Khand - 02 Maharana in Hindi Motivational Stories by Hind Gaurav books and stories PDF | खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 4

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खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 4

महाराणा प्रताप और अकबर : दो विरोधी जीवन मूल्यों का टकराव

महाराणा प्रताप के जीवन और कृतित्व को यदि कोई एक बात प्रमुखता से परिभाषित करती है तो वह है मुगल आक्रांता अकबर से उनका आजीवन संघर्ष, तथा उनकी विजय।

यह एक विशेष प्रकार की आनुवंशिक शत्रुता थी, जो अकबर के दादा बाबर की प्रताप के पितामह सांगा से और फिर अकबर की प्रताप से किसी पारिवारिक परंपरा की भाँति चली। दोनों के मध्य हुमायूँ और उदय सिंह जैसे राजाओं का भी नेतृत्व रहा, जो इतिहास में बहुत महत्त्व का स्थान नहीं रखते। उनका इतिहास में योगदान भी केवल इतना ही था कि अकबर और प्रताप क्रमशः इन दोनों के पुत्र थे, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को अपने-अपने तरीके से प्रभावित किया।

मेवाड़, बाबर द्वारा की गई राणा सांगा की हत्या से उबर रहा था और विपरीत परिस्थितियों में उदय सिंह का मेवाड़ के सिंहासन पर राजतिलक हो चुका था। अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में प्रताप ने यह सब होते हुए देखा। उदय सिंह को मेवाड़ का राज्य बहुत छिन्न-भिन्न अवस्था में प्राप्त हुआ। अकबर को भी अपने पिता हुमायूँ से दिल्ली का राज बड़ी ही कलहपूर्ण स्थिति में मिला था।

राजकार्य अधिकांशतः बहरम खाँ के हाथ में थे।

1556 में पानीपत का दूसरा युद्ध अकबर द्वारा जीता गया। इस युद्ध में हेमचंद्र विक्रमादित्य नाम के हिंदू राजा की हार के पश्चात् अकबर के विरुद्ध हिंदू विरोध का मुँह लगभग बंद हो गया। किंतु अकबर और बहरम खाँ को पानीपत के इस युद्ध में हिंदुओं की शक्ति का भान हो गया था। यह युद्ध अकबर ने कपट और भाग्य के भरोसे जीता था। 5 नवंबर, 1556 को हेमू (हेमचन्द्र) की विशाल सेना ने अकबर की चार गुना छोटी सेना पर आक्रमण किया।

हिंदू सैनिक, तुर्कों की सेना को बहुत ही बुरी तरह से पराजित करने ही वाले थे कि उसी समय तुर्कों द्वारा उपयोग में ली गई एक पुरानी नीति काम कर गई। मुसलमान हमलावर युद्ध में अपने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धरों को एक विशेष, ऊँचे स्थान पर रखते थे। इन धनुर्धारियों का एक ही लक्ष्य होता था–हिंदुओं के राजा या मुख्य नायक को ढूँढ़कर उस पर एक साथ हमला करना।

यह नीति सफल हई, क्योंकि हिंदुओं ने कभी भी अपने इतिहास से नहीं सीखा और बार-बार वही भूल दोहराते रहे। हाथी पर बैठकर सेना के अग्र भाग को संचालित करना शौर्य तो हो सकता है, पर बुद्धिमत्ता नहीं।

यह सरल सा तथ्य भी हिंदू रणनीतिक नहीं समझ पाए।

खानवा के युद्ध में अकबर के दादा बाबर ने इसी तरह से अपने धनुर्धारियों की मदद से सांगा को घेरकर घायल किया था। पानीपत में यही नीति अकबर ने भी अपनाई और हेमू पर निरंतर तीर बरसाकर उन्हें मरणासन्न स्थिति में पहुँचा दिया।

सोचने की बात है कि जहाँ हिंदू राजाओं ने सदैव आगे रहकर सामने से शत्रु पर आक्रमण किया, इस्लामी आक्रांता सदैव अपनी सेना के पीछे छुपे रहते थे।

हेमू का मस्तक विच्छिन्न करने के पश्चात् उनके वृद्ध पिता को इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए कहा गया।

मना करने पर उनका भी सिर काट दिया गया। अकबर समझ गया था कि हिंदुओं को बलात अपने अधीन और इस्लाम में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। यदि एक हेमू ने उसे इस तरह टक्कर दी थी तो भारत में दर्जनों ऐसे रजवाड़े थे। अकबर इस तरह कितनों से लड़कर जीत सकता था ? अतः उसने सहिष्णुता का मुखौटा तो पहना, पर मन-ही-मन हिंदुओं को हिंदुओं से ही लड़ाने का एक षड्यंत्र रचा।

सर्वप्रथम, उसने हिंदू मंत्रियों को अपने दरबार में शामिल करना आरंभ कर दिया। वह हिंदू राजाओं को भय या प्रलोभन देकर अपने साथ मिलाने लगा।

उसने अपने पूर्ववर्ती इस्लामी हत्यारों के जीवन से एक महत्त्वपूर्ण पाठ सीख लिया था। जब तक इस्लामी आक्रांता, हिंदू राजाओं व प्रजा को धर्मांतरण के लिए विवश नहीं करेंगे, दिल्ली या आगरा में किसका राज है, हिंदुओं को इससे बहुत प्रयोजन नहीं होगा।

अकबर ने इसीलिए जजिया कर समाप्त कर हिंदुओं को थोड़ा शांत कर दिया। किंतु हिंदुओं से कर वसूलने की दर कई गुना बढ़ा दी।

अपने शासन की स्वीकृति के विनिमय में हिंदुओं को इस्लामी आक्रमण से थोड़ा विश्राम मिल गया।

किंतु अकबर धुर इस्लामी राजा था। उसने यह मुखौटा केवल हिंदुओं को बहलाने के लिए पहना था।

इस छद्म सहिष्णु नीति के प्रदर्शन से अकबर को लाभ हुआ और बहुत से हिंदू राजा अकबर की महत्त्वाकांक्षा के सम्मुख झुकने लगे। तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की मोहम्मद गौरी द्वारा पराजय के बाद 1556 ईसवी तक कोई भी इस्लामी आक्रांता दिल्ली पर पूर्णतया राज नहीं कर सका था।

प्रथम तो हर इस्लामी हत्यारे को हिंदू राजाओं द्वारा उनके उपद्रव मचाने और धर्म-परिवर्तन की कुत्सित इस्लामी आकांक्षाओं को बार-बार पराजित किया।

दूसरे, इस तथाकथित दिल्ली सल्तनत में मुसलमानों का आपस में चला सत्ता का भीषण आंतरिक संघर्ष भी इसका बड़ा कारण था। तथाकथित दिल्ली सल्तनत के ये 350 वर्ष केवल हत्याओं, सुल्तानों को पदच्युत करने, विश्वासघात और सत्ता के बर्बर अनुसरण में बीते थे। इसलिए भारत के वक्ष में कोई इस्लामी हमलावर अपनी मतांधता की कील नहीं गाड़ पाया था।

किंतु अकबर के उत्थान के साथ हिंदुओं को एक नए प्रकार का शत्रु मिला, जिसने चतुराई से अपनी नीतियों को बदला और हिंदुओं के आपसी दुराव तथा लोभ का लाभ उठाकर हिंदुओं को हिंदुओं से ही लड़वाया।

अकबर ने अपनी महत्त्वाकांक्षा के लिए अपनी पूरी शक्ति राजस्थान में झोंक दी, क्योंकि उसे पता था कि राजपूत, और भी विशेषकर चित्तौड़ के सिसोदिया राजाओं को पराजित किए बिना भारत पर राज करना असंभव होगा। अतः अकबर ने आमेर के कच्छावा राजाओं से मित्रता की और इस मित्रता को प्रगाढ़ करने के लिए उसने विवाह संबंध भी स्थापित किए।

अकबर के दादा बाबर ने भी आमेर के राजपूत राजाओं को विवाह का प्रस्ताव भेजा था, किंतु कच्छावा राजपूतों ने उसके प्रस्ताव को विनम्रता से टाल दिया था।

आमेर के राजपूतों द्वारा अकबर से की गई संधि के विषय में काफी कुछ लिखा गया है और विशेषतः आमेर के राजा भारमल की पुत्री हरखू बाई (त्रुटिवश इन्हें जोधा के नाम से जाना जाता है) के अकबर से विवाह के विषय में। अब उन परिस्थितियों का निष्पक्ष आकलन करते हैं, जिनके चलते आमेर के राजपूतों ने अकबर से संधि करने का निर्णय लिया।

सर्वप्रथम, जयपुर का राज्य मैदानी क्षेत्र में है, जबकि मेवाड़ का राज्य चारों ओर से अरावली से घिरा हुआ होने के कारण भौगोलिक रूप से सुरक्षित है। यदि आमेर ने अकबर और उसकी विशाल सेना से युद्ध छेड़ा होता तो मैदानी क्षेत्र में होने के कारण तुर्कों की आग्नेयास्त्रों और उनकी बर्बर महत्त्वाकांक्षा के सामने उनकी एक नहीं चलती और जयपुर के लिए गुरिल्ला युद्ध का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।

जहाँ मेवाड़ के पास अरावली का प्रकृति निर्मित दुर्ग था, जयपुर सर्वथा कवचविहीन था।

दूसरी बात, बाबर द्वारा सांगा को विष देकर हत्या करने के पश्चात् राजस्थान में कोई एक ऐसा समर्थ नायक नहीं बचा था, जो सभी राजपूत राजाओं को एक सूत्र में बाँधकर उनका नेतृत्व करे। हिंदुओं के विरोध के प्रकाश-पुंज मेवाड़ की आभा क्षीण हो चुकी थी और अन्य हिंदू राजा अब स्वयं पर ही निर्भर थे। बिना नेतृत्व के, अकबर जैसे चालाक व निर्मम शासक से युद्ध करना सरल नहीं था।

तीसरा, इस समय की हिंदू राज्यों की आपसी प्रतिद्वंद्विता भी एक बड़ा कारण था। सत्ता का खेल मनुष्य को भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रभावित करता है।

जयपुर राज्य शताब्दियों से ही मेवाड़ का अनुसेवी था और यद्यपि ऐसा कोई लिखित प्रमाण नहीं है कि मेवाड़ ने कभी किसी राज्य को या अपने साथी राजपूतों को हेय प्रतीत करवाया हो, किंतु आपस में यदा-कदा टकराव की स्थिति बन ही जाती थी।

ऐसे ही कुछ कारणों से संभव है कि जयपुर के राजा भारमल, उनके पुत्र भगवानदास तथा पौत्र मान सिंह ने मेवाड़ के राजपरिवार से शत्रुता नहीं तो प्रतिस्पर्धा तो पाल ही ली हो। चौथी बात, कवि श्यामलदास अपनी विस्तृत पुस्तक ‘वीर विनोद’ में लिखते हैं, यही समय था, जब मुगलों ने राजपूत राजाओं के घरों में विवाह संबंध स्थापित किए।

आमेर के सरदारों और पुरोहितों ने भी इसे शांति का रास्ता सुझाया, अतः जयपुर ने अपनी पुत्रियाँ, मुगलों को विवाह संबंध में देने का निर्णय भारी हृदय से किया।

किंतु अपने घरों में उन्होंने मुगलों की बेटियों को विवाह संबंध में लेने से साफ मना कर दिया, क्योंकि इससे जयपुर के राजपरिवार का इस्लामीकरण होना निश्चित था। यह एक अति बुद्धिमानी व दूरदर्शितापूर्ण निर्णय था, जिसके कारण जयपुर के राजपरिवार का धर्म-परिवर्तन होने से बच गया।। अपनी पुत्री का विवाह करके विषय की इतिश्री कर लेना सहज था, किंतु एक मुगल लड़की को घर में लाने से वह अपने इस्लामी आचार-विचार, व्यवहार में लाती और जयपुर राजपरिवार के इस्लामीकरण को रोकना असंभव होता। एक राजकुमारी को खोकर पूरे राज्य की सुरक्षा करना एक विवेकपूर्ण त्याग ही कहा जा सकता है।

मुगलों की बेटियों से विवाह के लिए मना करना सरल नहीं रहा होगा। जयपुर के ब्राह्मण गुरुओं व राजपूतों का यह निर्णय क्रांतिकारी था और पूरे हिंदू समाज को इस दूरदर्शिता के लिए जयपुर के राजपूतों का ऋणी होना चाहिए।

पाँचवीं बात, गौरवशाली और समर्थ मेवाड़ राज्य को भी प्रताप के मोक्ष के पश्चात् कुँवर अमर सिंह के काल में जहाँगीर के संधि प्रस्ताव को स्वीकार करना पड़ा था, क्योंकि मेवाड़ की आर्थिक स्थितियाँ विकट हो चुकी थीं। मेवाड़ के सामंतों द्वारा सेना को वेतन न दे पाने की स्थिति से सेना में भी असंतोष की भावना आ गई थी। अमर सिंह ने अपने पुत्र करण सिंह को जहाँगीर के दरबार में अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा और इस तरह से मेवाड़ ने मुगलों से अपनी शांति खरीदी। यदि मेवाड़ पर भी प्रारब्ध ऐसा समय ला सकता है तो हम अकेले जयपुर के राजाओं पर ही समर्पण का दोषारोपण कैसे कर सकते हैं ?

छठी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, इस्लामी साम्राज्यवादियों के विरुद्ध संघर्ष में केवल अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के काल में सौ वर्ष के समय को छोड़कर आमेर ने सदैव मेवाड़ के साथ मिलकर मुसलमानों से संघर्ष किया था। इतिहास साक्षी है कि जयपुर के योद्धाओं ने राजा पृथ्वीराज कच्छावा के नेतृत्व में राणा सांगा के साथ और फिर राणा राजसिंह के साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध किया। मेवाड़ की ओर से दर्जनों कच्छावा राजपूत सरदारों का बलिदान वर्णित है। ये वे सैनिक व सामंत थे, जो प्रताप से प्रभावित हो, अपना घर-बार छोड़कर प्रताप से आ मिले थे।

सहस्र वर्ष के संघर्ष में जयपुर के त्यागी व वीर राजपूतों पर सौ वर्षों की विवशता के लिए धर्मद्रोह का आक्षेप, भ्रांत व अन्यायपूर्ण है।

सातवीं बात, जयपुर के राजपूतों ने मुगलों के साथ मिलकर एक बड़ी सेना का निर्माण तो किया, किंतु यह ध्यान रखा कि हिंदू जनता की अकारण हत्या न हो। इसलिए अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के काल में हिंदू मंदिरों को ध्वस्त नहीं किया गया और हिंदू जनता का बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन भी नहीं करवाया गया। जैसे ही औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करना आरंभ किया और हिंदुओं को बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन के लिए बाध्य किया, तब जयपुर और जोधपुर के राजपूतों ने विद्रोह कर दिया तथा मुगलों द्वारा प्राप्त पद इत्यादि को तुरंत प्रभाव से त्याग दिया। इसी विद्रोह के कारण जैसे ही 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई, मुगल शासन निष्प्राण हो गया।

आठवीं बात, मथुरा और वृंदावन में दर्जनों हिंदू मंदिर जयपुर राजपरिवार द्वारा निर्मित कराए गए थे, साथ ही जयपुर राजपरिवार कई वैदिक विद्यालयों का संरक्षक भी था। काशी का विश्वनाथ मंदिर व एक मुख्य घाट, राजा मान सिंह द्वारा निर्मित हैं। राजा जय सिंह ने बनारस के संस्कृत विद्यापीठ को संरक्षण दिया था तथा अपने पुत्र राम सिंह को वहीं शिक्षित किया।

नौवीं बात, आमने-सामने के युद्ध में कई ऐसे अवसर आए, जब जयपुर के राजपूतों ने अपने राजपूत भाइयों को बचकर निकलने के अवसर भी दिए। ऐसा अनुमान है कि हल्दीघाटी के युद्ध में भी जब प्रताप मुगलों से घिर गए थे और उनके अधिकांश सेनापति मारे जा चुके थे, तब प्रताप का वहाँ से बचकर निकलना लगभग असंभव ही हो जाता, यदि मान सिंह और अन्य राजपूतों ने प्रताप को ढील नहीं दी होती।

हल्दीघाटी में उस समय उपस्थित मुसलमान इतिहासकार अल बदायूँनी ने लिखा है कि मुस्लिम सैनिकों ने मान सिंह से प्रताप का पीछा करके उन्हें मारने के लिए कहा, किंतु मान सिंह ने स्पष्ट मना कर दिया। तब मुसलमान सेनापति आसिफ खाँ ने दो मुगल सैनिकों को प्रताप के पीछे भेजा, जिन्हें पीछे से आ रहे प्रताप के भाई शक्ति सिंह ने मार दिया।

ठीक यही काम मान सिंह ने प्रताप के पुत्र अमर सिंह जी के समय किया। प्रताप के मोक्ष के पश्चात, कई वर्षों तक मान सिंह जी, अमर सिंह पर आक्रमण को टालते रहे।

अकबर, हल्दीघाटी व अमर सिंह के प्रति उदारता रखने के कारण मान सिंह के प्रति बैर भाव रखता था, परंतु वह सीधे मान सिंह से टक्कर नहीं ले सकता था।

दसवीं बात, हम मान सिंह के हल्दीघाटी में प्रताप के साथ हुए संघर्ष में इतना खोए हैं कि मान सिंह द्वारा भारतवर्ष में चलाए सैन्य अभियानों की ओर हमारी चेतना गई ही नहीं है। मान सिंह को अकबर ने अफगान विद्रोह कुचलने के लिए भेजा। मान सिंह ने अद्वितीय प्रतिभा का परिचय देते हुए अफगानों को बुरी तरह काटा। मुसलमानों के एक गिरोह के द्वारा दूसरे गिरोह के संहार को आयोजित करने के लिए क्या हिंदू समाज को मान सिंह का ऋणी नहीं होना चाहिए ? मान सिंह के अभियान के बाद मुगल-अफगान शत्रुता स्थापित हो गई। यदि मान सिंह ने मुगल सेना का उपयोग कर अफगानों को नहीं मारा होता, तो निश्चय ही अफगानी पश्चिमी सीमा से अतिक्रमण करते। ऐसे में यदि मुगल व अफगान एक हो जाते तो भारत का इस्लामीकरण कौन रोक सकता था ?

इसी प्रकार मान सिंह ने बंगाल के मुसलमानों को मुगल सेना से मरवाया। जयपुर के मान सिंह के प्रति हिंदुओं को घृणा से देखने के स्थान पर कृतज्ञता से देखना चाहिए, क्योंकि उन्होंने इस्लामी विस्तार को चतुराई से रोका।

यह उचित है कि महाराणा प्रताप के साथ मान सिंह का युद्ध, हिंदुओं के हृदय में शूल की तरह गड़ता रहेगा, किंतु राजे-महाराजे, सत्ता व जीवन के बहुत से विरोधाभासों को अपने वक्ष पर ढोते हैं। हमें अपने पूर्वजों के खंडित चित्त की ओर संदेह से नहीं, करुणा की दृष्टि से देखना चाहिए।

अंतिम बात, आमेर के राजा भारमल की पुत्री हरखू बाई के विषय में अनेक कहानियाँ हैं। कुछ का कहना है कि वह भारमल की अपनी पुत्री नहीं थी, वरन् किसी दासी की पुत्री थी और अकबर से विवाह के पश्चात् उसके वंश के विषय में वैसे भी कौन पूछने वाला था ? कुछ का कहना है कि वह एक पुर्तगाली दासी थी, जिसे जयपुर के राजा ने खरीदा था और अकबर को प्रस्तुत कर दिया। एक रोचक बात इस विषय में लिखने योग्य है, जिससे इस बात को बल मिलता है कि हरखू कोई दासी पुत्री रही होगी !

किंवदंती है कि सिखों के चौथे गुरु श्री रामदासजी को जब हरखू बाई का सत्य पता चला तो वे विनोद में बोले, “चलो, राजपूतों को भी राजनीति करनी आ गई ! अन्यथा तो हर बात का समाधान वे तलवार से करते हैं।”

एक अंतिम बात हरखू बाई के अकबर से विवाह के विषय में लिखी जानी चाहिए। हरखू बाई का धर्म-परिवर्तन करके उनका नाम विवाह के समय ही ‘मरियम-उल-जमानी’ कर दिया गया था, अतः हिंदी फिल्म ‘मुगल ए आजम’ में अकबर द्वारा जन्माष्टमी का त्योहार मनाए जाने के जो दृश्य फिल्माए गए थे, वे केवल हिंदू मस्तिष्क को भ्रमित करने का उपक्रम थे। सत्य यह है कि अकबर हिंदू धर्म व रीति-रिवाजों से घृणा करता था।

बॉलीवुड के द्वारा हर ऐतिहासिक चलचित्र में ऐसे ही मिथ्या दृश्य दिखाकर सीधे-सादे हिंदुओं को गंगा-जमुनी तहजीब के किस्से दिखा कर भ्रमित किया जाता रहा है, जबकि ऐसी कोई संस्कृति ना तब थी, ना आज है। गंगा भी हिंदुओं की है तथा जमुना भी।

अकबर, खूनी-ए-आजम अवश्य था, जिसे हमारी पावन वैदिक भूमि का इस्लामीकरण करने से मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह ने रोका था। मनुष्य को जीवन में चुनाव करने में विलासिता नहीं होती, हमें परिस्थितियों से ही कुछ अच्छा निकालना पड़ता है। प्रथम दृष्ट्या, जयपुर के राजपूतों का इस्लामी आक्रांताओं के साथ विवाह संबंध स्थापित करना वास्तव में हिंदुओं के डूबते भविष्य को उबारने के लिए एक कामचलाऊ व्यवस्था मात्र थी। जयपुर के राजपूतों ने जो किया, उससे कोई सहमत हो या न हो, किंतु जयपुर राजपरिवार की सनातन धर्म के प्रति निष्ठा पर कोई संदेह नहीं कर सकता।

यद्यपि जयपुर ने मेवाड़ के साथ आगामी युद्धों के दौरान उपर्युक्त कारणों से अकबर के पक्ष में युद्ध किया, किंतु हमें युद्ध में और दरबार में और भी ऐसे कई कारणों की जानकारी होती हैं, जहाँ मान सिंह ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मेवाड़ के राजपूतों की सहायता की थी।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जयपुर के राजपूत, भगवान् श्रीराम के द्वितीय पुत्र, कुश के वंशज हैं। कुँवर मान सिंह ने आजीवन मेवाड़ की परोक्ष रूप में रक्षा की। हल्दीघाटी के पश्चात् अफगान व बंगाली मुसलमान विद्रोहियों को बुरी तरह पराजित किया। मान सिंह के विषय में अंतिम बात। प्रताप के मोक्ष के बाद अकबर ने अपने बेटे सलीम को प्रताप के पुत्र अमर सिंह पर आक्रमण हेतु भेजा। अकबर ने मान सिंह को सलीम की सहायता का निर्देश दिया। वर्षों तक सलीम अजमेर में भोग-विलास में पड़ा रहा तथा मान सिंह चुपचाप तमाशा देखते रहे। अपनी ओर से मान सिंह ने मेवाड़ के लिए कोई कठिनाई पैदा नहीं की, बल्कि सलीम का सहयोग करने में असमर्थता प्रकट करते रहे।

इस पृष्ठभूमि के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जयपुर घराने का तुर्कों के साथ संबंध संक्षिप्त समय के लिए था और इसका कारण उस समय की भूराजनैतिक स्थिति और दिल्ली से भौतिक निकटता होने के कारण जयपुर की सुरक्षा पर सतत मँडराता संकट था। किंतु इस सबसे अधिक, हिंदुओं को जयपुर के राजपूतों का सदैव आभारी रहना चाहिए कि वे कभी इस्लाम में परिवर्तित नहीं हुए। यद्यपि हमारे पास सिसोदिया राजपूत का उदाहरण है, प्रताप का भतीजा, उनके भाई सगर का पुत्र, जिसने इस्लाम अपना कर अपना नाम ‘मुहब्बत खाँ’ रख लिया था।

नागौर का एक राठौड़, जिसने इस्लाम अपना लिया था, किंतु एक भी कच्छावा सरदार ने किसी भी परिस्थिति में इस्लाम नहीं अपनाया। इसका कारण, प्रबल इच्छाशक्ति और सनातन मूल्यों में परम आस्था ही होगी कि इस्लामियों के साथ विवाह-संबंध होने के बाद भी आमेर के किसी एक भी बड़े सामंत अथवा सरदार ने इस्लाम धर्म नहीं अपनाया।

इस्लाम के उग्र धर्म-परिवर्तन के स्वभाव को देखते हुए यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, क्योंकि इस्लामी मतांधों ने कुछ ही दशकों में पूरे मध्य-पूर्व को समाप्त कर दिया था, किंतु जयपुर, धर्मांतरण के विरोध में अडिग खड़ा रहा और आज भी खड़ा है।

मुगलों के साथ जयपुर का संबंध निश्चित रूप से उनके लिए केवल एक कामचलाऊ व्यवस्था थी, जिससे तुर्कों के सैन्य सामर्थ्य के अंधड़ से धर्म व देश को सुरक्षित रखा जा सके। जयपुर के राजाओं ने मुगलों के साथ साफ शर्त रखी कि उनकी सेवाओं के बदले हिंदुओं के दुर्ग और मंदिर ध्वस्त नहीं किए जाएँ। औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर इस विश्वास को तोड़ा और परिणामस्वरूप उसे जयपुर और जोधपुर के राजपूतों का विद्रोह भी झेलना पड़ा।

औरंगजेब के समय, जयपुर के मिर्जा राजा जय सिंह ने विधिवत जयपुर के राजपूतों को मुगलों से दूर कर लिया। जय सिंह को औरंगजेब द्वारा मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ युद्ध पर भेजा गया। जय सिंह ने शिवाजी महाराज से ‘पुरंदर की संधि’ कर उन्हें औरंगजेब से मिलने आगरा भिजवाया। जय सिंह ने अपने पुत्र राम सिंह को पूर्व सूचना दे दी थी कि यदि औरंगजेब शिवाजी महाराज को बंदी बनाए तो उन्हें वहाँ से निकल जाने में सहयोग करें। इस विषय पर बीकानेर के श्री महेंद्र खड्गावत ने कुछ मौलिक शोध किया है, जिस पर वे शीघ्र ही पुस्तक भी लिखेंगे।

वही हुआ जिसका जय सिंह को संदेह था। औरंगजेब ने शिवाजी महाराज को राम सिंह के महलों में ही नजरबंद कर लिया। यह सर्वविदित है कि राम सिंह जी ने ही छत्रपति शिवाजी महाराज को आगरा से फलों की टोकरी में छुपाकर औरंगजेब के चंगुल से छुड़वाया। ऐसी मान्यता है कि औरंगजेब ने इस बात के लिए मिर्जा राजा जय सिंह से गहरी शत्रुता पाली तथा अंततः 19 जुलाई, 1667 ईसवी में जय सिंह को विष देकर बुरहानपुर में उनकी हत्या करवा दी। इस प्रकार जयपुर के राजवंश ने अपनी बलि देकर भी दक्षिण में हिंदू विरोध की ज्वाला को प्रज्वलित रखा।

आमेर राजपरिवार के नाम पर केवल एक ही धब्बा लगा और वह था 1568 में चित्तौड़ का तीसरा साका। आमेर के राजा भगवानदास ने न केवल अकबर की ओर से युद्ध लड़ा, वरन् मेवाड़ की छोटी सी आठ हजार सैनिकों की सेना को निर्ममता से समाप्त कर दिया, और साथ ही वह तुर्क सैनिकों द्वारा तीस हजार निरीह हिंदुओं की हत्या का भी मूकदर्शक बना रहा।

अपनी आस्था के केंद्र, हिंदू मंदिरों का बर्बरतापूर्ण नाश देखकर जयपुर के राजपूत सामंतों व सैनिकों ने विद्रोह नहीं किया होगा, यह बात अविश्वसनीय है। पर ऐसा प्रतीत होता है कि भगवानदास व राजा टोडरमल ने जयपुर की राजपूत सेना को चित्तौड़ में प्रवेश ही नहीं करने दिया होगा, अन्यथा जयपुर के राजपूत विद्रोह कर देते।

अबुल फजल, बदायूँनी, निजामुद्दीन बख्शी, फरिश्ता व अन्य मुसलमान लेखकों के संस्मरणों में भी किसी राजपूत द्वारा हिंदुओं की हत्या का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इन्हीं इतिहासकारों द्वारा भगवानदास व टोडरमल की उपस्थिति का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इतने सारे हिंदुओं की निर्मम हत्या व सैकड़ों वर्ष पुराने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त होते देखकर भी मूकदर्शक बने रहने के पाप के लिए भगवानदास व टोडरमल को हिंदू इतिहास कभी क्षमा नहीं करेगा।

अकबर एक अत्यंत कुटिल व्यक्ति था और उसका मुख्य सलाहकार बहरम खाँ भी उसके समान ही कुत्सित जेहादी था, जिसे पता था कि हिंदुओं को आमने-सामने के युद्ध में पराजित नहीं किया जा सकता।

अकबर ने बड़ी चतुराई से हिंदू राजाओं की कमियों को ध्यान में रखा और उनका समयानुसार लाभ भी उठाया, विशेषतः आमेर, मेवाड़ और मारवाड़ के राजपूतों को आपस में लड़वाने में। पानीपत के द्वितीय युद्ध में राजा हेमचंद्र को पराजित करने और उनका मस्तक काटने के पश्चात् अकबर ने दिल्ली के आस-पास के सभी उत्तरी सूबों को एकसूत्र में किया तथा मालवा के सुल्तान ने भी उसके समक्ष निष्ठा दिखाई।

आमेर के राजा भारमल इस अवसर का लाभ उठाने वाले सर्वप्रथम राजपूत थे और उन्होंने अपनी पुत्री/दासी हरखू बाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। भारमल का पुत्र भगवानदास, अकबर की सेना का मुख्य नायक बना। उसने 1567-68 में चित्तौड़ पर हुए आक्रमण में भी अकबर का साथ दिया।

मेवाड़ को अपने अधीन करने की अकबर की महत्त्वाकांक्षा का उद्भव तब हुआ, जब उसे लगा कि मेवाड़ ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जो कभी इस्लामी उपद्रवियों के सामने नहीं झुका है। उसे पता था कि जब तक मेवाड़ उसके अधीन नहीं होगा, इस उपमहाद्वीप के इस्लामीकरण का उसका स्वप्न पूरा नहीं होगा। अकबर को यह पता था कि मेवाड़, सांगा की मृत्यु के पश्चात् नेतृत्वहीन हो गया था और उदय सिंह अपेक्षाकृत निर्बल राजा थे। तब तक अकबर का सामना प्रताप से नहीं हुआ था। उसने मेवाड़ के इस राजकुमार की केवल कथाएँ सुनी थीं।

उधर, प्रताप ने 1568 में चित्तौड़ का तीसरा साका, महिलाओं का जौहर और अकबर द्वारा चित्तौड़ में किया गया भीषण हत्याकांड देखा था। एक अनुमान के अनुसार इस साके, जौहर में प्रताप ने लगभग 500 निकट व दूर के संबंधियों को खोया था।

अतः उन्होंने इस्लामियों को दंड देने की शपथ ली थी। चित्तौड़ हाथ से निकल जाने का प्रताप के मन को गहरा आघात लगा था। सिसोदिया राजाओं का अजेय कहा जाने वाला दुर्ग इस्लामी उपद्रवियों की सेना द्वारा तहस-नहस कर दिया गया। राजसी वैभव से परिपूर्ण वह महान दुर्ग, जो हिंदुस्तान के सभी दुर्गो में सर्वश्रेष्ठ कहलाता था, अब जंगली पशुओं का आश्रय स्थल बन कर रह गया था।

महाराणा प्रताप तुर्कों के विरुद्ध हिंदू एकता के परम पक्षधर थे और भारमल द्वारा अपनी पुत्री/दासी का विवाह अकबर से करने के कारण प्रताप दुःखी थे। उन्होंने अकबर की राजसी रक्त को दूषित करने की चाल समझ ली थी और इसका विरोध करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उस समय की सभी कविताओं और दोहों इत्यादि में प्रताप के इस कथन का उल्लेख है कि मेवाड़ पर चाहे जो भी आपदा आए, सिसोदिया वंश की कोई भी कन्या तुर्क का बिस्तर गरम नहीं करेगी।

एक बार अकबर ने प्रताप के विरोध और निरंतर युद्ध से त्रस्त होकर दिल्ली दरबार में ये झूठी बात प्रसारित कर दी कि प्रताप ने समर्पण करने के लिए एक दूत भेजा है। बीकानेर के राजकुमार, पृथ्वीराज, जो अकबर के मनसबदारों में से एक थे, उन्होंने प्रताप को दोहे में लिख भेजा–

“यदि प्रताप अकबर को अपने मुँह से बादशाह कहेंगे, तो सूर्य भी पश्चिम से ही उगेगा। मुझे बताएँ ओ वीर प्रताप, मैं अपनी मूँछों पर ताव देता रहूँ अथवा अपनी तलवार से अपने प्राण ले लूँ?”

प्रताप ने उन्हें उत्तर दिया–
“जब तक शरीर में प्राण हैं, भगवान् एकलिंगजी की कृपा से, मैं तो अकबर को केवल तुर्क ही कहूँगा। सूर्य पहले की भाँति पूर्व से ही उगेगा। जब तक मेरी तलवार यवनों की गरदन पर है, आप अपनी मूँछों में ताव देते रहिए। प्रताप प्रत्येक आघात को अपने सिर पर लेगा, आप तुर्कों से वाक्युद्ध में अवश्य विजयी होंगे।”

अतः प्रताप के हिंदू एकता के स्वप्न और आकांक्षा के उपरांत भी अकबर की कुटिल चालों व हिंदुओं के प्रारब्ध ने, प्रताप को अपने ही सहधर्मी बंधुओं से आमने-सामने का युद्ध करने को बाध्य कर दिया। किंतु प्रताप ने अपने राजपूत साथियों के साथ कितना भी कटाक्ष किया हो, पर कभी उन्हें अकबर के दरबार में होने के कारण हेय नहीं समझा।

अकबर के राजपूत और चारण दरबारी, निरंतर प्रताप को अकबर द्वारा चली जाने वाली प्रत्येक चाल की सूचना देते रहते थे। प्रताप को ज्ञात था कि अकबर के प्रत्येक हिंदू दरबारी के मन में वास्तव में तो वे ही बसे थे, क्योंकि इस महाद्वीप में हिंदुओं के बचने की वही अंतिम आशा थे। अतः उन्होंने पर्वतों और वनों से अपना संघर्ष जारी रखा तथा प्रत्येक हिंदू के मन में आशा का संचार भी जीवित रखा।

आज तो हमारे लिए यह जानना अत्यंत सरल है कि पाँच सौ वर्ष पहले कैसे अकबर के राज में हिंदू लोकाचार, संस्कृति तथा सामाजिक तंत्र को समाप्त करने का दोषी केवल अकबर ही था, किंतु उसके समकालीन प्रताप के लिए इस बात को उसी समय समझना और देखना, प्रताप की दूरदृष्टि को दर्शाता है।

प्रताप ने अकबर को मेवाड़ के शत्रुओं तथा विद्रोहियों को सहायता देते और अपनी तरफ मिलाते हुए देखा था तथा यही कारण था कि प्रताप के मन में शत्रुता और प्रगाढ़ होती गई। किंतु सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यदि हम मेवाड़ के इतिहास में बप्पा रावल से लेकर उदय सिंह तक के संघर्ष को देखें, तो सहज ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रताप भी इस्लामी विस्तारवाद की कुत्सित नीति अच्छी तरह से समझ गए थे और यह भी जान गए थे कि अकबर इस योजना का केंद्रबिंदु है। अकबर उदारता का मुखौटा लगा, हिंदुओं को आपस में लड़ाकर, भारत के इस्लामीकरण पर निकला था।

फिर चाहे हिंदू राजाओं में अंतर्कलह उत्पन्न करना हो अथवा बाह्य आतंकवादियों, जैसे उज्बेकिस्तान से बहलोल खाँ इत्यादि को बुलवाना और ऐसे किराए के हत्यारों की एक पूरी सेना तैयार करना; अपने ही लोगों का दमन करना अथवा उन्हें निर्दयतापूर्वक मार देना अकबर के लिए बहुत सरल था। उसने अपने ही विशेष सहयोगी बहरम खाँ, जो कि उसका अभिभावक था, जिसने उसे पुत्रवत् सँभालकर हर युद्ध में विजय दिलवाई थी, उस बहरम खाँ पर अविश्वास करके उसे मरवाने का षड्यंत्र किया। जब बहरम खान निकल भागा तो उसका पीछा करवाया और अंततः उसे मरवा ही दिया। इसके बाद अकबर ने उसकी विधवा पत्नी से विवाह भी किया। इतने घोर अनैतिक व्यक्ति से प्रताप का सामना था।

वैसे तो सभी इस्लामी आक्रांता आततायी लुटेरे थे, जिनमें सत्तालोलुपता कूट-कूट कर भरी थी और यही हमने अपनी इस पुस्तक में स्थापित भी किया है, किंतु मुगल इनसे भी एक कदम आगे निकले।

बाबर ने अपने संस्मरणों में विष के प्रयोग पर लिखा है।

हुमायूँ स्वयं को बचाने हेतु पूरे उपमहाद्वीप में भागता फिरा, अतः हम उसके विष-प्रेम के विषय में अधिक नहीं कह सकते।

अकबर, विभिन्न प्रकार के विषों का संकलन करता था।

उसने विभिन्न प्रकार के विषों पर शोध करने और उस तक पहुंचाने हेतु एक अधिकारी नियुक्त कर रखा था। अकबर ने ‘खिलत’ नाम के विशेष परिधान बनवाए थे जिनके कॉलर एवं बाजुओं में विष लगा होता था।

अकबर अपने शत्रुओं को खिलत भेंट कर उन्हीं से शत्रुओं की हत्या कर देता था। राजेंद्र शंकर भट्ट, इतालवी फिजिशियन मानुची के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहते हैं– “अकबर ने अपने शासन के रास्ते में आने वाले कई राजाओं और सामंतों की ऐसे ही हत्या की थी।” मानुची, शाहजहाँ एवं औरंगजेब के शासनकाल में भारत आए थे, उन्होंने लिखा था– “जब मैं मुगल दरबार में था तो इस प्रकार से हत्या करने अथवा करवाने का तरीका बहुप्रचलित था।
अकबर ने अपने शत्रुओं के लिए विषाक्त गोलियाँ भी बनवाई थीं। ऐसा कहा जाता है, अकबर की अपनी मृत्यु भी ऐसी ही एक गोली भूलवश निगल जाने से हुई थी।”

औरंगजेब विष बनाने की इस विधा में निष्णात था। उसने सबसे पहले जोधपुर महाराजा के बीर पुत्र पृथ्वीराज की हत्या की थी। इसके पश्चात् स्वयं जोधपुर महाराजा जसवंत सिंह को विष दिया। इसके पश्चात् उसने जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह एवं मेवाड़ के महाराणा राज सिंह को भी विष देकर उनकी हत्या की। इन दोनों के विषय में राज सिंह के अध्याय में लिखा गया है।

धिम्मी-वामपंथी-जिहादी समुदाय जिन्होंने इस देश के बौद्धिक जगत पर अपना कब्जा जमा रखा है, उनके अनुसार एक व्यक्ति अथवा वंश, जिसने लोगों को इस विधि से मारा हो, वो महान थे और उन्हें उदाहरण मानकर हमें उनका अनुसरण करना चाहिए। मैं यह पाठकों के विवेक पर छोड़ता हूँ कि वो वामी-जिहादी समुदाय के साथ हैं या नहीं?

यहाँ एक और कुत्सित और अभद्र प्रथा का उल्लेख होना आवश्यक है इस प्रथा के कारण भी प्रताप अकबर से घृणा करते थे। इस प्रथा को ‘नवरोजा’ कहा जाता था, अर्थात् नौ दिन। इसे फारसी त्योहार ‘नवरोज’ समझने की त्रुटि मत कीजिएगा। अकबर ने आगरा में नौ दिन का एक व्यापार का त्योहार मनाना प्रारंभ किया, जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों ही महिलाएँ होती थीं।

अकबर स्वयं इस त्योहार में एक महिला का वेश धारण करके जाता था और वहाँ से अपने शारीरिक सुख हेतु महिलाएँ पसंद करता था।

नवरोजा की प्रथा के विषय में अपूर्ण और अस्पष्ट उल्लेख है, किंतु राजस्थान के स्थानीय साहित्य तथा लोकश्रुति में अकबर द्वारा प्रचलित इस निकृष्ट प्रथा का उल्लेख मिलता है। आज भी राजस्थान में ‘जला’ के नाम से एक लोकगीत गाया जाता है, जो कि हिंदुओं की मूर्खता व अंधी विलासिता का प्रमाण है। ‘पणिहारी’ नाम की लोकधुन पर गाया जाने वाला यह गीत जलालुद्दीन अकबर की बारात का वर्णन करता है। लेखक ने अनगिनत विवाहों में इस अपमानजनक गीत पर हिंदू स्त्रियों को नाचते देखा है। एक समाज के रूप में तो कम-से-कम हम हिंदुओं को यह प्रथा पूर्णतया समाप्त कर देनी चाहिए।

प्रताप के पास जब इस नवरोजा की घृणित प्रथा का समाचार पहुँचा तो उनके मन में अकबर को पराजित करने का निश्चय और भी दृढ़ हो गया। चित्तौड़ के तीसरे साका-जौहर के लिए अकबर की अंधी काम वासना प्रमुख कारणों में से एक थी। अकबर की यह नीच प्रवृत्ति ही प्रताप के मन में अकबर के प्रति घृणा और कभी उसके अधीन न होने या संधि न करने का भी कारण बनी।

एक लोककथा के अनुसार, बीकानेर की राजकुमारी को जब अकबर ने नवरोजा के लिए बुलवाया, तो उसने स्थानीय देवी करणी माता से रक्षा की गुहार लगाई और राजकुमारी के स्थान पर करणी माता स्वयं अकबर के हरम में पधारी, ताकि वह अकबर के गले पर कटार रखकर इस कुत्सित प्रथा को समाप्त करवा दें।

इस घटना का कोई ऐतिहासिक प्रमाण न होने के कारण इसे किंवदंती ही माना जा सकता है। लेखक द्वारा इस प्रथा का उल्लेख केवल राजपूतों की शक्ति व आत्मसम्मान पर मर-मिटने की प्रवृत्ति बताने के लिए किया गया है, जिन्होंने अकबर को इस घृणित फरमान को वापस लेने के लिए बाध्य किया। साथ ही लेखक की हिंदू समाज से प्रार्थना है कि लोकगीतों में हमारे पुरखों के हत्यारे मुसलमानों का महिमामंडन तुरंत समाप्त किया जाए।

इतालवी लेखक एवं यात्री निकोलाइ मानुची ने अपनी पुस्तक ‘स्टोरिया दो मोगुर' अथवा ‘भारत में मुगल वंश का इतिहास’ में अकबर के हरम का उल्लेख कुछ इस प्रकार से किया है, “अकबर ने अपने हरम का उपयोग भी अपने राज्य के विस्तार के लिए किया। वह राजाओं की राजकुमारियों से विवाह कर लेता था और इन्हीं महिलाओं के बल पर वो राजाओं को आपस में लड़वाता रहता था।”

मानुची केवल वही लिखते थे, जो उन्होंने मुगल काल में देखा था। उन्होंने मीना बाजार के विषय में भी लिखा था कि किस तरह इसे हिंदू महिलाओं को मुगल हरम में लाने के लिए एक युक्ति के रूप में प्रयोग में लिया जाता था। यद्यपि मीना बाजार केवल महिलाओं के लिए होता था, किंतु ऐसा कहा गया है कि अकबर स्वयं वहाँ महिला के वेश में जाया करता था (अबुल फज्ल)।

इस घृणित प्रक्रिया के विषय में बात करने से लेखक का आशय केवल उन राजपूत राजाओं की शक्ति और सामर्थ्य दिखाना है जिन्होंने अकबर को इस अपमानजनक फरमान को वापस लेने पर बाध्य कर दिया।

अकबर द्वारा शत्रु की स्त्रियों के दुरुपयोग के विपरीत प्रताप के धार्मिक संस्कारों को यदि देखना हो तो एक घटना उल्लेखनीय है।

1585 ईसवी में अकबर ने प्रताप को पकड़ने हेतु अब्दुल रहीम खानखाना को भेजा। जब खानखाना आबू के निकट पड़ाव डाले हुए थे, तब कुँवर अमर सिंह ने खानखाना की पुत्री और उनके परिवार की अन्य महिलाओं को बंदी बना लिया।

अमर सिंह शत्रु खेमे की स्त्रियों को बंदी बनाकर अपने पिता प्रताप के सन्मुख ले गए।

प्रताप अमर सिंह पर अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने कहा, “यदि हम भी युद्ध में शत्रु की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करेंगे तो हम में और अकबर जैसे मुसलमानों के बीच क्या अंतर रह जाएगा? क्या ये हिंदुओं के संस्कार है ?”

“इसी समय खानखाना की पुत्री से राखी बँधवाओं और उसके भाई बनो। इसके पश्चात् सभी महिलाओं को ससम्मान खानखाना के शिविर में छोड़कर आओ।”

इस आदेश को सुनते ही कुँवर अमर सिंह ने क्षमा माँगी, खानखाना की पुत्री से राखी बँधवाई और उन सब महिलाओं को खानखाना के शिविर में छोड़कर आए।

खानखाना स्वयं भी आध्यात्मिक व्यक्ति थे, जिन्होंने बाद में इस्लाम छोड़ दिया एवं कृष्ण भक्त बन गए।

खानखाना एक शिया मुसलमान थे और अकबर के गुरु बहरम खाँ के पुत्र थे।

वो प्रताप के इस कृत्य से बड़े प्रभावित हुए और बिना उन पर आक्रमण किए ही आगरा लौट गए।

जब अकबर ने उन्हें पूछा कि उन्होंने प्रताप से युद्ध क्यों नहीं किया, तब उन्होंने एक ऐसा उत्तर दिया, जो कदाचित् इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा।

खानखाना का उत्तर था– “लड़ा मनुष्यों से जाता है जहाँपनाह , फरिश्तों से नहीं।”

क्या कभी हमने थोडा रुककर अकबर और प्रताप के नैतिक मूल्यों की तुलना की?

एक सभ्य समाज को किस तरह के नियमों एवं आदर्शों का पालन करना चाहिए?

प्रताप के या अकबर के ?

हमारे देश के वामपंथी और तथाकथित उदारवादियों ने हमारे बच्चों को ‘अकबर महान शासक’ था नाम का झूठ घोल-घोलकर पिलाया है, किंतु यही उपयुक्त समय है कि हमें अपने बच्चों को इन मिथ्या दावों का वास्तविक खतरा समझाना होगा।

क्या चाहते हैं हम ? हमारे बच्चे अकबर के पदचिह्नों पर चलें अथवा प्रताप के ?

हिंदू समाज को इस प्रश्न पर गहनता से मंथन कर, अपना उत्तर खोजना होगा।

अनैतिकता का ये घोल हमारे बच्चों के मस्तिष्क और विचारों को और दूषित न करने पाए।

या तो बहन-बेटियों का सम्मान एक निरपेक्ष सिद्धांत है, जैसा कि हिंदू धर्म में है या फिर महिलाएँ केवल विनिमय और भोग की वस्तु हैं। उन्हें पाशविक धर्मांधों को सौंप देना चाहिए, जो अपनी धर्मांधता के चलते इस पूरे विश्व को ही अपनी संपत्ति माने बैठे हैं!

या तो स्त्रियाँ देवियाँ हैं, जो हमें जीवन और उल्लास का वर देती हैं अथवा वे मात्र उपभोग के लिए हैं, जिन्हें काम में लेकर फेंक दिया जाए।

यदि हम अकबर जैसे बलात्कारी के संस्कार अपने बच्चों को देंगे तो शीघ्र ही हम सनातन धर्म को महिलाओं से घृणा करने वाले इस समुदाय में परिवर्तित होते देखेंगे।

दूसरी ओर, यदि प्रताप का सत्य विद्यालयों में पढ़ाया जाए तो हमारे बच्चे, भारत देश के सम्मानीय और विचारशील नागरिक बनेंगे।

श्रीकृष्ण ने महाभारत में पूरी मानवता लगभग नष्ट कर डाली थी क्योंकि एक द्रौपदी के चीर हरण का प्रयास हुआ था। क्या हम हिंदू अपने भगवानों और प्रताप सरीखे पुरखों से सीख सकते हैं कि एक स्त्री का शील भंग महापाप है। हर हिंदू को यह शपथ लेनी चाहिए कि समाज की स्त्रियों की रक्षा उसके जीवन का सर्वाधिक मूल्यवान नियम बन जाए।

एक देश के दो आदर्श नहीं हो सकते।

यदि अकबर महान है, तो हमें प्रताप को भुलाना होगा।

और यदि प्रताप महान हैं, तो अकबर को किसी कूड़ेदान में फेंकना होगा।

हिंदुओ के इस खंडित चित्त में दो विपरीत तरह के वैचारिक जगत् हैं, जिसके चलते समाज न केवल एक मतिभ्रम में है, वरन् अकर्मण्य भी हो चला है।

यदि हम अपने आदर्शों के साथ नहीं खड़े हैं तो कदाचित् हम मानव ही नहीं हैं।

आत्मसम्मान, सत्यनिष्ठा, व आत्मगौरव से रिक्त समाज तो दासता या यौन शोषण को भी जीवन मान लेगा। जीवित रहने के लिए भोजन व घर तो गुलामों को भी मिल ही जाता है। पर क्या हम हिंदू ऐसा दुर्गंधयुक्त जीवन जीने को राजी हैं?

हिंदुओं को अब निर्णय करना ही होगा।

हिंदुओं के मानस पर किसका प्रभाव होगा, अकबर का या प्रताप का ?

इस प्रश्न के उत्तर पर ही निर्भर करता है कि हम आने वाले वर्षों में उन्नति को प्राप्त होंगे अथवा अवनति व विनाश को!

देश के वामपंथी और छद्म उदारवादियों पर हमारे बच्चों को अकबर की महानता के विषय में असत्य पढ़ाने और भ्रमित करने के लिए कमीशन बिठाकर देशद्रोह का मुकदमा चलाना चाहिए, क्योंकि सत्य यह है कि अकबर एक कामांध, मतांध, लंपट, अति महत्त्वाकांक्षी, इस्लामी हत्यारा था। अकबर एक निर्मम व्यक्ति था, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के इस्लामीकरण की अपनी महत्त्वाकांक्षा को मदांधता और व्यग्रता के साथ पूर्ण करने के हरसंभव प्रयास किए।

प्रताप को पता था कि अकबर द्वारा हिंदुस्तान के इस्लामीकरण की योजना के बीच अकेले वे ही खड़े हैं। इस बात का ज्ञान ही प्रताप को महापुरुष मानने और उनके उस संघर्ष को नमन के लिए पर्याप्त है, जिसे न केवल उन्होंने आरंभ किया, वरन् अकेले ही उस संघर्ष को उसकी यथोचित परिणति तक भी पहुँचाया। प्रताप ने हिंदू धर्म के लिए हर आघात, हर चालबाजी, हर विश्वासघात, हर संकट को अपनी विशाल छाती पर सहन किया।

कोई धन्यवाद, कोई श्रद्धांजलि, कोई कृत्य, हमें उस महापुरुष के उपकारों से उऋण नहीं कर सकता।

आज हम हिंदू हैं, स्वतंत्र हैं, सुखी हैं, संपन्न हैं, सुरक्षित हैं, तो केवल और केवल एक महाराणा प्रताप सिंह के कारण। 🙇