एवं उन्होंने सफलतापूर्वक मेवाड़ पर राज भी किया। इन्हीं सामंतों की सहायता से प्रताप ने केवल राजकुमार होते हुए भी मेवाड़ की सीमाओं का विस्तार आरंभ किया। उन्होंने करण सिंह चौहान को पराजित कर वागड़ पर विजय प्राप्त की, सलूंबर के राठौड़ों को पराजित किया एवं छप्पन का क्षेत्र भी हस्तगत किया।

उन्होंने गोडवाड़ पर भी अधिकार कर उसे मेवाड़ में सम्मिलित कर लिया। इन विजय अभियानों ने मेवाड़ की हतोत्साहित सेना के मनोबल को पुनर्जीवित किया। सैनिकों के हृदय में प्रताप बसते थे। सेना ने उदय सिंह के दशकों के शांत एवं निर्लिप्त कार्यकाल की पीड़ा को भुलाकर उत्सव मनाया, क्योंकि अब उन्हें एक जुझारू एवं साहसी राजकुमार का नेतृत्व प्राप्त हो चुका था।

प्रताप का हिंदू धर्म की शिक्षाओं का प्रशिक्षण एवं उनके पूर्वजों द्वारा इस्लामी साम्राज्यवादियों के साथ किए गए संघर्ष की समझ भी ध्यान देने योग्य बिंदु हैं। मेवाड़ के ब्राह्मण शिक्षकों एवं हिंदू साधुओं के लिए प्रताप के मन में असीम श्रद्धा थी। इन्हीं महामनाओं की कृपा से उन्होंने मेवाड़ राजवंश के इष्टदेव, शिव स्वरूप भगवान् एकलिंगजी की भक्ति का प्रसाद प्राप्त किया था। प्रताप की धर्म शिक्षा आचार्य राघवेंद्र द्वारा की गई।

हिंदू धर्म एवं उसके आधारभूत मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने भारत की जनता पर इस्लाम बलपूर्वक थोपे जाने के विरुद्ध उनके निश्चय को और अधिक दृढ़ बनाया। प्रताप की युवावस्था की दो घटनाएँ यहाँ उल्लेखनीय हैं।

प्रथम, अपने भील मित्रों के साथ वनों में विचरण करते समय प्रताप की भेंट मुनि रूपनाथजी से हुई, जो हिंदू धर्म में नाथ संप्रदाय से संबंधित थे। प्रताप उनसे बहुत प्रभावित हुए। रूपनाथजी ने न केवल प्रताप को सनातन धर्म की नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षाएँ दीं, वरन् उन्हें राजनीति, राजधर्म एवं युद्धकौशल के गुर भी सिखाए।

नाथ संप्रदाय की परंपरा के प्रणेता महान गुरु मत्स्येंद्र नाथ एवं गुरु गोरक्षनाथ थे, जो उच्चतम श्रेणी के आध्यात्मिक योद्धा भी थे। यह कोई संयोग नहीं है कि वर्तमान समय में गोरखपुर के महंत रहे श्री अवेद्यनाथजी के शिष्य महंत श्री आदित्यनाथजी भी उसी नाथ परंपरा के अनुयायी हैं। नाथ संप्रदाय ने भारतीय उपमहाद्वीप में न केवल ज्ञान एवं आध्यात्मिक शक्तियों से विस्तार कर हिंदू मूल्यों की स्थापना एवं रक्षा की, वरन् जब-जब भी भारतीय उपमहाद्वीप में धर्म का अनुसरण करना मुश्किल हो गया तो उन्होंने अपनी शक्तियों के बल पर राजाओं को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन दिया। महंत अवेद्यनाथजी के गुरु महंत दिग्विजयनाथजी, संन्यास से पूर्व, मेवाड़ के एक सिसोदिया राजपूत परिवार से थे। मुनि रूपनाथजी के साथ प्रताप का संबंध जीवनपर्यंत बना रहा एवं ये मुनि रूपनाथ जी ही थे, जिन्होंने मुगलों पर आक्रमण करने तथा उन्हें पराजित करने के लिए दिवेर के थाने को चुनने की सलाह दी थी।

मुनि रूपनाथ के साथ प्रताप
प्रताप की युवावस्था में एक और घटना हुई थी, जिसके दूरगामी परिणाम हुए। प्रताप और उनके अनुज शक्ति सिंह, चित्तौड़ के निकटवर्ती वनों में शिकार हेतु गए थे। यहाँ प्रताप एवं शक्ति सिंह में एक हिरण के शिकार पर विवाद हो गया एवं इस विवाद के परिणाम ने मेवाड़ का इतिहास बदल दिया।

शक्ति सिंह को मेवाड़ में ‘शक्ता’ के नाम से भी जाना जाता था तथा वे भी साहस एवं निडरता में प्रताप के समान ही थे। जब उनकी आयु केवल पाँच वर्ष की थी, शक्ति सिंह अपने पिता के साथ बैठे थे। एक आयुध निर्माता अपने साथ एक कटार लेकर आया, जिससे उसने सूती कपड़े को एक ही वार में काटकर दिखाया। बालक शक्ता ने राणा से पूछा, “क्या यह कटार अस्थि एवं मांस को नहीं काट सकती ?” इतना कहकर उन्होंने कटार को हाथ में लिया और स्वयं के हाथ पर ही कटार चला दी। रक्त की धार से वहाँ बिछा कालीन लाल हो उठा, किंतु बालक शक्ता के मुख पर पीड़ा, दुःख या आश्चर्य का कोई भाव नहीं आया।

प्रताप एवं शक्ता प्रेमपूर्वक साथ रहते थे तथा मेवाड़ के सुयोग्य शिक्षकों एवं शस्त्रास्त्र प्रशिक्षकों के सान्निध्य में सब भली-भाँति सीख रहे थे। दुर्भाग्यवश, उस दिन आखेट में किसी बात पर साधारणतः शांत स्वभाव के प्रताप को क्रोध आ गया। उन्होंने शक्ति सिंह को द्वंद्वयुद्ध की चुनौती दे डाली। इस पर शक्ति सिंह ने चुनौती स्वीकार करते हुए कहा, “पहला आघात आप करेंगे या मैं?”

दोनों भ्राता एक-दूसरे के सामने भाले तानकर खड़े थे। राजपूत रक्त दोनों की धमनियों में उबाल ले रहा था। दोनों ही बराबर एक-दूसरे पर भीषण आघात कर रहे थे। मेवाड़ के दोनों राजकुमारों में से एक की मृत्यु निश्चित थी। ऐसे में कुछ स्वामिभक्त सैनिक भागकर महल की ओर आए। उन्होंने राजवंश के मुख्य पुरोहित नारायण पालीवाल को सारा वृत्तांत कह सुनाया। पालीवाल पुरोहित अश्वारूढ़ हो तुरंत राजकुमारों के पास पहुँच गए।

पुरोहित ने दोनों ही राजकुमारों को अलग करने के अथक प्रयास किए, किंतु दोनों ही अपने हठ पर अड़े थे। पुरोहित ने भय व चिंता से काँपते हुए दोनों ही भाइयों को राजवंश की इतनी बड़ी हानि करने से रोकने का भरसक प्रयास किया। जब दोनों ही राजकुमारों ने पुरोहित की प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया, तो पुरोहित पालीवाल ने सर्वोच्च बलिदान दे दिया। आत्मोत्सर्ग का वह मार्ग चुना, जो राजवंश की सुरक्षा के लिए आवश्यक हो गया था।

नारायण पालीवाल ने अपनी कटार निकालकर अपनी छाती में घोंप दी। दोनों राजकुमार हतप्रभ रह गए। पुरोहित ने अपने प्राण त्यागने से पूर्व प्रताप से कहा, “यदि आप दोनों अब भी नहीं रुके तो ब्रह्महत्या का दोष आपके सर होगा।”

ऐसी थी मेवाड़ के गुरुओं में बुद्धिमत्ता एवं बलिदान की परंपरा। पालीवाल पुरोहित समझ गए थे कि दोनों ही राजकुमारों के युवा हठ को तर्क से नहीं रोका जा सकता एवं अपने क्रोध की ज्वाला में उन्हें ज्ञान का दीपक दिखाई ही नहीं देगा। यदि दोनों में से एक भी राजकुमार घायल हो जाता या मृत्यु को प्राप्त हो जाता, तो मेवाड़ का राजवंश कभी न समाप्त होने वाली अंतर्कलह में डूब जाता।

हम हिंदुओं को पालीवाल पुरोहित जैसे मेवाड़ के शिक्षकों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए एवं प्रताप तथा अन्य महाराणाओं के बराबर सम्मान इन गुरुओं को भी देना चाहिए। इस घटना के पश्चात् प्रताप ने शक्ति सिंह को मेवाड़ से निर्वासित कर दिया।

शक्ति सिंह स्वयं अकबर के दरबार में चले गए। यद्यपि अपने जीवनपर्यंत शाक्ति ने प्रताप एवं मेवाड़ के प्रति निष्ठा रखी तथा उन्हें समय-समय पर अकबर की अगली योजनाएँ, उपयोगी जानकारियाँ इत्यादि भिजवाते रहते थे। जब धौलपुर के निकट अकबर का एक सैन्य अभियान चल रहा था, तब शक्ति को अकबर के चित्तौड़ आक्रमण के विषय में ज्ञात हुआ तो उन्होंने तुरंत ही उदय सिंह एवं प्रताप को सूचना भिजवा दी, ताकि वे समय रहते उपयुक्त निर्णय ले सकें।

ये वही शक्ति सिंह हैं, जिन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप को अपना अश्व देकर उनकी प्राणरक्षा का अपना दायित्व निभाया। अंततः 1580 ईसवी में उन्होंने अकबर का दरबार छोड़ अपने भ्राता के नेतृत्व में रहने का निश्चय किया एवं 1583 ईसवी में हुए दिवेर के युद्ध में प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ के ध्वज तले युद्ध किया। यह एक व्यर्थ का आक्षेप शक्ति सिंह पर लगाया जाता है कि वे धर्मद्रोही थे। उनका जीवन तो ठीक इस मान्यता के विपरीत, उत्कट धर्मपरायणता का प्रबल उदाहरण है।

महान महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व एवं उनके उत्थान का पथ, उनके बाल्यकाल एवं युवावस्था की अनेक घटनाओं से प्रशस्त हुआ था, जो आज हमारे लिए भी उतनी ही उचित हैं, जितनी तब उनके लिए थीं।

अपने परिवार तथा परिजनों से उपेक्षित होने के उपरांत भी विशाल हृदय कैसे रखा जा सकता है।

एक ऐसे राज्य में, जहाँ स्वातंत्र्य एवं धर्म, रक्तकणों में प्रवाहित होता हो, वहाँ के राजकुमार के रूप में कैसे, केवल अपने कर्तव्य एवं कर्म पर ही केंद्रित रहा जाता है। कैसे आप तप एवं नियम की पालना करते हुए स्वयं को सबल एवं सक्षम बना सकते हैं।

कैसे अपनी माता, मातृभूमि एवं अपनी प्रजा के लिए भी एक पुत्र की भांति निष्ठावान रहा जा सकता है। 
कैसे निडर होकर धर्म की सेवा की जा सकती है। 
कैसे राजकुमार होने के थोथे अभिमान को त्याग, एक सरल मनुष्य के रूप में अपने प्रजाजनों के साथ मिलकर आचार-विहार किया जा सकता है।
कैसे बिना किसी अपेक्षा के अपने परिजनों की सेवा करते हुए उनके प्रति सत्यनिष्ठ रहा जा सकता। 
कैसे पिता द्वारा उपेक्षित होने के उपरांत भी कर्तव्य पथ पर अडिग होकर चला जाता है।
कैसे हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्याग, उदारता व दूरदृष्टि का जीवन जिया जाता है।

ये सब उच्च आदर्श, हमें प्रताप के बाल्य काल व युवावस्था में उनके व्यवहार में स्पष्ट देखने को मिलते हैं।

पतझड़ में जैसे वृक्षों के पत्ते गिरते हैं और फिर कोपलें फूटती हैं, उसी प्रकार धरती पर अनगिनत मनुष्य जन्मते-मरते रहते हैं, किंतु यदि प्रताप हमारे हृदय में आज, कल और अनादिकाल तक विराजमान रहेंगे तो केवल इसलिए, क्योंकि वे एक अद्वितीय मनुष्य थे, जिन्होंने मेवाड़ एवं हिंदू धर्म को समाप्त होने से बचाने में अपना जीवन अर्पित कर दिया। यदि आज हिंदू जनमानस में प्रताप की छवि जीवित है, तो केवल इसलिए, क्योंकि उन्होंने क्षात्र धर्म को एक शरीर दिया। प्रताप ने हमें एक आशा दी कि यदि एक अकेला राजा उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली राजा से लड़ सकता है, तो आज हम भी भारत को विनष्ट करने में जुटी शक्तियों को पराजित कर सकते हैं। जब तक पृथ्वी पर एक भी हिंदू जीवित है, तब तक प्रताप जीवित रहेंगे, क्योंकि प्रताप एक भावना है सम्मान व स्वातंत्र्य की, जिस पर काल की धूल कभी जम ही नहीं सकती।

प्रताप ने शौर्य एवं साहस के बल पर इतिहास में अपनी जगह बनाई। इसलिए नहीं कि वे महत्त्वाकांक्षी थे, वरन् इसलिए कि उन्होंने मानवीय मूल्यों को सदैव शिरोधार्य रखा, सदा सहजता से धारण किया। राजनिष्ठा, शौर्य एवं मातृभूमि के प्रति प्रेम को सदैव अपने रक्तकणों में समाकर जीने वाले ऐसे महापुरुष को इतिहास भी अपने सुनहरे पृष्ठों में स्थान देने को बाध्य होता है।