लेखक की कलम से…
कहानियाँ सहज ही मन से जुड़ जाया करती हैं। पढ़ते-पढ़ते किरदार अपने से लगने लगते हैं। मगर कविताएँ पहली नज़र में अपने रहस्य नहीं खोलती। वो पाठक से ठहराव माँगती है। धीरे-धीरे मन में घुलती हैं। ये कविताएँ अलग-अलग भाव संसार की यात्रा कराती हैं। आशा है कहीं कुछ पंक्तियाँ आपके भी मन में घुल पायें…
जैसे तुम ही हो...
हे गिरिधर!
जब अनंत आकाश को देखती हूँ
जाने क्यों ऐसा लगता है
जैसे तुम ही हो…
रंग भी तुमसे मेल खाता है
और भाव-व्यवहार भी
जब बदलियों की ओट में रहता है
तो लगता है
तुम ही चोरी-छिपे
थोड़ा माखन खा रहे हो
और उससे अधिक गिरा रहे हो
चंद्रमा का मुकुट पहनकर
जब नक्षत्रों से श्रृंगार करता है
तो लगता है
तुम ही कोई लीला रचने
बन-सँवरकर निकले हो
और जब
समय-रथ पर सवार होकर
सूर्य, चंद्र और नक्षत्रों की
डोर थामे दिखता है
तो लगता है
तुम ही जगत को
राह दिखा रहे हो
प्रीत की रीत भी
तुमसे अलग नहीं लगती
रात्रि में असंख्य नेत्रों का मीत बनकर
उनके संग रास रचाता है
जहाँ जल
राधा-सा निर्मल
और शांत हुआ करता है
ख़ुद ही झुककर
उस जल में उतर आता है
यह भी तुम्हारी ही तरह
न अपनी गहराई का भेद देता है
न अपनी सीमाओं का
साथ तो प्रतीत होता है
पर पहुँच में नहीं आता
जितना जिसकी नज़र में समा पाए
बस उतना ही नज़र आए
जाने क्यों ऐसा लगता है
जैसे तुम ही हो…
— शिल्पी
Adृश्य लेखा
प्रकृति, प्रवृत्ति और परिस्थितियाँ—
जीवन के बहीखातों में
अपनी-अपनी हाशियाँ खींच देती हैं,
और विकल्पों को
सीमाओं में बाँध देती हैं।
और इंसान—
कभी स्वाभिमान से,
कभी लाचारी में,
अपनी प्रविष्टियाँ दर्ज करता रहता है।
किसी पन्ने में धूप दर्ज हो जाती है,
किसी काग़ज़ पर बस नमी ठहरती है।
हर मन
अपनी समझ की स्याही से
अपना सच लिख ही लेता है।
फर्क बस इतना-सा रह जाता है—
अकसर तुम्हारे लेखे
मेरे मानकों से मेल नहीं खाते।
या शायद
मेरे पैमाने ही छोटे हैं
जीवन का सच मापने को।
अजीब है इंसान भी—
उम्र भर
अपने ही खातों के जोड़ नहीं मिला पाता,
और फिर भी
दूसरों के पन्नों पर
अपनी समझ उतारने की कोशिश करता रहता है।
मगर अंत में
सामना सिर्फ़ अपने आप से होगा—
कहाँ शब्द उधार थे,
कहाँ कर्म अधूरे रह गए,
और कहाँ आत्मा
बस मौन रह गई।
— शिल्पी
हर निर्णय के पीछे
एक अनदेखा संदर्भ होता है
मेरे जज़्बात
मेरे जज़्बात भारी हैं
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ ।
सफ़र हो दिल से दिल तक का
वो एक आवाज़ कैसे दूँ ।
घोंसला छोड़ जाने का
हौंसला ले भी आयें तो
बिखर कर टूट जाने को
मैं झूठी आस कैसे दूँ।
बोझ इनका उठा लें जो
सही अल्फ़ाज़ कैसे दूँ।
मेरे जज़्बात भारी हैं
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ ।
सियाह हैं, कुछ ये मैले से,
सुरख, उजले, सुनहरे से।
सभी रंगों में गहराकर,
वक्त की मार खा-खा कर,
मन ने कोख में अपनी
कई तूफ़ान पाले हैं,
कई मोती संभाले हैं।
गुज़रता वक्त जाता है
ये चुप सागर में ठहरे हैं।
हदों को तोड़ जाने को,
बहाकर सब ले जाने को,
बवंडर आज कैसे दूँ।
मेरे जज़्बात भारी हैं ,
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ ।
तराने बन के होठों पर,
ये मुस्कानें बिछाते हैं।
कभी नैनों से झर-झर कर,
तपिश दिल की मिटाते हैं।
महफिलों में, वीरानों में
यही तो साँसें थामे हैं।
इन्हें खुद से जुदा करके
तेरी सोहबत में लाने की
मेरे दिल के शहज़ादों को
तेरे दिल में इतराने की
जगह एक खास कैसे दूँ।
मेरे जज़्बात भारी हैं
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ।
— शिल्पी
समंदर क्यूँ इतराता है
देखते हो समंदर को
ये इतना जो इतराता है
दौड़कर पास में आए
कदम चूमे चला जाए
सताने को, तरसाने को
हिमाकत फिर दोहराता है
कि मुझसे रूठा हो जैसे
बैठ जाए मुँह सुजाये
कभी कुछ शोरगुल कर के
ख्वाहिशों को छिपाता है
देखते हो धुरंदर को
अकड़ कितनी दिखाता है
थिरककर साथ ये अकसर
मेरी मौजों को अपनाये
कभी खामोशी की चादर
ओढ़ हर गम उठाता है
ये उठती गिरती लहरों में
प्यार की थपकियाँ देकर
कभी बस छेड़ने को ही
छुए और गुदगुदाता है
देखते हो शरारती को
मन ही मन मुस्कराता है
कभी आग़ोश में भरके
डूबने ही नहीं देता
मोहब्बत बूंदों में भरके
फुहारों में बरसाता है
मेरी हस्ती, मेरे जीने के
हर एक शौक के खातिर
चाहतों के तूफ़ानों को
खुद ही में रोक रखता है
उमड़ना भूला हो जैसे
हदों मे बंधकर रहता है
देखते हो दिलदार मेरा
चाहतें जो निभाता है
देखते हो समंदर को…
— शिल्पी
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