Khand - 02 Maharana in Hindi Biography by Hind Gaurav books and stories PDF | खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 8

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खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 8

करण सिंह (1620-1628 ईसवी) एवं जगत सिंह (1628-1652 ईसवी)

करण सिंह को 1620 ईसवी में आधिकारिक रूप से मेवाड़ का महाराणा बना दिया गया। करण सिंह साहसी योद्धा तो थे ही, साथ ही सरल हृदय तथा परोपकारी राजा भी थे। करण ने अपने आठ वर्ष के शासन में युद्धों से खंडित मेवाड़ को आर्थिक व सामाजिक रूप से सुदृढ़ करने का प्रयास किया।

उन्होंने बिना किसी सशस्त्र संघर्ष के केवल अपने बुद्धि-चातुर्य एवं नीति-कौशल्य से मेवाड़ की सीमाओं का मालवा एवं गुजरात में विस्तार किया। हमने अमर सिंह के अध्याय में पढ़ा एवं जाना कि करण सिंह आगरा तथा अजमेर में लगाए गए जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुए थे।

जहाँगीर के पुत्र खुर्रम से उनकी अभिन्न मित्रता भी इसी समय हुई। यही खुर्रम आगे जाकर 'शाहजहाँ' के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा।

करण सिंह के राजकाल में खुर्रम ने अपने पिता जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, जिसके फलस्वरूप मुगल साम्राज्य उत्तराधिकार के इस युद्ध में दो फाड़ हो गया। यद्यपि करण ने खुर्रम को उदयपुर में शरण दी, किंतु जहाँगीर से किसी भी प्रकार का वैर नहीं लिया, क्योंकि जहाँगीर स्वयं करण सिंह को पुत्र के समान मानता था।

मुस्लिम पुस्तकों के अनुसार शाहजहाँ, कभी करण सिंह के राजकाल में मेवाड़ का अतिथि रहा ही नहीं, क्योंकि एक भावी मुगल सुल्तान किसी हिंदू की शरण ले, यह मुसलमानों के लिए अपमान का एक विषय है, किंतु इस संबंध में अनेक साक्ष्य हैं, जो इस घटनाक्रम को प्रामाणिक बनाते हैं।

रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा रचित 'राजप्रशस्ति' नामक ऐतिहासिक ग्रंथ में शाहजहाँ के विषय में उल्लेख है, तैलंग मेवाड़ के राज्याश्रय प्राप्त इतिहासकार थे। इसके अतिरिक्त बीकानेर एवं बूँदी के इतिहास में भी शाहजहाँ का उल्लेख है।

मुगल बादशाह शाहजहाँ की लाल मुगल पगड़ी, अब भी मेवाड़ राजघराने के पास सुरक्षित है। उस समय में यदि दो राजा मित्रता करते थे तो वे आपस में पगड़ियाँ बदलते थे। इस बात से यह स्थापित होता है कि करण सिंह ने मेवाड में शाहजहाँ को शरण दी थी। इस घटना से मेवाड़ का आगरा एवं दिल्ली के आंतरिक मामलों में प्रभाव भी स्पष्ट होता है। जहाँगीर ने करण सिंह द्वारा खुर्रम को शरण देने की घटना पर अधिक ध्यान नहीं दिया। करण भी मेवाड के राणा के रूप में फिर कभी आगरा नहीं गए, वरन् अपने पुत्र जगत सिंह को मेवाड़ का प्रतिनिधि बनाकर भेजा। इस बात से जहाँगीर भी संतुष्ट हो गया था एवं उसने शेष भारत में युद्ध लड़ने में अपना समय व्यतीत किया। 

1627 ईस्वी में जहांगीर की मृत्यु के पश्चात करण ने खुर्रम का खुलकर पक्ष लिया एवं उसे दिल्ली के उत्तराधिकार के युद्ध में विजय पाने में सहायता की। इस तरह से करण ने भविष्य में मेवाड़ के महाराणा बनने वाले अपने पुत्र जगत सिंह का स्थान अधिक सुरक्षित व शक्तिशाली बना दिया। उधर खुर्रम ने अपने श्वसुर आसफ खाँ के साथ मिलकर अपने सभी भाइयों की हत्या कर दी। जहाँगीर के अन्य पुत्रों के दुःखद अंत के विषय में नीचे लिखा है, जिससे ज्ञात होता है कि मुगल शहजादे किस प्रकार सत्ता-लोलुपता में अंधे थे! अपने पिता एवं परिवार से द्रोह कर, सत्ता हथियाने को कितने घृणित कर्म कर लेते थे। अपने ही सहोदरों में छिड़े उत्तराधिकार के इस संघर्ष में जो जितना अधिक क्रूर एवं निर्दयी होता था, उसके विजयी होने की संभावना उतनी ही अधिक होती थी।

इस्लामी शासक न केवल हिंदुओं पर, वरन् अपने संबंधियों, मित्रों व आम मुसलमानों के साथ भी उतने ही बर्बर हो जाते थे, जितने कि अन्य धर्मों के साथ। ऐसे में उनका एकमात्र लक्ष्य केवल शक्ति एवं सत्ता प्राप्त करना होता था, फिर वह चाहे किसी भी मूल्य पर मिले। इसके विपरीत, मेवाड़ जैसे हिंदू राज्य में प्रताप के समक्ष ऐसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। उनका अपना राज्यारोहण हो रहा था, किंतु उन्होंने कभी सत्ता-प्राप्ति हेतु अपने परिजनों का रक्त नहीं बहाया। जहाँगीर के ज्येष्ठ पुत्र परवेज का सभी मुगल सरदारों ने एवं जोधपुर तथा जयपुर ने साथ दिया था। भीम सिंह नाम से करण सिंह के ही भाई, जो शाहजहाँ के साथ बड़े हुए थे, उन्होंने भी शाहजहाँ का इस उत्तराधिकार युद्ध में साथ दिया था।

भीम सिंह एक महान योद्धा थे। वर्तमान उत्तर प्रदेश में जिला जौनपुर में उस समय भीषण युद्ध हुआ था, जिसमें शाहजहाँ की ओर से लड़ते हुए भीम सिंह ने वीरगति प्राप्ति की। भीम सिंह के इस मित्रवत् बलिदान का मूल्य शाहजहाँ ने जीवन पर्यंत चुकाया। शाहजहाँ न केवल करण सिंह, वरन् उनके पुत्र जगत सिंह एवं उनके पौत्र राजसिंह के प्रति भी सदैव सहिष्णु बना रहा। परवेज अत्यधिक मदिरापान के कारण मात्र 38 वर्ष की आयु में 1626 ईसवी में यकृत के सिरोसिस की व्याधि से मृत्यु को प्राप्त हुआ। जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र खुसरो मिर्जा योग्य व्यक्ति व साहसी योद्धा था और अपने दादा अकबर का भी लाड़ला था। इसी कारण अकबर ने जहाँगीर की इच्छा के विरुद्ध उसे मुगल शासन का उत्तराधिकारी घोषित करने की सोची थी, किंतु 1605 ईसवी में अकबर की मृत्यु के पश्चात् जहाँगीर ने खुसरो मिर्जा को स्वयं पराजित कर उसे अंधा कर दिया था।

कालांतर में शाहजहाँ के आदेश पर आसफ खाँ द्वारा 1622 ईसवी में खुसरो की हत्या कर दी गई।

जहाँगीर के कनिष्ठ पुत्र शहरयार को खुर्रम ने एक युद्ध में पराजित कर 1628 ईसवी में उसकी हत्या कर दी। अपने सभी भाइयों को समाप्त करने के पश्चात् खुर्रम ने 'शाहजहाँ' नाम प्राप्त किया एवं इसी नाम से वह 1628 ईसवी में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। खुर्रम की उत्तराधिकार के युद्ध में करण सिंह द्वारा की गई सहायता का शाहजहाँ ने आजीवन उपकार माना और इसका समुचित मूल्य भी चुकाया। करण सिंह ने तो जहाँगीर की मृत्यु का समाचार मिलते ही खुर्रम को अपने सरदारों द्वारा सूरत तक सूचना पहुँचाई, जहाँ वह छुपा हुआ था तथा उसे सूरत से ही उदयपुर बुलवा भेजा।

उदयपुर के ही बादल महल में मेवाड़ तथा आसपास के सभी राजकुमारों एवं सरदारों ने मिलकर खुर्रम को 'शाहजहाँ' का नाम दिया था। आगरा पहुँचते ही शाहजहाँ ने मेवाड़ की पाँच जागीरें उन्हें पुनः लौटा दीं एवं करण सिंह को एक बहुमूल्य माणिक भेंट करते हुए करण की इच्छानुसार उन्हें चित्तौड़गढ़ का पुनर्निर्माण करने की छूट भी दे दी। साथ ही मेवाड़ में शस्त्रास्त्र के उत्पादन के कारखाने स्थापित करने की भी छूट दी गई।

करण के जीवन की एक और महत्त्वपूर्ण घटना का यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है। किस प्रकार सौभाग्य ने महाराणाओं की रक्षा की तथा मेवाड़ के महाराणाओं तथा चारण समाज के प्रगाढ़ संबंधों के विषय में भी ज्ञात होता है। 1625 ईसवी में करण सिंह ने जयपुर के एक नरुका राजपूत को अज्ञात कारणों से मृत्युदंड दे दिया।

इस मृत नरुका राजपूत के छोटे भाई ने अपने भाई के प्रतिकार की शपथ ली एवं अपने हृष्ट-पुष्ट घोड़े पर चढ़कर वह मेवाड़ आ गया। उस समय खेमराज चारण नामक एक युवा योद्धा, शस्त्रागार में काम करता था। नरुका ने खेमराज को भारी धनराशि के बदले में अपनी तलवार तेज करने के लिए कहा। साथ ही नरुका ने अपने घोडे की नाल को ठीक करने के लिए भी आवश्यकता से अधिक धन दिया।

खेमराज को नरुका पर संदेह हो गया एवं उसने उसका पीछा किया। अगले दिन करण सिंह के पुत्र एवं मेवाड़ के उत्तराधिकारी, जगत सिंह आखेट से वापस लौट रहे थे। करण सिंह स्वयं महल की सबसे ऊँची जगह से उन्हें लौटते हुए देख रहे थे। ऐसे में कृष्ण पोल के निकट“मैं यहाँ तुमसे अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने आया हूँ” ऐसा कहते हुए नरुका ने अचानक ही जगत सिंह पर आक्रमण कर दिया।

दूर से देख रहे करण सिंह भी घबराकर चिल्लाए, “मेरा कुलदीपक बुझा! कोई बचाओ!”

उसी समय पहले से तैयार बैठा खेमराज, नरुका एवं जगत के मध्य आ गया। उसने एक ही प्रहार में नरुका राजपूत का एक हाथ तथा मस्तक धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार एक सामान्य नागरिक की दूरदृष्टि तथा स्वामिभक्ति के कारण मेवाड़ के उत्तराधिकारी के जीवन की रक्षा हो सकी।

कहते हैं– ‘सतत जागरूकता ही स्वतंत्रता का मूल्य है।’खेमराज ने नरूका के धन के लोभ में अपने विवेक का विनिमय नहीं किया, इस प्रकार देश व धर्म को बहुत बड़े संकट से बचा लिया।

करण ने खेमराज को अपने पुत्र के रूप में ग्रहण किया एवं उसे जगत सिंह का मुख्य अंगरक्षक भी बनाया। 1628 ईसवी में करण सिंह अपने आठ वर्षों का राजकाल भोगकर मात्र 45 वर्ष की अल्पायु में, अज्ञात व्याधि के कारण परलोक सिधार गए। इसके पश्चात् करण सिंह के उत्तराधिकारी जगत सिंह मेवाड़ के महाराणा बने तथा उन्होंने मुगलों से बिना छेड़खानी के चौबीस वर्षों तक शांतिपूर्वक राज किया। इस शांतिकाल में विभिन्न कलाओं, विशेषकर स्थापत्य कला का खूब उत्थान हुआ। 

मेवाड की जनता द्वारा उठाए गए कष्टों के पश्चात् उदयपुर की वर्तमान सुंदरता का श्रेय मुख्यतः इन्हीं महाराणा को जाता है। जगत सिंह ने उदयपुर नगर को अप्रतिम सुंदरता के एक उदाहरण के रूप में विकसित किया और आज न केवल देश भर में, वरन विश्व भर में भी उदयपुर विख्यात है। उदयपुर को नहरों पर बसे इटालवी नगर वेनिस से तुलना करते हुए 'पूर्व का वेनिस' भी कहा जाता है।

जगत सिंह ने हिंदू तीर्थस्थलों में तीर्थयात्रियों के लिए विभिन्न निर्माण करवाए।

उनकी निजी तीर्थयात्राओं में भी उनके साथ विशाल सेना चलती थी। विभिन्न अवसरों पर स्थानीय मुस्लिम शासकों एवं जागीरदारों द्वारा उनकी यात्रा में व्यवधान डाले गए, किंतु उन्होंने कभी भी किसी विधर्मी का संज्ञान ही नहीं लिया। द्वारका एवं हरिद्वार के उनके प्रवास के समय में मुस्लिम लुटेरों द्वारा हिंदू व्यापारियों पर होने वाले अत्याचारों एवं करों से उन्होंने हिंदुओं को मुक्त करवाया।

एक बार मालवा के सूबेदार के साथ उनका आमने-सामने का संघर्ष भी हुआ, जिसमें सूबेदार की बुरी तरह पराजय हुई। मुसलमान सूबेदार ने जगत सिंह के विरुद्ध शाहजहाँ को एक पत्र लिखा, जिसे शाहजहाँ ने अनावश्यक मानकर अनदेखा कर दिया। यह मानना होगा कि करण व जगत सिंह की मित्रता का शाहजहाँ ने भी प्रतिफल दिया। उस कालखंड में मेवाड़ की आर्थिक व सैन्य प्रगति में शाहजहाँ की उपेक्षा का भी सक्रिय योगदान था।

जगत सिंह ने उदयपुर में प्रसिद्ध जगदीश मंदिर के निर्माण के साथ चित्तौड़ के दुर्ग का भी पुनर्निर्माण करवाया।

इसके अतिरिक्त शाहजहाँ की अनदेखी का लाभ उठा जगत सिंह ने डूंगरपुर, बाँसवाड़ा और सिरोही में मेवाड़ का प्रभाव बढ़ाया। 1652 ईसवी में जगत सिंह के 45 वर्ष की अल्पायु में स्वर्गारोहण के पश्चात् उनके ज्येष्ठ पुत्र राजसिंह ने मेवाड़ का शासन सँभाला।

महाराणा राजसिंह ने उत्तरोत्तर प्रगति कर अपने पूर्वजों की ख्याति को और प्रगाढ़ता से स्थापित किया।

जगत व करण द्वारा अर्जित मेवाड़ की संपदा, इन्हीं राजसिंह को हिंदुओं के सर्वाधिक दुष्ट एवं घृणित शत्रु औरंगजेब की कुटिल विस्तारवादी नीतियों से निपटने हेतु काम आने वाली थी। मेवाड़ के हर महाराणा ने अपने-अपने स्वभाव, प्रतिभा व योग्यता के अनुसार धर्म व राष्ट्र की सेवा की। ये महाराणा सत्तामद में अंधे, हिंसक या शोषण करने वाले शासक नहीं थे। ये विलक्षण पुरुष, काल व परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने वाले महामना थे। निज महत्त्वाकांक्षा, लोकहित के सम्मुख गौण थी।

आज के हमारे शासक इन महाराणाओं से यह सरल सा सिद्धांत सीख लें, तो हमारा देश एवं धर्म और भी तीव्र गति से प्रगति कर सकता है।