Paretni's Wedding - 4 in Hindi Horror Stories by Sapna Badh books and stories PDF | परेतनी की शादी - 4

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परेतनी की शादी - 4

मेरे हामी भरने के बाद वह मुझे खाने की मेज पर ले आई,तब तक दोनों अधेड़ व्यक्ति वहां पर मेरी सेवा के लिए उपस्थित हो चुके थे।मेरे लिए ये एक बडी अजीब बात थी। क्योंकि वें दोनों अचानक से गायब हो जाते थे और अचानक ही प्रकट हो जाते थे।

लेकिन उस वक्त मेरे लिए खाना बहुत मायने रखता था।आप सोच रहे होंगे कि क्या एख भोजन खाना,जीवन में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है ?

किसी भूखे से यह सवाल पुछेंगे तो आपको खुद समझ आएगा कि एक भूखे गरीब व्यक्ति के लिए भोजन का क्या महत्व जीवन से भी ज्यादा रहता है ।मेरी स्थिति लगभग वैसी ही थी। मैं मेज के समाने लगी कुर्सी पर बैठकर भोजन पर टूट पड़ा जब तक पेट नहीं भर गया मैंने रूकने का नाम नाम लिया।

वे दोनों मेरी सेवा में लगे हुए थे,,,,,,,,।

मेरी भोजन की थाली जैसे पूरी खत्म होती,,,,, तुरंत नयी थाली हाजिर हो जाती,,,,, जैसे ही हलवा खत्म होता,हलवा आ जाता।

जैसे ही सब्जी खत्म होती,,,,तो तुरंत सब्जी आ जाती।

जब मेरा पेट गले तक भर गया तो मैंने संतुष्टि भरी डकार मारी।तब तक मेरे लिए हाथ धोने के लिए पानी आ चुका था।उन लोगों ने मेरे हाथ घुलवाए और पोंछने के लिए तोलिया भी दिया।यह सब मेरे लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं था,,,,,,,,,,,,।

अब जब पेट भर चुका था तो स्वाभाविक रूप से अगला काम था सोना। मैं मन ही मन में सोच रहा था कि अगर सोने मिल जाए तो कितना मजा आता,,,,,,,,,,,,।

तभी वो फिर प्रकट हुई,,,,,,, उसने मुझे खाने के बारे में पूछा।

मैंने कहा खाना बहुत बढ़िया और स्वादिष्ट था, और ऐसा खाना तो मैंने आज तक नहीं खाया।

आप कौन हो ?

मेरे ऐसा पूछने पर उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। फिर जैसे उसने अपने आप को नियंत्रित किया और बताया कि वह राजनगर की राजकुमारी है।

उसे भैरू बाबा से कुछ काम करवाना था । और वह उसके पास जाना नहीं चहती थी। इसलिए मेरे जरिए से भरू बाबा को बुलाना चाहती थी।मेरे लिए यह जानकारी काफी थी और मैं इस बात के लिए तैयार हो गया था कि मैं भैरू बाबा को बुलाऊंगा।

वह युवती फिर मुझे शयनकक्ष तक लेकर आ गई। उसने मुझे कक्ष में छोड़ा और चली गई।

शानदार बिस्तर सामने था,,,,,,,। और अब तो पेट भी भरा हुआ था,,,,,,,

स्वाभाविक रूप से अगला कदम था,,,,,,,,,,,सोना और मैं एक छलांग मे बिस्तर के ऊपर था और पल भर में निद्रा देवी की गोद में जा चुका था।

कमरे में मेरे खर्राटे गूंज रहे थे।

भरपूर नींद के बाद सुबह जब मेरी आंख खुली तो कमरे में संगीत बज रहा था,,,,,,।

वही सुन्दरी वीणा बजा रही थी,,,,,,,।

वीणा के मधुर स्वर गूंज रहे थे,,,,,,,,,

मुझे संगीत का ज्ञान तो नहीं था लेकिन उसके संगीत में गजब का जादू था,,,,। जिसे सुनते रहने की इच्छा अपने आप हो जाती है।

मुझे जगा हुआ देखकर उसने मेरी ओर देखा और मुस्कुराई,तब तक वे दोनों अधेड़ फिर से प्रकट हो चुके थे।एक के हाथ में पानी का जग था और दूसरे के हाथ में तौलिया।

उन दोनों ने मेरा हाथ मुंह धुलवाया।

उसने फिर से मेरा हाथ पकड़ लिया। राजमहल जैसे उस भवन में पता नहीं कहां से हल्की रोशनी छाई हुई थी।


क्रमशः ✍️