Diwan ji... our share in Hindi Motivational Stories by Wajid Husain books and stories PDF | दीवान जी... हमारा हिस्सा

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दीवान जी... हमारा हिस्सा

        वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी

चौड़ी सड़क पर शाम उतर रही थी। दिन भर की तपिश से सड़क अब भी भट्टी की तरह तप रही थी। शेखर ने अपनी कार डोमिनोज़ के सामने पार्क की ओर अंदर चला गया। जब वह लौटा, तो सड़क पर तमाशा शुरू हो चुका था-बिना टिकट का, बिना मंच का, बिना तालियों का। शेखर कार में बैठा-बैठा इस अद्भुत तमाशे को देखने लगा।

सात-आठ साल का एक लड़का था, बदन पर कपड़े कम, धूल और मेहनत का रंग ज़्यादा। उसने दोनों हाथ हवा में उठाए, फिर हथेलियां सड़क पर टिकाईं और एक झटके में गुलाटी मारी। अपनी लचीली पीठ सीधी करके वह शेखर की कार की ड्राइवर साइड विंडो के बराबर आकर खड़ा हो गया और अपनी छोटी सी हथेली फैला दी।

 हथेली पर मेहंदी से बना फूल था। शेखर की नज़र उस फूल से फिसल कर उसके पैरों तक पहुंची जिसमें पहनी हुई हवाई चप्पल का आधा तल्ला ही बचा था।

 "क्या उसके पैरों में छाले पड़ गए होंगे?" उसने सोचा। फिर उसकी नज़र धूप में तपे कुम्हलाये चेहरे पर पड़ी। सूखे होठ और उनके ऊपर काली स्याही से बनाई गई मूछें। उसकी थोड़ी पर दाढ़ी पेंट करने की कोशिश की गई थी। लड़के ने अपनी स्याही से बनी मूछों को ऐठा। फिर जोकर बनकर कार में बैठे शेखर को हंसाने की कोशिश शुरू कर दी।

अगले ही पल उसके सामने एक दस-बारह साल की लड़की खड़ी हो गई। उसकी काली सलवार के पायचें सड़क की कड़क सतह से रगड़ खाते-खाते उधड़ने शुरू हो गए थे। गुलाबी फूलों वाली कुर्ती उसे जिस किसी से मिली थी वह ज़रूर कोई जवान औरत रही होगी, शायद उसकी मां ही, क्योंकि इस बच्ची के सपाट सीने पर कुर्ती का ऊपरी हिस्सा अजीबो-गरीब ढंग से लटक रहा था। जवानी और ख़ूबसूरती का भ्रम पैदा करने के लिए उसके गालों पर ढेर सारी लाली पोती हुई थी और होठों पर भी शायद कोई सस्ता सा रंग कर रखा था। वह अचानक हवा में अपनी दोनों टांगें फैला कर घूमी‌। इस दौरान उसकी कुर्ती उलट कर थोड़ी ऊपर हो गई लेकिन बस इतनी कि उसके पिचके हुए पेट के थोड़ा ऊपर झांकती पसलियां दिख सकीं। फिर उसने पलट कर वापस जाने के लिए दो उल्टी गुलाटी मारी। उसके बाद वह शेखर की तरफ मुंह करके , तवायफ के अंदाज में झुकी- "आदाब..." और भीख या बख्शीश के लिए अपनी हथेली फैला दी। उसकी हथेली पर भी मेहंदी से बना वही फूल दिख गया जो उसके छोटे भाई की हथेली पर भी बना था।

शेखर इन बाल कलाकारों को ख़ाली हाथ नहीं जाने देना चाहता था। लेकिन वह जानता था कि आदत के मुताबिक उसने चिल्लर अपने पर्स में आज भी नहीं रखे थे। उसने पर्स में पांच सौ का नोट निकाला, कार के डैश बोर्ड पर रख दिया और सामने खड़े जूस बेचने वाले को चेंज देने के लिए इशारा किया। 

लेकिन शेखर को यह कहां मालूम था कि उसकी असहजता को कोई और भी ताड़ रहा है। यह बात जिसने ताड़ ली थी वह शेखर की कार से थोड़ी ही दूर पर नीम के पेड़ की छांव में बैठी हुई उनतिस-तीस साल की औरत थी। उसकी गोद में दूध पीता बच्चा था। उसने झटपट बच्चे को पास में बैठी अपनी ही जैसी एक औरत की गोद में डाला और तेज़ कदमों से शेखर की कार की और बढी।

"किसे दिखा रहे हो बाबू यह पांच सौ का नोट?" वह लगभग झपटते हुए बोली-"वो तुम्हारे किसी काम की नहीं.., मैं हूं ना।"

 शेखर सन्न रह गया। शब्द गले में अटक गए। 

उसने घबरा कर कार का शीशा ऊपर करना चाहा ही था  तभी पेड़ की छाया में खड़ा ट्रैफिक पुलिस वाला पास आ गया। उसने खटखटाया-"शीशा नीचे करो।"

शेखर ने लाचारी से शीशा नीचे कर दिया। पुलिस वाले ने कड़क आवाज में कहा-"क्या चल रहा है यहां?" वह ऐसे पूछता है, जैसे सब जानता हो। फिर पुलिस वाला हल्की मुस्कान के साथ बोला- "सर जी, क्या सेटिंग कर रहे थे?"

शेखर के पास कोई जवाब नहीं था।

"चौकी चलें, वहां आराम से बता देना।"

शेखर का गला सूख गया। एक पल के लिए उसे लगा-वह अपराधी है। बिना कुछ किये।

उसने बिना कुछ कहे वह नोट उसकी तरफ बढ़ा दिया। "अब जाऊं?" उसने धीमे से पूछा। 

पुलिस वाले ने नोट जेब में सरकाते हुए कहा -"और नहीं तो क्या... या कुछ और भी करना है।"

उसे लगा, उसके कानों में पिघला सीसा भर दिया गया था। उसने पुलिस वाले की तरफ से मुंह फेर कर दूसरी तरफ कर लिया, देखा, पुलिस वाला पांच‌ सौ का नोट अपनी जेब में रख ही रहा था कि उसके एकदम पास आकर लड़के ने उसकी तरफ अपनी हथेली फैला दी-"दीवान जी... हमारा हिस्सा?" 

तभी अचानक एक और पात्र नाटक में शामिल हो गया। शायद मटमैली बनियान और लूंगी के पहनावे की इज़्ज़त बढ़ाने के लिए उसने सिर पर टोपी की तरह जमे बालों में ढेर सा तेल चुपड़ रखा था। वह था लड़के का पिता। उसे ख़ूब पता था कि लड़के की यह बेवकूफी पूरे परिवार पर भारी पड़ सकती है। पुलिस वाले के कुछ कहने से पहले ही उसने कहा-"हरामखोर! दीवान जी हमारे माई-बाप हैं!" और उसकी कनपटी पर ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया।

तमाचा इतना तेज़ था कि लड़का लड़खड़ाकर सड़क के किनारे गिर पड़ा। उसकी हथेली सड़क से घिसट गई। 

मेहंदी का जो फूल अभी तक साफ दिख रहा था... अब धूल, पसीने और सड़क की रगड़ से घिसकर लगभग मिट चुका था। लड़का सिसकियों से रो रहा था और अपनी हथेली सहला रहा था।

शेखर का दिल कांप गया। वह कार से उतरकर लड़के के पास आया-"चल जूस पीते हैं।"

लड़का चौका फिर उसके साथ चल पड़ा। जूस की हर घूंट उसके अंदर जमे डर को धोने की कोशिश कर रही थी।

शेखर ने पूछा-"स्कूल जाते हो?"

"नहीं... बाबू कहता है, पढ़ाई से पेट नहीं भरता। 

तभी वह औरत सामने आई-इस बार उसकी आवाज़ में न वह तेज़ी थी ना बाज़ारू लहजा। उसने हाथ जोड़कर कहा-" माफ कर दो बाबू...गरीबी क्या नहीं कराती?"

शेखर ने औरत को अपना कार्ड दिया और धूप- छांव के दफ्तर जाने को कहा। धूप-छांव एक एनजीओ है जो इस तरह के परिवारों के पुनर्वास में सहयोग देता है। 

"बाबू... यह सब मत करो। हम लोग ऐसे ही जी लेते हैं..."

शेखर ने कहा-"जी लेते हो या हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरते हो?"आज अगर यह बच्चा भी यही सीखेगा तो इसका कल कैसा होगा? एक मौका है... बस एक। पकड़ लो।"

औरत सन् रह गई। वह धीरे-धीरे ज़मीन पर बैठ गई। कुछ पल की खामोशी के बाद उसने हाथ जोड़े-"आज से सब छोड़ दियो। अब... मेहनत से पेट भरेंगे।"

पास खड़ा पुलिसवाला जूस पी रहा था- उसने आंखें नीचे कर लीं। 

बरसों बाद शेखर फिर उसी जगह आया। डोमिनोज़ के सामने अब एक छोटा सा चाय का खोखा था।

"बाबूजी...चाय पियोगे?"

आवाज़ जानी-पहचानी लगी।

शेखर ने देखा-वही औरत थी। पर आज उसके चेहरे पर  लाली पुती हुई नहीं थी... एक सादगी थी, एक थकन थी और कहीं गहराई में एक आत्मसम्मान भी था। 

शेखर ने कहा-"कैसी हो... बहन?"

यह शब्द सुनते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने रूंधे गले से कहा-"बाबू, मैं आपका कार्ड लेकर धूप- छांव के दफ्तर गई। उन्होंने मेरे बच्चों का स्कूल में दाख़िला करा दिया। अब वे मन लगाकर पढ़ाई कर रहे हैं। हमें इंसानों की तरह रहना- सहना सिखाया और हमारे गुज़ारे के लिए यह चाय का खोखा खुलवा दिया। 

शेखर ने चाय पी। उसने चलते-चलते कहा- "ज़िंदगी के किसी मोड़ पर अकेली पड़ो तो भाई को याद कर लेना।"

औरत ने पैर छूकर नम आंखों से उसे विदा किया। जैसे-जैसे कार स्पीड पकड़ रही थी वैसे-वैसे औरत की आंखों से अश्रु धारा बहने का वेग बढ़ता जा रहा था।

एक ग्राहक ने आश्चर्यचकित होकर पूछा-"कौन था?"

"जिसने जीना सिखाया।" औरत ने रूंधे गले से कहा। और उबलती हुई चाय गिलासों में लौटने लगी।

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