Chalo Dur kahi - 23 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 23

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चलो दूर कहीं..! - 23

चलो दूर कहीं.. 23

सुबह की औरा ने रोहन के व्याकुल मन को कुछ देर के लिए सुकून पहुंचाया था। भोर के सुनी सड़क पर तेज गति से दौड़ते गाड़ी से ज्यादा स्पीड से उसके मन मस्तिष्क में विचारों की श्रृंखलाएं दौड़ रही थी। दोस्त होने के नाते प्रतीक्षा की सहायता करना उसका फर्ज  था लेकिन उसके लिए सिरदर्द के सबब बने हुए थे उसके दोस्त और उसमें भी खासकर अनाह.. उसे न जाने उससे क्यों चिढ़ हो रही थी? अगर इन्हें अपने घर ले गया तो लोग तरह तरह के प्रश्न करेंगे..? क्या करुं कुछ समझ नहीं आता..? प्रतीक्षा से पूछूं तो पूछूं कैसे ये अनाह ऐसे घूर रहा है जैसे कच्चा चबा जाएगा..!

उसके मन में चल रहा बवंडर और सड़क पर पसरे सन्नाटे के बीच तेज गति से दौड़ते गाड़ी का शोर मिलकर किसी बहुत बड़े बवंडर का अहसास करा रहा था। रोहन बिना कुछ कहे चुपचाप विचारों में खोया तेज गति से गाड़ी चला रहा था, उसके बगल में अनाह बैठा था जो एकटक सामने देख रहा था,बीच के सीट में रवि के कंधे पर सिर टिकाए प्रतीक्षा और सुमी सोई हुई थी और पीछे के सीट पर छोटू घोड़ा बेचकर सोया हुआ था।

रोहन के मन में ग्रामोफोन के पिन की भांति यह बात फंस गया था कि आखिर प्रतीक्षा और उसके पलटन को इस हाल में कहां ले जाए..? इस हाल में इन्हें देखकर न जाने लोग क्या कहेंगे..? और दिल्ली का कपड़े का दुकान 10-11 बजे से पहले खुलता नहीं.. क्या करूं कुछ समझ नहीं आ रहा है..? रोहन सोच ही रहा था कि अनाह की आवाज से वह उसकी ओर देखा," मि.रोहन क्या हम दिल्ली पहुंच गए हैं?" 

"हां बस पहुंचने ही वाले हैं.. बदरपुर बार्डर पार करते ही दिल्ली का इलाका शुरू हो जाता है..!" रोहन ने कहा तो वह बोला," जरा खाली जगह देखकर गाड़ी रोकिए.. फ्रेश हो लिया जाए..!" 

"हां.. हां.. क्यों नहीं?" कहकर रोहन ने गाड़ी रोका तो सबसे पहले अनाह उतरा और धुंधली रोशनी में किधर को गया रोहन देख नहीं पाया, उसने अपना सीट बेल्ट खोलते हुए कहा,"रवि फ्रेश होना हो तो हो लो..!" कहकर वह नीचे उतरा और गेट बंद किया तो उसकी आवाज और झटका से सभी की नींद खूल गई.. सभी बारी-बारी से नीचे उतरे और प्रतीक्षा नीचे उतरते ही सबसे पहले पूछी,"अनाह कहां है.. दिखाई नहीं दे रहा है..?" 

"अभी अभी तो नीचे उतरा है,यहीं कहीं होगा..इस अनजान जगह में इतनी सुबह-सुबह कहां जाएगा..!" 

रवि आसपास मुआयना करने के बाद कहा,"रोहन भैया अनाह आसपास दिखाई नहीं दे रहा है..!"

" अरे यार यहीं कहीं होगा..जरा आगे बढ़कर तो देखो.. प्रतीक्षा तुम उधर देखो मैं इस तरफ देखता हूं..!" 

रोहन कहकर एक ओर बढ़ गया.. प्रतीक्षा भी आसपास ढूंढ़ी और जब अनाह नहीं मिला तो रोहन से बोली,"रोहन सही में अनाह यहां नहीं है..!"

" क्या.. ऐसा कैसे हो सकता है, भला कोई बीच रास्ते कहां जा सकता है..? अब तुम्हीं बताओ उसे कहां ढूंढे..?" रोहन ने प्रतीक्षा से मुखातिब होते हुए कहा तो वह बोली," वह जिधर गया है चलो उधर ढूंढते हैं..!"

रोहन के इशारा पाते ही सभी नंगे पैर उस ओर दौड़ पड़े... सड़क के किनारे फूटपाथ पर उगे तृण पर ओस की बूंदें जमी थी,जब पांव के तलवे तृण पर जमें ओस की बूंदों से टकराते तो उसकी ठंडक सीधे दिल और दिमाग को एक अद्भुत ठंडक पहुंचा रहा था... ठंडी हवा के झोंके के साथ बहती सौंधी खुशबू के बीच इन घासों पर वे न जाने कितनी देर चलते रहे पता नहीं...उनकी तंद्रा " चाय.. गरमागरम चाय..!" के आवाज से टूटी..! सुबह सुबह बोहनी के आस में बड़े आग्रह से उस चाय वाले ने रोहन से कहा," चाय दूं बाबू..स्पेशल है, पी कर देखो फिर पैसा देना..!"

रोहन ने प्रतीक्षा से इशारे से चाय पीने के बारे में पूछा और हां में इशारा पाते ही कहा,"लाओ भाई सबको चाय पिलाओ..!" 

चाय वाले ने खुश होते हुए एक एक कर कुल्हड़ में चाय उड़ेल कर रोहन को बढ़ाता गया और रोहन पहले रवि को फिर सुमी को और उसके बाद प्रतीक्षा को चाय का कुल्हड़ थमा कर एक कुल्हड़ हाथ में लिया तब उसे एकाएक छोटू की याद आई.. उसने इधर उधर नजर दौड़ाते हुए प्रतीक्षा से पूछा,"छोटू दिखाई नहीं दे रहा है.. वह साथ नहीं आया है क्या..?" 

"लगता है वो गाड़ी में ही सोया है..!" 

रोहन चाय की चुस्की लेते हुए कहा," अरे वाह.. लाजवाब चाय है,मजा आ गया..!" 

चाय पीने के बाद रोहन ने चाय का बिल पूछा तो चाय वाले ने 40 रुपए बताया तो उसने अपना पर्स टटोला तो उसके होश उड़ गए..उसका पर्स तो जेब में था ही नहीं, उसे अचानक याद आया कि उसने पर्स को निकाल कर डैशबोर्ड में रख दिया था। उसे घोर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी, उसने दबी जुबान से प्रतीक्षा से पूछा," तुम लोगों के पास कुछ पैसे हैं क्या..?" 

"शर्मिंदा क्यों करते हो रोहन..?" 

प्रतीक्षा बोल ही रही थी कि उस चाय वाले ने अपने गंदे से झोले से एक क्यूआर कोड स्कैनर निकाल कर रोहन के सामने करते हुए कहा," मोबाइल हाथ में हो तो कैश की क्या जरूरत है साहब.. स्कैन किजिए और पेमेंट किजिए..न खुदरा का झंझट,न हिसाब-किताब का टेंशन..!"

रोहन अवाक् नेत्रों से कभी उस चाय वाले को देखता तो कभी उस क्यूआर कोड स्कैनर को.. डिजिटल पेमेंट की ताकत जिसका लाभ समाज के सबसे निचले पायदान के लोगों को मिल रहा है और उन्हें खुशी खुशी इतने बड़े बदलाव के भागीदार बनते देखकर उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे, उसने चुपचाप क्यूआर कोड स्कैन किया और 40 रुपए पेमेंट का मैसेज देखते ही उस चाय वाले ने उसे शुक्रिया कहा और चलता बना..!

चारों जब गाड़ी के पास पहुंचे तो क्षितिज में धीरे धीरे लालिमा फैल रही थी, पक्षियों के कलरव से वातावरण गुंजायमान हो रहा था.. सुनसान सड़क पर गाड़ियों की आवाजाही धीरे धीरे बढ़ रही थी..! सुबह की ठंडी हवा से थोड़ी कंपकंपी हो रही थी तो सुमी ने गाड़ी में बैठने की इच्छा जताई तो रवि ने उसे बीच के सीट पर बैठा कर पीछे के सीट को देखा तो वहां छोटू को न देख कर वहीं से चीखा,"रोहन भैया.. छोटू गाड़ी में नहीं है..!" 

"क्या..?" 
कहते हुए रोहन ने पीछे का दरवाजा खोलकर देखा और झुंझलाते हुए कहा,"अच्छा मुसीबत है.. पहले अनाह.. और अब ये छोटू..? अरे कहीं जाना था तो बताकर जाते ..अब तुम्हीं बताओ प्रतीक्षा क्या करें..? ये तुम्हारे चेले चपाटे बड़े युनिक है.. मैं तो कहता हूं इन्हें यहीं छोड़ कर चलो तब इनके अक्ल ठिकाने आएगी..!

                                          क्रमशः..