MTNL ki ghanti - 29 in Hindi Drama by kalpita books and stories PDF | MTNL की घंटी - 29

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MTNL की घंटी - 29

सुबह की पहली किरणें NGO मे खिड़की से झाँक रही थीं।
रसोई से आती खुशबू पूरे घर में फैल रही थी—महक ने नाश्ते में पूड़ी, आलू की सब्ज़ी, पराठे, बेसन का चिल्ला, और गरमा-गरम चाय सब कुछ तैयार कर दिया था।

बच्चे भी आज जल्दी उठ गए, क्योंकि वह देव के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहते थे।
हँसी-ठिठोली के बीच आलोक और सुधा भी आ पहुँचे।
"अरे वाह, महक… इतने सारे पकवान! लगता है आज हम पेट पकड़कर ही उठेंगे," सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा। 
"वाह देवर जी आज तो आप जी भर कर खायेंगे आज तो परहेज नही करेंगे" सुधा ने छेड़ते हुए देव से कहा ।देव के गाल भी किसी  20 साल के लड़के जैसे लाल हो गये।

नाश्ते की मेज़ पर सब एक साथ बैठे—गर्म-गर्म पूड़ियों की खुशबू, बच्चों की खिलखिलाहट बच्चो की संतुष्ट नज़रें उस पल को और भी अपना बना रही थीं।

खाते-खाते सुधा ने धीरे से कहा,
"महक, सामान बाँध लेना… दोपहर तक दिल्ली की ओर निकल जाएँगे।"

महक के हाथ हल्के से रुक गए, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
बच्चों ने ये सुना तो उनके चेहरे उतर गए।
"नहीं… हमें नहीं जाना…" वे एक साथ बोल पड़े, मानो किसी ने उनका खेल बीच में रोक दिया हो।

आलोक ने प्यार से समझाया,
"देखो, हम फिर से आ जाएँगे… लेकिन ताया जी और तायी जी अकेले हैं, उन्होंने एक दिन के लिए ही इजाजत दी थी । वैसे भी तुम सब को हमेशा के लिए ही तो आना है फिर आराम से खेलना।

बच्चों ने चुपचाप सिर हिला दिया, लेकिन उनकी आँखों में साफ़ दिख रहा था कि मन अब भी यहाँ, इन वादियों में, देव पापा के पास ही अटका हुआ रहेगा।

नाश्ता खत्म होते ही सब अपने-अपने कमरों में सामान समेटने लगे।
बाहर धूप हल्की-सी सुनहरी हो गई थी, लेकिन महक के मन में एक अजीब-सी ठंडक थी।

महक चुपचाप आँगन में आई और दूर पेड़ों के बीच से झलकते पहाड़ों को देखने लगी।
पीछे से देव की आहट आई—
"इतनी चुप क्यों हो, महक?"

महक ने मुस्कुराने की कोशिश की,
"कुछ नहीं… बस सोच रही थी, कैसे सब इतनी जल्दी बदल जाता है… अभी कल ही तो हम आये थे, और आज जाना पड़ रहा है. ...तुमसे दूर"
उसकी आवाज़ हल्की-सी रुक गई।

देव ने पास आकर कहा,
"महक, दूरी सिर्फ रास्तों में होती है… दिलों में नहीं।"

महक ने उसकी तरफ़ देखा—उसकी आँखों में वही सच्चाई थी, जो शब्दों से कहीं गहरी थी।
देव ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया,
"जब भी तुम्हें लगे मैं दूर हूँ… बस ये हाथ याद कर लेना, और यकीन मानो, मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"

महक ने हल्की-सी हँसी में अपनी नमी छिपाने की कोशिश की,
"देव जी को इतना अच्छा बोलना किसने सिखाया?"

देव मुस्कुराया,
"वो तो मै अपनी प्यारी लेखिका के लिए सीख रहा हूं "
कभी कभी सपने सच होते है कभी ऐसा वक़्त था की उसे लेखिका तो दूर कलम पकड़ने की भी इजाजत नही थी और अब उसे लेखिका सुनना  एक सपना पूरा होना  जैसा  लग रहा  है।
देव जी आपको याद है एक बार आपने कहा था की महक तुम्हे लिखना चाहिए बाते बहुत बनाती हो और ख्यालो की दुनिया मे रहती हो
देव ने हस कर जवाब दिया की सब याद है..कभी भी नही भुला।

तभी दूर से आलोक की आवाज़ आई—
"महक, चलो! गाड़ी तैयार है।"

महक ने देव का हाथ धीरे से छोड़ दिया, पर दोनों की नज़रों में एक अनकहा वादा चमक रहा था—
एक वादा कि ये आख़िरी मुलाक़ात नहीं होगी।

गाड़ी के पास आते ही परी देव के पास भागी और उसका हाथ पकड़ लिया,
"देव पापा… आप भी चलो हमारे साथ दिल्ली।"
उसकी आँखों में सच्ची विनती थी, मानो जाने का मतलब बिछड़ना हो।

देव ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"नहीं बेटा… मैं दिल्ली नहीं आ सकता।
लेकिन तुम लोग जल्दी से आओ मेरे पास… बस कुछ दिन की बात है।"

परी के होंठ सिकुड़ गए, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
देव ने झुककर उसकी आँखों में देखा,
"अभी तुम दिल लगाकर अपने पेपर दो… फिर मेडिकल लेकर डॉक्टर बनना है, याद है ना?
और सुनो… मैंने दून स्कूल में तुम दोनों के एडमिशन की बात कर ली है।"

बच्चों ने हैरानी और खुशी के बीच देव को देखा,
"सच पापा?"
"सच," देव ने मुस्कुराकर कहा,
"अब पढ़ाई यहाँ होगी… और मिलना रोज़ का होगा। फिर मै तुम सब को कहीं जाने नही दूंगा।

महक एक तरफ़ खड़ी ये सब सुन रही थी—दिल में राहत भी थी और एक अजीब-सी कसर भी।
देव ने उसकी तरफ़ देखा,
उस नज़र में बच्चों के लिए स्नेह और महक के लिए वही अनकहा वादा था,
जो विदाई को थोड़ा आसान और थोड़ा मुश्किल दोनों बना रहा था।

सब गाड़ी में बैठने लगे थे, लेकिन देव के चेहरे पर एक अजीब-सी खामोशी उतर आई थी।
उसका मन जैसे बग़ावत कर रहा था—पर होंठ बंद थे।
वो चुपचाप  वापिस आकर अपनी दहलीज़ पर खड़ा हो गया,
आँखों में एक बेचैनी, जैसे किसी ने उसके भीतर से सब कुछ खींच लिया हो।

महक ने मुड़कर देखा—देव वहाँ नहीं था जहाँ वह अभी खड़ा था।
उसका दिल धक से रह गया।
"मैं अभी आई…" बस इतना कहकर वह फूलों की क्यारी वाले रास्ते से वापस भागी।

दहलीज़ में खड़े देव को देखते ही महक ने बिना सोचे-समझे उसे कसकर गले से लगा लिया।
उसकी साँसें तेज़ थीं, दिल की धड़कनें जैसे देव के सीने से टकराकर पुकार रही हों—
"रोक लो मुझे, देव…"

देव के हाथ कुछ पल के लिए उसके कंधों पर ठहर गए…
लेकिन फिर उसने बिना कुछ कहे महक को धीरे से अलग किया।
आँखों से ही जाने का इशारा किया—उस इशारे में शब्दों से ज़्यादा दर्द था।

महक की पलकें भीग गईं।
वो पल ऐसा था मानो शरीर से आत्मा निकल रही हो…
और पीछे रह गया हो सिर्फ एक खालीपन, जो देव ने गुजारने थे बस कुछ दिन और 
                      ___________
बस कुछ दिन और......महक और देव के मिलन मे
पढ़ना जारी रखे।
...to be continued