मेरी है।"
अवंतिका खिड़की के सामने खड़ी रह गई। उसकी नज़र बार-बार उन तीन शब्दों पर टिक जा रही थी। वे सिर्फ़ तीन शब्द थे, लेकिन उनके पीछे छिपा एहसास किसी भी डरावने दृश्य से ज़्यादा भयावह था। क्योंकि यह कोई सपना नहीं था।
यह उसकी अपनी खिड़की के शीशे पर लिखा हुआ सच था।
उसने तुरंत अपना फोन निकाला और उन शब्दों की तस्वीर खींच ली। फिर धीरे से खिड़की खोली और नीचे झाँका।
नीचे कोई नहीं था। गेस्ट हाउस की दीवार बिल्कुल सीधी थी। न कोई पाइप, न बालकनी, न ऐसा सहारा जिसके सहारे कोई दूसरी मंज़िल तक पहुँच सके।
अवंतिका ने उँगली से उन अक्षरों को छुआ। धूल शीशे के बाहर की तरफ जमी हुई थी। यानी यह संदेश बाहर खड़े होकर लिखा गया था।
उसने बिना कुछ कहे खिड़की बंद कर दी।
नाश्ते की मेज़ पर तीनों साथ बैठे थे।
अवंतिका ने फोन निकालकर तस्वीर मेहर और चोटू को दिखाई।
मेहर कुछ देर तक स्क्रीन देखती रही, फिर उसने फोन चोटू की तरफ बढ़ा दिया।
चोटू ने फोटो देखी, बिना कुछ बोले कुर्सी से उठा और बाहर निकल गया।
"चोटू!" मेहर ने आवाज़ लगाई।
बाहर से उसकी घबराई हुई आवाज़ आई, "थोड़ी हवा खाने जा रहा हूँ।"
मेहर ने गहरी साँस ली और धीमे से बोली, "वह सचमुच डर गया है…"
कुछ पल बाद उसने खुद स्वीकार किया, "और सच कहूँ… मैं भी।"
यह सुनकर अवंतिका ने उसकी तरफ देखा। मेहर हमेशा हर मुश्किल में मज़ाक ढूँढ़ लेती थी। उसे इस तरह डरा हुआ देखना आसान नहीं था।
अवंतिका ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"तुम दोनों वापस दिल्ली चले जाओ," उसने शांत स्वर में कहा। "इस सब में तुम्हें नहीं पड़ना चाहिए।"
मेहर ने तुरंत सिर हिला दिया।
"नहीं।"
"मेहर…"
"मैंने कहा ना, नहीं।" इस बार उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा दृढ़ थी। "तू अकेली नहीं है। मैं तेरे साथ हूँ। और चोटू भी रहेगा… चाहे उसे जितना मनाना पड़े।"
अवंतिका हल्का-सा मुस्कुराई।
कभी-कभी दोस्ती का सबसे बड़ा सहारा शब्द नहीं, सिर्फ़ साथ होता है।
नाश्ते के बाद अवंतिका अकेली कस्बे की गलियों में निकल पड़ी। उसे शांत दिमाग से सोचना था।
एक पत्रकार होने के नाते उसने अब तक मिले हर सुराग को मन ही मन जोड़ना शुरू किया।
श्यामला… या उससे जुड़ी कोई शक्ति… सचमुच मौजूद है।
उसका सीधा संबंध अवंतिका से है।
उसकी माँ चंदनगढ़ की रहने वाली थीं।
वही रहस्यमयी धुन उनकी लोरी भी थी।
माँ ने अपनी सच्चाई उससे क्यों छिपाई?
उसका श्यामला से क्या रिश्ता है?
और सबसे बड़ी बात… "तू मेरी है" का मतलब क्या है?
सोचते-सोचते वह कस्बे के आख़िरी छोर तक पहुँच गई।
वहीं एक छोटी-सी पुरानी किताबों की दुकान थी। लकड़ी का फीका बोर्ड, दरवाज़े पर पुराना पर्दा और अंदर तक फैली पुरानी किताबों की खुशबू।
जिज्ञासा उसे भीतर खींच लाई।
अंदर चारों तरफ़ धूल जमी अलमारियाँ थीं। एक कोने में मोमबत्ती जल रही थी और एक युवक ऊँची शेल्फ़ से किताबें उतार रहा था।
"नमस्ते," अवंतिका ने कहा।
युवक मुड़ा।
अवंतिका एक पल के लिए ठिठक गई।
लगभग सत्ताईस-अट्ठाईस साल का लंबा युवक। साँवला रंग, नुकीले नैन-नक्श और सबसे अलग… उसकी धूसर (Grey) आँखें। इतनी अनोखी आँखें उसने पहले कभी नहीं देखी थीं।
"नमस्ते," उसने शांत स्वर में जवाब दिया।
"क्या आप यहीं के रहने वाले हैं?" अवंतिका ने पूछा।
"हाँ।"
"और यह दुकान…?"
"मेरे बाबा की है।"
उसने किताब वापस रखी और सहजता से पूछा, "आप दिल्ली से आई हैं?"
अवंतिका हैरान रह गई।
"आपको कैसे पता?"
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।
"चंदनगढ़ छोटा कस्बा है। यहाँ नए चेहरे ज़्यादा देर तक अनजान नहीं रहते।"
"आपका नाम?"
इस बार वह पूरी तरह उसकी तरफ मुड़ा।
"वीर।" उसने कहा। "वीर राठौड़।"
अवंतिका ने नाम दोहराया—वीर राठौड़।
न जाने क्यों, उसमें कुछ ऐसा था जो इस कस्बे का होकर भी इस कस्बे जैसा नहीं लगता था।
तभी वीर ने पूछा,
"आप पत्रकार हैं… है ना?"
"हाँ। मैं काली कोठी की कहानी पर काम कर रही हूँ।"
यह सुनते ही उसकी आँखों का भाव एक पल को बदल गया।
"यहाँ के लोग उस हवेली के बारे में बात नहीं करते," उसने शांत स्वर में कहा।
"लेकिन मुझे कुछ जवाब चाहिए। क्या आप—"
"नहीं।"
इस बार जवाब इतना सीधा था कि अवंतिका कुछ क्षण चुप रह गई।
"आपने मेरा सवाल पूरा सुना भी नहीं।"
"सवाल सुनने की ज़रूरत नहीं थी," वीर बोला। "मुझे पता है आप क्या पूछना चाहती हैं।"
"और जवाब?"
"नहीं।"
"क्यों?"
वीर कुछ पल तक उसकी आँखों में देखता रहा।
फिर धीमे स्वर में बोला,
"क्योंकि… जो लोग उस हवेली के बारे में ज़्यादा बोलते हैं… वह उन्हें सुन लेती है।"
अवंतिका की भौंहें सिकुड़ गईं।
"कौन?"
वीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह वापस किताबें सँभालने लगा।
कुछ पल बाद बिना उसकी तरफ देखे बोला,
"अगर मेरी बात मानें… तो जितनी जल्दी हो सके चंदनगढ़ छोड़ दीजिए।"