Raaz - Part 8 in Hindi Horror Stories by Aarushi Singh Rajput books and stories PDF | Raaz - Part 8

Featured Books
Categories
Share

Raaz - Part 8

अवंतिका दुकान से बाहर निकल आई, लेकिन उसके कदम वहीं रुक गए। जाने क्यों उसे लगा कि वीर कुछ छिपा रहा है। उसने दरवाज़े पर पड़े पुराने पर्दे की ओट से अंदर झाँका। वीर फिर से एक पुरानी किताब खोलकर पढ़ने लगा था।

किताब का नाम साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसकी कलाई पर बना एक निशान साफ़ नज़र आ गया।

वह कोई साधारण दाग नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी गर्म लोहे से वह चिन्ह उसकी त्वचा पर उकेरा गया हो। गोल आकृति, उसके भीतर तीन सीधी रेखाएँ और एक किनारे हल्की-सी मुड़ी हुई लहर।

अवंतिका का दिल धड़क उठा।

यही निशान उसने काली कोठी की दीवारों पर बनी पुरानी तस्वीरों के पास देखा था।

क्या यह सिर्फ़ संयोग था... या वीर का उस हवेली से कोई रिश्ता था?

गेस्ट हाउस लौटते ही उसने अपनी नोटबुक निकाली और याद के सहारे वही चिन्ह बना दिया। कई बार देखने के बाद भी उसे समझ नहीं आया कि वह किसी भाषा का अक्षर था, कोई धार्मिक प्रतीक या किसी गुप्त निशान का हिस्सा।

इसी बीच चोटू कमरे में आया। सुबह की घबराहट अब उसके चेहरे से कुछ कम हो चुकी थी

लेकिन इस बार उसकी आवाज़ सामान्य से कहीं ज़्यादा गंभीर थी।

"मैं कस्बे में रामदीन काका से मिला था," उसने कहा। "उन्हें उस पत्रकार के बारे में सब याद है, जिसकी मौत तीन महीने पहले हुई थी।"

अवंतिका तुरंत उसकी तरफ मुड़ी।

"उन्होंने बताया कि उस पत्रकार का नाम राहुल मेहरा था। लेकिन वह अकेला नहीं आया था। उसके साथ एक लड़की भी थी।"

"फिर?" मेहर ने उत्सुकता से पूछा।

"राहुल की लाश मिल गई... लेकिन वह लड़की कभी नहीं मिली। आज तक नहीं।"

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

चोटू ने आगे कहा, "रामदीन काका को एक बात और याद थी... उस लड़की की बाईं आँख के पास भी ठीक वैसा ही तिल था, जैसा अवंतिका के चेहरे पर है।"

अवंतिका के हाथ अनायास अपनी आँख तक पहुँच गए।
उसने बिना कुछ कहे नोटबुक खोली और लिखा

• तिल वाली लड़की — लापता।
• मेरी बाईं आँख के पास भी वही तिल।
• शीशे पर लिखा संदेश — "तू मेरी है।"

कलम कुछ पल के लिए रुक गई।

क्या यह सब आपस में जुड़ा हुआ था?

शाम होते-होते अवंतिका फिर उसी किताबों की दुकान पर पहुँची।

वीर वहीं था।

इस बार उसने बिना किसी भूमिका के कहा,

"मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।"

वीर ने किताब बंद कर दी।

"मैंने पहले ही कहा था..."

"तीन महीने पहले जो लड़की गायब हुई थी..." अवंतिका ने उसकी बात बीच में ही काट दी, "क्या आप उसे जानते थे?"
कुछ पल तक वीर चुप रहा।

फिर उसने धीमे स्वर में कहा,

"हाँ... जानता था।"

"कौन थी वह?"

उसने एक गहरी साँस ली।

"मेरी बहन।"

अवंतिका स्तब्ध रह गई।

"उसका नाम आरोही था। राहुल उसके साथ यहाँ आया था। मैंने उसे बहुत रोका... लेकिन वह नहीं मानी।"
पहली बार वीर की आवाज़ में छिपा दर्द साफ़ महसूस हो रहा था।

"क्या उसकी बाईं आँख के पास भी तिल था?" अवंतिका ने पूछा।

वीर ने सिर हिला दिया।

"हाँ।"

"तो इस तिल का मतलब क्या है?"

वीर कुछ देर चुप रहा। जैसे वह तय कर रहा हो कि कितना सच बताया जाए।

"मैं सब नहीं जानता," उसने आखिर कहा। "लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि यह कोई साधारण निशान नहीं है।

बचपन से इस निशान के बारे में कहानियाँ सुनता आया हूँ। लोग कहते हैं... इसका संबंध काली कोठी से है।"

"और श्यामला से?"

वीर ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।
"शायद..."

बस एक शब्द।

लेकिन उसी एक शब्द ने अवंतिका के मन में दर्जनों नए सवाल खड़े कर दिए।

दुकान से बाहर निकलते समय सूरज डूब चुका था। पूरा आसमान लाल और बैंगनी रंग में डूबा हुआ था।

पीछे से वीर की आवाज़ आई।

"अवंतिका।"

वह पलटी।

वीर दरवाज़े पर खड़ा था।

"आरोही को मैं बचा नहीं पाया..." उसने शांत स्वर में कहा। "लेकिन अगर तुम यहाँ रुकने का फैसला करती हो... तो मैं तुम्हारा साथ दूँगा।"

अवंतिका ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन पहली बार उसे लगा कि इस रहस्य में वह बिल्कुल अकेली नहीं है।

रात को कमरे में लौटकर उसने खिड़की के शीशे पर लिखे शब्दों को धीरे-धीरे मिटा दिया।

"तू मेरी है।"

शब्द मिट गए, लेकिन उनका असर नहीं।
शीशे में अब सिर्फ़ उसका अपना चेहरा दिखाई दे रहा था।
उसकी नज़र अनायास बाईं आँख के पास बने उस छोटे-से तिल पर टिक गई।

आज पहली बार उसे उस तिल से डर लगा।
लेकिन अगले ही पल उसने नोटबुक खोली और एक नए पन्ने पर लिखा

"मैं भागने नहीं आई हूँ। मैं सच जानने आई हूँ।"

उसने कलम बंद की और गहरी साँस ली।

अब यह सिर्फ़ एक ख़बर नहीं रही थी।

यह उसकी अपनी कहानी बन चुकी थी।

उसी समय, दूर काली कोठी की सबसे ऊपरी मंज़िल पर एक दीपक अपने आप जल उठा।

उस हल्की-सी रोशनी में खिड़की के पास एक स्त्री की धुंधली परछाईं दिखाई दी।

वह चुपचाप गेस्ट हाउस की दिशा में देख रही थी।

उसके होंठों पर एक धीमी मुस्कान उभरी।

उसे यक़ीन था...

अवंतिका अब इस रास्ते से लौटने वाली नहीं थी।