Incomplete Love: Two Worlds - Part 15 in Hindi Love Stories by sukhvinder Singh Rai books and stories PDF | अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 15

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अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 15

**भाग पंद्रह: मासूम दिल की ज़िद और आँसुओं की विदाई**अगली सुबह जब हवेली के ऊँचे कमरों में सूरज की पहली किरण पहुँची, तो वह पल्लवी के जीवन में कोई रोशनी नहीं ला सकी। इंजेक्शन के असर से जब उसकी भारी पलकें धीरे-धीरे खुलीं, तो कमरे की दीवारें उसे किसी जेल की तरह चुभने लगीं। उसने अपनी सूजी हुई आँखों से अपने बिल्कुल बगल में बैठी माँ सुमन को देखा, जो रात भर जागने के कारण बेहद थकी हुई लग रही थीं।"मॉम..." पल्लवी की आवाज़ में अब रोने की ताकत भी नहीं बची थी, सिर्फ एक गहरा खालीपन था।"बेटा! तू उठ गई? देख, मैंने तेरे लिए गरमा-गरम सूप बनाया है, दो चम्मच पी ले मेरी बच्ची," सुमन ने आंसू छुपाते हुए कटोरी आगे बढ़ाई। पर पल्लवी ने धीरे से अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया। वह बिस्तर से उठी, उसके पैर की मोच का दर्द अब कम था, लेकिन सीने के अंदर की तड़प और बढ़ चुकी थी। वह लंगड़ाते हुए खिड़की के पास गई और बाहर लॉन में खड़ी अपनी सफेद कार को देखने लगी। उसे कबीर की वह बुलेट, उसकी वह डांट याद आ रही थी।"मॉम, क्या वह जंगली बंदर सच में चला गया?" पल्लवी ने खिड़की के कांच पर अपना माथा टिकाते हुए बहुत ही बेजान आवाज़ में पूछा। "उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा? क्या मेरा सच्चा प्यार उसके लिए सिर्फ एक रईसी नाटक था?"सुमन के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। वह बस पीछे से आकर पल्लवी के कांपते कंधों को थामकर रोने लगीं।उधर, शिवाजी कॉलोनी के उस छोटे से सीलन भरे कमरे में कबीर तख्त पर बैठा था। कमरे में कूलर बंद था, सिर्फ छत का पुराना पंखा चर्र-चर्र की आवाज़ कर रहा था। कबीर की निगाहें अपनी उसी कलाई पर टिकी थीं, जिसे पल्लवी ने कल अपनी नाज़ुक उंगलियों से पकड़ा था। कबीर का वह सख्त और पत्थर जैसा दिल आज अंदर ही अंदर रो रहा था। उसने कल रात पल्लवी के पिता का दिया हुआ वह करोड़ों का चेक बाहर कीचड़ में फाड़कर फेंक दिया था, क्योंकि वह पल्लवी के आंसुओं की कीमत नहीं लगा सकता था। उसने पल्लवी को अपनी दुनिया से दूर सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वह उसे इस तंग गली के दुखों में नहीं ढकेलना चाहता था।कबीर ने कमरे के कोने में रखे उस छोटे से शीशे में अपना चेहरा देखा। उसके कटे हुए होंठ का खून सूख चुका था। उसने आहिस्ता से उस चोट को छुआ और उसकी आँखों से एक गरम आंसू टपक कर उसकी शर्ट पर गिर गया।"तुम्हें मुझसे बहुत बेहतर मिलेगा पल्लवी..." कबीर ने बंद दरवाज़े की तरफ देखते हुए बहुत ही रुआंसी आवाज़ में कहा, "तुम महलों की रानी हो, और मैं इस रास्ते का पत्थर। पत्थरों से ठोकर लगती है पल्लवी, महल नहीं बनते। मुझे भूल जाओ... इसी में तुम्हारी भलाई है।"एक तरफ आलीशान हवेली की खिड़की पर खड़ी पल्लवी रो रही थी, और दूसरी तरफ अपनी इस टूटी हुई झोपड़ी में बैठा कबीर तड़प रहा था। दो अलग दुनिया के इन दो दिलों ने एक-दूसरे को अपनी सांसों से भी ज़्यादा चाहा था, लेकिन हकीकत की इस दीवार ने उनकी पहली मोहब्बत का ऐसा दर्दनाक अंत किया था कि आज आसमान भी उनकी इस बेबसी पर आंसू बहा रहा था।