Chalo Dur kahi - 22 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 22

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चलो दूर कहीं..! - 22

चलो दूर कहीं.. 22

अनाह के माथे की लाइट जबतक जलती रही रोहन बुत बना खड़ा रहा.. और जैसे ही लाइट बुझी वैसे ही अनाह ने कहा, " क्या हुआ मि. रोहन आप तो मुझे ऐसे घूर रहे हैं जैसे मैं कोई भूत हूं..?" 

"अरे .. नहीं.. नहीं... ऐसी कोई बात नहीं है। दरअसल मुझे ऐसा लगा जैसे मैं यहां हूं ही नहीं..! और तुम पर कैसा शक तुम हमारी प्रतीक्षा के फ्रेंड हो तो मेरे भी फ्रेंड हुए.. अच्छा छोड़ो इन बातों को चलो पहले कुछ खा लेते हैं.. जोरों की भूख लगी है। " कहकर वह अनाह को देखा तो उसने प्रतीक्षा, रवि और सुमी के ओर इशारा करते हुए कहा, " इन्हें ले जाओ.. मुझे भूख नहीं है,मैं यही रहता हूं..!" 

"भला ऐसा क्या खा लिए हो कि अबतक तुम्हें भूख नहीं लगी है.. चलो सभी साथ में खाते हैं…!" 

 रोहन के जिद करने पर रवि ने कहा, "रोहन भैया.. अनाह को भूख नहीं लगता उसे कुछ भी खाने पीने की जरूरत नहीं पड़ती है..!" 

"चुप बदमाश कहीं का कुछ भी अनाप-शनाप बकता रहता है..! ऐसी कोई बात नहीं है मि. रोहन..! मुझे भी भूख लगती है मगर थोड़ा कम.. आप सब जाइए खाना खा आइए.. झूठ मूठ का वक्त बर्बाद करने से कोई फायदा नहीं..! "

अनाह के इतना कहते ही प्रतीक्षा बोली," अनाह को यहीं रहने दो रोहन चलो हम-सब खाकर आते हैं..! " कहकर वह आगे बढ़ी और रोशनी में आई तो पहली बार रोहन उसे गौर से देखा..गोरा सुंदर चेहरा कुम्हलाया हुआ था, आंखें धंसी हुई थी,बाल चिड़ियां के घोंसले की भांति उलझा हुआ था, गदराया बदन सुखकर कांटा हो गया था..वह हवा के तेज झोंके से फड़फड़ाते धोती को कसकर पकड़े वह अपने लाज को बचाने के जद्दोजहद में जुटी थी कि धोती के फटे हिस्से से  झांकते उसके बदन पर रोहन की नजर पड़ी तो  उसने कहा, " प्रतीक्षा जरा रुकना..!"

और दौड़ कर वह अपने गाड़ी के पास गया, गाड़ी में पड़ा अपना जैकेट निकाला और भागते हुए प्रतीक्षा के पास आया और उसे अपने हाथों से जैकेट पहनाकर कहा," अब चलो..! " कहकर वह आगे बढ़ गया लेकिन उसका ये अपनापन और प्यार उसकी तड़पती आत्मा को मरुभूमि में गिरे बारिश की बूंदों की भांति तृप्त कर गया..! उसकी पोरें गीली हो गई..! 

चारों को ढाबे की ओर आता देख वही लड़का जो कुछ देर पहले प्रतीक्षा को भिखारिन कहकर रोहन को उसके पास जाने से रोक रहा था,भागता हुआ आया और बड़े अदब से कहा,"आइए साहब ..इधर आइए..!" और उन्हें एक कमरे में ले जाकर बैठाते हुए पूछा,"क्या लगाऊं साहब..?" 

"जो बढ़िया हो फटाफट लाओ..!" रवि ने कहा तो उसने चारों के सामने ग्लास रखते हुए कहा,"अभी तो सिर्फ तड़का रोटी हो सकेगा साहब..!" 

"अरे कोई बात नहीं वही लगाओ और हां एक प्लेट ज्यादा लगाना अनाह पेड़ के नीचे बैठा है उसका खाना वहीं पहुंचा देना..!" 

वह लड़का आर्डर लेकर वहां से चला गया तो प्रतीक्षा और सुमी फ्रेस होने बाथरूम चली गई। रोहन और रवि चुपचाप बैठे हुए थे कि रवि ने पूछा,"रोहन भैया.. प्रतीक्षा आपकी कौन है..?"

एकाएक रवि के इस तरह के प्रश्न पूछने से रोहन को कोई जबाब देते नहीं बना वह कुछ देर उसे बस देखता रहा.. और फिर मुस्कुराते हुए धीरे से कहा,"दोस्त हैं..!" 

"अच्छा..कैसी वाली दोस्ती है, कच्ची वाली या पक्की वाली..?" 

रवि के बातों को सुनकर रोहन ने हंसते हुए कहा,"ये कच्ची वाली और पक्की वाली दोस्ती क्या होती है मुझे नहीं मालूम..?" 

"क्या भैया आपको ये भी नहीं मालूम.. अरे भाई कच्ची वाली दोस्ती वो होती है जिसमें हम लड़ते हैं झगड़ते हैं एक दूसरे से कुट्टी होते हैं यानी सुबह में लड़ाई और शाम में सुलह और पक्की वाली दोस्ती वो होती है जिसके बिना दिन नहीं कटती..रात पहाड़ सा लगता है..!" 

रवि बोल ही रहा था कि रोहन उसे रोकते हुए कहा,"बस..बस.. मैं सब समझ गया मेरे भाई..तू पहुंचा हुआ फकीर है..!" 

"मैं पहुंचा फकीर ..आप कहना क्या चाहते हैं,साफ साफ बताइए न भैया..!" 

" तू जैसा सोचता है वैसा कुछ नहीं है..हम सिर्फ दोस्त हैं..!" 

"सिर्फ दोस्त ही रहना अच्छा है.. उससे आगे पक्की वाली सोचना भी मत...!"

वह बोलते बोलते जोर जोर से हंसते हुए फिर से कहा," जानते हैं भैया इस दुनिया में सब मतलबी है.. कोई किसी का नहीं है। यहां हर कोई भी चीज फ्री में नहीं मिलता हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है..! क्या पता आप ये जो खाना खिलाएंगे उसकी क़ीमत भी हमसे वसूल करेंगे.. यहां सब स्वार्थी हैं। 

"क्या हुआ रोहन ये रवि क्यों चिल्ला रहा है..!" 

" अभी तो ठीक से ही बातें कर रहा था..न जाने अचानक इसे क्या हुआ कि अनाप-शनाप बकने लगा..!" 

प्रतीक्षा उसके पास आते हुए पूछी तो बोलते बोलते उसकी  नजर सुमी पर पड़ी.. सांवली सुरत में भी गजब की खूबसूरत लग रही थी। वह सुमी को घूरते हुए बोला," ये रवि देखने में जितना सीधा लगता है उतना है नहीं..?"

" आपने ठीक पहचाना है भैया.. रवि वाकई बहुत शरारती है..!" सुमी कुर्सी पर बैठते हुए बोली तो रोहन ने कहा," काश ये शरारत हमेशा कायम रहे..!"

रोहन बोल ही रहा था कि वेटर (लड़का) सबके सामने खाने की थाली रखा तो रोहन बोला,"गाछ के नीचे अनाह बैठा है उसे भी खाना और पानी दे आना..!" 

"जी साहब..!" कहकर वह लड़का वहां से चला गया और जब वह खाना लेकर गाछ के नीचे पहुंचा तो धुंधली रोशनी में अनाह के शक्ल सूरत को देखकर सिहर उठा.. उसे बहुत डर लग रहा था।आज तक ऐसा जानवर नहीं देखा..उसकी आंखें कैसे जुगनू जैसा चमक रहा है.. कहीं मुझे झपट कर पकड़ लिया तो..वह मन ही मन सोचते हुए डर से थरथराते हाथों से दूर से ही खाना के थाली को अनाह की ओर धकेलकर मुड़ा ही था कि एक बेहद भारी आवाज से वह जैसे जड़ हो गया.."इतने घबराए हुए क्यों हो छोटू.. उर्फ़ शिबू..! भला दुश्मन को भी कोई ऐसे फेंककर खाना देता है क्या?" 

अनाह के आवाज को सुनकर छोटू के जैसे प्राण सूख गए..उसकी आंखें फटी की फटी रह गई .. उसने थरथराते स्वर में कहा," तुम बोल सकते हो .. और तुम्हें मेरा नाम कैसे मालूम है..? कौन हो तुम..?"

"मैं कौन हूं ये जानकर तुम क्या करोगे छोटू..? बस इतना जानो कि मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूं..और मुझसे पक्की वाली दोस्ती करोगे तो फायदे में रहोगे..!"

छोटू कुछ बोलता उससे पहले ही अनाह के माथे से नीली रोशनी निकली और देखते ही देखते छोटू उस रोशनी के जद में आ गया..!

                                                क्रमशः