Holy Love or Curse 2 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 13

Featured Books
Categories
Share

पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 13

रात का सन्नाटा एक भयानक गर्जना से टूट गया। जंगल के चारों ओर से दर्जनों राक्षस निकल आए। उनकी लाल आँखें अंधेरे में चमक रही थीं। रितांश तुरंत खड़ा हो गया। उसकी आँखें भी गहरी लाल हो गईं। उसने सिद्धिदात्री को अपने पीछे कर लिया।

एक राक्षस गुर्राया—
रक्तवंश के उत्तराधिकारी! आज तुम्हारा अंत निश्चित है!

यह कहकर वे सब एक साथ रितांश की ओर झपट पड़े। लेकिन इससे पहले कि वे उसके पास पहुँचते सिद्धिदात्री आगे आ गई।
उसकी आँखें अचानक Sky Blue हो गईं।

उसकी गर्दन पर बना ॐ का चिन्ह तेज़ी से चमकने लगा। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। अगले ही पल सुनहरी और नीली दिव्य ऊर्जा की लहर राक्षसों की ओर बढ़ी।
धड़ाम!!
कई राक्षस दूर जाकर गिरे। कुछ चीखने लगे। रितांश हैरानी से उसे देख रहा था।

वो बोला - 
तुम्हारी शक्तियाँ...

सिद्धिदात्री ने उसकी ओर देखा।

बोली - 
मुझे नहीं पता ये कैसे हो रहा है... लेकिन मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी।

तभी पीछे से एक विशाल राक्षस ने हमला किया। रितांश ने तुरंत सिद्धिदात्री का हाथ पकड़ लिया। जैसे ही दोनों के हाथ एक-दूसरे से जुड़े दोनों के शरीर से तेज़ प्रकाश निकलने लगा। रितांश की लाल शक्ति और सिद्धिदात्री की दिव्य शक्ति आपस में मिलने लगी।
लाल और सुनहरी ऊर्जा एक-दूसरे में समा गई। 

पूरा जंगल काँप उठा। आकाश में बादल गरजने लगे। उनकी संयुक्त शक्ति अब सामान्य नहीं रही थी। वह दस गुना अधिक शक्तिशाली हो चुकी थी। रितांश की पीठ से विशाल काले पंख निकल आए। वहीं सिद्धिदात्री के पीछे सुनहरी आभा प्रकट हो गई। उसके सिर के पीछे प्रकाश का एक दिव्य चक्र दिखाई देने लगा। एक राक्षस भय से काँप उठा।

वो बोले -
नहीं...! भविष्यवाणी सच हो रही है!

दूसरा चिल्लाया—
भागो! रक्तवंश और देवकन्या की संयुक्त शक्ति जाग चुकी है!

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। रितांश और सिद्धिदात्री ने एक साथ हाथ उठाया। और अगले ही क्षण एक विशाल लाल-सुनहरी ऊर्जा तरंग चारों ओर फैल गई।
धड़ाआआम!!
पूरे जंगल में तेज़ प्रकाश फैल गया। सारे राक्षस दूर जा गिरे। कुछ वहीं बेहोश हो गए और बाकी भयभीत होकर भाग निकले। प्रकाश धीरे-धीरे शांत हो गया। दोनों अब भी एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़े थे। दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं। सिद्धिदात्री ने धीरे से रितांश की ओर देखा।

वो बोला - 
ये... क्या था?

रितांश ने भी पहली बार महसूस किया जब भी वह उसके साथ होता है...वह पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो जाता है। और दूर...अंधकार के महल में बैठा शैतानों का राजा भय से खड़ा हो गया। उसकी आँखों में पहली बार डर साफ दिखाई दे रहा था।

वो बोला - 
नहीं...उनकी संयुक्त शक्ति जाग चुकी है...अगर इन्हें अभी नहीं रोका गया...तो मेरा अंत निश्चित है।

उधर...हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच, एक प्राचीन गुफा में कृष्णा अग्निहोत्री ध्यानमग्न बैठे थे। लेकिन आज...उनका ध्यान बार-बार भंग हो रहा था। उनकी आँखें अचानक खुल गईं। उनकी साँसें तेज़ हो गईं। कई वर्षों से उन्होंने अपने भीतर की शक्तियों को शांत रखा था। लेकिन आज...उन्हें लग रहा था कि सब कुछ बदल रहा है। उन्होंने अपने हाथों को देखा।वो हाथ, जो समय के साथ बूढ़े हो चुके थे...अब फिर से युवा हो चुके थे।उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक लौट आई थी। वही चेहरा...जिससे सिद्धिका पहली बार ऑफिस में मिली थी।

कृष्णा धीरे से बुदबुदाए—
सिद्धिका...तुम लौट रही हो।

वे जानते थे नियम यही था। यदि सिद्धिका की दिव्य शक्तियाँ फिर से जागेंगी...तो उसका पति भी पुनः युवा हो जाएगा। लेकिन इस बार...उनके मन में खुशी से अधिक चिंता थी।

वो बोले - 
अगर सिद्धिका को सब कुछ याद आ गया...तो वह फिर खतरे में पड़ जाएगी।

दूसरी ओर घर में...राधा अब भी आईने के सामने खड़ी थी।
वह बार-बार अपने चेहरे को छू रही थी। उसकी उम्र चालीस वर्ष थी। लेकिन आईने में...उसे बीस वर्ष की एक युवती दिखाई दे रही थी वह घबराकर पीछे हट गई।

वो बोली - 
ये कैसे हो सकता है...?

अचानक...उसकी आँखें कुछ क्षणों के लिए लाल हो गईं। कमरे की खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं। तेज़ हवा चलने लगी। रितांशी डर गई।

वो बोली - 
माँ!

राधा ने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं। कुछ ही क्षणों में सब सामान्य हो गया। लेकिन उसका दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके भीतर क्या जाग रहा है। रात को...जब राधा सोई...तो उसे अजीब सपने आने लगे। उसने सपने में खुद को एक नदी के किनारे देखा। उसके सामने एक युवक खड़ा था। वही चेहरा...वही मुस्कान...कृष्णा।

सपने में वह हँसते हुए बोली—
आप मेरा नाम अपने हाथ से लिखिए।

और कृष्णा मुस्कुराकर उसके हाथ पर लिखते हैं—
राधे!

राधा अचानक चीखते हुए नींद से जाग गई। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

वो बोली - 
ये कौन सी यादें हैं...?
और मुझे कृष्णा की इतनी याद क्यों आ रही है?

उसे नहीं पता था...कि ये सिर्फ सपने नहीं थे। ये उसकी दबी हुई स्मृतियाँ थीं...जो धीरे-धीरे वापस लौट रही थीं। और उसी समय...
हिमालय में बैठे कृष्णा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उन्हें स्पष्ट महसूस हो रहा था—
समय आ गया है...हमारा परिवार फिर से मिलने वाला है।

लेकिन अंधकार के महल में... शैतानों का राजा मुस्कुरा रहा था।

वो बोला - 
हाँ...पर उससे पहले...सिद्धिका को सब कुछ याद आ जाएगा।
और वही उसके विनाश की शुरुआत होगी।

रात का अंधेरा पहले से कहीं अधिक भयावह था। रितांश और सिद्धिदात्री अभी पिछली लड़ाई से पूरी तरह उबरे भी नहीं थे कि अचानक—
धड़ाम!
चारों ओर से शक्तिशाली राक्षसों ने उन्हें घेर लिया। इस बार वे साधारण राक्षस नहीं थे। उनकी शक्तियाँ पहले से कई गुना अधिक थीं।

एक विशाल राक्षस गुर्राया—
महाराज का आदेश है! देवकन्या को जीवित पकड़ो!

रितांश तुरंत आगे आ गया। उसकी आँखें लाल हो गईं। उसके पंख निकल आए। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाता एक राक्षस ने अपनी शक्ति से उस पर हमला कर दिया।
धड़ाम!
रितांश दूर जा गिरा। दूसरे ही पल एक और भयानक प्रहार हुआ।
और रितांश संतुलन खोकर चट्टान से नीचे गिरने लगा।

सिद्धिदात्री चीख उठी -
रितांश!!

वह तेजी से नीचे गिर रहा था। चारों ओर सिर्फ अंधेरा था। उसे लगा यहीं सब खत्म हो जाएगा। लेकिन तभी...किसी ने उसे हवा में ही थाम लिया। बहुत मजबूत बाहें। बिल्कुल वैसी...जैसी उसे बचपन से याद थीं। कुछ ही क्षणों बाद...वह सुरक्षित एक चट्टान पर लेटा हुआ था। रितांश ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। उसकी धुंधली नजरों के सामने एक स्त्री की आकृति खड़ी थी। लाल साड़ी। लंबे बाल। लाल चमकती आँखें। और अपार शक्ति। रितांश की आँखें फैल गईं। उसके होंठ काँपे।

वो फुसफुसाया -
माँ...?

लेकिन इससे पहले कि वह कुछ और कह पाता ऊपर से एक भयानक गर्जना सुनाई दी। उन्होंने ऊपर देखा।बसिद्धिदात्री को कई राक्षस पकड़कर ले जा रहे थे। अचानक एक लाल चमक बिजली की तरह आकाश में दौड़ी। अगले ही पल वह स्त्री उनके सामने प्रकट हुई। लेकिन...वह राधा नहीं थी। वह थी सिद्धिका।बअपने असली, दिव्य और भयानक रूप में। उसकी आँखें लाल थीं। उसके चारों ओर सुनहरी और लाल ऊर्जा घूम रही थी। उसके चेहरे पर अपार क्रोध था।

वह राक्षसों की ओर देखकर बोली—
छोड़ दो उसे...

उसकी आवाज़ से पूरा जंगल काँप उठा।

सिद्धिका बोली - 
वह मेरे संरक्षण में है।

लेकिन राक्षस नहीं रुके। उनमें से एक हँस पड़ा।

वो बोला - 
अब तुम्हारी शक्ति पहले जैसी नहीं रही, सिद्धिका!
अब तुम्हारी वो उम्र नहीं रही...तुम दिखने में जवान हो पर तुम बूढ़ी हो गई हो...।

यह सुनते ही...सिद्धिका की नजर अचानक नीचे खड़े रितांश पर गई। उसने देखा उसका बेटा घायल था। उसके होंठों से खून बह रहा था। एक पल के लिए समय जैसे थम गया। फिर...सिद्धिका की आँखें और भी लाल हो गईं। पूरा आकाश काले बादलों से भर गया।
बिजलियाँ चमकने लगीं।

उसकी आवाज़ क्रोध से काँप उठी—
तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई...मेरे बेटे को चोट पहुँचाने की?

अगले ही क्षण उसके शरीर से निकली शक्ति ने पूरे जंगल को हिला दिया।
धड़ाआआम!!!
दर्जनों राक्षस चीखते हुए दूर जा गिरे। कुछ तो राख बनकर वहीं समाप्त हो गए। बाकी भय से काँपने लगे।

एक राक्षस डरकर बोला—
नहीं...! सिद्धिका पूरी तरह लौट आई है!

दूर खड़ा रितांश अपनी माँ को देख रहा था। उसने अपनी माँ को हमेशा एक साधारण, स्नेही और शांत स्त्री के रूप में देखा था।
लेकिन आज...उसके सामने खड़ी स्त्री कोई साधारण माँ नहीं थी।
वह एक ऐसी शक्ति थी...जिससे स्वयं राक्षस काँपते थे। और उसी क्षण...बहुत दूर हिमालय में कृष्णा अग्निहोत्री मुस्कुरा उठा।

वो बोला - 
स्वागत है, सिद्धिका...तुम आखिर लौट ही आई।