Paretni Ki Shaadi - 2 in Hindi Horror Stories by Sapna Badh books and stories PDF | परेतनी की शादी - 2

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परेतनी की शादी - 2

 मैं खाने के मामले में बड़ा ही शातीर था। जब मै खाना खाने बैठता था तो चार पांच लोगों का खाना मै अकेले खा जाता था।

इसलिए आमतौर पर लोग मुझे अपने घर खाना खाने पर बुलाने से कतराते थे। मां के गुज़र जाने के बाद मैं काम चलाऊं खाना बनाकर रोज की आदत थी। इसलिए मुझे स्वादिष्ट भोजन बहुत पसंदथा,,,,।

और यहां भी मैंने दवा कर रोटियां खाता गया,,, लगभग चालीस रोटियां खाने के बाद मेरा पेट भरा था और फिर मैंने तृप्ति भरी डकार ली।

और बाद में वो खाना खाने बैठ गई। मैंने उससे बात करना चाही,,,, लेकिन उसने इशारे से मना कर दिया, उसने भोजन समाप्त किया।

और उसने मुझसे पूछा - क्या तू साथ चलेगा ?  हर रोज तुझे ऐसा ही खाना खिलाएंगे।

स्वादिष्ट भोजन मेरी कमजोरी थी और जो भोजन उसने मुझे खिलाया था वैसा मैंने अपनी जिंदगी में कभी नहीं खाया था। इसलिए मैं तुरंत हां कह दिया । और मेरे हां कहते ही उसने अपनी चुनरी निकाली और मेरे ऊपर डाल दी।

और चुनरी डालते ही मैं बेहोश हो गया,,,,,।


अगले दिन मेरी जब मेरी नींद खुली। मैंने अपने आप को एक महल नूमा कयरे में पाया।

उस महल जैसे कमरे सुख सुविधा की सारी चीजें मौजूद थी।

मैं एक बहुत ही खूबसूरत पलंग पर लेटा  हुआ था।

पलंग बहुत सुंदर नक्काशीदार था । उस पलंग पर सुनहरे रंग की चादर बिछी हुई थी उस चादर को देखकर ऐसा लगता था कि जैसे किसी राजा महाराजा के महल का बेडरूम हो।

मेरे ये किसी स्वप्न से कम नहीं था। मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि ये मैं कहां आ गया।

तभी कमरे में एक सुंदर युवती आई मुझे देख कर खिलखाकर हंस पड़ी,,,,,,,

और फिर वो बोली तुम उठ ग‌ए  ।चलो अब तुम्हें स्नान कराएंगे।

जैसे ही मैंने कुछ कहने के लिए मुंह खोला। उसने इशारे से मुझे मना कर दिया, मैं चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा। उसने किसी को आवाज लगाई तो दो आदमी प्रकट हुए और मुझे स्नानघर तक ले गए। मैंने उन दोनों से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने भी इशारे से मुझे मना कर दिया।

फिर मैंने सोचा कि अपने बाप का जाता है ? इस परम सुंदरी का मजा ले लिया जाए, अब आगे देखते हैं क्या होगा। क्योंकि मेरे पास ना घर था ना अपना कहने के लिए परिवार था और ना ही मेरे धन दौलत या कोई संपत्ति थी।ले दे कर एक टूटी फूटी झौपड़ी थी जिसे मैं फिर बना सकता था।

जब किसी के पास कुछ खोने के लिए नहीं होता है तो वो रिस्क लेने के लिए तैयार हो जाता है।

मैं भी शायद इसी स्थिति में था।

इसलिए मुझे किसी बात की कोई चिंता नहीं थी और यही सोच रहा था कि अब जो होगा देखा जायेगा।

फिर मुझे स्नानघर में ले जाकर उन्होंने एक चांदी से बने गोल टब में मुझे बिठाया ।

उस चांदी के टब में सोने की स्टूल लगी हुई थी और उस पर बैठ कर ठंडे खुशबूदार पानी से मुझे स्नान करवाया उसके बाद उन दोनों ने मुझे तौलिये से पोछा और फिर मुझे पहनने के लिए न‌ए वस्त्र दिए, और ये वस्त्र किसी राज महाराज को भी मात देने वाले वस्त्र थे 


क्रमशः ✍️