Khand - 02 Maharana in Hindi Anything by Hind Gaurav books and stories PDF | खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 6

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खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 6

दिवेर का युद्ध : मेवाड़ का मैराथन व अकबर की निर्णायक पराजय

सन् 1576 में हल्दीघाटी के पश्चात् दिवेर के युद्ध के लिए सात वर्षों तक चले अभियान की पूर्णाहुति उस दिन हुई, जब महाराणा प्रताप ने 1583 में दिवेर के थाने पर लगभग बीस हजार की सेना लेकर धावा बोल दिया। तीन दिन तक चली इस मार-काट में प्रताप ने मेवाड़ की पग-पग भूमि पर फैले मुगलों के कुल 36 थानों को स्वतंत्र कर मातृभूमि का इंच-इंच मुगलों से मुक्त करवा लिया।

प्रताप, छापामार युद्ध की अपेक्षा एक बार अपनी पूरी सैन्य शक्ति के साथ आक्रमण करना चाहते थे, ताकि मुगल थानेदारों के संहार की गूँज आगरा में अकबर के कानों तक पहुँच जाए। अचानक किए गए इस हमले में प्रताप व कुँवर अमर सिंह ने बिना रुके मुगलों का संहार किया एवं तुर्कों को एकत्र होकर पुनः आक्रमण करने योग्य भी नहीं छोड़ा।

दिवेर के इस महिमाशाली अभियान के वर्णन से पूर्व यह समझना आवश्यक होगा कि हल्दीघाटी से लेकर दिवेर तक के सात वर्षों के अंतराल में प्रताप ने क्या आर्थिक व सैनिक तैयारी की।

स्मरण रहे कि हल्दीघाटी में मेवाड़ के सबसे प्रतिभाशाली योद्धा, प्रताप को बचाने के उपक्रम में वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

हल्दीघाटी युद्ध के तुरंत बाद प्रताप ने भामाशाह व ताराचंद को मालवा का सूबेदार नियुक्त कर उन्हें मुगल थानों व काफिलों को लूटकर धन एकत्रित करने का निर्देश दिया। मेवाड की पूर्वी दिशा में स्थित मालवा, आगरा से गुजरात के बंदरगाहों के मध्य एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। अकबर समुद्री मार्ग से बहुत सारा धन तुर्की व अरब देशों में इस्लामी सल्तनतों को भेज रहा था।

अकबर व बहुत से पूर्ववर्ती मुसलमान लूटेरे, वैदिक भूमि भारतवर्ष को इस्लामिक खिलाफत का ही विस्तार मानते थे। खिलाफत की मौलिक अवधारणा यह है कि पूरे विश्व में इस्लाम के प्रतिनिधि के रूप में केवल एक ही व्यक्ति का राज होगा, जिसे ‘खलीफा’ कहा जाएगा। शेष विश्व केवल उस खिलाफत के पोषण के लिए होगा। ऐसी संभावना है कि अकबर अपने मन में इस्लाम का खलीफा बनने का स्वप्न पाल रहा था।

श्री एम.ए. खान द्वारा लिखित पुस्तक ‘जिहाद : बलात् धर्मांतरण, उपनिवेशवाद और दासता की परिपाटी’ में वे लिखते हैं–

“भारत के गैर-मुसलमानों से छीना हुआ धन व संपदा इस्लामिक खिलाफत के राजकोषों की पूर्ति के लिए, दमिश्क, बगदाद, मिस्त्र व ताशकंद भेजा जाता था। वहाँ यह धन, इस्लामी धार्मिक शहरों मक्का व मदीना के रखरखाव में तथा मौलवियों के वेतन हेतु उपयोग में लाया जाता था। यद्यपि इसी कालखंड में हिंदू काफिर, भयानक विपन्नता की ओर धकेले जा रहे थे।”

मुगलों ने हिंदुओं की आर्थिक संपन्नता को नष्ट कर, सुदूर के इस्लामी राज्यों का पोषण किया, क्योंकि वही उनकी निष्ठा के केंद्र थे।

1526 के पानीपत के प्रथम संग्राम में इब्राहिम लोधी की हत्या कर बाबर ने आगरा के राजकीय कोष की चाबियाँ हथिया लीं। बाबर स्वयं अपनी जीवनी ‘बाबरनामा’ में लिखता है, “आगरा के खजाने में से सभी कबीलों; अफगान, हजारा, अरब, बलोच आदि को यथायोग्य उपहार दिए गए। हर व्यापारी और छात्र, बल्कि हर वह व्यक्ति, जो हमारी सेना के साथ आया था, उसने जी भरकर खजाने में से अपना हिस्सा लिया। निश्चित ही संबंधियों व छोटे बच्चों की पूरी श्रृंखला लाल और श्वेत रंगों (स्वर्ण व रजत) में नहा गई और विपुल रत्न और गुलाम भी उन्हें मिले।”

जहाँ हिंदू राजा अपनी प्रजा से लगभग 16 प्रतिशत कर वसूलते थे, मुगल 40-50 प्रतिशत कर वसूलते थे। जो लेखक मुस्लिम संघर्ष के काल को आर्थिक रूप से प्रगतिशील व हिंदुओं के प्रति बहुत उदार व्यवस्था बताते हैं, स्वयं मुसलमान लेखकों के आँकड़े इन वामपंथी जिहादियों के असत्य दावों की धज्जियाँ उड़ा देते हैं।

फ्रेंच यात्री बर्नियर, औरंगजेब की ‘कर व्यवस्था’ पर लिखता है, “यह एक ऐसा आतंक था, जिसने किसानों व कारीगरों को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित कर, उन्हें थकान व विपन्नता में मरने के लिए छोड़ दिया।”

इस प्रकार जब मुगल लुटेरे और उनके साथ सत्ता में भागीदार उच्च वर्ग के हिंदू, अय्याशी में धन उड़ा रहे थे, तब भारतवर्ष के हिंदू, चोरों व हत्यारों के इस समूह के द्वारा भयंकर दरिद्रता के गर्त में धकेल ले जा रहे थे।

अकबर, राज्य के धन को मुसलमानों की हज यात्रा पर भी व्यय करता था। मुगल काल में औसतन 15,000 यात्री हज के लिए प्रति वर्ष मक्का जाते थे। यह धार्मिक प्रयोजन अकबर द्वारा 1573 ईसवी में गुजरात विजय के बाद आरंभ हुआ, जब मुगलों को सूरत का बंदरगाह मिल गया। 1576 में मुगलों का एक कारवाँ आगरा से छह लाख रुपए का भारी भत्ता लेकर हज के लिए निकला। 1577 में इससे दगुना धन लेकर हज कारवाँ गया।

भामाशाह एवं ताराचंद के नेतृत्व में मेवाड के सैनिकों ने इन जत्थों को लूटना आरंभ किया। अकबर इन जत्थों की बहुत सुरक्षा नहीं कर सकता था, क्योंकि स्थान व समय का चुनाव मेवाड़ की सेना करती थी तथा मुगल प्रतिकार से पूर्व ही मेवाड़ के सैनिक पर्वतों व कंदराओं में लुप्त हो जाते थे। इस प्रकार प्रताप ने मुगलों की एक दुखती रग पकड़कर उसका भरपूर दोहन किया।

पाँच वर्षों में भामाशाह ने 25 लाख स्थानीय मुद्रा व 20,000 स्वर्ण मुद्राएँ एकत्र कर प्रताप के चरणों में रख दीं। हिंदू समाज क्या कभी भामाशाह व ताराचंद के उपकारों से उऋण हो सकता है? कैसे विलक्षण मनुष्य थे ये दोनों भाई ! कैसी उच्च कोटि के रणनीतिज्ञ, कैसे उत्कट योद्धा, कैसे सत्यनिष्ठ व प्रताप के स्वामिभक्त मित्र ! इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे संकल्पनिष्ठ महापुरुषों के कारण ही प्रताप अपना धर्मयुद्ध लड़ व जीत पाए थे।

1580-81 में प्रताप ने दोनों भाइयों से जो धन प्राप्त किया, उससे 12 वर्षों तक सेना के वेतन की व्यवस्था हो गई थी। भामाशाह व ताराचंद के बिना प्रताप, केवल एक साहसी, विद्रोही राजा बन कर रह जाते। इन दो ओसवाल जैन बंधुओं के कारण ही प्रताप मेवाड़ के यशस्वी महाराणा के पद पर स्थापित हुए। हल्दीघाटी से दिवेर के मध्य के कालखंड में प्रताप व मुगलों के सैनिक संघर्षों का लघु विवरण भी आवश्यक हो जाता है।

मोही का युद्ध
हल्दीघाटी की पराजय से झल्लाए अकबर ने स्वयं नवंबर 1576 में मेवाड़ पर आक्रमण कर गोगूंदा प्रताप से छीन लिया। प्रताप को खोजते हुए कुछ माह मेवाड़ में भटककर असफल अकबर आगरा लौट गया। किंतु जाने से पूर्व अकबर ने कई महत्त्वपूर्ण थाने प्रताप से छीन लिये। मई, 1577 में अकबर की पीठ होते ही प्रताप ने एक-एक कर मुगल थानों को जीतना आरंभ किया। अकबर ने उदयपुर का नाम मुहम्मदाबाद रखकर वहाँ मुगल सिक्के प्रसारित कर दिए थे। प्रताप ने सर्वप्रथम उदयपुर जीतकर राजस्व से मुहम्मदाबाद नाम हटवाया तथा मुगल सिक्के गलवा दिए।

उदयपुर और गोगूंदा से मुगलों को भगाने के बाद प्रताप, मोही का महत्त्वपूर्ण ठिकाना जीतना चाहते थे। मोही, राजसमंद में भाटी राजपूतों का महत्त्वपूर्ण ठिकाना था। वहाँ मुजाहिद बेग नाम के एक मुगल ने स्थानीय हिंदुओं को कृषि के लिए बाध्य कर अपनी सेना के लिए रसद की व्यवस्था कर ली थी। प्रताप को यह कदापि स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि ऐसा होने से मुगल पूरे मेवाड़ को कुछ ही वर्षों में जीत लेते। सितंबर, 1577 में प्रताप ने भाटी राजपूतों को संदेश भेजकर आक्रमण की तैयारी के लिए कहा। मेवाड़ व भाटियों की सामूहिक सेना ने खेतों को नष्ट करना आरंभ किया। मुजाहिद बेग के पास 3,000 घुड़सवारों के अतिरिक्त पैदल सेना भी थी। मुजाहिद के साथ हिंदू सेना का भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें मुजाहिद अपने सैकड़ों सैनिकों के साथ मारा गया। मोही प्रताप के कब्जे में आ गया तथा शेष मुगल थानों पर मुगल सेना रसद के लिए फिर अजमेर पर निर्भर हो गई।

'अकबरनामा' में अबुल फजल लिखता है, “राणा के आदमियों ने मोही पर हमला कर फसलें वगैरह बरबाद करना शुरू कर दिया। इस वक्त कुँवर मान सिंह कच्छावा मेवाड़ के पहाड़ी इलाकों में चला गया। मोही के थानेदार मुजाहिद बेग को खबर मिली, तो वह फौरन बिना जरूरी हथियार लिये ही फौजी आदमियों समेत खेतों की तरफ दौड़ा। मुजाहिद बेग ने रुस्तम जैसी बहादुरी दिखाई और शहीद हुआ।”

एक बार पुनः हम देखते हैं कि मान सिंह ने प्रताप के आक्रमण को अनदेखा कर, हिंदू संघर्ष में कितनी महत्त्वपूर्ण सहायता की।

अगले वर्ष अकबर ने अपने कुशल सेनापति, शाहबाज खाँ को मेवाड़ भेजा, जिसने भयंकर लूटपाट व नरसंहार किया। 1578 में शाहबाज ने प्रताप को कुंभलगढ़ में घेर लिया, जहाँ से छिपकर प्रताप को निकलना पड़ा। इस तरह मेवाड़ की वैकल्पिक राजधानी व पुरखों का आश्रय भी प्रताप से छिन गया।

बाँसवाड़ा का युद्ध
1578 ईसवी में डूंगरपुर के रावल आसकरण व बाँसवाड़ा के रावल प्रताप सिंह अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। आसकरण के पुत्र कुँवर सहस्रमल ने इस बात से दुःखी होकर प्रताप से विनती की कि वे डूंगरपुर पर आक्रमण करें।

इस कार्य के लिए कुँवर सहस्रमल ने महाराणा प्रताप को 4,000 मुद्राएँ देने का वचन भी दिया। प्रताप ने कुँवर सहस्रमल से कहा, “अगर आप हमारे पास न भी आते तब भी हम डूंगरपुर-बाँसवाड़ा पर आक्रमण जरूर करते। हमें यदि मुगल सल्तनत से बैर रखना है, तो पड़ोसी राज्यों को अपने अधीन कर मेवाड़ को सशक्त बनाना ही होगा।”
डूंगरपुर-बाँसवाड़ा को बादशाही मातहती कुबूल करने का खामियाजा भुगतना पड़ा। महाराणा प्रताप ने कानोड़ के रावत भाण सारंगदेवोत को फौज समेत भेजा। रावत भाण हल्दीघाटी युद्ध में वीरगति पाने वाले रावत नैतसिंह सारंगदेवोत के पुत्र थे। डूंगरपुर और बाँसवाड़ा की फौजें मिल गईं और सोम नदी के किनारे मेवाड़ी सेना का सामना डूंगरपुर-बाँसवाड़ा की सम्मिलित सेना से हुआ।

रावत भाण सारंगदेवोत ने बड़ी वीरता दिखाई और बुरी तरह आहत हुए। रावत भाण के काका रणसिंह सारंगदेवोत इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। रावत भाण के नेतृत्व में मेवाड़ी सेना ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की। महाराणा प्रताप का प्रभुत्व उन्हें स्वीकार करना ही पड़ा।

डूंगरपुर के रावल आसकरण की मृत्यु के पश्चात् प्रताप ने आसकरण के पुत्र सहस्रमल को वहाँ का राजा बना दिया, जो कि पहले से ही प्रताप के समर्थन में था। इसी प्रकार उग्रसेन को बाँसवाड़ा का अधिपति घोषित किया गया। दोनों ही राजा, प्रताप के अनुयायी एवं समर्थक थे और इस प्रकार प्रताप ने मेवाड़ की दक्षिण-पश्चिमी सीमाओं को सुरक्षित कर लिया।

वागड़ पर महाराणा प्रताप की विजय की खबर अकबर के कानों तक पहुँची तो एक बार तो उसे विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि कुछ महीने पहले ही उसने वागड़ के नरेशों को अपने अधीन किया था। इनके अतिरिक्त मारवाड़ के चंद्रसेन राठौर, बूंदी के राव दूदा हाड़ा, सिरोही के महापराक्रमी राव सुरताण देवड़ा तथा प्रताप के श्वसुर इंडर के नारायणदास का पूर्ण सहयोग प्रताप को मिला। दर्जनों छोटे-बड़े ठिकानों के सरदार प्रताप से आ मिले।

मायरा की खदानों में छुपे धन एवं भामाशाह तथा ताराचंद द्वारा अर्जित धनराशि से सेनाएँ भी सम्मिलित थीं। आस-पास के क्षेत्रों में बसे सोलंकियों एवं चौहान सरदारों की प्रताप ने एक विशाल सेना संगठित की, जिसमें सिरोही, ईडर, डूंगरपुर एवं बाँसवाड़ा की सेनाएँ तथा शक्ति सिंह के नेतृत्व में शक्तावतों की सेना मेवाड़ की ओर से युद्ध करने हेतु तैयार हुईं।

प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर अमर सिंह अब एक अत्यंत बलशाली व साहसी युवा योद्धा बन चुके थे। कुँवर अमर सिंह मेवाड़ की सेना की एक टुकड़ी का संचालन करने के साथ ही पूरे सैन्य अभियान का आपसी समन्वय भी सँभालते थे। भामा शाह एवं ताराचंद को एक टुकड़ी एवं भीलों को पर्वतों एवं वृक्षों पर अपना-अपना मोर्चा सँभालने के लिए कहा गया।

यद्यपि इस युद्ध की विस्तृत जानकारी हमारे पास नहीं है, किंतु प्रताप की सेना में अनुमानतः 25,000 पैदल सैनिक एवं 5,000 अश्वारोहियों को मिलाकर लगभग 30,000 की सेना थी। प्रताप को 1582 में प्राप्त धनराशि एवं मेवाड़ के अधिकांश सामंतों एवं निकटतम राजाओं की सहायता के कारण यह संभव है कि उनकी सेना में 10,000 की संख्या की वृद्धि हो गई हो।

यह युद्ध प्रताप के लिए ‘करो या मरो’ का अवसर था। अतः प्रताप अपने सबसे कुशल सेनानायकों के साथ युद्ध में उतरे थे। मुगलों की ओर से सेरिमा खाँ सुल्तान, दिवेर का थानेदार था, जिसमें 2,000 सैनिक, एक हाथी तथा कुछ सौ अश्वारोहियों का दस्ता था। सेरिमा नरम स्वभाव का, न्यायप्रिय व्यक्ति था एवं किसी दूर के संबंध से अकबर का चाचा लगता था। सेरिमा हिंदू रीति-रिवाजों का सम्मान करता था तथा किसी सीमा तक वह हिंदुओं के प्रति सहिष्णु भी था।

सेरिमा को उसके शुभचिंतकों ने प्रताप से दिवेर में युद्ध न करने की सलाह दी थी, किंतु सेरिमा ने उन सबकी बातों को अनसुना कर प्रताप को पकड़ने अथवा मारने के लिए अभियान शुरू कर दिया।

एक प्रकरण है, जो सेरिमा के हिंदू रीति-रिवाजों की ओर झुकाव को दर्शाता है। जब वह अमर सिंह के भाले से आहत हो मृत्यु शैया पर था, उसने गंगाजल पीने को माँगा था। इस प्रकरण को कई लेखकों एवं इतिहासकारों ने लिखा है। प्रताप ने स्वयं इस मुगल को मृत्यु-पूर्व गंगाजल दिया था।

मुगलों की ओर से सेरिमा ने आस-पास के 14 मुगल थानों से भी सेना बुलवाकर अपने साथ मिला ली थी। श्यामलदास ने अपनी पुस्तक ‘वीर विनोद’ में लिखा है, “प्रत्येक मुगल थाने में कम-से-कम हजार सैनिकों की नफरी उपस्थित रहती थी। अतः यह माना जा सकता है कि दिवेर के युद्ध में मुगलों के कम-से-कम 15,000 सैनिक थे।”

यदि हम दोनों ओर की सेनाओं की तुलना करें तो प्रताप द्वारा दिवेर को युद्धस्थल हेतु चुनना एवं अपने सभी शक्तिशाली एवं बड़े योद्धाओं को एकत्र करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह युद्ध प्रताप एवं मुगलों के बीच होने वाला आर-पार का संघर्ष था। प्रताप ने समय और स्थान ऐसा चुना था, जहाँ से वे एक अप्रत्याशित आक्रमण कर सामरिक महत्त्व के दिवेर थाने को जीता जा सके।

इस युद्ध को हम दिवेर का अभियान इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि दिवेर पर विजय के बाद प्रताप ने विश्राम नहीं किया।

दिवेर विजय के अगले ही दिन मेवाड़ की सेना को दो भागों में विभक्त करके, मेवाड़ में मुगलों के 36 थानों को जीतकर पुनः मेवाड़ के अधिकार में कर लिया गया। इनमें एक भाग का नेतृत्व स्वयं प्रताप ने किया था और दूसरे का कुँवर अमर सिंह ने।

दिवेर की विजय के पश्चात् अमर सिंह ने अपनी आधी सेना को पूर्व में आमेट की ओर भेजा; जिसने भी मुगलों का साथ दिया, उसे समाप्त कर दिया गया। इधर प्रताप ने दक्षिण-पश्चिम की ओर कूच कर कुंभलगढ़ एवं उदयपुर पर पुनः अधिकार कर लिया। अब दिवेर के युद्ध के विषय में उपलब्ध जानकारी के आधार पर उसका विश्लेषण करते हैं।

मेवाड़ की युद्धनीति
मेवाड़ की ‘युद्ध परिषद्’ की बैठक दिवेर घाटी के दक्षिण-पूर्व में दस किलोमीटर दूर एक निर्जन क्षेत्र में हुई।

प्रताप के अतिरिक्त इस सभा में कुँवर अमर सिंह, भामा शाह, ताराचंद, शक्ति सिंह, भील राजा राणा पूंजा, रावत कृष्णदास, गोपालदास मेड़तिया एवं शक्ति सिंह के वंश के सभी शक्तावत उपस्थित थे।

यह तो सभी ने स्पष्ट रूप से मान लिया था कि मेवाड़ की सेना दिवेर के उत्तरी मैदानों में युद्ध नहीं करेगी, वरन् इसके विपरीत उन्होंने दिवेर के दक्षिणी भाग को चुना, जो पर्वतीय क्षेत्र में खुलता था। कोई भी यहाँ हल्दीघाटी में की गई भूल को किसी भी मूल्य पर दोहराना नहीं चाहता था।

मेवाड़ के सेनानायकों ने मुगलों पर 'कुंत व्यूह' से आक्रमण का निर्णय लिया।

कुछ सैनिकों को आमजन में घुल-मिलकर, बिना शत्रु की दृष्टि में आए, थाने के निकट जाकर उस पर दृष्टि बनाए रखने के आदेश हुए। प्रताप, भामा शाह एवं अन्य सभी नायक घाटी के बीच से शत्रु पर आक्रमण करने के लिए तैयार थे, भील सेना को पर्वतों व टीलों पर स्थान दिया गया, ताकि वो शत्रुओं पर छुपकर बाणों एवं 'गोफण' से वार कर सकें।

कुँवर अमर सिंह को गाँव का पूरा चक्कर लगाकर घाटी के उत्तरी छोर पर शत्रु की प्रतीक्षा करनी थी, ताकि मुगलों द्वारा मैदानी क्षेत्र में भागने की किसी भी संभावना को रोका जा सके।

युद्ध
एक शक्तिशाली एवं सुसज्जित सेना, जहाँ सभी को उचित वेतन एवं पर्वतीय युद्ध हेतु प्रशिक्षण मिला था, दिवेर के थाने का नाश करने को निकली।

इस सेना का नेतृत्व करने के लिए विश्वासपात्र नायक एवं सहायक जैसे कुँवर अमरसिंह, शक्ति सिंह, भामा शाह, ताराशाह, रावत कृष्णदास एवं मेवाड़ के कई सरदार अपने-अपने दस्ते एवं टुकड़ियों के साथ उपस्थित थे। साहसी भीलों की सेना पर्वतीय क्षेत्रों में पेड़ों इत्यादि पर मुगलों पर घात करने हेतु तैयार थी। इस तरह महाराणा प्रताप ने अपने जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं अंतिम अभियान का मंचन किया, ताकि मेवाड़ की पग-पग भूमि से मुगलों को समाप्त कर प्रत्येक थाना मेवाड़ के अधिकार में लिया जा सके। हल्दीघाटी के विपरीत, प्रताप अब मुगलों के साथ खड़े अपने राजपूत भाइयों पर घात करने के नैतिक भार से भी मुक्त थे। अकबर ने मेवाड़ में स्थित मुगलों के थानों का दायित्व केवल अपने विश्वासपात्र मुसलमान सरदारों को ही दिया था, क्योंकि उसे भी अब जयपुर एवं जोधपुर के राजपूतों पर विश्वास नहीं था कि वे अब मेवाड़ के राजपूत राज्य के निकटवर्ती थानों की रक्षा उसी निष्ठा से कर पाएँगे। अकबर की ऐसी मनःस्थिति, प्रताप जैसे समर्पित सनातनी के लिए बहुत उपयोगी रही।

अब उन्हें अरब के रेगिस्तान से आए, हिंदू धर्म तथा मेवाड़ के शत्रुओं द्वारा किए गए 800 वर्षों के दमन के प्रतिकार का खुला, निर्बाध अवसर मिल रहा था। 25 फरवरी, 1568 को चित्तौड़ में किए गए 'जौहर' अग्निस्नान में चीत्कार करती माँओं, बहनों एवं बालिकाओं की कातर चीखें, प्रताप के मन में जलती प्रतिशोध की अग्नि में घी का काम कर रही थीं।

जयमल राठौर और पत्ता चुंडावत, ग्वालियर के तंवर, सादड़ी के झाला, डोडिया के भीम सिंह जैसे आत्मबलिदानी मित्र और सहायक प्रताप को स्मरण करा रहे थे कि उन्हें तुर्कों का संहार कर उन सभी बलिदानों का ऋण चुकाना है एवं मेवाड़ की पवित्र भूमि को मुगलों से मुक्त कराना है। उस गौरवशाली दिन मेवाड़ के पूर्वज भी स्वर्ग से प्रताप को देखकर पुष्पों की वर्षा कर रहे होंगे, जब प्रताप ने पुनः अपनी मातृभूमि को गौरव दिलाने हेतु अपने पूर्वजों को दिए वचन का निर्वहन करने के लिए कदम बढ़ाए।

मित्रों, संबंधियों, प्रजा, शुभचिंतकों एवं गुरुओं इत्यादि सभी ने 'हर-हर महादेव' की हुँकार के साथ मेवाड़ के आकाश को गुंजायमान किया एवं प्रताप की सेना को तुर्कों का संहार करने हेतु संबल देकर, मातृभूमि पर दाँत गड़ाए बैठे तुर्कों से निर्णायक युद्ध करने हेतु विदा किया।

प्रताप ने दिवेर की विजय के एकमात्र लक्ष्य के पथ में सभी प्रकार के भय, चिंता एवं शंकाओं, स्वयं एवं अपने पारिवारिक जीवन इत्यादि को पीछे छोड़ दिया था। प्रताप किसी भीषण धूमकेतु की भाँति केवल प्रतिशोध की अग्नि हृदय में धारण कर संहार की लालसा लिये आगे बढ़ रहे थे। अश्वों की निरंतर बजती टाप, भालों की सरसराहट, खड्‌गों की खनक, मनुष्यों एवं पशुओं के मिश्रित उग्र स्वर, केवल लक्ष्य की ओर देखती लाल उग्र आँखें, मेवाड़ की प्रजा एवं महाराणा का दृढ़ निश्चय उन्हें विजयादशमी के उस शुभ दिन तक ले आया।

सितंबर 1583 ईसवी की विजयदशमी के उस महिमाशाली दिन, हिंदू योद्धा काल बनकर उन म्लेच्छों पर टूट पड़े, जिन्होंने 800 वर्षों तक उनकी मातृभूमि पर रक्त की होली खेली थी।

सूर्य की प्रथम किरण के साथ ही प्रताप की सेना ने मुगल सेना पर तीन ओर से आक्रमण कर दिया एवं हिंदू सैनिक शत्रु पर भीषण प्रहार करने लगे।

मुगलों का मुख्य सेनापति सेरिमा खाँ सुल्तान, अपनी सेना का नेतृत्व हाथी पर बैठकर कर रहा था। प्रताप का सेरिमा से सामना हुआ, प्रताप ने भाले से भीषण प्रहार किया, किंतु ऊँचाई पर होने के कारण सेरिमा ने झुककर स्वयं को बचाया। तब पडिहार सोलंकी वंश के एक राजपूत योद्धा ने सेरिमा के हाथी के सामने के पैरों के बीच में घुसकर उसके दोनों पैरों को अपनी कटार से काट दिया। पैर कटने से विकल हाथी सामने की ओर झुक गया एवं प्रताप ने भाले के एक ही वार में हाथी का कुंभ स्थल (सर) फोड़ दिया। प्रताप के इस प्रबल आघात से हाथी भरभराकर धराशायी हो गया।

सेरिमा ने हाथी से कूदकर प्राण बचाए। सेरिमा ने अश्वारूढ़ होकर अपनी सेना का नेतृत्व एवं युद्ध करना जारी रखा। किंतु शीघ्र ही सेरिमा और उसके सैनिकों को आभास हो गया कि पर्वतों एवं पेड़ों से निरंतर चल रही पत्थरों एवं बाणों की वर्षा से अब उनका बचना कठिन है, अतः उन्होंने उत्तर की ओर खुले मैदान की ओर भागना शुरू कर दिया।

सेरिमा का यह प्रयास, उसे और उसके सैनिकों को दिवेर घाटी के मुहाने पर ले आया, जहाँ कुँवर अमर सिंह एवं उनके शूरवीर इसी बात की प्रतीक्षा में थे। पीछे से प्रताप और उनकी सेना तथा सामने से कुँवर अमर सिंह एवं उनकी सेना ने मुगलों को घेरकर गाजर-मूली की भाँति काटना आरंभ कर दिया। कुंवर अमर सिंह ने एक लंबा और शक्तिशाली भाला लिया और सेरिमा की ओर घात लगाकर फेंका।

इस भाले की तीव्रता एवं प्रहार इतना घातक था कि सेरिमा के शरीर को छेदता हुआ यह भाला, उसके अश्व के भी शरीर से पार निकलकर धरती में जाकर धँस गया। कुँवर अमर सिंह के इस घातक प्रहार से उनके विषय में प्रचलित कथा का सत्यापन हो गया कि वे सात फीट लंबे, एक बलिष्ठ योद्धा थे। इस तरह का वार कोई असाधारण योद्धा ही कर सकता था।

पूरे मानव इतिहास में भाले के ऐसे बलशाली प्रहार के उदाहरण शायद ही कहीं और मिले! हम उन मुगल सैनिकों के टूटे मनोबल की कल्पना कर सकते हैं, जिन्होंने अपने नायक को कुँवर अमर सिंह के भाले के एक ही आघात से उसके अश्व समेत इस प्रकार धरती में बिंधते एवं निष्प्राण होते देखा होगा!

सेरिमा अब भी जीवित था और उसने सहायता हेतु इधर-उधर देखा भी, किंतु तब तक उसके सैनिक इधर-उधर भाग खड़े हुए थे और अब सेरिमा के निकट केवल मेवाड़ी योद्धा ही खड़े थे।

सेरिमा ने उन सैनिकों से पूछा कि वह योद्धा कौन है, जिसने इस कुशलता के साथ उसे भाले के वार से मृत्यु के कगार पर पहुँचा दिया है ? सेरिमा ने उस योद्धा से मिलने की इच्छा जताई। कुँवर अमर सिंह ने प्रताप की ओर देखा। प्रताप ने मौन स्वीकृति दी, तब अमर सिंह आगे आए। इस बीच मेवाड़ी सैनिकों ने सेरिमा के शस्त्र उससे ले लिये, ताकि वह मेवाड़ के राजकुमार पर कोई कपटपूर्ण घात न कर दे।

इस बात का उल्लेख कई जगह किया गया है कि कोई भी सैनिक मुगलों के सेनापति सेरिमा के शरीर से उस भाले को नहीं निकाल पाया था, तब कुंवर अमर सिंह आगे आए। उन्होंने एक हाथ से ही उस भाले को धरती, अश्व एवं सेरिमा के शरीर से निकाल लिया। ऐसा माना जाता है कि मृत्युपूर्व सेरिमा ने कहा था, “मुझे दैवीय प्रकाश से ओत-प्रोत एक बलिष्ठ पुरुष दिखाई दे रहा है, मैं भाग्यशाली हूँ कि मैं इस देवपुरुष के हाथों से मारा गया हूँ।”

ऐसा भी कहा जाता है कि सेरिमा ने मृत्युपूर्व अपने मुँह में गंगाजल डालने की इच्छा जताई थी। सेरिमा के अंतिम समय में स्वयं प्रताप ने उसके मुँह में गंगाजल डाला तथा उन्होंने सेरिमा की मृत्यु के पश्चात् उसके पार्थिव शरीर को सम्मान सहित दफनाने का आदेश भी दिया। इस घटना के पश्चात् तीन घंटे तक चला दिवेर का युद्ध रुक गया एवं मुगल सेना बुरी तरह पराजित होकर भाग खड़ी हुई। जो भी मुगल सैनिक इस युद्ध में लड़ रहा था अथवा वहाँ से भाग रहा था, उसे मेवाड़ी योद्धाओं ने बिना किसी दया के समाप्त कर दिया।

दिवेर के इस युद्ध में एक भी युद्धबंदी नहीं था। दोपहर तक दिवेर के थाने पर केसरिया ध्वज फहरा दिया गया था। प्रताप एवं उनकी सेना द्वारा प्रचंड आक्रमण कर मुगल सेना का सर्वनाश किया गया और यहीं से मेवाड़ से मुगलों को पूर्णतया समाप्त कर उन्हें बाहर निकालने का अभियान प्रारंभ हुआ।

बहलोल खाँ मुगलों में एक उज्बेक सेनानायक था। वह नृशंस व भीमकाय योद्धा था। उससे शत्रु सदैव भयभीत रहते थे। उसका युद्ध कौशल एवं उसकी पाशविक प्रवृत्ति उसे उच्चकोटि का शत्रु बनाती थी। बहलोल खाँ, दिवेर के दूसरे छोर पर अपनी सेना के साथ तैनात था और यह दूसरा छोर कुंभलगढ़ के मार्ग पर स्थित था। बिना एक भी पल गँवाए प्रताप ने अपने कुछ सैनिकों को लेकर इस छोटे ठिकाने पर आक्रमण कर दिया। प्रताप को स्पष्ट रूप से स्मरण था कि किस तरह से इस बहलोल खाँ उज्बेक ने उनके मित्रों एवं संबंधियों को निर्दयतापूर्वक हल्दीघाटी में मारा था, अतः प्रताप की बहलोल खाँ से शत्रुता बहुत सघन व निजी थी।

दिवेर के युद्ध में बहलोल खाँ से प्रताप के प्रतिशोध को इतिहास ने रक्त तथा तलवार से लिखा है। 43 वर्ष की आयु में मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह ने बहलोल खाँ पर प्रतिशोध की भावना से ऐसा प्रबल प्रहार किया कि वह हत्यारा उजबेक समझ ही नहीं पाया कि उसके साथ हुआ क्या है। प्रताप ने खड्ग के एक ही भीषण प्रहार से उस उज्बेक का शरीर सिर से धड़ तक दो हिस्सों में काट डाला। प्रताप यहीं नहीं रुके। उनकी खड्ग का प्रहार इतना सबल था कि बहलोल खाँ का घोड़ा भी बीच में से आधा कट गया।

आस-पास युद्धरत सैकड़ों मेवाड़ी व मुगल सैनिक इस अद्भुत दृश्य को देख हतप्रभ रह गए। ऐसा प्रतीत होता था, मानो इस्लामी विचारधारा के विरुद्ध सभी हिंदुओं का क्रोध, प्रताप के हाथों उस प्रचंड आघात में एकत्र होकर बहलोल खाँ पर गिरा था।

पद्मिनी का निःशब्द होकर अग्नि को समर्पित हो जाना, रतनसिंह की कपटपूर्वक हत्या, प्रताप के पितामह राणा सांगा के विरुद्ध खानवा में षड्यंत्र और उनकी हत्या, चित्तौड़ के तीसरे साके में हिंदुओं का नरसंहार, दशकों तक अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं में वन-वन भटकना, मित्रों-संबंधियों इत्यादि को हल्दीघाटी के युद्ध में अकाल मृत्यु को प्राप्त होते देखना, वह सब कुछ जो इस उपमहाद्वीप के हिंदुओं ने मुसलमानों की ओर से झेला था, उस हर अत्याचार का प्रत्युत्तर, इस निर्णायक युद्ध में प्रताप ने दे दिया।

प्रताप ने उस दिन एक मुगल सेनानायक को ही नहीं मारा, वरन् उन्होंने पूरे विश्व को यह संदेश दे दिया था कि हिंदुओं का क्रोध क्या रूप धारण कर सकता है! यदि हिंदू दृढ़प्रतिज्ञ हो, अपनी स्वाधीनता एवं स्वाभिमान हेतु शस्त्र उठा लें, तो किस प्रकार से वे शताब्दियों से चले आ रहे दमन का प्रतिशोध एक पल में ले सकते हैं! विश्व भर के इतिहास में कभी भी, कहीं भी ऐसा प्रकरण नहीं घटा है, जब एक राजा ने इस प्रकार से अपने प्रतिशोध का गुबार निकाला हो!

प्रताप ने उस दिन हल्दीघाटी का ही प्रतिशोध नहीं लिया, वरन् उन्होंने अकबर की धूर्तता एवं कायरता के उस दुर्ग को ही बीच में से काटकर रख दिया था, जो अकबर ने हिंदुओं पर विजय हेतु बनाया था। 1583 के उस दिन से जनवरी 1597 में उनके मोक्ष के दिन तक, फिर किसी भी बड़े योद्धा ने प्रताप के साथ सीधा युद्ध करने की हिम्मत नहीं की। कोई आश्चर्य की बात नहीं, यदि इस दिन के पश्चात्, अकबर ने अपने सेनानायकों से कई बार मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए कहा, किंतु एक ने भी हाँ में सिर नहीं हिलाया।

इस आघात का मुगलों की मनःस्थिति पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि प्रताप ने एक ही रात में मेवाड़ से 32 मुगल थानों को अपने अधिकार में ले लिया। जिस दिन दिवेर पर विजय प्राप्त हुई, उसी दिन दिवेर में हिंदू थानेदार को बिठाकर सेना को दो भागों में विभक्त किया गया। अमर सिंह आधी सेना लेकर पूर्व की ओर निकले, दिवेर से भागे मुगल सैनिकों का आमेट तक पीछा कर उन्हें समाप्त किया गया। आमेट की रक्षा में लगी मुगल सेना का अमर सिंह एवं उनकी सेना ने पूर्ण संहार कर दिया।

इधर प्रताप ने दक्षिण-पश्चिम की ओर मुँह किया एवं कुंभलगढ़ पहुंच गए। मुगलों की सेना वहाँ से भाग खड़ी हुई एवं जो मुगल वहाँ डटे रहे, उन्हें परलोक पहुंचाकर प्रताप कुंभलगढ़ में घुसे। शाहबाज खान ने 1578 ईसवी में प्रताप से कुंभलगढ़ छीना था, जिसे प्रताप ने केवल पाँच ही वर्षों में पुनः प्राप्त कर लिया। केवल इन्हीं पाँच वर्षों के लिए कुंभलगढ़ हिंदू स्वामित्व में नहीं रहा।

इतिहास में केवल प्रताप ही ऐसे साहसी एवं दृढ़ निश्चयी राजा रहे, जिन्होंने तथाकथित 'शक्तिशाली मुगल साम्राज्य' से अपना हारा हुआ दुर्ग पुनः प्राप्त किया। इस बीच अब्दुल्ला नाम का एक शक्तिशाली मुगल सेनानायक भी अपनी सेना समेत प्रताप के हाथों मारा गया। कुंभलगढ़ के निकट ही एक और मुगल थाना हम्मीरसर भी प्रताप के हाथ में आ गया। इसके पश्चात् प्रताप दक्षिण में स्थित ओवरो गाँव की ओर बढ़े। उन्होंने टिन तथा चाँदी का उत्पादन करने वाली जावर की खदानों को हस्तगत कर लिया। आर्थिक दृष्टि से मेवाड़ के लिए इन खदानों पर अधिकार करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।

मेवाड़ को घेरे हुए सभी बत्तीस थानों पर आक्रमण किए गए एवं वहाँ तैनात मुगल सेनाओं को निर्दयता से समाप्त कर दिया गया। कर्नल टॉड, मेवाड़ के इस प्रकरण पर लिखते हैं, “प्रताप ने मेवाड़ को मरुस्थल बना दिया।”

जो प्रताप के सामने आया, प्रताप की तलवार की भेंट चढ़ गया। मेवाड़ के मैदानी तथा पठारी क्षेत्रों में सब कुछ अब प्रताप की तलवार की छाया में था। यह प्रताप द्वारा मातृभूमि की सेवा में किया गया अद्वितीय किंतु वांछनीय समर्पण व त्याग था। बहुत कम समय तक चले इस अभियान में प्रताप एवं कुँवर अमर सिंह ने चित्तौड़ के अतिरिक्त पूरा मेवाड़ पुनः प्राप्त कर लिया था।

मेवाड़ को दोनों ही ओर से सुरक्षित कर प्रताप एवं अमर सिंह जब उदयपुर आए तो उन्होंने देखा कि आस-पास के थानों से मुगल भाग चुके थे।

यह प्रताप के ही प्रचंड अभियान का प्रभाव था कि उदयपुर जैसे महत्त्वपूर्ण नगर व क्षेत्र के लिए मुगलों ने कोई संघर्ष ही नहीं किया तथा उदयपुर पर सहज ही प्रताप का अधिकार हो गया। बहलोल खाँ की दुर्गति का समाचार मुगल हरकारों ने विद्युत् की तरह पूरे मेवाड़ व देश में फैला दिया था। पूरे मेवाड़ में मुगल सैनिकों में भगदड़ मच गई। जिसे जो साधन मिला, उसी पर चढ़कर वह प्रताप, कुंवर अमर व मेवाड़ी सेना के प्रकोप से बचने के लिए भाग निकला। दिवेर का युद्ध एवं उसके पश्चात् मेवाड़ का पुनः प्राप्त करने के लिए चलाए गए अभियान ने उपमहाद्वीप में प्रताप को अकबर के सामने निर्विवाद हिंदू नायक के रूप में स्थापित कर दिया था।

प्रताप द्वारा प्राप्त की गई इस विजय के विषय में काफी ऐसी जानकारियाँ इत्यादि हैं, जिन्हें पुस्तकों को जलाकर, मंदिरों को ध्वस्त कर, मुगलों द्वारा इतिहास से मिटा दिया गया, किंतु लोककथाओं ने प्रताप की इस विजयगाथा को मेवाड़ के जन-जन की स्मृतियों में सदा के लिए अमर कर दिया। रणछोड़ भट्ट, वीर विनोद, जेम्स टॉड एवं राजस्थान के विश्वविद्यालयों के कई समकालीन इतिहासकारों ने दिवेर के अभियान में हुई घटनाओं को ग्रंथों में सहेजकर रखा है। किंतु हम जैसे आमजनों के लिए दिवेर के अभियान की सफलता इस बात से स्थापित होती है कि 1583 ईसवी से 1597 ईसवी तक प्रताप ने निःशंक होकर राज किया।

उस समय के विश्व की तथाकथित सर्वाधिक शक्तिशाली मुगल सल्तनत के स्वामी अकबर और उसकी सेना ने कभी मेवाड़ पर पुनः आक्रमण करने का साहस भी नहीं किया। इस देश के अधिकांश निर्लज्ज इतिहासकारों ने अकबर द्वारा प्रताप पर पुनः आक्रमण न करने का कारण भारत के अन्य प्रदेशों में अकबर की व्यस्तता बताया है।

सत्य यह है कि प्रताप व कुँवर अमर सिंह के क्रोध व पराक्रम की पवित्र अग्नि में मुगल अतिक्रमण जलकर राख हो गया था। प्रताप की निर्णायक विजय को छोटा सिद्ध करने के लिए इन घटिया वामियों-जिहादियों ने स्वयं के जितना ही घटिया झूठ गढ़ा।

सरल सी तर्कनिष्ठा से ही यह प्रश्न उठ जाता है कि यदि अकबर भारत में अन्यत्र व्यस्त था, तो उसने 1568 ईसवी से लेकर 1583 ईसवी में, 15 वर्षों तक, चार संधि प्रस्ताव, दस से अधिक सैन्य अभियान तथा करोड़ों रुपए व सहस्रों सैनिक मेवाड़ विजय में क्यों व्यय किए थे ?

इस्लामी मानसिकता के इन गुलामों और इनके हिंदू चाटुकारों के लिए यह तथ्य एक असहनीय वेदना है कि एक अकेले हिंदू राजा, महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को धूल चटाकर अपने जीवनपर्यंत उन्हें मेवाड़ में घुसने नहीं दिया।

अकबर का भारत के पूर्ण इस्लामीकरण का स्वप्न, एक प्रताप के कारण स्वप्न ही रह गया। यही कष्ट इस अभागे देश के छद्म बुद्धिजीवियों को कचोटता है। इसीलिए वे नए-नए झूठ गढ़कर प्रताप के शौर्य को तुच्छ दिखाने के असफल प्रयास करते रहते हैं। खैर, हरसंभव प्रयास के उपरांत भी, प्रताप के सत्य को ये मक्कार इतिहासकार नहीं मिटा पाए। अब इंटरनेट के इस युग में तो हर हिंदू के घर से प्रताप का सत्य बोला जाएगा।

प्रताप के त्याग व योग्यता की कथा पूरा विश्व कृतज्ञता व विस्मय से सुनेगा। यह हर हिंदू का दायित्व है।

मुगलों को मेवाड़ से खदेड़ने के बाद प्रताप अन्य हिंदू राजाओं की सहायता से धन एवं सेना भी एकत्र कर रहे थे, ताकि पहले चित्तौड़ एवं उसके पश्चात् दिल्ली पर आक्रमण कर पाएँ, किंतु इससे पहले ही आखेट के समय दुर्भाग्यवश, प्रताप को एक गंभीर चोट लगने से उनका देहावसान हो गया। जीवनलीला पूरी होने से पहले प्रताप ने मेवाड़ का सम्मान एवं संपन्नता पुनः प्राप्त कर ली थी तथा कुँवर अमर सिंह को मेवाड़ का संपन्न और सशक्त राज्य सौंपकर यह महापुरुष स्वर्ग सिधार गए।

दिवेर का युद्ध तब हुआ, जब अकबर एवं उसके हिंदू सेनापतियों ने शेष भारत में हिंदू विद्रोह व विरोध के स्वरों का पूरी तरह से दमन कर दिया था। हिंदू इतिहास में दिवेर का यह युद्ध स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए, क्योंकि यहीं से प्रताप ने अपने खोए हुए राज्य को पुनः प्राप्त करने का अभियान छेड़ा एवं मेवाड़, राजस्थान एवं भारतवर्ष में एक नए आत्मविश्वास का संचार किया।

दिवेर की विजय और प्रताप द्वारा मुगलों के भीषण संहार से मुस्लिम आक्रांताओं में स्पष्ट और सबल संदेश गया कि हिंदू अब अपने धर्म के विरुद्ध कुछ सहन नहीं करेंगे। चाहे वह शक्ति का प्रयोग हो या कपट का। जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी की तुलना थर्मोपाइल के युद्ध से की थी तो दिवेर के युद्ध की तुलना उन्होंने मैराथन के युद्ध से की है।

490 ईसा पूर्व में ग्रीक व फारसी सेना के बीच मैराथन में युद्ध हुआ, जिसमें ग्रीक सेना ने निर्णायक विजय प्राप्त की। सही शब्दों में दिवेर 'मेवाड़ का मैराथन' ही कहा जाएगा, जिसने पूरे उपमहाद्वीप के हिंदुओं में इस भावना को स्थापित कर दिया था कि समय आने पर हिंदू योद्धा किस निर्ममता से शत्रु को समाप्त कर सकते हैं!

प्रताप वह महापुरुष थे, जिन्होंने इस्लामी साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिंदू संघर्ष की ज्वाला को उस समय भी जाग्रत् रखा, जब सभी ओर से आशाएँ समाप्त हो चुकी थीं एवं मेवाड़ के पुनरुद्धार का मार्ग दूर-दूर तक नहीं दिख रहा था। आज यदि हम हिंदू हैं तो इसका श्रेय केवल महाराणा प्रताप सिंह को जाता है। दिवेर की उस घाटी का तीर्थ की भाँति पूजन होना चाहिए, जहाँ प्रत्येक हिंदू जीवन में कम-से-कम एक बार जाकर मेवाड़ की उस पवित्र धरा के दर्शन करे। हर हिंदू मेवाड़ के उन महान बलिदानी योद्धाओं के सम्मान में कम-से-कम एक बार अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देकर आए, जिन्होंने धर्म और सम्मान हेतु अपने प्राणों को अर्पित कर दिया।

दिवेर को हिंदुओं के उस अदम्य साहस का प्रतीक बनाना हर हिंदू के लिए प्रताप व मेवाड़ के हमारे पुरखों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पुनीत अवसर है। दिवेर की युद्ध तीर्थ के रूप में स्थापना, हर हिंदू के लिए उस दिन के रोमांचक शौर्य के स्पंदन को साक्षात् अनुभव करने का एक अवसर है। दिवेर की पुनर्स्थापना हमें उस अकथनीय शौर्य के दर्शन करा सकती है, जिसके आधार पर हिंदुओं ने चौदह सौ वर्षों तक इस्लामी आक्रमणों का सामना किया है।

वही अद्भुत पौरुष आज के हिंदुओं को आत्मविश्वास प्रदान कर सकता है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम आने वाले चौदह सौ वर्षों तक इस्लामी शक्तियों का सामना कर पाएँ। महाराणा प्रताप को हमारी यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

दिवेर की पवित्र घाटी के प्रति यही हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी।