आक्रोश का नंगा नाच और रूहानी कत्लेआम
भाग एक: आँखों में उतरता खून
इकबाल की आँखें अब सफेद नहीं, बल्कि स्याही की तरह नीली और खून की तरह सुर्ख हो चुकी हैं. वह हाथ- गाडी के हैंडल को इतनी जोर से भींचता है कि लोहे से चरमराने की आवाज आती है. वह मुंबई की उन गलियों से गुजर रहा है जहाँ उसने कभी अपनी इज्जत नीलाम होते देखी थी. उसके दिमाग में सिर्फ एक ही धुन बज रही है—बदला. वह बदला जो जुबेदा के घर की दिवारों को गिरा देगा. वह चिल्लाता नहीं है, उसकी खामोशी में हजारों चीखें दफन हैं. आज इकबाल पत्रकार नहीं, आज वह अपनी बर्बादी का हिसाब लेने वाला मुनीम है.
भाग दो: जुबेदा के महल पर दस्तक
सगाई वाले घर के बाहर इकबाल खडा है. अंदर से कहकहों की आवाज आ रही है. फरहान की वो हंसी, जुबेदा के भाई का वो अहंकार और जुबेदा की वो कातिल खामोशी—सब इकबाल के कान के पर्दे फाड रहे हैं. इकबाल की जेब में वो' I' चाबी अब एक खंजर की तरह चुभ रही है. वह गेट की तरफ बढता है. पहरेदार उसे रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन इकबाल की नजरों में ऐसा खौफ है कि वे पीछे हट जाते हैं. आज कोई' डिलीवरी बॉय' नहीं आया है, आज अपनी' किस्मत का मालिक' खुद अपनी मौत का वारंट लेकर आया है.
भाग तीन: पत्रकार का आखिरी हथियार
इकबाल हॉल के बीचों- बीच पहुँचता है. जुबेदा उसे देखकर कांप जाती है. इकबाल मुस्कुराता है, पर उस मुस्कान में मौत का सन्नाटा है. वह अपना फोन निकालता है और एक ऐसी' फाइल' प्ले करता है जिसे सुनकर जुबेदा के पिता के चेहरे का रंग उड जाता है. यह वही' ब्लैकमेल' नहीं, बल्कि वो' सत्य' है जो इकबाल ने अपनी पत्रकारिता के दिनों में तिजोरी में बंद किया था. इकबाल गरजता है, तुमने मेरा साम्राज्य राख किया था, आज मैं तुम्हारी' इज्जत' को बीच बाजार नंगा करूँगा. एक- एक पाई का हिसाब होगा, और ब्याज में तुम्हारी रूह लूंगा!
भाग चार: तबाही की तैयारी
जुबेदा का भाई आगे बढता है, लेकिन इकबाल उसे एक धक्के में गिरा देता है. हॉल में सन्नाटा पसर गया है. मेहमान भागने लगे हैं. इकबाल जुबेदा के करीब जाता है, उसके हाथ में वही मशाल है जो उसने सपने में देखी थी. वह पर्दे की तरफ बढता है. पाठक का दिल हलक में है—" क्या इकबाल आग लगा देगा? क्या आज सब खत्म हो जाएगा? इकबाल की उंगली ट्रिगर पर है, उसकी कलम अब तलवार बन चुकी है. वह जुबेदा की आँखों में देखता है और कहता है, तुझे लगा था मैं मर गया? मैं तो वो बीज हूँ जिसे तूने दबाया था, अब मैं वो जंगल हूँ जो तुझे निगल जाएगा।
भाग पाँच: बाइनरी आक्रोश (The Digital Wrath)
अचानक इकबाल को लगता है कि उसकी आवाज गूँज नहीं रही, बल्कि टाइप हो रही है. वह चिल्लाता है तो उसके मुँह से शब्द नहीं, बल्कि जलते हुए अक्षर निकलते हैं जो हॉल की दीवारों पर चिपक जाते हैं. जुबेदा का चेहरा डर से पीला पड चुका है. इकबाल उसे याद दिलाता है कि कैसे उसने' AK Service' के मलबे पर खडे होकर अपनी सगाई के सपने बुने थे. जुबेदा, आज तेरी सगाई नहीं, आज तेरी बेवफाई का अंतिम संस्कार होगा!
भाग छह: यादों का कत्लेआम
इकबाल हॉल की टेबल पर रखे कीमती काँच के बर्तनों को अपनी हाथ- गाडी के लोहे से तोड देता है. हर टूटते काँच के साथ उसे जुबेदा के साथ बिताया एक- एक लम्हा याद आता है. वह काँच के टुकडों को उठाकर जुबेदा के पैरों के पास फेंकता है और कहता है, इन पर चल, जैसे मैं जलती हुई राख पर चला था. तुझे दर्द चाहिए न? मैं तुझे वो दर्द दूँगा जो रूह को छलनी कर दे।
भाग सात: फरहान का पतन
फरहान, जो अब तक सगाई का नायक बना बैठा था, पीछे हटने की कोशिश करता है. इकबाल उसे कॉलर से पकडकर खींचता है और उसके चेहरे के करीब अपना चेहरा ले जाकर कहता है, तूने नोट फेंक कर मेरी इज्जत खरीदी थी? आज मैं तेरी सांसों की नीलामी करूँगा। इकबाल के हाथों की पकड इतनी मजबूत है कि फरहान की आवाज नहीं निकल पा रही. पाठक सोच रहे हैं—" क्या आज फरहान की कहानी यहीं खत्म हो जाएगी?
भाग आठ: रूह का सौदा और सन्नाटा
पूरे हॉल में धुआं भर चुका है. इकबाल की परछाईं दिवारों पर एक दानव की तरह दिख रही है. वह कहता है, तुम सबको लगा कि इकबाल राज मर चुका है? पत्रकार मरा है, इंसान मरा है, लेकिन यह जो तुम्हारे सामने खडा है, यह तुम्हारी अपनी करतूतों का' रिटर्न गिफ्ट' है। वह मशाल को झुकाता है, आग की लपटें कालीन को छूने ही वाली हैं.
भाग नौ: जुबेदा की आखिरी गिडगिडाहट
जुबेदा हाथ जोडकर इकबाल के सामने गिर पडती है. इकबाल, मुझे माफ कर दो! मैं मजबूर थी! इकबाल जोर से ठहाका लगाता है. वह हंसी जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए. मजबूरी? मजबूरी तो वो थी जब मैं सडकों पर हाथ- गाडी खींच रहा था और तू यहाँ फूलों की खुशबू ले रही थी. तेरी माफी की कीमत अब तेरी बर्बादी है।
भाग दस: व्यवस्था का विध्वंस
इकबाल हॉल के बिजली के तारों को अपनी नंगी आँखों से देखता है और देखते ही देखते पूरी लाइटें टिमटिमाने लगती हैं. ऐसा लगता है जैसे पूरी इमारत इकबाल के गुस्से के साथ कांप रही है. वह पत्रकारिता का वो असली' धमाका' करने वाला है जो सिर्फ इस हॉल को नहीं, बल्कि पूरे शहर की राजनीति को हिला कर रख देगा.
भाग ग्यारह: सस्पेंस का गहरा जाल
जैसे ही इकबाल उस मशाल को फर्श पर फेंकने वाला होता है, तभी एक ऐसी आवाज गूँजती है जो मशाल की आग से भी ज्यादा तेज है. वह आवाज हॉल के माइक से नहीं, बल्कि इकबाल के अंदर से आती है. एक ऐसी कडवी सच्चाई जो अब तक छुपी हुई थी. इकबाल के हाथ कांपने लगते हैं.
भाग बारह: शतरंज की असली चाल
अचानक हॉल का मुख्य दरवाजा एक धमाके के साथ खुलता है. इकबाल रुक जाता है. धुआं छंटता है और सामने एक ऐसी' परछाई' खडी है जिसे देखकर इकबाल के चेहरे से सारा आक्रोश गायब हो जाता है. वह परछाईं सगाई में आए किसी मेहमान की नहीं है, न ही वो पुलिस है. वह कुछ ऐसा है जिसकी उम्मीद न पाठक को थी, न खुद इकबाल को.
भाग तेरह: खौफनाक फुसफुसाहट
वह परछाईं धीरे- धीरे इकबाल की तरफ बढती है. हॉल में मौजूद लोग पत्थर बन चुके हैं. वह शख्स इकबाल के बिल्कुल पास आता है और उसके कान में सिर्फ तीन शब्द कहता है. उन तीन शब्दों को सुनते ही इकबाल की मशाल हाथ से छूटकर गिर जाती है. उसका शरीर पसीने से भीग जाता है.
भाग चौदह: पहेली (The Final Mystery)
इकबाल पीछे हटने लगता है. वह जुबेदा को नहीं, बल्कि उस अजनबी को देख रहा है. वह अपनी हाथ- गाडी, अपना बदला, अपना आक्रोश—सब कुछ वहीं छोडकर पागलों की तरह बाहर की तरफ भागता है. पाठक हक्का- बक्का है—" आखिर उस शख्स ने ऐसा क्या कह दिया कि बदला लेने निकला शेर दुम दबाकर भाग गया?
भाग पंद्रह: मलबे की वापसी (The Ruins Return)
भागते हुए इकबाल को अचानक लगता है कि मुंबई की सडकें गायब हो गई हैं. वह फिर से उसी' AK Service' के मलबे के सामने खडा है. लेकिन इस बार मलबे से राख नहीं, बल्कि पुराने पत्रकारिता के कैमरे और टाइपराइटर बाहर निकल रहे हैं. वे उसे चीख- चीख कर कह रहे हैं, इकबाल, तूने बदला नहीं लिया, तूने अपनी हार स्वीकार कर ली है!
भाग सोलह: रूह का विभाजन (The Split Soul)
इकबाल अपना sir पकड कर चीखता है. उसे अपनी देह के अंदर दो लोग महसूस होते हैं—एक वो जो बदला लेना चाहता है, और एक वो जो उस अजनबी की बातों से डर गया है. वह अजनबी कोई और नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही' बुराइयों का आईना' था. सगाई का वो हॉल अब एक डिजिटल स्क्रीन में बदल गया है और ऊपर लिखा आ रहा है—" ERROR चार सौ चार: IDENTITY NOT FOUND"
भाग सत्रह: अंधेरे का आखिरी पैंतरा
इकबाल सडक पर गिरता है और आसमान की तरफ देखकर पागलों की तरह हंसने लगता है. उसकी हंसी में एक ऐसी सच्चाई छिपी है जो पूरे ग्यारह अध्यायों को झूठ साबित कर सकती है. वह चिल्लाता है, लेखक! तू जीत गया! तूने मुझे कहाँ लाकर खडा कर दिया! हवा में चंदन और मोगरे की खुशबू फिर से गूँजती है, लेकिन इस बार उसमें किसी के रोने की आवाज शामिल है.
लेखक का नोट:
क्या आपको लगा था कि इकबाल आज खून बहाएगा? अभी तो आपने सिर्फ प्यादा मरते देखा है, असली' शह और मात' तो बारहवें अध्याय में होगी. वह अजनबी कौन था? और उसने इकबाल के कान में क्या कहा? आज रात ठीक दस: शून्य बजे की अगली किश्त आपकी रूह कंपा देगी, क्योंकि अब वह आ रही है जिसे इकबाल ने अपनी मौत मान लिया था—' यूपी वाली वो औरत' जिसने इकबाल को लावारिस बनाया था. बारहवां अध्याय वह' तूफान' लाएगा जिसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।
चेतावनी:
ग्यारहवें अध्याय ने अगर आपको हिला दिया है, तो बारहवें के लिए खुद को पत्थर बना लेना. क्योंकि अगला वार इकबाल नहीं, उसका' अतीत' (Past) करेगा. क्या आप उस खौफनाक सच के लिए तैयार हैं जो रात दस: शून्य बजे खुलेगा?
(क्रमशः)
लेखक की रूहानी पुकार:
दोस्तों, 'IJ अधूरा प्यार' की इस खौफनाक दास्तान में आप भी मेरे साथ उस अंधेरे में भटक रहे हैं, जहाँ इकबाल को ढूंढना नामुमकिन सा लगता है। क्या आप वाकई इकबाल तक पहुँच पाएंगे? सच कहूँ तो, मुझे भी नहीं लग रहा था... लेकिन हार मान लेना इकबाल की फितरत नहीं है।
मैंने आप सभी के लिए एक रास्ता खोल दिया है। जो लोग इस खौफ के सफर में मेरे साथ लाइव रूबरू होना चाहते हैं और जानना चाहते हैं कि इकबाल इस दास्तान में आगे क्या भुगतने वाला है, वे अभी फेसबुक पर सर्च करें— 'IJ Adhura Pyaar'।
देखते हैं, आपमें से कितने लोग मुझे वहां ढूँढ पाते हैं! क्या आप तैयार हैं इस डिजिटल पहेली को सुलझाने के लिए? मैं फेसबुक के उस पन्ने पर आपका इंतज़ार कर रहा हूँ, जहाँ सस्पेंस का असली चेहरा दिखेगा।