(रात का वक़्त। आसमान में हल्के बादल हैं, पर उनमें से चाँद की एक हल्की सी झलक दिखती है।
सिया बालकनी में है — सजी धजी लाल साड़ी में , किसी मासूम दुल्हन सी लग रही थी। हाथ में चलनी और थाली लिए हुए।
उसकी आँखों में इंतज़ार है, पर चेहरा थका हुआ और फीका लग रहा है।)
(धीरे-धीरे हवा तेज़ चलने लगती है, उसके बाल चेहरे पर उड़ते हैं।
वो थाली उठाती है, चाँद की ओर देखती है — और मुस्कुरा देती है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“चाँद निकल आया… अब व्रत पूरा हो गया…”
(वो चलनी से चाँद देखती है, पर आगे वो canfuse हो गई कि अब वो किसे देखे क्योंकि उसे याद नहीं कि कौन है उसका पति? वो थोड़ा सा इधर उधर घूमती है और गलती से उसकी चलनी कबीर की तरफ चली गई। वो ठहर सी गई।
जो छत पर ही खड़ा उसे देख रहा था।
उनकी नज़रों में कुछ ऐसा है — जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता।)
(अचानक सिया की आँखों के सामने धुंध छा जाती है।
वो लड़खड़ाती है, थाली गिरती है और वो ज़मीन पर गिरकर बेहोश हो जाती है।)
(कबीर भागता हुआ सिया urf सिमरन तक पहुँचता है।
वो सिया को ज़मीन पर पड़ा देख काँप उठता है।)
कबीर (घबराकर) बोला -
“सिमरन!! सिमरन उठो!! सुनो ना… आँखें खोलो!!”
(वो उसके सिर को अपनी गोद में रख लेता है।
सिया की साँसें धीमी हैं। कबीर के हाथ काँप रहे हैं।
वो जल्दी से पास रखी पूजा की लोटे से पानी उठाता है और उसके होंठों पर लगाता है। तभी अचानक उसे याद है कि वो अभी कबीर है ना कि करण। सिमरन अभी सिया है। वो फिर उसे सिया बोलने लगा।)
कबीर (आवाज़ टूटती हुई आवाज में) बोला -
“पानी पियो सिया… बस थोड़ा सा… देखो मेरी तरफ़…”
(धीरे-धीरे सिया की पलकों में हरकत होती है।
वो आँखें खोलती है — धुंधला-धुंधला सब दिख रहा है।)
सिया (धीरे से, टूटी आवाज़ में) बोली -
“कबीर जी… चाँद… निकल आया था न?”
(कबीर की आँखें भर आती हैं, वो सिर हिलाता है — हाँ में।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“हाँ सिया… चाँद भी निकला… और तुम भी फिर से मेरे पास…”
(सिया हल्की मुस्कान देती है,
फिर उसका सिर कबीर के सीने पर टिक जाता है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“पता नहीं क्यों… हर बार जब मैं बेहोश होती हूँ…
तो लगता है जैसे… कोई मेरा नाम लेकर पुकार रहा हो…
‘सिमरन’… पर मेरा नाम तो सिया है।”
(कबीर का चेहरा सख्त हो जाता है।
वो धीरे से उसका सिर सहलाता है, लेकिन उसकी आँखों में डर है —
कहीं वो सब याद न कर ले जो उसने खोया है।)
कबीर (धीरे से, उसके माथे पर हाथ रखकर) बोला -
“अब कुछ मत सोचो… बस आराम करो…”
(वो उसे अपनी बाहों में उठा लेता है,
नीचे कमरे में ले आता है।
कमरे में चाँद की रोशनी सीधे उनके ऊपर गिर रही है —
जैसे कोई अधूरी कहानी अब फिर से शुरू होने वाली हो।)
“वो बेहोश हुई थी एक व्रत के लिए,
पर होश में आते ही किस्मत का एक और अध्याय खुलने वाला था।
क्योंकि ‘सिया’ के भीतर अब ‘सिमरन’ जागने लगी थी…”
(रात गहरी हो चुकी है। कमरे में हल्की नीली चाँदनी फैली हुई है।
सिया बिस्तर पर लेटी है — मगर उसकी आँखें बंद हैं, नींद में भी उसका चेहरा बेचैन है।)
(सिया करवट बदलती है… और तभी सपना शुरू होता है।
एक-एक दृश्य धुंध की तरह उसकी आँखों के सामने आने लगता है…)
सपना (फ्लैशबैक जैसा)
(एक पुराना कमरा, दीवारों पर लाल निशान।
एक आदमी का चेहरा — धुंधला पर उसकी आँखें पहचान में आती हैं — वो करण था।)
करण (सपने में) बोला -
“सिमरन… भागो यहाँ से! वो लोग आ रहे हैं!!”
(सिया की आँखें चौड़ी हो जाती हैं।
वो खुद को दौड़ते हुए देखती है, उसकी साँसें तेज़ हैं, पीछे से शोर, चिल्लाने की आवाजें…)
रुद्र (गूँजती हुई आवाज़ में) बोला -
“तुमने हमें धोखा दिया करण!
एक इंसान के लिए अपने भाईचारे को तोड़ दिया!”
(सिया पीछे मुड़ती है — करण लड़ रहा है, उसका चेहरा खून से लथपथ है।
वो चिल्लाती है — “करण जी!!”
और तभी तेज़ रोशनी फैल जाती है… सब कुछ गायब।)
(सिया की आँखें खुल जाती हैं।
उसकी साँसें तेज़ हैं, माथे पर पसीना।
वो उठकर बैठ जाती है और अपनी धड़कनें महसूस करती है।)
सिया (हैरानी से) बोली -
“कौन था वो… जिसने मुझे सिमरन कहा?
और ये करण… कौन है?”
(वो अपने सिर को पकड़ लेती है —
जैसे कोई याद जबरदस्ती लौटने की कोशिश कर रही हो।)
(इतने में दरवाज़ा खुलता है।
कबीर (असल में करण) अंदर आता है, हाथ में पानी का गिलास लिए।)
कबीर (चिंतित होकर) बोला -
“सिया, सब ठीक है ना? तुम फिर से पसीने-पसीने हो गई हो…”
सिया (घबराई आवाज़ में) बोली -
“कबीर जी… मुझे सपना आया था… कोई मुझे सिमरन कह रहा था…
और एक लड़का… करण… वो मुझे बचा रहा था…”
(कबीर के चेहरे पर जैसे खून जम जाता है।
उसके हाथ से पानी का गिलास धीरे से नीचे गिर जाता है — आवाज़ आती है - “ठप!”)
कबीर (धीरे, डरे स्वर में) बोला -
“सपना… बस सपना था सिया।
कुछ चीज़ें याद करना अच्छा नहीं होता…”
(सिया उसे देखती है,
वो महसूस करती है कि कबीर की आँखों में कुछ छिपा हुआ है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“कबीर जी… क्या आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”
(कबीर उसके पास आता है, उसके चेहरे को थामता है,
और मुस्कुरा कर कहता है — लेकिन मुस्कान में दर्द है।)
कबीर बोला -
“अगर मैं कहूँ कि कुछ बातें… याद आने से बेहतर है भूल जाना…
तो क्या तुम मानोगी?”
(सिया चुप रहती है, बस उसकी आँखों में देखती है —
जैसे कहीं बहुत गहराई में कोई पहचान जाग उठी हो।)
“कभी-कभी यादें सोई नहीं होतीं…
बस वक़्त के किसी कोने में छिपी होती हैं…
और जब वक्त सही आता है — तो सबकुछ याद दिला देती हैं।”