His Holiness Dadashri in Hindi Biography by Nitya Oswal books and stories PDF | परम् पूज्य दादाश्री

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परम् पूज्य दादाश्री

 ✨ ज्ञानी पुरुष का परिचय ✨

ज्ञानी पुरुष के बारे में
ऐसा कहा जाता है कि इस काल में ज्ञानी पुरुष नहीं हो सकते, लेकिन ऐसा नहीं है। जो शास्त्रों में निपुण हैं, वे ज्ञानी नहीं हैं। ज्ञानीपुरुष वे हैं, जिनका खुद का आत्मा जागृत हो चुका है और जो अपनी अध्यात्मिक शक्ति द्वारा औरों को भी आत्मज्ञान की प्राप्ति करवा सकते हैं। सिर्फ ज्ञानीपुरुष ही, कि जो सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त हो चुके हैं, औरों को मुक्त करवा सकते हैं। शास्त्रों के अध्ययन द्वारा आत्मज्ञान या मोक्ष प्राप्त करना संभव नहीं है। भले ही वे शास्त्र-ज्ञानी के शब्दों को लेकर बनाए गए हों। प्रत्यक्ष ज्ञानी से ही आत्मज्ञान प्राप्त हो सकता है। ऐसे ही ज्ञानीपुरुष कुछ ही समय पहले हम सबके बीच थे। उनका नाम है परम पूज्य अंबालाल मूलजीभाई पटेल। (जो “दादा भगवान” या “दादाश्री” के नाम से जाने जाते हैं)

अंतर ज्ञानीपुरुष और गुरु में !
परम पूज्य दादाश्री कहते थे कि ज्ञानीपुरुष और गुरु में बहुत अधिक फ़र्क है! गुरु वे हैं, जिन्हें खुद को अभी तक आत्मज्ञान नहीं हुआ है, लेकिन वे शुभ कर्म करते हैं और खुद मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। वे लोगों को एक बेहतर सांसारिक जीवन प्राप्ति करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन मोक्ष सिर्फ ज्ञानीपुरुष से ही प्राप्त हो सकता है, जो आत्मज्ञान सहित होते हैं!

ज्ञानीपुरुष के कुछ गुण नीचे बताए गए हैं, जो कि आप को परम पूज्य दादाश्री, पूज्य नीरुमा और पूज्य दीपकभाई में मिलेंगे।

• उनकी वाणी और वर्तन, नम्रता एवं करुणा से भरपूर होते हैं, जो आपका दिल जीत लेते हैं।
• उनका मुक्त हास्य सभी परेशानियाँ भुला देता है।
• ज्ञानीपुरुष में नाम मात्र का भी अहंकार नहीं होता।
• ज्ञानीपुरुष में एक बूंद बराबर भी बुद्धि नहीं होती। (बुद्धि- वह ज्ञान प्रकाश जो अहंकार के माध्यम से आता है)।

ज्ञानीपुरुष आत्मा और अनात्मा के गुणधर्म जानते हैं, इसलिए वे दोनों को अलग कर सकते हैं।


बचपन 

ज्ञान से पहले का जीवन :
परम पूज्य दादा भगवान का जन्म 7 नवम्बर, 1908 को भारत के गुजरात राज्य के तरसाली गाँव में हुआ था। जन्म से ही उनमें खास गुण देखने को मिलते थे। उनकी सोच और समझ उनकी उम्र से बहुत अधिक थी। उनके ये विलक्षण गुण, कुछ उनके व्यक्तित्व के कारण और कुछ माताजी के संस्कारों के कारण थे।

झवेर बा ने बचपन से ही अपने नन्हें गलो (अंबालालजी को प्यार से गलो कहते थे) में अहिंसा, सहानुभूति और नोबिलिटी के गुण सींचे। एक दिन स्कूल में उनकी एक लड़के से लड़ाई हो गई और उन्हें चोट लग गई। तब माताजी ने उन्हें सिखाया कि ‘मार खाकर आना लेकिन कभी किसी को मारना मत !’ जब उनके घाव पर पट्टी बाँध रही थी, तब उन्होंने कहा कि ज़रा सोचो तो सही बिचारे उस लड़के को कितना दर्द हो रहा होगा। और उसकी माँ को कितना दुःख हुआ होगा?

एक बार जब रात को उन्होंने खटमल काटने की शिकायत की तब उनकी माताजी ने कहा, “बेटा मुझे भी खटमल काट रहे हैं, लेकिन ये बेचारे क्या टीफिन लेकर आए हैं? वे तो अपना खाना खाकर चले जाते हैं।”

गणित का एक सवाल हल करते हुए उन्होंने भगवान ढूँढ निकाले। गणित के एक सवाल में उन्हें L.C.M. (छोटी से छोटी अविभाज्य संख्या) निकालने को कहा गया। और इस सवाल पर से उन्होंने तुरन्त ही भगवान को खोज निकाला। ये सभी जीव भी ‘संख्याएँ’ ही है न! “भगवान प्रत्येक जीव में वे अविभाज्य रूप से विद्यमान हैं।”

जब वे बारह वर्ष के थे, तब गले में पहनी हुई उनकी कंठी टूट गई थी। उनकी माताजी ने उन्हें नई कंठी बनवाने के लिए फिर से गुरु जी के पास जाने के लिए कहा, तब उन्होंने अपनी माताजी से कहा, ‘गुरु वे कहलाते हैं जो हमें प्रकाश देते हैं। मैं किसी ऐसे गुरु की दी हुई कंठी नहीं पहनना चाहता जो मुझे सही राह न दिखा सकें।’

वे बहुत उदार स्वभाव के थे। दूसरों के बारे में सोचते थे और सभी की मदद करने के लिए तैयार रहते थे। कभी-कभी वे नज़दीक के एक आश्रम में जाकर वहाँ पर रहनेवाले एक संत की सेवा करते थे। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर एक दिन संत ने उनसे कहा, ‘बेटा, भगवान तुझे मोक्ष में ले जाएगा!’ अंबालाल ने तुरन्त ही कहा, ‘अगर भगवान मुझे मोक्ष में ले जाने वाले हैं तो मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि ऐसा करने पर वे मेरे ऊपरी बन जाएँगे। अगर भगवान मुझे मोक्ष देंगे तो वे वापिस ले भी सकते हैं!’‘ मोक्ष का मतलब न तो कोई ऊपरी, न ही कोई अन्डरहेन्ड।’ उस समय उनकी उम्र तेरह वर्ष की थी।


युवावस्था

वे हमेशा स्वतंत्र रहना चाहते थे। उन्हें अपने सिर पर किसी ऊपरी का रहना स्वीकार नहीं था। उनके लिए किसी भी प्रकार की नौकरी का मतलब था कि उनके सिर पर एक बॉस होगा जो कभी भी उन्हें निकाल सकता है। एक दिन उन्होंने अपने पिताजी और बड़े भाई को यह बात करते हुए सुना कि वे लोग अंबालाला भाई को कलेक्टर बनाना चाहते थे। इसका मतलब यह था कि उन्हें कमिश्नर के तहत काम करना पड़ता। ‘मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है तो इस जन्म को किसी ऊपरी का मातहत बनकर गुज़ारने का क्या अर्थ है।’ जब मुझे संसार की किसी चीज़ की चाहत ही नहीं है, तो फिर मैं क्यों किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रहूँ, जो मेरा बॉस बनकर रहे? यह उनके लिए ठीक है, जिन्हें संसारी सुखों की इच्छा है, लेकिन यह मेरे लिए नहीं है। इसके बजाय मैं एक पान की दुकान लगाना पसंद करूँगा, लेकिन किसी भी कीमत पर नौकरी नहीं करूँगा। इसलिए मैंने दसवीं कक्षा में फेल होना तय किया ताकि मेरे भाई और पिताजी मुझे कलेक्टर बनाने का इरादा छोड़ दें!

सतत अध्यात्मिक खोज में रहने वाले अंबालाल भाई को ऐसी किसी भी चीज़ से खुशी नहीं मिलती थी, जिन चीज़ों से लोगों को खुशी मिलती है। वे कभी भी सामाजिक नियमों के प्रभाव में नहीं आए और जो सब लोग करते थे, उससे कुछ अलग ही करते थे। उन्होंने कभी भी पैसों का लालच नहीं किया। और वे अपने कोन्ट्रेक्ट का बिज़नेस ईमानदारी और उसूलों से चलाते थे। जब अन्य कोन्ट्रेक्टर उन्हें पैसे बचाने के लिए निम्न कोटि का सामान इस्तेमाल करने की सलाह देते, तब वे कहते थे कि भले ही भूखों मर जाएँ, लेकिन कभी भी मकान बनाने के लिए निम्न या खराब कोटि के सीमेन्ट या स्टील का इस्तेमाल नहीं करेंगे। सीमेन्ट और स्टील किसी भी इमारत में शरीर के खून व हड्डी के समान हैं।


व्यावसायिक जीवन

धंधे में नैतिकता के सिद्धांत
युवावस्था से ही परम पूज्य दादा भगवान कंस्ट्रक्शन के व्यवसाय में कॉन्ट्रैक्टर थे। संसारी होते हुए भी, आसपास के लोग उन्हें सुखी और दैवी गुण वाले मानते थे। उन्हें लोगों के प्रति करुणा और प्रेम था। उनका धंधे बहुत अच्छा चल रहा था और उन्होंने कभी झूठ की लक्ष्मी घर में आने नहीं दी। यदि संयोगाधीन आ गई हो तो वह धंधे में ही रहने देते, घर में आने नहीं देते थे।

आत्मज्ञान से पहले - धंधे में नैतिकता
परम पूज्य दादा भगवान ने तय किया था कि धंधे में जो मुनाफा या नुकसान हो, उसे धंधे में ही रखा जाए। वे घर पर उतने ही पैसे लाते थे, जितने वे नौकरी से कमा सकते हों! धंधे में कमाए लाखों रुपये उन्होंने तभी खर्च किए, जब धंधे में कोई मुश्किल आई हो।

उन्होंने व्यापार को कर्म के खेल के रूप में ही देखा था: मुनाफा पुण्य का परिणाम है और नुकसान कर्म का परिणाम है। इसलिए वे मानते थे कि यदि कोई अनीति से धंधा करता है, तो भी उससे मुनाफा एक पैसा भी नहीं बढ़ सकता। इन सिद्धांतों के साथ धंधा करते हुए, उन्होंने न तो कभी लक्ष्मी की भीड़ देखी और न ही भराव।

धंधे में नुकसान - उनके जीवन का उदाहरण
ज्ञान प्राप्ति से पहले, परम पूज्य दादाश्री को एक बार धंधे में नुकसान हुआ था। बाद में उन्होंने उस स्थिति का वर्णन करते हुए कहा कि नुकसान के कारण उन्हें बहुत चिंता हुई और उन्हें पूरी रात नींद नहीं आई। फिर उन्हें विचार आया और उन्होंने खुद से पूछा कि क्या इस नुकसान के कारण कोई और चिंता कर रहा है? तब उन्हें समझ में आया कि उनके भागीदार तो चिंता नहीं भी कर रहे हों, और न उनके परिवार को तथा न ही दादाश्री के परिवार को इस नुकसान की कोई खबर थी। फिर उन्होंने सोचा कि जब इस पूरी स्थिति में कोई और चिंता नहीं कर रहा है, तो मैं अकेला ही क्यों सब कुछ अपने सिर पर ले रहा हूँ? उन्हें अपनी चिंता निरर्थक लगी। ऐसी प्रैक्टिकल समझ से इसके बाद दादाश्री को कभी भी व्यवसाय में चिंता नहीं हुई।

आत्मज्ञान के बाद लक्ष्मी में नीति
परम पूज्य दादाश्री ने कभी भी अत्यंत आवश्यक खर्चों के लिए भी किसी से पैसे नहीं लिए थे। आत्मज्ञान के बाद, उन्होंने सत्संग के लिए गाड़ी, ट्रेन या प्लेन से अपने ही पैसों से बहुत यात्रा की। कई महात्मा उन्हें पैसे और सोना देते थे, लेकिन वे इसे कभी स्वीकार नहीं करते थे। जिन लोगों में देने की बहुत इच्छा होती थी, उन्हें परम पूज्य दादाश्री दूसरों के हित के लिए, मंदिरों को या भूखों को देने के लिए कहते थे। यदि देने वाला अपनी इच्छा से दे रहा हो, वह दे सकता हो और परिवार की सहमति हो, तभी वे देनेवालों को ऐसा कहते थे।

धंधे में लोगों के साथ व्यवहार
परम पूज्य दादाश्री ने भागीदार के साथ एक भी मतभेद के बिना पैंतालीस साल भागीदारी की। वे मानते थे कि धंधे में अंदरूनी मुश्किलें तो आती ही रहेंगी, लेकिन मतभेद होने देना वह गलत दृष्टिकोण है। भागीदार धंधे में पूरा वक्त साथ ही रहे, फिर भी उन्हें दादाश्री के प्रति नेगेटिव नहीं हुआ। उन्हें दादाश्री के प्रति इतना पूज्यभाव था कि उन्होंने धंधे की ज़िम्मेदारी संभालकर दादाश्री को सत्संग के लिए मुक्त कर दिया था। वे अपने बेटों से कहते थे कि दादाश्री की उपस्थिति वही श्रीमताई है, उन्हें कभी भी पैसों की कमी नहीं आई थी।

परम पूज्य दादाश्री ने, अपने जीवन के अनुभवों से ‘काउंटर पुली’ का सिद्धांत अपनाया था, जो लोगों के साथ व्यवहार में उपयोगी है। एक इंजन का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि यदि इंजन और पंप सीधे जुड़े हों और इंजन 3000 आरपीएम (रिवोल्यूशन पर मिनट) की गति से चलता हो, तो वह 1500 आरपीएम की गति से चलने वाले पंप को तोड़ डालेगा। ऐसे में, पंप को 1500 आरपीएम मिल सके, इसके लिए दोनों के बीच एक काउंटर पुली लगानी ज़रूरी है। इसी प्रकार, जिस व्यक्ति की बुद्धिमत्ता और ग्रहण शक्ति बहुत ऊंची हो, उसे कम रिवोल्यूशन वाले व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय काउंटर पुली लगानी ज़रूरी है। इस एडजस्टमेन्ट से, हम दूसरों को दोषित न देखकर अकूलाना टाल सकते हैं और व्यवहार को क्लेश रहित बना सकते हैं।


विवाहित जीवन

अठारह साल की उम्र में उनका विवाह हीराबा के साथ हुआ। विवाह के कुछ समय बाद ही एक बीमारी में हीराबा की एक आँख चली गई। कुछ समय बाद लोग अंबालाल से दूसरा विवाह करने के लिए कहने लगे। क्योंकि हीराबा में नुख्स था। लेकिन अंबालाल भाई उन्हें साफ-साफ कहते थे कि ‘मैंने पवित्र अग्नि की साक्षी में जीवनभर साथ निभाने की कसम खाई है। मैं अंतिम श्वास तक वादा निभाऊँगा। अगर इनकी दोनों आँखें चली जाएँ तो भी मैं उनका ध्यान रखूँगा!’

संपूर्ण विवाहित जीवन में कभी भी उनका हीराबा के साथ झगड़ा नहीं हुआ।

उनका जीवन बहुत ही सादा और सरल था। सफल व्यवसाय चलाने के बावजूद वे घर खर्च के लिए इतनी ही रकम ले जाते थे जो कि एक नॉन-मैट्रिक व्यक्ति की तनख्वाह के बराबर थी। उन्होंने कभी भी व्यापार में हुए नफे के पैसे का उपयोग नहीं किया और अपने पार्टनर को उन पैसों से बेटी की शादी और अन्य ज़रूरत के लिए खर्च करने की अनुमति दी। वे अपने खर्चे पर लोगों को धार्मिक यात्रा पर भी ले जाते थे, उन्होंने अपने निजी खर्चे के लिए कभी भी किसी से एक पैसा तक नहीं लिया।

अहिंसा पालन करने के प्रति उनकी जागृति इतनी अधिक थी कि कभी यदि अगर वे रात को देर से घर लौटते थे तो, वे अपने जूते निकाल कर नंगे पैर सड़क पर चलते थे ताकि जूतों की आवाज़ से सड़क पर सोए हुए कुत्ते नींद से न जग जाएँ।

वे सांसारिक जीवन को एक अलग ही दृष्टि से देखते थे । “बचपन से ही मैंने संसार के भयावह स्वरूप को देख लिया था। प्रतिक्षण भय, दुःख और परेशानियाँ हैं। इसलिए मैं संसार की किसी भी चीज़ या काम में गहरा नहीं उतरता था। पता नहीं कौन-सी घड़ी देह छोड़ना पड़े, क्या पता?” उनका दिमा़ग हमेशा उच्च आध्यात्मिक विचारों में ही डूबा रहता था। शाश्वत सत्य और आत्मज्ञान की खोज में उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। ज्ञानीपुरुष श्रीमद् राजचंद्र द्वारा लिखे गए ग्रंथों से वे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि ‘यदि मैं श्रीमद् राजचंद्र से मिल पाता तो अवश्य उन्हें अपना गुरु बना लेता।’

आत्मा की खोज में किए बहुत तप:
“मैं खटमल को भी अपने आपको काटने देता। मैं खटमल से कहता ‘अब तुम आ ही गए हो तो अच्छी तरह भोजन करके जाओ। भूखे मत जाना।’ मेरा यह शरीर एक ऐसा ‘होटल’ है कि यहाँ पर जो भी आए, उसे सुख मिले और इससे किसीको कभी दुःख न हो। मेरी ‘होटल’ का यह बिज़नेस था। इस प्रकार मैंने खटमल को भी खाना खिलाया। अगर मैं नहीं खिलाता तो क्या कोई मुझ पर फाइन लगाता? नहीं! मेरा ध्येय सिर्फ आत्मा की प्राप्ति का ही था। मैं लगातार इन नियमों का पालन करता था-सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना, कंदमूल नहीं खाना और हमेशा उबला हुआ पानी ही पीना। अपनी अध्यात्मिक खोज में मैंने कुछ भी बाकी नहीं रखा और देखो पूरा अक्रमविज्ञान प्रकट हों गया, यह विज्ञान जो कि पूरे विश्व को प्योर बना दे ऐसा विज्ञान है!!”


ज्ञान प्रागट्य

शाश्वत सत्य को जानने के अलावा उनकी और कोई इच्छा नहीं थी, और उनकी अनंत जन्मों की खोज का अंत आया। जब जून-1958 में उनके भीतर कुदरती रूप से यह ज्ञान प्रकट हुआ। उस शाम को हुई इस अदभूत घटना के फल स्वरूप अध्यात्म की खोज कर रहे एक व्यक्ति में से वे आत्मज्ञानीपुरुष बन गए। उनका आत्मा पूर्ण रूप से अनावृत हो गया। और भीतर चौदह-लोक के नाथ प्रकट हुए।

एक ही घंटे में ब्रह्मांड के सभी रहस्य उनके सामने खुल गए। सभी प्रश्न जैसे कि मैं कौन हूँ, भगवान कौन हैं, यह दुनिया कौन चलाता है, कर्म क्या है, मोक्ष क्या है वगैरह के उत्तर उन्हें मिल गए।

वे इस भगवान को, ‘दादा भगवान’ कहते थे। वे कहते थे, “ये भगवान, दादा भगवान मुझमें पूर्ण रूप से प्रकट हो चुके हैं। वे सभी जीवों में विराजमान हैं। फर्क सिर्फ इतना हे कि मुझमें वे पूर्ण रूप से प्रकट हो चुके हैं और आप में अभी प्रकट होने बाकी है।”

“जगत् की किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं होने के कारण, मुझ में यह अपूर्व सिद्धि प्रगट हुई।” —परम पूज्य दादाश्री