ulte pairon wali dakini in Hindi Horror Stories by Raj books and stories PDF | उल्टे पैरों वाली डाकिनी

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उल्टे पैरों वाली डाकिनी

शायद आप मेरी इस कहानी पर यकीन न करें, और मैं दुआ करता हूँ कि आपको कभी ऐसी जगह पर कदम न रखना पड़े जहाँ यकीन और हकीकत के बीच का फर्क ही मिट जाए। यह कहानी मेरे एक दोस्त समीर की है, जो आज इस दुनिया में नहीं है। मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूँ ताकि दुनिया को पता चल सके कि हमारे देश के एक सुदूर कोने में एक ऐसा गाँव भी मौजूद है, जिसे भगवान ने भी अपने हाल पर छोड़ दिया है। उस गाँव का नाम है—कालेपुर।
कालेपुर कोई आम गाँव नहीं है। वहाँ के भूगोल और मौसम के नियम विज्ञान को चुनौती देते हैं। पिछले लगभग सौ सालों से हमारे गाँव के लोगों ने सूरज की शक्ल नहीं देखी है। वहाँ कभी सुबह नहीं होती, और न ही कभी शाम की लाली छाती है। वहाँ सिर्फ़ एक अंतहीन, घनेरी रात है जो कभी खत्म होने का नाम नहीं लेती। आसमान हमेशा काले, सड़ते हुए बादलों से घिरा रहता है। वो बादल इतने नीचे आ जाते हैं मानो हमारे घरों की छतों को छू लेंगे। मौसम ऐसा रहता है जैसे कोई भयानक प्रलय आने वाली हो। रह-रहकर आसमान में खून खौला देने वाली बिजली कड़कती है, जिसकी नीली-सफेद रोशनी में पूरा गाँव एक पल के लिए चमकता है और अगले ही पल फिर से गहरे काले सन्नाटे में डूब जाता है।
वहाँ चौबीसों घंटे बर्फीला, तेज़ तूफ़ान चलता रहता है। हवाएं जब हमारे पुराने और जर्जर मकानों के कोनों से टकराती हैं, तो ऐसा लगता है मानो कोई तड़पकर रो रहा हो। कभी-कभी तो इतनी तेज़ और मूसलाधार बारिश होती है कि पूरे गाँव की गलियां कीचड़ और मलबे से भर जाती हैं। उस बारिश का पानी भी अजीब है—वह साफ़ नहीं, बल्कि कुछ गंदा और चिपचिपा होता है, जिसकी गंध सड़े हुए मांस जैसी आती है।
हम कालेपुर के लोग इस नरक में जीने के लिए मजबूर हैं। दिन और रात का अंदाज़ा हम सिर्फ़ अपनी कलाई घड़ियों या दीवारों पर टंगे पुरखों के समय के क्लॉक से लगाते हैं। जब घड़ी में सुबह के आठ बजते हैं, तो हम समझ जाते हैं कि काम पर जाने का समय हो गया है। लेकिन कोई भी खुशी-खुशी बाहर नहीं निकलता। हम अपने घरों के दरवाजों पर बड़े-बड़े लोहे के ताले और भीतर से लकड़ी के भारी लट्ठ लगाकर रखते हैं। सिर्फ़ जिंदा रहने के लिए, अनाज और पानी के इंतजाम की खातिर, हम बेहद मजबूरी में अपने घरों से बाहर कदम रखते हैं। जब भी कोई बाहर जाता है, वह कभी अकेला नहीं जाता। तीन-चार मर्द हाथ में लालटेन और कुल्हाड़ी लेकर निकलते हैं, चारों तरफ़ सहमी हुई निगाहों से देखते हैं और जितना जल्दी हो सके, काम निपटाकर वापस अपने कमरों में दुबक जाते हैं।
क्योंकि हम जानते हैं कि इस अंतहीन अंधेरे में हम अकेले नहीं हैं। इस गाँव पर एक ऐसी ताकत का साया है, जिसके नाम मात्र से हमारा खून जम जाता है। वह कोई मामूली भूत या चुड़ैल नहीं है। गाँव के बुजुर्ग उसे डाकिनी कहते हैं।
डाकिनी इस पूरे इलाके की मालकिन बन चुकी है। वह रात के ठीक बारह बजे—जब घड़ी की सुइयां एक दूसरे के ऊपर आती हैं—अपने ठिकाने से बाहर निकलती है। उसका हुलिया ऐसा है जिसे देखकर कोई भी इंसान पागल हो जाए। उसका शरीर असाधारण रूप से लंबा और सुखा हुआ है, जैसे हड्डियों पर सिर्फ़ चमड़ी मढ़ दी गई हो। उसने सफ़ेद रंग का एक लंबा कफ़न जैसा कपड़ा पहन रखा है, जो नीचे कीचड़ में घिसटता रहता है। उसके बाल घुटनों तक लंबे, रूखे और बिखरे हुए हैं, जिनसे लगातार पानी या कोई गाढ़ा कतरन टपकती रहती है।
लेकिन उस डाकिनी की सबसे भयानक और रूह कंपा देने वाली सच्चाई हैं उसके पैर।
उसके पैर इंसानों की तरह सीधे नहीं हैं। वे पूरी तरह से उल्टे हैं। उसकी एड़ियां आगे की तरफ़ निकली हुई हैं और पैरों के लंबे, नुकीले नाखूनों वाले पंजे पीछे की तरफ़ मुड़े हुए हैं। उन डरावने, उल्टे पैरों में उसने लोहे की भारी-भारी पंजियाँ पहन रखी हैं, जिनमें बड़े-बड़े, पुराने पीतल के घुंघरू लगे हुए हैं। वह जब भी चलती है, तो पूरा गाँव दहल उठता है।
जब डाकिनी हमारे गाँव की सुनसान, कीचड़ भरी गलियों में घूमती है, तो सन्नाटे को चीरती हुई एक ही आवाज़ आती है—
छन... छन... छनक!
छन... छन... छनक!
वह आवाज़ जब किसी के घर के पास से गुजरती है, तो घर के भीतर मौजूद मासूम बच्चों के मुंह उनकी माएँ अपने हाथों से दबा देती हैं ताकि डर के मारे उनकी सिसकी भी बाहर न निकल जाए। डाकिनी के चलने का तरीका भी बड़ा अजीब है। चूंकि उसके पैर उल्टे हैं, इसलिए जब वह आगे बढ़ती है, तो कीचड़ में बनने वाले पैरों के निशान पीछे की तरफ़ इशारा करते हैं। अगर कोई सुबह उन निशानों को देखता है, तो उसे लगता है कि डाकिनी गाँव से बाहर जा रही है, जबकि असलियत में वह गाँव के भीतर आ चुकी होती है। वह पैरों के निशान इंसानों को भ्रमित करने का उसका एक जाल हैं।
डाकिनी की सबसे खतरनाक बात है उसकी हंसी। वह चलते-चलते अचानक रुक जाती है, अपना सिर आसमान की तरफ़ उठाती है और बिजली की कड़वाहट के बीच हंसने लगती है—"हीहीही... हूहूहू... आहाहाहा..."
वह हंसी कोई सामान्य हंसी नहीं है। उस आवाज़ में एक ऐसा सम्मोहन और ऐसा खौफ है कि उसे सुनते ही कमजोर दिल वाले लोगों की छाती में तेज दर्द होने लगता है। हमारे गाँव के कई बुजुर्गों की तो सिर्फ़ उसकी हंसी सुनकर ही दिल का दौरा पड़ने से मौत हो चुकी है। उसकी हंसी का मतलब होता है कि आज रात कालेपुर में किसी न किसी की बलि चढ़ने वाली है। वह किसी न किसी को अपने साथ ले जाने आई है।
समीर मेरा बचपन का दोस्त था। वह शहर में पढ़ता था और स्वभाव से बहुत तार्किक और हिम्मती था। वह इन सब बातों को अंधविश्वास मानता था। जब उसके दादाजी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हुई, तो उसे न चाहते हुए भी हमारे गाँव वापस आना पड़ा। मैंने उसे बहुत रोका था, मैंने कहा था, "समीर, वहाँ मत जाओ, वह जगह श्रापित है।" लेकिन उसने मेरी एक न सुनी। उसने कहा, "आज के जमाने में भी तुम लोग भूत-प्रेत की बातों में यकीं करते हो? मौसम खराब है, तो इसका कोई वैज्ञानिक कारण होगा।"
समीर जब कालेपुर पहुँचा, तो यहाँ के माहौल ने पहली ही बार में उसकी रीढ़ में एक सिहरन पैदा कर दी। हर तरफ़ फैला काला सूनापन, लगातार गूँजती बिजलियां और लोगों के चेहरों पर पसरा मौत का डर। उसके दादाजी के घर में सिर्फ़ एक बूढ़ी चाची थीं, जो दिन-रात बस भगवान का नाम जपती रहती थीं।
उसकी पहली रात थी। समीर अपने कमरे में लेटा हुआ था। बाहर तूफ़ान अपनी पूरी चरम सीमा पर था। खिड़की के शीशों पर तेज बारिश की बूंदें थप-थप की आवाज़ कर रही थीं। समीर को नींद नहीं आ रही थी। वह बार-बार अपनी कलाई घड़ी देख रहा था। रात के ठीक 12 बजे।
अचानक, हवा का रुख बदला। बारिश की थपथपाहट के बीच एक और आवाज़ मिक्स होने लगी।
छन... छन... छनक!
समीर के कान खड़े हो गए। उसने सोचा कि शायद कोई मवेशी बाहर घूम रहा है जिसके गले में घंटी बंधी है। उसने ध्यान से सुना। वह आवाज़ हर सेकंड के साथ उसके घर के करीब आ रही थी।
छन... छन... छनक!
तभी, पूरे गाँव की हवा को चीरती हुई वह भयानक हंसी गूँजी—"हीहीही... हूहूहू..."। आवाज़ इतनी तेज और तीखी थी कि समीर ने अनजाने में ही अपने दोनों कान हाथों से दबा लिए। उसके कमरे की दीवारें जैसे उस हंसी से कांपने लगी थीं। घर के दूसरे कोने से उसकी चाची के रोने और बुदबुदाने की आवाज़ आ रही थी, "वह आ गई... वह फिर आ गई... भगवान रक्षा करना।"
समीर का तार्किक दिमाग अब डर में बदलने लगा था। लेकिन उसके भीतर का कौतूहल अभी मरा नहीं था। वह देखना चाहता था कि आखिर बाहर है कौन। वह रेंगते हुए बिस्तर से उठा और दबे पांव अपने कमरे की बड़ी लकड़ी की खिड़की के पास गया। खिड़की के पल्लों के बीच एक छोटी सी झिरी (दरार) थी, जहाँ से बाहर का रास्ता साफ़ दिखता था।
समीर ने अपनी एक आँख उस दरार पर टिका दी। बाहर घाघ अंधेरा था। सिर्फ़ तूफ़ान की सरसराहट थी। तभी, एक बहुत तेज़ बिजली चमकी। उस एक सेकंड के दसवें हिस्से की रोशनी में समीर ने जो देखा, उसने उसके होश उड़ा दिए।
खिड़की से महज दस फीट की दूरी पर एक आकृति खड़ी थी। वह सफेद कफ़न में लिपटी हुई थी। बिजली की चमक में साफ़ दिखा कि उसके दोनों पैर घुटनों के नीचे से पूरी तरह पीछे की तरफ़ मुड़े हुए थे। उन उल्टे पैरों की उंगलियां समीर के घर की तरफ़ थीं, और एड़ियां बाहर की तरफ़। पैरों में भारी लोहे की पंजियाँ और पीतल के घुंघरू बंधे थे, जिन पर जंग लगी हुई थी।
समीर का गला सूख गया। वह पीछे हटने ही वाला था कि तभी डाकिनी ने अपना सिर धीरे-धीरे घुमाया। उसके लंबे, कीचड़ से सने बाल एक तरफ़ हटे। उसका चेहरा सामने आया। उसका चेहरा पूरी तरह सफेद और झुर्रियों से भरा था, जैसे कोई लाश पानी में हफ़्तों तक सड़ती रही हो। उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं—उनमें कोई पुतली नहीं थी।
और सबसे भयानक बात... वह सीधे उसी खिड़की की दरार की तरफ़ देख रही थी जहाँ समीर अपनी आँख टिकाए खड़ा था। डाकिनी को पता चल चुका था कि कोई उसे देख रहा है।
डाकिनी के चेहरे पर एक वीभत्स मुस्कान उभरी। उसके काले पड़ चुके होठों के बीच से नुकीले दांत दिखे, जिनसे गाढ़ा, काला खून टपककर उसके सफेद कफ़न पर गिर रहा था। उसने अपने दोनों उल्टे पैरों को जोर से जमीन पर पटका—छनकार!!!
वह एक झटके में हवा में तैरती हुई खिड़की के बिल्कुल पास आ गई। अब उसकी सफेद, अंधी आँखें समीर की आँखों से महज कुछ इंच की दूरी पर थीं, बीच में सिर्फ़ खिड़की का शीशा था।
समीर डर के मारे चीखना चाहता था, लेकिन उसके गले से आवाज़ ही नहीं निकली। उसका पूरा शरीर जैसे किसी ने पत्थर का बना दिया हो। वह अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रहा था। डाकिनी ने धीरे से अपना हाथ उठाया। उसके हाथ के नाखून छह-छह इंच लंबे और काले थे। उसने अपने हाथ को खिड़की के शीशे पर फेरा। एक अजीब, रूह कंपा देने वाली सरसरायत की आवाज़ हुई।
तभी, डाकिनी ने फिर से वही भयानक हंसी हंसी, लेकिन इस बार वह हंसी समीर के दिमाग के भीतर गूँज रही थी। उसने अपना एक उल्टा पैर उठाया और पूरे बल के साथ खिड़की के शीशे पर दे मारा।
कड़कड़ाकर... कांच चकनाचूर हो गया!
कांच के टुकड़े समीर के चेहरे और शरीर पर आ गिरे, जिससे उसका खून बहने लगा। दर्द के इस अहसास ने जैसे समीर के सम्मोहन को तोड़ा। वह जोर से चीखा और पीछे की तरफ़ भागा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डाकिनी का एक लंबा, ठंडा और सड़ा हुआ हाथ खिड़की के भीतर आ चुका था। उस हाथ ने समीर के पैर को पकड़ लिया। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी जैसे कोई लोहे का शिकंजा हो।
समीर ने घर की दीवारों को पकड़ने की कोशिश की, उसने अपनी चाची को आवाज लगानी चाही, "चाची! बचाओ!" लेकिन डाकिनी ने उसे इतनी ताकत से खींचा कि वह सीधा खिड़की के टूटे हुए फ्रेम से बाहर कीचड़ में जा गिरा। कांच के टुकड़ों से उसका शरीर पूरी तरह छिल चुका था।
बाहर, तूफ़ान और तेज हो गया था। बिजली इस तरह कड़क रही थी मानो आसमान फट पड़ेगा। डाकिनी ने समीर को उसके बालों से पकड़ लिया और उसे घसीटते हुए गाँव की मुख्य सड़क की तरफ़ ले जाने लगी। समीर तड़प रहा था, चिल्ला रहा था, लेकिन हमारे गाँव के किसी भी घर का दरवाजा नहीं खुला। सब जानते थे कि अगर आज समीर को बचाने के लिए कोई बाहर निकला, तो डाकिनी पूरे गाँव को जिंदा निगल जाएगी। लोग अपने कमरों में रो रहे थे, कांप रहे थे और कानों पर तकिए रखे हुए थे।
डाकिनी समीर को घसीटते हुए हमारे गाँव की सीमा पर स्थित उस घने और काले जंगल की तरफ़ ले गई, जहाँ से वह हर रात आती है। हवा में सिर्फ़ डाकिनी के पैरों के घुंघरुओं की आवाज आ रही थी—छन... छन... छनक... और साथ में समीर की आखिरी, दम तोड़ती हुई चीखें।
अगली 'सुबह' जब घड़ी में आठ बजे, तो गाँव का तूफ़ान थोड़ा धीमा पड़ा था, लेकिन अंधेरा वैसा ही घना था। मैं और गाँव के कुछ हिम्मतवाले लोग, जिनमें समीर की चाची भी शामिल थीं, लाठियां और मशालें लेकर समीर के घर के बाहर इकट्ठा हुए।
वहाँ का मंजर देखकर हम सबकी रूह कांप गई। समीर के कमरे की खिड़की पूरी तरह टूटी हुई थी। चारों तरफ़ खून के छींटे थे। और घर के बाहर, कीचड़ से भरी जमीन पर पैरों के निशान बने हुए थे। वे निशान अजीब थे। वे निशान ऐसे लग रहे थे जैसे कोई इंसान जंगल की तरफ़ से समीर के घर की तरफ़ आया हो, क्योंकि पंजों के निशान घर की तरफ़ इशारा कर रहे थे। लेकिन हम सब सच जानते थे। डाकिनी के पैर उल्टे हैं। इसका मतलब था कि वह समीर को घसीटते हुए उस खौफनाक जंगल के भीतर ले जा चुकी थी।
समीर का उसके बाद कभी कोई पता नहीं चला। आज भी, मेरा यह कालेपुर गाँव उसी तरह अंधेरे में डूबा हुआ है। आज भी यहाँ न सुबह होती है, न शाम। आज भी हम लोग रात के बारह बजते ही अपनी सांसें रोक लेते हैं। क्योंकि हम जानते हैं, जैसे ही बिजली कड़केगी, वैसे ही उस अंतहीन अंधेरे से एक बार फिर आवाज़ आएगी
छन... छन... छनक! और उसके बाद गूँजेगी वो जानलेवा हंसी, जो किसी और बदनसीब का दिल दहलाने के लिए काफी होगी। अगर कभी आपका रास्ता मेरे इस गाँव की तरफ़ मुड़े जहाँ दिन में भी टार्च जलानी पड़े, तो यहाँ से तुरंत भाग जाना... क्योंकि हो सकता है, आपके ठीक पीछे कोई उल्टे पैरों वाली डाकिनी खड़ी आपका इंतजार कर रही हो!