घर तो आज भी वही है, पर जिस आँगन में जीवन हँसता-खेलता था, वो आँगन अब न रहा।
उस आँगन में बचपन पला-बढ़ा करता था। कभी हँसी के ठहाके गूँजा करते थे तो कभी बिन आँसुओं की दहाड़ें। चारपाई के चारों ओर चोर-पुलिस का खेल हुआ करता था और माँ की थपकी को बैट बनाकर घुमाते फिरते थे। क्यारियों में बड़े चाव से सब्ज़ियाँ लगाते, पेड़ से मीठे अमरूद तोड़कर खाते और थक जाने पर नीम की छाँव में सो जाया करते थे। बचपन तो आज भी वही है, पर वो खेल का मैदान अब न रहा।
गर्मियों में सूरज ढलते ही आँगन में बच्चे-बड़े, सब ही जुड़ जाया करते थे। शाम की ठंडी हवा दिन भर की तपिश अपने साथ बहा ले जाती थी। अंत्याक्षरी में बेसुरे सुर लगा करते और नई-नई पहेलियाँ बूझने की प्रतियोगिता-सी रहती थी। जुगनुओं की टिमटिमाहट में घंटों एक-दूसरे से बातें करते हुए कल्पनाओं की सैर पर निकल पड़ते थे। आसमान में तारों से बनी आकृतियाँ खोजते-खोजते न जाने कब आँख लग जाती। आसमान तो आज भी वही है, पर वो तारों की छाँव अब न रही।
मानसून के आने पर आँगन कुछ अधिक ही जीवंत हो उठता, मानो किसी उत्सव का उत्साह लिए हो। पहली बारिश की सोंधी ख़ुशबू हवा में घुल जाती थी और नीम की डाली पर पड़ा झूला झूलने लगता था। हर झोंटे के साथ और ऊँचा जाने की होड़-सी रहती। बारिश की पहली बूँद गिरते ही चारपाइयाँ, बिस्तर और सामान समेटने की भागदौड़ शुरू हो जाती, और अगले ही पल घर का बचपन पानी में छप-छप करता नज़र आता था। पानी ठहरता तो काग़ज़ की नावें बनतीं और उनकी रेस लगती। बारिशें तो आज भी वही हैं, पर उनमें वो उल्लास अब न रहा।
सर्दियों की सुबह अलाव की आँच लिए आँख खोलती थी और दोपहरी में धूप की नरम गुनगुनाहट आँगन में बिछ जाया करती थी। रेवड़ी-मूँगफली के स्वाद और चाय की चुस्कियों के साथ चौपालें जमती थीं। धूप सरकती रहती थी और उसके साथ-साथ चारपाइयाँ भी। कभी राजनीति पर बहस छिड़ती, कभी खेल पर चर्चा होती और कभी कोई पुराना किस्सा चल निकलता था। पास की दीवार पर बैठी गिलहरी और आँगन में फुदकती गौरैया भी मानो उन्हीं महफ़िलों का हिस्सा होती थीं। सभाएँ तो आज भी हैं, पर वो धूप की गुनगुनाहट अब न रही।
आँगन के नल में तो जैसे कुछ जादू ही था। गर्मियों में उसका पानी धरती की ठंडक घोल लाता था और सर्दियों में उसी धरती की गुनगुनी गरमाहट। नल के नीचे बैठकर नहाना, माँ का पास बैठकर थपकी चलाना, और हम सबसे बारी-बारी एक-एक बाल्टी पानी भरवाना रोज़मर्रा की बात थी। गिलास से नहीं, हाथों की कटोरियाँ बनाकर पानी पीना अधिक सुहाता था। वो मीठा पानी सिर्फ़ प्यास नहीं बुझाता था, भीतर तक तृप्त कर जाता था। पानी तो आज भी वही है, पर उसमें धरती का वो स्पर्श अब न रहा।
वो आँगन महज़ एक आँगन नहीं, मेरा सारा संसार हुआ करता था। जहाँ मिट्टी से जुड़ाव भी था और उड़ने के लिए खुला आकाश भी। वहाँ सूरज, चाँद, सितारे, हवा, वर्षा, पशु और पक्षी किसी दृश्य का हिस्सा भर नहीं थे, वे जीवन के सहभागी थे। जीवन वहाँ किसी प्रयास से नहीं, सहजता से बहता था। शांति, सुकून, विश्राम और अपनापन अलग-अलग खोजने की चीज़ें नहीं थे; वे उस जीवन की समग्रता में स्वाभाविक रूप से घुले हुए थे।
आज इन चार दीवारों में क़ैद जीवन तो वही है, मगर जीवन का वो सहज बहाव अब न रहा।
घर तो आज भी वही है, पर वो घर का आँगन अब न रहा।
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— शिल्पी
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